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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

९६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

९६कठोपनिषद्[ अध्याय २
प्रत्यक्चासावात्मा चेति प्रत्यगात्मा। प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढो लोके नान्यस्मिन्। व्युत्पत्तिपक्षेऽपि तत्रैवात्मशब्दो वर्तते।<br><br>“यच्चाप्नोति यदादत्ते<br>  यच्चात्ति विषयानिह।<br>यच्चास्य संततो भाव-<br>  स्तस्मादात्मेति कीर्त्यते”<br>   (लिङ्ग० १। ७०। ९६)<br><br>इत्यात्मशब्दव्युत्पत्तिस्मरणात्।ओरसे हटाकर] उस अपने प्रत्यगात्माको [देखता है]। जो प्रत्यक् (सम्पूर्ण विषयोंको जाननेवाला) हो और आत्मा भी हो उसे प्रत्यगात्मा कहते हैं। लोकमें आत्मा शब्द ‘प्रत्यक्’ के अर्थमें ही रूढ है, और किसी अर्थमें नहीं। व्युत्पत्तिपक्षमें भी ‘आत्मा’ शब्दकी प्रवृत्ति उसी (प्रत्यक्-अर्थ ही) में है जैसा कि “क्योंकि यह सबको व्याप्त करता है, ग्रहण करता है और इस लोकमें विषयोंको भोगता है तथा इसका सर्वदा सद्भाव है इसलिये यह ‘आत्मा’ कहलाता है” इस प्रकार आत्मा शब्दकी व्युत्पत्तिके सम्बन्धमें स्मृति है।
तं प्रत्यगात्मानं स्वं स्वभावमैक्षदपश्यत्पश्यतीत्यर्थः, छन्दसि कालानियमात्। कथं पश्यतीत्युच्यते। आवृत्तचक्षुरावृत्तं व्यावृतं चक्षुः श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातमशेषविषयाद्यस्य स आवृत्तचक्षुः। स एवं संस्कृतः प्रत्यगात्मानं पश्यति। न हि बाह्यविषया-उस प्रत्यगात्माको अर्थात् अपने स्वरूपको ‘ऐक्षत्’—देखा यानी देखता है। वैदिक प्रयोगमें कालका नियम न होनेके कारण यहाँ वर्तमान कालके अर्थमें भूतकालकी क्रिया [ऐक्षत्] का प्रयोग हुआ है। वह किस प्रकार देखता है ? इसपर कहते हैं—‘आवृत्तचक्षुः’ अर्थात् जिसने अपनी चक्षु और श्रोत्रादि इन्द्रियसमूहको सम्पूर्ण विषयोंसे व्यावृत कर लिया है—लौटा लिया है, वह इस प्रकार संस्कारयुक्त हुआ पुरुष ही उस प्रत्यगात्माको देख पाता है। एक