कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ )
१४ सू० । बलास ( क्षय रोग Consumption ) रोग के निवारण
का मंत्र ।
१६ सू० । चक्षु रोग ( Ophthalmia ) आरोग्य का मंत्र टीकाकार
गण इस सूक्त को चक्षु रोग में सरिसों का ( mustard ) व्यवहार सूचित
होता है । कौशिक इस सूत्र के मंत्र में ( ३०।१।७ ) इस सम्बन्ध में
विस्तृत व्यवस्था दृष्ट होती है । इस मंत्र के उच्चारण के साथ सरिसों वृक्ष
के यंत्र, सरसों के तैल सिक्त करके बान्ध देवे, सरसों के पत्ते का रस
सेवन करने को देवे । और पत्ते को पीस कर नेत्र के ऊपर प्रलेप करे ।
२० सू० । तक्षण ( १म का० २५ सू० । )
२१ सू० केशवृद्धि के मंत्र । ६ ठा काण्ड १३७ और १३ श सू० में
नितत्नी नामक लता को केश बढ़ाने के लिये की गई है इस नितत्नी
लता का स्वरूप स्थिर नही हुआ है । मंत्र में यहां तक कहा गया है जो
यह लता को जमदग्नि अपनी कन्या के लिये मट्टी से उखाड़ा था । इस
लता को सम्बोधन करके कहते हैं—“हे लते ! तू पुरातन केश को दृढ़
कर, नये केश को उत्पादन कर, और वर्तमान केशों को घन कर दो
( ६।१३६।२ ) । छठे काण्ड में ३० सू० में “शमी वृक्ष” ( Drosopis
spicogera or Acun sum ) केश बढ़ाने के लिये बुलाया
गया है ।
२४ सू० । शोथ ( Dropsry ) वक्षः पीड़ा ( heart disease ) इस
पीड़ा के लिये स्रोत ( सोते के ) के जल की व्यवस्था की गयी है ।
१ का० ८३ सूक्त में भी शोथका और भी एक मंत्र है । कौशिक सूत्र
( ३२।१४ ) २५ सू० शरीर के ऊपर गण्डमाला का मंत्र है । कौशिक सूत्र
( ३०।१४ ) ८३ सू० में एक और मंत्र है । ५७ सू० में गण्डमाला की
चिकित्सा में जालस गोमूत्र व्यवहृत हुआ है । ३० सू० में केश वृद्धि
के लिये शमी वृक्ष को बुलाया गया है । ( २१ सू० ) ३७ सू० रोग का
मूल कारण अप्सरा, गन्धर्व सबको दूर करने के लिये “अजशृङ्गी” को
( Odinapinata ) आह्वान किया गया है । ४४ सू० । देह से अत्यधिक
स्राव निवारण का मंत्र १म काण्ड, २रा सू० । ५७ सू० गण्डमाला की
दवा इस सूक्त में कही गयी है । जालस् अर्थात् गोमूत्र इस रोग में
व्यवहृत होता है । कौशिक सूत्र (२२।११।१३) में वर्णित है जो गण्डमाला
पर गोमूत्र का फेन लेपन करे । ( २५।८३ सू० देखो । ८०म सू० पक्षा-
घात आरोग्य करने में सूर्य को इस सूक्त से स्तव किया गया है । ८३ म