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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१


| सर्वहरोऽपि मृत्युर्यस्योपसेचनम् इवौदनस्य, अशनत्वेऽप्यपर्याप्तस्तं प्राकृतबुद्धिर्यथोक्तसाधनरहितः सन् क इत्था इत्थमेवं यथोक्तसाधनवानिवेत्यर्थः, वेद विजानाति यत्र स आत्मेति ॥ २५ ॥ | तथा सबका हरण करनेवाला होनेपर भी मृत्यु जिसका भातके लिये उपसेचन (शाकादि) के समान है, अर्थात् भोजनके लिये भी पर्याप्त नहीं है, उस आत्माको, जहाँ कि वह है, ऐसा कौन पूर्वोक्त साधनोंसे रहित और साधारण बुद्धिवाला पुरुष है जो इस प्रकार—उपर्युक्त साधनसम्पन्न पुरुषके समान जान सके? ॥ २५ ॥ |


इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ २ ॥