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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९


किं चान्यदग्निविद्या पृष्टा प्रत्युक्ता च। तस्याश्च फलप्राप्तिप्रकारो वक्तव्य इति मन्त्रारम्भः। तत्र—इसके सिवा नचिकेताके पूछनेपर यमराजने पहले अग्निविद्याका भी वर्णन किया था; उस अग्निविद्याके फलकी प्राप्तिका प्रकार भी बतलाना है ही। इसी अभिप्रायसे इस मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। वहाँ [कहना यह है कि—]

शतं चैका च हृदयस्य नाड्य-
स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति
विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥

इस हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं; उनमेंसे एक मूर्धाका भेदन करके बाहरको निकली हुई है। उसके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर गमन करनेवाला पुरुष अमरत्वको प्राप्त होता है। शेष विभिन्न गतियुक्त नाड़ियाँ उत्क्रमण (प्राणोत्सर्ग) की हेतु होती हैं ॥ १६ ॥

[सुषुम्नाभेदेन अमृतत्वम्]<br><br>शतं च शतसंख्याका एका च सुषुम्ना नाम पुरुषस्य हृदयाद्विनिःसृता नाड्यः शिरास्तासां मध्ये मूर्धानं भित्त्वाभिनिःसृता निर्गता सुषुम्ना नाम। तयान्तकाले हृदय आत्मानं वशीकृत्य योजयेत्।<br><br>तया नाड्योर्ध्वमुपर्य्यायन् गच्छन्नादित्यद्वारेणामृतत्वममरण-पुरुषके हृदयसे सौ अन्य और सुषुम्ना नामकी एक—इस प्रकार [एक सौ एक] नाडियाँ—शिराएँ निकली हैं। उनमें सुषुम्ना नाम्नी नाडी मस्तकका भेदन करके बाहर निकल गयी है। अन्तकालमें उसके द्वारा आत्माको अपने हृदयदेशमें वशीभूत करके समाहित करे।<br><br>उस नाडीके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर जानेवाला जीव सूर्यमार्गसे अमृतत्व—आपेक्षिक अमरणधर्मत्व-