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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
पृष्ठ 169स्थायी लिंक
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
| कदा पुनः कामानां मूलतो विनाश इत्युच्यते- | परन्तु कामनाओंका समूल नाश कब होता है ? इसपर कहते हैं— |
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यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥ १५ ॥
जिस समय इस जीवनमें ही इसके हृदयकी सम्पूर्ण ग्रन्थियोंका छेदन हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस सम्पूर्ण वेदान्तोंका इतना ही आदेश है ॥ १५ ॥
| [ग्रन्थिभेद एवामृतत्वम्]<br><br>यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते भेदम् उपयान्ति विनश्यन्ति हृदयस्य बुद्धेरिह जीवत एव ग्रन्थयो ग्रन्थिवद् दृढबन्धनरूपा अविद्याप्रत्यया इत्यर्थः । अहमिदं शरीरं ममेदं धनं सुखी दुःखी चाहम् इत्येवमादिलक्षणास्तद्विपरीतब्रह्मात्मप्रत्ययोपजननादब्रह्मैवाहमस्म्यसंसारीति विनष्टेष्वविद्याग्रन्थिषु तन्निमित्ताः कामा मूलतो विनश्यन्ति । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयेतावदेवैतावन्मात्रं नाधिकमस्तीत्याशङ्का कर्तव्या— | जिस समय यहाँ—जीवित रहते हुए ही इसके हृदयकी—बुद्धिकी सम्पूर्ण ग्रन्थियाँ अर्थात् दृढ बन्धनरूप अविद्याजनित प्रतीतियाँ छिन्न-भिन्न होतीं—भेदको प्राप्त होतीं अर्थात् नष्ट हो जाती हैं—'मैं यह शरीर हूँ, यह मेरा धन है, मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ' इत्यादि प्रकारके अनुभव अविद्या-प्रत्यय हैं; उसके विपरीत ब्रह्मात्मभावके अनुभवकी उत्पत्तिसे 'मैं असंसारी ब्रह्म ही हूँ' ऐसे बोधद्वारा अविद्यारूप ग्रन्थियोंके नष्ट हो जानेपर उसके निमित्तसे हुई कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं। तब वह मर्त्य (मरणधर्मा जीव) अमर हो जाता है। बस इतना ही सम्पूर्ण वेदान्तोंका अनुशासन—आदेश है; इससे अधिक कुछ और |
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