संग्रह पर लौटें

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९
पृष्ठ 81स्थायी लिंक
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९
| कथं लभ्यत इत्युच्यते—<br>तस्यात्मकामस्यैष आत्मा विवृणुते प्रकाशयति पारमार्थिकीं तनूं स्वां स्वकीयां स्वयाथात्म्यम् इत्यर्थः ॥ २३ ॥ | किस प्रकार उपलब्ध होता है, इसपर कहते हैं—उस आत्मकामीके प्रति यह आत्मा अपने पारमार्थिक स्वरूप अर्थात् अपने याथात्म्यको विवृत—प्रकाशित कर देता है ॥ २३ ॥ |
|---|
| किं चान्यत्— | इसके सिवा दूसरी बात यह भी है— |
|---|
आत्मज्ञानका अनधिकारी
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥
जो पापकर्मोंसे निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त असमाहित या अशान्त है वह इसे आत्मज्ञान-द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता है ॥ २४ ॥
| न दुश्चरितात्प्रतिषिद्धाच्छ्रुतिस्मृत्यविहितात्पापकर्मणोऽविरतः अनुपरतो नापीन्द्रियलौल्याद् अशान्तोऽनुपरतो नाप्यसमाहितोऽनेकाग्रमना विक्षिप्तचित्तः, समाहितचित्तोऽपि सन्समाधान- | जो दुश्चरित—प्रतिषिद्ध कर्म यानी श्रुति-स्मृतिसे अविहित पापकर्मसे अविरत—अनुपरत है वह नहीं, जो इन्द्रियोंकी चञ्चलताके कारण अशान्त यानी उपरतिशून्य है वह भी नहीं, जो असमाहित अर्थात् जिसका चित्त एकाग्र नहीं है—जो विक्षिप्तचित्त है वह भी नहीं, तथा समाहितचित्त होनेपर भी उस एकाग्रताके फलका इच्छुक |
|---|