सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११ ९

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११ ९


ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥

जो प्राणको ऊपरकी ओर ले जाता है और अपानको नीचेकी ओर ढकेलता है, हृदयके मध्यमें रहनेवाले उस वामन—भजनीयकी सब देव उपासना करते हैं ॥ ३ ॥

| [आत्मनः प्राणापानयोः अधिष्ठातृत्वम्]<br><br>ऊर्ध्वं हृदयात्प्राणं प्राणवृत्तिं वायुमुन्नयत्यूर्ध्वं गमयति। तथापानं प्रत्यगधोऽस्यति क्षिपति य इति वाक्यशेषः। तं मध्ये हृदयपुण्डरीकाकाश आसीनं बुद्धावभिव्यक्तविज्ञानप्रकाशं वामनं संभजनीयं सर्वे विश्वे देवाश्चक्षुरादयः प्राणा रूपादिविज्ञानं बलिमुपहरन्तो विश इव राजानमुपासते तादर्थ्येनानुपरतव्यापारा भवन्ति इत्यर्थः । यदर्था यत्प्रयुक्ताश्च सर्वे वायुकरणव्यापाराः सोऽन्यः सिद्ध इति वाक्यार्थः ॥ ३ ॥ | जो हृदयदेशसे प्राण—प्राणवृत्तिरूप वायुको ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर ले जाता है तथा अपानको प्रत्यक्—नीचेकी ओर ढकेलता है। इस वाक्यमें 'यः (जो)' यह पद शेष रह गया है, हृदयकमलाकाशके भीतर रहनेवाले उस वामन अर्थात् भजनीयकी, जिसका विज्ञानरूप प्रकाश बुद्धिमें अभिव्यक्त होता है, चक्षु आदि सभी देव—इन्द्रियाँ और प्राण रूप-रसादि विज्ञानरूप कर देते हुए इस प्रकार उपासना करते हैं जैसे वैश्यलोग राजाकी अर्थात् वे चक्षु आदि उसके ही लिये अपना व्यापार बन्द नहीं करते। अतः जिसके लिये और जिसकी प्रेरणासे प्राण और इन्द्रियोंके समस्त व्यापार होते हैं वह उनसे अन्य है—ऐसा सिद्ध हुआ। यही इस वाक्यका अर्थ है ॥ ३ ॥ |

कठो० ५—