कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
दूसरा अध्याय
दूसरा अध्याय
निष्काम कर्म का महत्त्व
दूसरों को शारीरिक सहायता देना और उनकी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करना बहुत अच्छा काम है। परन्तु वह सहायता, जो आवश्यकतानुसार दी जाती है, सर्वोपरि सिद्ध हुई है। उसका प्रभाव नित्य और दूरगामी है। वह व्यक्तियों को लाभ पहुँचाती हुई जातीय आवश्यकताओं को भी पूर्ण करती है। यदि एक घण्टे के लिए किसी मनुष्य की कोई आवश्यकता पूरी कर दी जाय तो यह सहायता अवश्य कहलावेगी। किन्तु यदि एक वर्ष के लिए उसकी आवश्यकता पूरी कर दी गई है, तो यह उसकी अपेक्षा अधिक सहायता मानी जावेगी। और, यदि, सदा के लिए (जीवन भर के लिए) उसकी आवश्यकता पूरी कर दी गई तो फिर इसका क्या कहना है। यह सबसे बड़ी और सबसे उत्तम सहायता है। आत्मिक ज्ञान ही एक ऐसी वस्तु है जिससे सदा के लिए हमारे दुःखों की समाप्ति हो जाती है। और प्रकार के ज्ञान से केवल थोड़ी देर के लिए हमारी तृप्ति हो जाती है। केवल अपने स्वरूप का ज्ञान ही हमें सदा के लिए दुःखों से मुक्ति दिलाता है। इसलिए आत्मिक सहायता सबसे बड़ी और प्रधान सहायता है। जो मनुष्य इस प्रकार की आत्मिक सहायता दे सकता है, वह
१८ कर्मयोग
मनुष्य-समाज का सच्चा मित्र और सच्चा गुरु है। इतिहास हमें बतला रहा है कि जिन लोगों ने मनुष्य की आत्मिक आवश्यकताओं के पूरा करने का प्रबन्ध और यत्न किया है वे बड़े प्रभाव-शाली पुरुष हुए हैं, और उन्होंने संसार की काया पलट दी है। वास्तव में आत्मिकता ही हमारे जीवन के सारे कर्मों की कुञ्जी है। आत्मिक बल-युक्त पुरुष यदि चाहे तो अन्य विषयों में भी असाधारण सफलता प्राप्त कर सकता है। बिना आत्मिक बल के सांसारिक और शारीरिक आवश्यकतायें भी यथेष्ट पूर्ण नहीं हो सकतीं। आत्मिक सहायता के पश्चात् बुद्धि और मन की सहायता है। शिक्षा और ज्ञान की सहायता, भोजन और वस्त्र की सहायता से कहीं अधिक है। यह प्राण-रक्षा और जीवन-दान से भी अधिक आवश्यक है। क्योंकि मनुष्य के जीवन का वास्तविक उद्देश ही विद्या और ज्ञान की प्राप्ति करना है। अज्ञान मृत्यु है और ज्ञान ही जीवन है। यदि मनुष्य अज्ञान के कारण अँधेरे में भटकता और टटोलता फिरता है तो उसका जीवन व्यर्थ ही नहीं किन्तु दुःखदायक है। इसके बाद फिर शारीरिक सहायता का नम्बर आता है। इसलिए दूसरों की सहायता करते समय हमको कभी इस भूल में न पड़ना चाहिए कि केवल शारीरिक सहायता ही सब कुछ है। शारीरिक सहायता सबसे पिछली है, क्योंकि इससे स्थिर सुख नहीं मिलता। भूख का दुःख खाना खा लेने से शान्त हो जाता है, पर थोड़ी देर बाद फिर हमें भूख सताने लगती है। हमको शान्ति या सन्तोष तभी हो सकता है जब कि सदा के लिए हमारी आवश्यकतायें पूरी हो जावें। और यह केवल