कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
दूसरा अध्याय १६
दूसरा अध्याय १६
आत्मिक ज्ञान से सम्भव है। इसलिए ज्ञान की सहायता सबसे बड़ी सहायता है।
संसार के दुःख केवल शारीरिक सहायता से दूर नहीं हो सकते। जब तक मनुष्य अपने मन का संयम और इन्द्रियों का निग्रह नहीं करता, तब तक उसे शारीरिक आवश्यकतायें बराबर सताती रहेंगी और वह क्लेशों से पीड़ित होता रहेगा। चाहे जितनी उसे शारीरिक सहायता पहुँचाई जावे, परन्तु उसके कष्ट दूर न होंगे। अज्ञान ही सारे दुःखों और पापों की जड़ है। अविद्या के अन्धकार को मिटाओ, मनुष्य से कहो कि वह आत्मिक बल प्राप्त करे। यदि मनुष्य को उत्तम शिक्षा दी जावे और उसका आत्मा शुद्ध और बलवान् बना दिया जावे, तो फिर कोई घटना उसे दुःख न पहुँचा सकेगी। भूखों के लिए सदावर्त और रोगियों के लिए औषधालय खोलना धर्म का काम है। परन्तु जब तक मनुष्य को सच्ची शिक्षा न दी जायगी, उसकी भूख तथा रोग सदा के लिए नहीं मिट सकेगा।
भगवद्गीता में बार बार यह उपदेश किया गया है कि नियत हो कर निरन्तर कर्म करना चाहिए। परन्तु कोई कर्म संसार में ऐसा नहीं है, जिसमें धर्म और अधर्म दोनों संयुक्त न हों। किसी कर्म में धर्म अधिक है और अधर्म कम; किसी में अधर्म अधिक और धर्म कम। यह बात स्मरण रक्खो, कोई भी शुभ कर्म ऐसा नहीं है जिसमें पाप का लेश न हो और कोई भी अशुभ कर्म ऐसा नहीं है जिसमें पुण्य का लेश न हो। प्रत्येक कर्म में पाप-पुण्य दोनों मिश्रित रहते हैं। तभी तो इनमें विवेक की आवश्यकता है। विवेक
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कर्मयोग
के द्वारा शुभ कर्म में से अशुभ को निकाल डालो या दबा दो; एवं अशुभ में से शुभ कर्म को चुन लो या धारण करो; इसी का नाम पाण्डित्य है और यही बुद्धिमत्ता है ✻। शुभ कर्म का फल इष्ट और अशुभ कर्म का फल अनिष्ट है और ये दोनों आत्मा के बन्धन के हेतु हैं। भगवद्गीता ने इस बन्धन से छूटने का जो उपाय बतलाया है, वह यह है कि यदि तुम किसी कर्म से अपने को बाँध नहीं देते तो उसका फल तुम्हारे लिए बन्धन का हेतु न होगा। हमको विचारपूर्वक यह समझ लेना चाहिए कि इस अनासक्ति (बेतअ़ल्लुक़ी) का यथार्थ में क्या अभिप्राय है ?
गीता कहती है कि कर्म करो। परन्तु कर्म से या उसके फल से अनासक्त (बेतअ़ल्लुक़) रहो। संस्कार (मन की वासनायें) सक्ति को उत्पन्न करती हैं। इसको समझाने के लिए हम एक दृष्टान्त देते हैं। मनुष्य का मन एक सरोवर है, इसमें लहरें उठा करती हैं। ये लहरें यद्यपि किसी समय शान्त हो जावें तथापि सदा के लिए मर नहीं जातीं, किन्तु अपने पीछे कुछ चिह्न छोड़ जाती हैं। सम्भव है, आगे चल कर इनसे और लहरें उत्पन्न हों। ये चिह्न ही संस्कार
✻ गीता में लिखा है कि जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है, वही बुद्धिमान् और कर्मवान् है। इसका यह आशय कदापि नहीं है कि कर्म को अकर्म और अकर्म को कर्म समझे, किन्तु इसका आशय भी यही है कि कोई कर्म ऐसा नहीं है जिसमें अकर्म की आशङ्का न हो और न कोई अकर्म ऐसा है, जिसमें कर्म की संभावना न हो। अतएव जो कर्म में से अकर्म को हटा कर उसका आचरण करता है, एवं अकर्म में से भी कर्म को चुन कर ले लेता है और अकर्म का त्याग कर देता है वह निश्चय बुद्धिमान् और कर्मयोग का जाननेवाला है।