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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

१५६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१५६कठोपनिषद्[ अध्याय २

जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ, जो कि इसके हृदयमें आश्रय करके रहती हैं, छूट जाती हैं उस समय वह मर्त्य (मरणधर्मा) अमर हो जाता है और इस शरीरसे ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥

| [कामत्यागेन अमृतत्वम्]<br><br>यदा यस्मिन्काले सर्वे कामाः कामयितव्यस्यान्यस्याभावात्प्रमुच्यन्ते विशीर्यन्ते येऽस्य प्राक्प्रतिबोधाद्विदुषो हृदि बुद्धौ श्रिता आश्रिताः । बुद्धिर्हि कामानामाश्रयो नात्मा । “कामः संकल्पः” (बृ० उ० १ । ५ । ३) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च ।<br><br>अथ तदा मर्त्यः प्राक्प्रबोधात् आसीत्स प्रबोधोत्तरकालमविद्याकामकर्मलक्षणस्य मृत्योर्विनाशादमृतो भवति । गमनप्रयोजकस्य मृत्योर्विनाशाद्गमनानुपपत्तेरत्रैहैव प्रदीपनिर्वाणवत्सर्वबन्धनोपशमाद्ब्रह्म समश्नुते ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १४ ॥ | जब—जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ कामनायोग्य अन्य पदार्थका अभाव होनेके कारण छूट जाती हैं—छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जो कि बोध होनेसे पूर्व इस विद्वान्‌के हृदय—बुद्धिमें आश्रित रहती हैं—क्योंकि बुद्धि ही कामनाओंका आश्रय है, आत्मा नहीं; जैसा कि “कामना, संकल्प [और संशय—ये सब मन ही हैं]” इत्यादि एक दूसरी श्रुतिसे भी सिद्ध होता है।<br><br>तब फिर जो आत्मसाक्षात्कारसे पूर्व मरणधर्मा था वह जीव आत्मज्ञान होनेके अनन्तर अविद्या, कामना और कर्मरूप मृत्युका नाश हो जानेसे अमर हो जाता है । परलोकमें गमन करानेवाले मृत्युका विनाश हो जानेसे वहाँ जाना सम्भव न होनेके कारण वह इस लोकमें ही दीपनिर्वाणके समान सम्पूर्ण बन्धनोंके नष्ट हो जानेसे ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है, अर्थात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ १४ ॥ |

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७


कदा पुनः कामानां मूलतो विनाश इत्युच्यते-परन्तु कामनाओंका समूल नाश कब होता है ? इसपर कहते हैं—

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥ १५ ॥

जिस समय इस जीवनमें ही इसके हृदयकी सम्पूर्ण ग्रन्थियोंका छेदन हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस सम्पूर्ण वेदान्तोंका इतना ही आदेश है ॥ १५ ॥

[ग्रन्थिभेद एवामृतत्वम्]<br><br>यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते भेदम् उपयान्ति विनश्यन्ति हृदयस्य बुद्धेरिह जीवत एव ग्रन्थयो ग्रन्थिवद् दृढबन्धनरूपा अविद्याप्रत्यया इत्यर्थः । अहमिदं शरीरं ममेदं धनं सुखी दुःखी चाहम् इत्येवमादिलक्षणास्तद्विपरीतब्रह्मात्मप्रत्ययोपजननादब्रह्मैवाहमस्म्यसंसारीति विनष्टेष्वविद्याग्रन्थिषु तन्निमित्ताः कामा मूलतो विनश्यन्ति । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयेतावदेवैतावन्मात्रं नाधिकमस्तीत्याशङ्का कर्तव्या—जिस समय यहाँ—जीवित रहते हुए ही इसके हृदयकी—बुद्धिकी सम्पूर्ण ग्रन्थियाँ अर्थात् दृढ बन्धनरूप अविद्याजनित प्रतीतियाँ छिन्न-भिन्न होतीं—भेदको प्राप्त होतीं अर्थात् नष्ट हो जाती हैं—'मैं यह शरीर हूँ, यह मेरा धन है, मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ' इत्यादि प्रकारके अनुभव अविद्या-प्रत्यय हैं; उसके विपरीत ब्रह्मात्मभावके अनुभवकी उत्पत्तिसे 'मैं असंसारी ब्रह्म ही हूँ' ऐसे बोधद्वारा अविद्यारूप ग्रन्थियोंके नष्ट हो जानेपर उसके निमित्तसे हुई कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं। तब वह मर्त्य (मरणधर्मा जीव) अमर हो जाता है। बस इतना ही सम्पूर्ण वेदान्तोंका अनुशासन—आदेश है; इससे अधिक कुछ और

१५८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१५८कठोपनिषद्[ अध्याय २

| अनुशासनमनुशिष्टिरुपदेशः। सर्व-वेदान्तानामिति वाक्यशेषः ॥१५॥ | है ऐसी आशङ्का नहीं करनी चाहिये। यहाँ 'सर्ववेदान्तानाम्' यह वाक्यशेष है ॥ १५॥ |


| निरस्ताशेषविशेषव्यापि-ब्रह्मात्मप्रतिपत्त्या प्रभिन्नसमस्ता-विद्यादिग्रन्थेर्जीवत एव ब्रह्मभूतस्य विदुषो न गतिर्विद्यत इत्युक्तमत्र ब्रह्म समश्नुत इत्युक्तत्वात् । “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति” (बृ० उ० ४।४।६) इति श्रुत्यन्तराच्च ।<br><br>ये पुनर्मन्दब्रह्मविदो विद्या-न्तरशीलिनश्च ब्रह्मलोकभाजो ये च तद्विपरीताः संसारभाजः तेषामेव गतिविशेष उच्यते— प्रकृतोत्कृष्टब्रह्मविद्याफलस्तुतये । | जिसमें सम्पूर्ण विशेषणोंका अभाव है उस सर्वव्यापक ब्रह्मको ही अपने आत्मस्वरूपसे जान लेनेके कारण जिसकी अविद्या आदि समस्त ग्रन्थियाँ टूट गयी हैं और जो जीवितावस्थामें ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया है उस विद्वान्का कहीं गमन नहीं होता—ऐसा पहले कहा गया, क्योंकि [चौदहवें मन्त्रमें] 'इस शरीरमें ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है'—ऐसा कहा है। "उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते वह ब्रह्मरूप हुआ ही ब्रह्ममें लीन हो जाता है" इस एक दूसरी श्रुतिसे भी यही निश्चय होता है।<br><br>किन्तु जो मन्द ब्रह्मज्ञानी और अन्य विद्या (उपासना) का परिशीलन करनेवाले ब्रह्मलोक-प्राप्तिके अधिकारी हैं अथवा जो उनसे विपरीत [जन्म-मरणरूप] संसारको ही प्राप्त होनेवाले हैं, उन्हींकी किसी गतिविशेषका वर्णन यहाँ प्रकरणप्राप्त ब्रह्मविद्याके उत्कृष्ट फलकी स्तुतिके लिये किया जाता है। |

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९


किं चान्यदग्निविद्या पृष्टा प्रत्युक्ता च। तस्याश्च फलप्राप्तिप्रकारो वक्तव्य इति मन्त्रारम्भः। तत्र—इसके सिवा नचिकेताके पूछनेपर यमराजने पहले अग्निविद्याका भी वर्णन किया था; उस अग्निविद्याके फलकी प्राप्तिका प्रकार भी बतलाना है ही। इसी अभिप्रायसे इस मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। वहाँ [कहना यह है कि—]

शतं चैका च हृदयस्य नाड्य-
स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति
विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥

इस हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं; उनमेंसे एक मूर्धाका भेदन करके बाहरको निकली हुई है। उसके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर गमन करनेवाला पुरुष अमरत्वको प्राप्त होता है। शेष विभिन्न गतियुक्त नाड़ियाँ उत्क्रमण (प्राणोत्सर्ग) की हेतु होती हैं ॥ १६ ॥

[सुषुम्नाभेदेन अमृतत्वम्]<br><br>शतं च शतसंख्याका एका च सुषुम्ना नाम पुरुषस्य हृदयाद्विनिःसृता नाड्यः शिरास्तासां मध्ये मूर्धानं भित्त्वाभिनिःसृता निर्गता सुषुम्ना नाम। तयान्तकाले हृदय आत्मानं वशीकृत्य योजयेत्।<br><br>तया नाड्योर्ध्वमुपर्य्यायन् गच्छन्नादित्यद्वारेणामृतत्वममरण-पुरुषके हृदयसे सौ अन्य और सुषुम्ना नामकी एक—इस प्रकार [एक सौ एक] नाडियाँ—शिराएँ निकली हैं। उनमें सुषुम्ना नाम्नी नाडी मस्तकका भेदन करके बाहर निकल गयी है। अन्तकालमें उसके द्वारा आत्माको अपने हृदयदेशमें वशीभूत करके समाहित करे।<br><br>उस नाडीके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर जानेवाला जीव सूर्यमार्गसे अमृतत्व—आपेक्षिक अमरणधर्मत्व-

१६० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१६०कठोपनिषद्[ अध्याय २

| धर्मत्वमापेक्षिकम् । “आभूतसं-<br>प्लवं स्थानममृतत्वं विभाव्यते”<br>(वि० पु० २ । ८ । ९७)<br>इति स्मृतेः । ब्रह्मणा वा सह<br>कालान्तरेण मुख्यममृतत्वमेति<br>भुक्त्वा भोगाननुपमान्ब्रह्मलोक-<br>गतान् । विष्वङ्नानाविधगतयः<br>अन्या नाड्य उत्क्रमणे निमित्तं<br>भवन्ति संसारप्रतिपत्त्यर्था एव<br>भवन्तीत्यर्थः ॥ १६ ॥ | को प्राप्त हो जाता है, जैसा कि<br>“सम्पूर्ण भूतोंके क्षयपर्यन्त रहने-<br>वाला स्थान अमृतत्व कहलाता है”<br>इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है ।<br>अथवा [ यह भी तात्पर्य हो सकता<br>है कि ] कालान्तरमें ब्रह्माके साथ<br>ब्रह्मलोकके अनुपम भोगोंको भोगकर<br>मुख्य अमृतत्वको प्राप्त करता है ।<br>इसके सिवा जिनकी गति विविध<br>भाँतिकी हैं ऐसी अन्य सब नाड़ियाँ<br>प्राणप्रयाणकी हेतु होती हैं, अर्थात्<br>वे संसारप्राप्तिके लिये ही होती<br>हैं ॥ १६ ॥ |

| इदानीं सर्ववल्ल्यर्थोपसंहा-<br>रार्थमाह— | अब सम्पूर्ण वल्लियोंके अर्थका<br>उपसंहार करनेके लिये कहते हैं— |

उपसंहार

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥

अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जो अन्तरात्मा है सर्वदा जीवोंके हृदयदेशमें स्थित है । मूँजसे सींकके समान उसे धैर्यपूर्वक अपने शरीरसे बाहर निकाले [ अर्थात् शरीरसे पृथक् करके अनुभव करे ] । उसे शुक्र ( शुद्ध ) और अमृतरूप समझे, उसे शुक्र और अमृतरूप समझे ॥ १७ ॥

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६१

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६१


अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरा-<br>त्मा सदा जनानां सम्बन्धिनि<br>हृदये संनिविष्टो यथाव्याख्यातः<br>तं स्वादात्मीयाच्छरीरात्प्रवृहेत्<br>उद्यच्छेन्निष्कर्षेत्पृथक्कुर्यादित्यर्थः।<br>किमिवेत्युच्यते मुञ्जादिव<br>इषीकामन्तस्थां धैर्येणाप्रमादेन ।<br>तं शरीरान्निष्कृष्टं चिन्मात्रं विद्या-<br>द्विजानीयाच्छुक्रममृतं यथोक्तं<br>ब्रह्मेति । द्विर्वचनमुपनिषत्परि-<br>समाप्त्यर्थमितिशब्दश्च ॥१७॥अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जिसकी व्याख्या पहले (क० उ० २ । १ । १२-१३ में) की जा चुकी है और जो जीवोंके हृदयमें स्थित उनका अन्तरात्मा है उसे अपने शरीरसे बाहर करे—ऊपर नियन्त्रित करे—निकाले अर्थात् शरीरसे पृथक् करे । किस प्रकार पृथक् करे? इसपर कहते हैं—धैर्य अर्थात् अप्रमादपूर्वक इस प्रकार अलग करे जैसे मूँजसे उसके भीतर रहनेवाली सींक की जाती है। शरीरसे पृथक् किये हुए उस (अङ्गुष्ठमात्र पुरुष) को ही पूर्वोक्त चिन्मात्र विशुद्ध और अमृतमय ब्रह्म जाने। यहाँ 'तं विद्याच्छुक्रममृतम्' इस पदकी द्विरुक्ति और 'इति' शब्द उपनिषद्की समाप्तिके लिये हैं ॥ १७ ॥
विद्यास्तुत्यर्थोऽयमाख्यायि-<br>कार्थोपसंहारोऽधुनोच्यते—अब विद्याकी स्तुतिके लिये यह आख्यायिकाके अर्थका उपसंहार कहा जाता है—

मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा
विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्यु-
रन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥

१६२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१६२कठोपनिषद्[ अध्याय २

मृत्युकी कही हुई इस विद्या और सम्पूर्ण योगविधिको पाकर नचिकेता ब्रह्मभावको प्राप्त, विरज (धर्माधर्मशून्य) और मृत्युहीन हो गया। दूसरा भी जो कोई अध्यात्म-तत्त्वको इस प्रकार जानेगा वह भी वैसा ही हो जायगा ॥ १८ ॥

मृत्युप्रोक्तां यथोक्तामेतां ब्रह्मविद्यां योगविधिं च कृत्स्नं समस्तं सोपकरणं सफलमित्येतत्; नचिकेता वरप्रदानान्मृत्योर्लब्ध्वा प्राप्येत्यर्थः—किम् ? ब्रह्मप्राप्तोऽभून्मुक्तोऽभवदित्यर्थः। कथम् ? विद्याप्राप्त्या विरजो विगतधर्माधर्मो विमृत्युर्विगतकामाविद्यश्च सन्पूर्वमित्यर्थः।मृत्युकी कही हुई इस पूर्वोक्त ब्रह्मविद्या और कृत्स्न—सम्पूर्ण योग-विधिको, उसके साधन और फलके सहित, वरप्रदानके कारण मृत्युसे प्राप्त कर नचिकेता, क्या हो गया ? [इसपर कहते हैं] ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया, अर्थात् मुक्त हो गया । सो किस प्रकार ? [इसपर कहते हैं—] विद्याकी प्राप्तिद्वारा पहले विरज—धर्माधर्मसे रहित और विमृत्यु—काम और अविद्यासे रहित होकर [ मुक्त हो गया ] ऐसा इसका तात्पर्य है ।
न केवलं नचिकेता एव अन्योऽपि नचिकेतोवदात्मविद् अध्यात्ममेव निरुपचरितं प्रत्यक्स्वरूपं प्राप्य तत्त्वमेवेत्यभिप्रायः, नान्यद्रूपमप्रत्यग्रूपम् । तदेवमध्यात्ममेवमुक्तप्रकारेण वेद विजानातीत्येवंवित्सोऽपि विरजःकेवल नचिकेता ही नहीं, बल्कि नचिकेताके समान जो दूसरा भी आत्मज्ञानी है अर्थात् जो अपने देहादिके अधिष्ठाता उपचारशून्य प्रत्यक्स्वरूपको—यही तत्त्व है, अन्य अप्रत्यक्रूप नहीं—ऐसा जानता है, जो उक्त प्रकारसे अपने उसी अध्यात्मरूपको जानता है अर्थात् जो उसी प्रकार जाननेवाला है वह भी विरज (धर्माधर्मसे

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६३

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६३


सन्ब्रह्मप्राप्त्या विमृत्युर्भवतीति वाक्यशेषः ॥ १८ ॥रहित ) होकर ब्रह्मप्राप्तिद्वारा मृत्युहीन हो जाता है— वह वाक्यशेष है ॥ १८ ॥

शिष्याचार्ययोः प्रमादकृतान्यायेन विद्याग्रहणप्रतिपादननिमित्तदोषप्रशमनार्थेयं शान्तिरुच्यते—अब शिष्य और आचार्यके प्रमादकृत अन्यायसे विद्याके ग्रहण और प्रतिपादनमें होनेवाले दोषोंकी निवृत्तिके लिये यह शान्ति कही जाती है—

शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ १९ ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

परमात्मा हम [ आचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करे। हमारा साथ-साथ पालन करे। हम साथ-साथ विद्यासम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें। हमारा अध्ययन किया हुआ तेजस्वी हो। हम द्वेष न करें ॥१९॥

सह नावावामवतु पालयतु विद्यास्वरूपप्रकाशनेन । कः ? स एव परमेश्वर उपनिषत्प्रकाशितः । किं च सह नौ भुनक्तु तत्फलप्रकाशनेन नौ पालयतु । सहैवावां विद्याकृतं वीर्यं सामर्थ्यं करवावहै निष्पादयावहै । किंविद्याके स्वरूपका प्रकाश कर हम दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करे। कौन [ रक्षा करे ? इसपर कहते हैं—] वह उपनिषत्प्रकाशित परमेश्वर ही [ हमारी रक्षा करे ]। तथा उसके फलको प्रकाशित कर वह हम दोनोंका साथ-साथ पालन करे। हम अपने विद्याकृत वीर्य—सामर्थ्यको साथ-साथ ही सम्पादित करें—प्राप्त करें। और

१६४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१६४कठोपनिषद्[ अध्याय २

| च तेजस्विनौ तेजस्विनोरावयोर्यदधीतं तत्स्वधीतमस्तु। अथवा तेजस्वि नावावाभ्यां यदधीतं तदतीव तेजस्वि वीर्यवदस्तु इत्यर्थः। मा विद्विषावहै शिष्याचार्यावन्योन्यं प्रमादकृतान्यायाध्ययनाध्यापनदोषनिमित्तं द्वेषं मा करवावहै इत्यर्थः। शान्तिः शान्तिः शान्तिरिति त्रिवचनं सर्वदोषोपशमनार्थमित्योमिति॥१९॥ | हम तेजस्वियोंका जो अध्ययन किया हुआ है वह सुपठित हो। अथवा तेजस्वी हो अर्थात् हमलोगोंका जो अध्ययन किया हुआ है वह अत्यन्त तेजस्वी यानी वीर्यवान् हो। हम शिष्य और आचार्य परस्पर विद्वेष न करें अर्थात् हम प्रमादकृत अन्यायसे अध्ययन और अध्यापनमें हुए दोषोंके कारण परस्पर एक दूसरेसे द्वेष न करें। 'शान्तिः शान्तिः शान्तिः' इस प्रकार 'शान्तिः' शब्दका तीन बार उच्चारण [आध्यात्मिकादि] सम्पूर्ण दोषोंकी शान्तिके लिये किया गया है। इत्योम् ॥१९॥ |


इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली समाप्ता ॥३॥ (६)


इति कठोपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥

समाप्त

मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका

श्रीहरिः

मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका

मन्त्रप्रतीकानिअ०व०मं०पृ०
अग्निर्यथैको भुवनम् ...२२९१२५
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः ...२११२१०९
,, ,, ...,,,,१३११०
,, ,, ...,,३१७१६०
अजीर्यताममृतानाम् ...११२८३५
अणोरणीयान्महतः ...१२२०६३
अनुपश्य यथा पूर्वे ...११६११
अन्यच्छ्रेयोऽन्यत् ...१२१३९
अन्यत्र धर्मादन्यत्र ...१२१४५७
अरण्योर्निहितः ...२१८१०५
अविद्यायामन्तरे ...१२५४४
अव्यक्तात्तु परः ...२३८१४६
अशब्दमस्पर्शम् ...१३१५९०
अशरीरँ शरीरेषु ...१२२२६७
अस्तीत्येवोपलब्धव्यः ...२३१३१५४
अस्य विस्रंसमानस्य ...२२४१२०
आत्मानँ रथिनम् ...१३३७५
आशाप्रतीक्षे संगतम् ...११८१३
आसीनो दूरं व्रजति ...१२२१६५
इन्द्रियाणां पृथग्भावम् ...२३६१४४
इन्द्रियाणि हयानाहुः ...१३४७६
इन्द्रियेभ्यः परं मनः ...२३७१४६
इन्द्रियेभ्यः पराः ...१३१०८१
इह चेदशकद्बोद्धुम् ...२३४१४२
उत्तिष्ठत जाग्रत ...१३१४८८
ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः ...१११६
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति ...२२३११९
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः ...२३११३६

| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |

( २ )

मन्त्रप्रतीकानिअ०व०मं०पृ०
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य ...१३१७२
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा ...२२१२१२९
एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य ...१२१३५६
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे ...११२४३१
एतदालम्बन ँश्रेष्ठम् ...१२१७५९
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म ...१२१६५९
एष तेऽग्निर्नचिकेतः ...१११९२५
एष सर्वेषु भूतेषु ...१३१२८४
कामस्याप्तिं जगतः ...१२११५३
जानाम्यहँ शेवधिः ...१२१०५२
तँह कुमारँसन्तम् ...११२७
तदेतदिति मन्यन्ते ...२२१४१३२
तमब्रवीत्प्रीयमाणः ...१११६२१
तं दुर्दर्शं गूढम् ...१२१२५४
तां योगमिति मन्यन्ते ...२३१११४९
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीः ...११९१४
त्रिणाचिकेतस्त्रयम् ...१११८२४
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिः ...१११७२२
दूरमेते विपरीते ...१२४४३
देवैरत्रापि विचिकित्सितम् ...११२१२८
,, ...,,,,२२२९
न जायते म्रियते वा ...१२१८६०
न तत्र सूर्यो भाति ...२२१५१३३
न नरेणावरेण ...१२८४८
न प्राणेन नापानेन ...२२५१२१
न वित्तेन तर्पणीयः ...११२७३४
न संदृशे तिष्ठति ...२३९१४७
न सांपरायः प्रतिभाति ...१२६४५
नाचिकेतमुपाख्यानम् ...१३१६९२
नायमात्मा प्रवचनेन ...१२२३६८
नाविरतो दुश्चरितात् ...१२२४६९
नित्योऽनित्यानाम् ...२२१३१३१

| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |

( ३ )

मन्त्रप्रतीकानिअ०व०मं०पृ०
नैव वाचा न मनसा२३१२१५२
नैषा तर्केण मतिः१२९५०
पराचः कामाननुयन्ति२१२९७
पराञ्चि खानि व्यतृणत्२११९४
पीतोदका जग्धतृणा११३८
पुरमेकादशद्वारम्२२१११४
प्र ते ब्रवीमि तदु१११४१९
बहूनामेमि प्रथमः११५१०
भयादस्याग्निस्तपति२३३१४१
मनसैवेदमाप्तव्यम्२११११०८
महतः परमव्यक्तम्१३११८२
मृत्युप्रोक्तां नाचकेतः२३१८१६१
य इमं परमम्१३१७९३
य इमं मध्वदम्२१५१०२
य एष सुप्तेषु जागर्ति२२८१२४
यच्छेद्वाङ्मनसी१३१३८६
यतश्चोदेति सूर्यः२१९१०६
यथादर्शे तथा२३५१४३
यथा पुरस्ताद्भविता१११११६
यथोदकं दुर्गे वृष्टम्२११४१११
यथोदकं शुद्धे शुद्धम्२११५११२
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते२३१०१४९
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते२३१५१५७
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते२३१४१५५
यदिदं किं च जगत्सर्वम्२३२१४०
यदेवेह तदमुत्र२११०१०७
यस्तु विज्ञानवान्१३६७८
”१३८७९
यस्त्वविज्ञानवान्१३५७७
”१३७७९
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति११२९३७
यस्य ब्रह्म च क्षत्रम्१२२५७०

| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |

( ४ )

मन्त्रप्रतीकानिअ०व०मं०पृ०
यः पूर्वं तपसः२१६१०३
यः सेतुरीजानानाम्१३२७४
या प्राणेन संभवति२१७१०४
येन रूपं रसम्२१३९९
येयं प्रेते विचिकित्सा११२०२७
ये ये कामा दुर्लभाः११२५३१
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते२२७१२३
लोकादिमग्निम्१११५२०
वायुर्यथैको भुवनम्२२१०१२७
विज्ञानसारथिर्यस्तु१३९८०
वैश्वानरः प्रविशति११७१२
शतं चैका च हृदयस्य२३१६१५९
शतायुषः पुत्रपौत्रान्११२३३०
शान्तसंकल्पः सुमनाः१११०१५
श्रवणायापि बहुभिः१२७४७
श्रेयश्च प्रेयश्च१२२४१
श्वोभावा मर्त्यस्य११२६३३
स त्वमग्निꣳस्वर्ग्यम्१११३१८
स त्वं प्रियान्प्रियरूपाꣳश्च१२३४२
सर्वे वेदा यत्पदम्१२१५५८
सह नाववतु२३१९१६३
स होवाच पितरम्११४९
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य२२१११२७
स्वप्नान्तं जागरितान्तम्२१४१०१
स्वर्गे लोके न भयम्१११२१७
हꣳसः शुचिषद्वसुः२२२११६
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि२२६१२२
हन्ता चेन्मन्यते१२१९६२

॥ श्रीहरिः ॥

गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित विभिन्न गीताएँ

(१) श्रीमद्भगवद्गीता-तत्त्व-विवेचनी—(टीकाकार—श्रीजयदयालजी गोयन्दका)
गीता-विषयक २५१५ प्रश्न और उनके उत्तररूपमें
विवेचनात्मक टीकाके कई संस्करण—
(क) बृहदाकार—मोटे टाइपोंमें।
(ख) ग्रन्थाकार—विशेष संस्करण।
(ग) ग्रन्थाकार—सामान्य संस्करण।
(घ) संस्कृतमें श्लोक, अंग्रेजीमें व्याख्या।

(२) गीता-साधक-संजीवनी—(टीकाकार—स्वामी श्रीरामसुखदासजी) गीताके मर्मको समझने-हेतु व्याख्यात्मक शैली एवं सरल, सुबोध भाषामें टीका—
(क) बृहदाकार—मोटे टाइपोंमें हिन्दी।
(ख) ग्रन्थाकार—विशेष संस्करण हिन्दी।
(ग) पाकेट साइज—दो खण्डोंमें हिन्दी।
(घ) ग्रन्थाकार—मराठी अनुवाद।
(ङ) ग्रन्थाकार—गुजराती अनुवाद।
(च) ग्रन्थाकार—अंग्रेजी अनुवाद।
(छ) ग्रन्थाकार—बँगला अनुवाद (अध्याय १ से १२ तक)।

(३) गीता-दर्पण—(स्वामी श्रीरामसुखदासजीद्वारा) गीताके तत्त्वोंपर प्रकाश, लेख, गीता-व्याकरण और छन्द-सम्बन्धी गूढ-विवेचन, सचित्र, सजिल्द।
इस पुस्तकका ग्रन्थाकार हिन्दी, मराठी, बँगला तथा गुजराती संस्करण भी उपलब्ध है।

(४) गीता-शांकरभाष्य—गीतापर आचार्य शंकरका भाष्य।

(५) गीता-माधुर्य—स्वामी श्रीरामसुखदासजीद्वारा सरल प्रश्नोत्तर शैलीमें हिन्दी, तमिल, कन्नड़, मराठी, गुजराती, उर्दू, नेपाली, बँगला, असमिया एवं अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध है।

(६) गीता-चिन्तन—(ले०—श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार)।

(७) श्रीमद्भगवद्गीता-पदच्छेद (मूल, अन्वय, भाषाटीकासहित) हिन्दी, गुजराती, बँगला, मराठी।

(८) श्रीमद्भगवद्गीता—(श्लोक, अर्थ तथा प्रत्येक अध्यायके माहात्म्यसहित) हिन्दी, मराठीमें उपलब्ध।

(९) श्रीमद्भगवद्गीता—(सटीक) मोटे अक्षरोंमें आकर्षक बहुरंगा आवरणसहित।

(१०) श्रीमद्भगवद्गीता—केवल भाषा।

(११) श्रीमद्भगवद्गीता—भाषाटीका गुटका (हिन्दी, अंग्रेजी एवं बँगला)।

(१२) श्रीपञ्चरत्नगीता—गीता, विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज, अनुस्मृति, गजेन्द्रमोक्ष (मोटे अक्षरोंमें, केवल मूल पाठ)।

(१३) गीता मूल विष्णुसहस्रनामसहित—(नित्य-स्तुतिसहित विशेष संस्करण)।

(१४) गीता रोमन—संस्कृतमें श्लोक, रोमनमें मूल एवं अंग्रेजी अनुवाद।

(१५) गीता ताबीजी मूल—
(क) माचिस-आकारमें।
(ख) सम्पूर्ण गीता एक पत्रेमें।

(१६) गीता-ज्ञान-प्रवेशिका—गीता-व्याकरणका ज्ञान करानेवाली शोधपरक पुस्तक।

(१७) गीता-दैनन्दिनी—सम्पूर्ण गीता एवं अनेक उपयोगी सूचनाएँ और जीवनोपयोगी सूत्र (दो आकार, तीन प्रकारमें) पुस्तकाकार, पाकेट साइज, प्लास्टिक-आवरण एवं कपड़ेके आवरणमें।

॥ श्रीहरिः ॥

गीताप्रेस, गोरखपुरसे

प्रकाशित

उपनिषद्

उपनिषद्विवरण
ईशादि नौ उपनिषद्अन्वय, हिंदी व्याख्यासहित
बृहदारण्यकोपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
छान्दोग्योपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
ईशावास्योपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
केनोपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
कठोपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
माण्डूक्योपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
मुण्डकोपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
प्रश्नोपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
तैत्तिरीयोपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
ऐतरेयोपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
श्वेताश्वतरोपनिषद्हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित