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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

चौथा अध्याय ४६

चौथा अध्याय ४६

सन करता है। थोड़ी देर में उसका सब दुःख जाता रहता है और वह आनन्द में आकर आलाप करने लगता है। देखो ! शब्द में कैसी विचित्र शक्ति है। शब्द ही दर्शन-शास्त्र हैं और इन्हीं से धर्म-शास्त्र भी बनता है। मनुष्य-जीवन के नाटक में इनका अभिनय (एक्ट्) सर्वोपरि है और इन्हीं की शक्ति इस सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त हो रही है। हम रात-दिन बिना जाने-बूझे और बिना परीक्षा किये इस शक्ति से काम लेते रहते हैं, इस शक्ति का जानना वा उपयोग में लाना कर्मयोग की एक शाखा है।

हमारा धर्म है कि हम दूसरों की सहायता करें अर्थात् संसार को लाभ पहुँचावें पर हम ऐसा क्यों करें ? प्रत्यक्ष में तो लोग इसका उत्तर यह देंगे कि इससे संसार का उपकार होता है, पर वास्तव में हमारा अपना उपकार होता है। हम सदा परोपकार की चेष्टा करते हुए कर्म में प्रवृत्त हों, यह बहुत अच्छी बात है। पर यदि विचार-पूर्वक देखा जाय तो संसार को हमारी सहायता की कुछ भी आवश्यकता नहीं। इस सृष्टि को न तो तुमने बनाया और न हमने। फिर हम और तुम इसकी क्या सहायता कर सकते हैं। एक बार मैंने एक उपदेश पढ़ा। उसमें यह लिखा था कि "यह सृष्टि बड़ी अच्छी और सुन्दर है क्योंकि इसके कारण हमको दूसरों के उपकार का अवसर और समय हाथ आता है।" देखने में तो यह बात अच्छी मालूम होती है, पर दूसरी दृष्टि से ऐसा सोचना अनुचित है। क्यों ? क्या ऐसा कहना कि संसार को हमारी सहायता की आवश्यकता है, धृष्टता से पूर्ण और अनुचित नहीं है ? अवश्य है। हम स्वीकार करते हैं कि संसार में दुःख अवश्य है,

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इसलिए दूसरों के उपकार की दृष्टि से कर्म करना बहुत अच्छी बात है। पर अन्त में जाकर हमको यह मालूम होने लगता है कि दूसरों की सहायता करने में हम अपनी सहायता आप करते हैं। जब मैं छोटा बालक था, मेरे पास एक सफ़ेद चूहा था। वह एक सन्दूक़ में बन्द था, जिसमें छोटे छोटे पहिये बने हुए थे। पहिये हर वक्त़ घूमते रहते थे और चूहा बाहर नहीं निकल सकता था। इसी प्रकार संसार और संसार के उपकार का विषय है। इस सहायता का इतना लाभ अवश्य होता है कि हमको एक सद्गुण के अभ्यास का अवसर हाथ आता है। यह संसार न तो बुरा है और न अच्छा है। हम अपने कर्मों से इसको अपने लिए अच्छा या बुरा बना लेते हैं। हम में हज़ारों सुखी हैं और लाखों दुःखी। सुखी सुख से उन्मत्त हो रहे हैं; दुःखी दुःख से विलाप कर रहे हैं। युवक प्रसन्न हैं और बूढ़े उदास हैं। उनको आगे के लिए आशा है और उनके सामने अब निराशा की रात है। परन्तु ये दोनों मूर्ख हैं। जीवन न तो अच्छा है न बुरा। जैसा हमारा अन्तःकरण बन गया है, वैसा ही हम संसार को देखते हैं। वह मनुष्य बुद्धिमान् है, जो न तो किसी वस्तु को अच्छा और न बुरा समझता है। आग अपनी अवस्था में न तो अच्छी है और न बुरी। जब वह हमारी रोटी पका देती है या हमको रोशनी देती है तो हम कहते हैं अहा! आग कैसी अच्छी वस्तु है। पर वही आग जब हमारी उँगलियों को जलाती है तो हम आग को बुरा बतलाने लगते हैं। वास्तव में आग न अच्छी है और न बुरी। हम जिस रीति पर उसका उपयोग करते हैं, वह हमारे लिए अच्छी या बुरी बन जाती है। यही दशा

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इस संसार की है। संसार अपनी अवस्था में पूर्ण है। पूर्ण से यह अभिप्राय है कि उसकी आवश्यकतायें किसी व्यक्ति-विशेष या जाति-विशेष पर निर्भर नहीं हैं। हमको विश्वास रखना चाहिए कि चाहे हम कर्म करें या न करें, संसार के काम कभी बन्द न होंगे और उनको हमारी सहायता की कुछ भी आवश्यकता न होगी।

तथापि हमको धर्मात्मा होना चाहिए। धर्म की इच्छा ही हम को सदाचारी बनाती है। यदि हम विश्वास कर लें कि धर्माचरण और दूसरों की सहायता करने का न केवल हमको अधिकार है, प्रत्युत हमारा धर्म है, तो फिर हमें कोई अपने धर्म के पालन से रोक नहीं सकता। जिनकी तुम सहायता करते हो, उन पर अपना अहसान न जतलाओ और न ऋणी के समान उन पर दबाव डालो। किन्तु उनका तुमको स्वयं कृतज्ञ होना चाहिए कि उनके कारण तुमको अपनी उदारता के चरितार्थ करने का अवसर मिला। उनकी सहायता करने से वास्तव में तुमने अपनी सहायता की है, क्योंकि गृहीता से अधिक दान का लाभ दाता को मिलता है। तुम उनका धन्यवाद करो कि उनके कारण तुम धर्मात्मा और दानी कहलाने के अधिकारी बने और तुमको अपने अन्तःकरण के पवित्र और उदार बनाने में सफलता प्राप्त हुई। स्मरण रक्खो, जितने शुभ कर्म तुम करोगे, उतना ही तुम्हारा हृदय पवित्र होगा। चिकित्सालय बनाकर रोगियों की सहायता करो, दीनालय और अनाथालय खोल कर दीनों और अनाथों का भरण-पोषण करो। विद्यालय स्थापन करके सर्व-साधारण को शिक्षित बनाओ। इनको और ऐसे ही लोकोपकार के अन्य कार्यों को भी उत्साह और प्रेम

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के साथ करो। किन्तु "हम दूसरों का उपकार करते हैं" इस तुच्छ और अनुचित भावना को अपने हृदय से निकाल दो। यद्यपि संसार आपकी सहायता की प्रतीक्षा नहीं करता तथापि हमको अपने धर्म के पालन में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए। यही हमारे अभ्युदय का मार्ग है और यही हमारे निःश्रेयस की भी निःश्रेणी है।

इस बात को मन में धारण करना कि हमने किसी का उपकार किया है, बड़ी भारी भूल है। इसका परिणाम पश्चात्ताप और दुःख है। हम समझते हैं कि हमने अमुक का उपकार किया है और इस आशा में हैं कि वह हमारा धन्यवाद करे और जब वह ऐसा नहीं करता तो हमको क्रोध उत्पन्न होता है और यही दुःख का कारण है। उदारता का बदला चाहना उसके मूल्य को घटाना है। निःस्वार्थ परोपकार से बढ़ कर और कोई ईश्वर की पूजा नहीं हो सकती। यदि हम अनासक्त (बेलाग) रहें तो इच्छा और आशा की प्रतीक्षा से जो दुःख उत्पन्न होते हैं, वे निर्मूल हो जावें। और हम आनन्द के साथ निर्द्वन्द्व होकर अपना अपना काम करें।

एक दरिद्र को रुपये की आवश्यकता थी। उसने किसी से सुन रखा था कि यदि भूत वश में हो जाय तो घर में रुपयों के ढेर लग जावें। उसके मस्तिष्क में यही धुन समा गई और वह ऐसे मनुष्य की खोज करने लगा जो भूत को वश में करने की क्रिया सिखा दे। निदान उसको एक महात्मा मिले। महात्मा ने पूछा— "तू क्या चाहता है?" उसने कहा— "मैं भूत चाहता हूँ, जो मेरे लिए काम करे।" महात्मा ने कहा— "पागल हुआ है, जा अपने घर को।"