कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
३६४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
जो अश्वमेध का आदिक है राजा स्वयं नहीं करता है इस कारण से
हे श्रेष्ठतम! तुम करो । इस प्रकार से नृप कायान्तिक द्विज से मंत्रों के
द्वारा मंत्रणा करके उनके द्वारा अज्ञातों को स्वयं ज्ञान प्राप्त करके उनसे
उसके मन को ग्रहण करे । यदि राज्य की अभिलाषा से सचिव अधर्म
का आचरण करे अथवा राजा के विषय में अधिक करे तो उस धर्म
को हीन बना देवे । अत्यन्त आभिचारिक कर्म को करने वाले का
विघात कर देवे । राजा को चाहिए कि अभिचारिक ब्राह्मण हो तो
उसको देश से बाहर निकलवा दे ।
यह धर्मोपधा जाननी चाहिए उनके अमात्यों को और सुतों को
विजित करे । इस प्रकार की उसी भाँति अन्य उपधा का धर्म से
समाचारण करना चाहिए । कोषाध्यक्षों को समन्वित करके राजा
अमात्यों को प्रतारित कर देवे तथा पुत्रों को अथवा अन्यों को जो मन्त्र
के संवरण करने में असमर्थ होवें प्रतारित कर देना चाहिए । हे नरोत्तम!
यह प्रचुर बहुत बड़ा कोष मेरे अधीन है यदि उसकी आप प्रतीक्षा करते
हैं तो आपकी सम्मति से उसे ले आता हूँ । आपके अर्थ के लग्न दोनों
में हमारा जीवन होगा और आप भी इन प्रचुर कोषों के द्वारा क्या-क्या
नहीं करोगे । इस प्रकार से अन्य कोषगत उपायों से नृप श्रेष्ठ पुत्र,
अमात्य आदिक सबका निरन्तर परिशोधन करे । जो कोष में दोषों के
करने वाले हैं उनका हनन कर देवे और जो करने की इच्छा रखते हों
उनको देश से बाहर निकाल देना चाहिए । जो द्वैध चित्त वाले होवें
उनको विमानित कर देवें किन्तु कोष की रक्षा हर प्रकार से करनी
चाहिए । जो द्वैध चित्त वाले होवें उनको विमानित कर देवें किन्तु कोष
की रक्षा हर प्रकार से करनी चाहिए । दासियाँ, शिल्पनी, वृद्धा, मेधा
और धृति वाली स्त्रियाँ जो बाहर और भीतर गमन किया करती हैं तथा
सचिवों आदि के द्वारा विदित हैं । राजा उसको भार्या आदि से
अलक्षित होकर स्थित होकर स्थित रहकर एकांत में अभिमन्त्रण करके
तथा इसके अनन्तर भली भाँति मन्त्रणा करके सचिवों के पास प्रेषित
कर देवे । वे आकर वहाँ हृदय का ज्ञान प्राप्त करके विज्ञान में तत्पर
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३६५
राजा की महिषी प्रमुख तुमको चाहती हैं यदि आपकी स्पृहा हो तो वहाँ
पर मैं योजित कर दूँगी । सचिव तुमको चाहता है । हे वरवर्णिनि!
आपके योग्य भी है यदि आपकी श्रद्धा हो तो में उसका संगम कराने
के लिए समर्थ हूँ । इस रीति से तथा अनेक उपायों से और उत्तरों के
द्वारा भार्याओं, पुत्र, दुहित्रियों, स्नुषाओं, सचिवों, पुत्रों, सेवकों, आदि
का शोधन करना चाहिए । काम की उपधाओं से अविशुद्ध के बिना
ही कुछ विचार किए हुए विघात कर देना चाहिए । स्त्रियों को दण्ड
के द्वारा योजित करे और ब्राह्मणों को प्रवासित कर देवे । मोक्ष के मार्ग
में अवसक्त तथा हिंसा और पैशुन्य से रहित, क्षमा को ही एक सार
मानने वाले सचिव का राजा को परिवर्जन कर देना चाहिए ।
जो मोक्ष मार्ग में विशेष रूप से शक्त हों, दण्ड योग्य भी हों तो
भी उन्हें दण्ड नहीं देना चाहिए । वह सर्वत्र सम बुद्धि वाला हैं इसी
कारण से उसको परिवर्जित कर देवे । उपधाओं का यह सूत्र है । पुनः
उपधा का बहुत सा विवेचन किया गया है । उशना ने इसका अच्छा
विवेचन किया है । वहाँ पर उसके शास्त्र में इसका बोध करे । राजा
को दूसरों के साथ निरन्तर विग्रह का भली प्रकार से आचरण नहीं
करना चाहिए । भूमि, वित्त, मित्र, लाभों से जब से निश्चय हो जावें
तो ही विग्रह होते हैं । उत्तम नृपों के द्वारा स्वतः अंगों में सदा प्रसाद
ही करना चाहिए । कोष की रक्षा और निरन्तर सञ्चय भली भाँति
करना चाहिए । राजा को अपने मंत्रीगण विद्या में विशारद विप्रों को
ही करना चाहिए । जो विशेष रूप से धर्मशास्त्र के ज्ञाता, कुलीन, धर्म
और अर्थ में कुशल एवं सरल स्वभाव वाले होवें । उनके साथ ज्ञान
की मन्त्रणा करे और अत्यंत अधिक बहुतों के साथ कभी भी समाचरण
करे । एक-एक के ही साथ मन्त्रणा का विशेष निश्चय करे ।
अरण्य से निशिलोक में मन्त्रणा करे किन्तु रात्रि में कभी भी
मन्त्रणा नहीं करना चाहिए । मन्त्रणा के गृह में छोटे बच्चों को, शाखा
मृगों को, (बन्दरों) षण्डों को, शुकों को, सारिकाओं को तथा विकृत
मनुष्यों को वर्जित कर देना चाहिए । नृपों के मन्त्र भेदों में भी जो दूषण
३६६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
हो जाता है वह परम दक्ष सैकड़ों नृपों के द्वारा भी समाधान नहीं किया
जा सकता है । जो दण्ड के योग्य है उनको तो अवश्य दण्ड देवे और
जो अदंडनीय हों उनको दण्ड नहीं देना चाहिए । जो दण्ड के योग्य हैं
उनको दण्ड न देते हुए और जो दण्ड के योग्य नहीं है उनको दण्ड देते
हुए राजा निन्दा को प्राप्त करके चोर के पाप को प्राप्त किया करता
है । प्रकार, अट्टालिका और तोरणों के द्वारा दुर्ग में समता करनी
चाहिए । राजा को चाहिए कि भूषित नगर से दूर में दुर्गाश्रय करे ।
राजाओं का बल दुर्ग है और नित्य ही दुर्ग की प्रशंसा की जाती है ।
एक ही धनुर्धारी दुर्ग में स्थित होकर सौ शूरों से युद्ध किया करता है ।
इसी कारण से दुर्ग को प्रशस्त कहा जाया करता है । दुर्ग कई प्रकार
के होते हैं, जल दुर्ग होता है, भूमि दुर्ग है, और वृक्ष दुर्ग होता है ।
अरण्य मरु दुर्ग, शैल से समुद्भूत दुर्ग और परिखा से उद्भूत दुर्ग होता
है । नृप का जैसा अपने देश का दुर्ग हो वैसा ही दुर्ग करना चाहिए ।
दुर्ग की रचना करते हुए त्रिकोण और धनुष की आकृति वाला पुर
बनाना चाहिए । वर्तुल और चतुष्कोण की रचना करे अन्य प्रकार से
नगर में नहीं करना चाहिए । मृदंग की आकृति वाला दुर्ग निरन्तर कुल
के नाश करने वाला होता है । जिस प्रकार से पहले राक्षसों का राजा
रावण की लंका पुरी में दुर्ग से युक्त थी । राजा बलि को शोणित नाम
वाला पुर था और दुगों में प्रतिष्ठित था । क्योंकि वह व्यञ्जाकार था
और शिवा बलि मनोभ्रष्ट थी । शल्वराज का सौभाग्य नगर पाँच कोनों
वाला था । जो राज्य दिवलोक में है वह भ्रष्ट हो जायेगा और जो
अयोध्या नामक इक्ष्वाकुओं नृपों का पुरा था वह भी धनुष की आकृति
वाला था । इसलिए विजयप्रद हुआ था । दुर्ग की भूमि में दुर्गा का
यजन करना चाहिए और द्वारा पर दिक्पालों का यजन करे । विधान
से पूजन करके नृप जय को प्राप्त किया करता है ।
इसलिए राजा को अपना दुर्ग निरन्तर जय की वृद्धि के लिए
करना चाहिए । राजा ब्राह्मणों को सदा किसी से भी अवमानीकृत न
करे । राजा विप्रों को अवमान करके यहाँ पर और मृत्युगत होकर भी
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दुःख का भागी होता है। उनके साथ कभी विरोध नहीं करे और उनका
धन ग्रहण नहीं करना चाहिए। कृत्य के कालों में निरन्तर उनका ही
परिपूजन करना चाहिए। इस प्रकार से महान् बुद्धिमान तत्त्व मण्डल
में संयुत नृप, अप्रमादी, चार चक्षु, गुणवान्, प्रियपद होता है। यहाँ पर
और मृत्युगत होकर महती सिद्धि को प्राप्त होता है और सुखों के भोग
वाला हुआ करता है। जिन गुणों से अपने आपको योजित करे उन
गुणों से पुत्रों को भी योजित करना चाहिए। नृप की निरन्तर स्वतन्त्रता
अपने आपका विनाश किया करती है। राजा का पुत्र स्वतन्त्र रहकर
निश्चय रूप से विकार को प्राप्त हो जाता है। निर्विकार के लिए
निरन्तर वृद्धों को पारियोजित करे। भोजन में, शयन में, यान में और
पुरुषों के वीक्षण में सदा दाराओं को भय को काम विनेष्टन में
नियोजित करना चाहिए। राजा के द्वारा स्त्रियाँ निरन्तर स्वाधीन रखनी
चाहिए।
स्वतन्त्र रहने वाली स्त्रियाँ नित्य ही हानि के लिए हुआ करती हैं।
उस कारण से कुमार को और महिषी को मनोहर उपधानों से शोधन
करके यौवराज्य और अवरोध में नियोजित करे। अन्तःपुर के प्रवेश
में स्वतन्त्रता का निषेध कर देना चाहिए। राजा के पुत्र का, भार्या का
यह विशेषता संक्षेप से नृप का धर्म मैंने बता दिया है। पुत्रों के गुणों
के विन्यास में और राजा की भार्याओं के भी विषय में उशनों ने और
बृहस्पति ने राजनीतियों के तन्त्रों को कहा है। अन्य विशेषताओं को उन
दोनों के तन्त्रों में समझना चाहिए। इस प्रकार से महाभाग राजा
राजनीति में विशेषता को करता हुआ कभी दुःखित नहीं होता है और
सदा बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है।
[ सदाचार कथन ]
और्व ने कहा-अब हे राजेन्द्र! सदाचारों में जो विशेषतायें हैं उनका
श्रवण कीजिए। जिन्हें राजा को अवश्य ही करना चाहिए उन सबको
आप मुझसे ही उन सबका श्रवण कीजिए। साधुगण क्षीण दोषों वाले
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होते हैं । क्योंकि सत् शब्द साधु वाचक हुआ करता है । उनका जो भी
आचरण है वह सदाचार कहा जाया करता है । आगमों में, पुराणों में
और संहिताओं में जिस प्रकार से कहे गए उन समुद्दिष्ट सदाचारों में
गृहस्थ की भाँति ग्रहण करना चाहिए । वेदों के पाठों के द्वारा ऋषियों
का यजन करे और होमों के द्वारा देवगणों का पूजन करे । श्राद्धों के
द्वारा पितृगणों को तृप्त करे तथा बस्तियों के द्वारा भूतों को संतृप्त
करना चाहिए । मैत्र, प्रसाधन, स्नान, दन्त, धावव, अञ्जन यह सब
गृहस्थ की ही भाँति करे तथा निषेकाद्य विधि को करना चाहिए । राजा
को चाहिए कि षट्कर्मों में सभी ओर से विप्रों की नियुक्ति करे । उसी
भाँति क्षत्रिय आदि को अपने-अपने धर्म में नियोजित करे । जो अपने
शास्त्रोक्त धर्म का परित्याग करके पराये के धर्म का समाचरण करे
उसको राजा एक सौ पण का दण्ड देवे और फिर उसको उसी विहित
धर्म में नियोजित करना चाहिए ।
एक सम्वत्सर में होने वाले कृत्यों में विशेष रूप से इनका
समाचरण करना चाहिए । हे राजन्! राजा उन विशेषों का अवश्य ही
समाचरण करे, उनका श्रवण मुझसे कर लो । शरत्काल में अष्टमी के
दिन दुर्गा का परिपूजन करे । दशमी तिथि में बल की वृद्धि के लिए
नीराजन करना चाहिए । पौष मास में तृतीया में पुष्य का अभिषेक करे
और नृप पञ्चमी में श्रीदेवी का पूजन करके चरण करे । हे नृप श्रेष्ठ!
धन धान्य की वृद्धि के लिए श्रीयज्ञ का समाचरण करना चाहिए ।
श्रेष्ठ मास में दशहरा के दिन भगवान् विष्णु की इष्टि का समाचरण
करे । द्वादशी में हरिस्थ रवि के दिन में इन्द्रदेव की पूजा करनी
चाहिए । राजा को इन यज्ञों का विशेष रूप से बहुत व्यय के द्वारा
करना चाहिए । इनके किए जाने पर बल, राज्य और कोष भी वृद्धि
को प्राप्त होते हैं । इन यज्ञों को न किए जाने पर देश में दुर्भिक्ष
( अकाल ) और मरण होता है । सब प्रकार की ईतियाँ होती हैं ।
( टिड्डी आदि ईतियाँ हुआ करती है ) अतएव इनको विशेष रूप से
करना चाहिए । शारत्काल में महाष्टमी तिथि में दुर्गा की पूजा की
विधि है ।
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३६९
यह विधि पहले कह दी गई है उसी विधि से पूजन करना चाहिए ।
हे पार्थिवों में परम श्रेष्ठ! आप नीराजन की विधि का श्रवण करिए ।
जिसके करने में अश्वों की और गजों की वृद्धि हुआ करती है ।
आश्विन मास में शुक्ल पक्ष में तृतीय तिथि स्वामी नक्षत्र की योग वाली
हो । आठवें दिन के सम्प्राप्त हो जाने पर नीराजन करना चाहिए ।
नीराजन (आरती) का काल तो आपको मैंने बहुत पहले ही बता दिया
है । अब तो केवल मुझसे विधान ही श्रवण करिए । इससे आप
कृतकृत्य हो जायेंगे । हे महासत्व! एक अश्व जो सबसे बहुत ही सुन्दर
होवे । सात दिन तक गन्ध, पुष्प, वस्त्र आदि से उसकी पूजा करे ।
तृतीया के आदि से अर्चन करके उसे यज्ञ मण्डल में ले जावे । उसकी
चेष्टा का निरूपण करते हुए शुभ और अशुभ का ज्ञान करो । यदि
अश्व पलायन करता है तो पराये राष्ट्र का अवमर्दन होता हैं । यदि वह
अश्व अश्रुओं का मोचन किया करता है तो राजा के पुत्र की मृत्यु हो
जाती हैं । ले जाया हुआ वह अश्व आदि गमन न करे तो महिषा का
मरण हो जाता है । यदि अश्व मुख, नासिका और नेत्रों से शब्द करे
तो जिस दिशा की ओर मुख करके ध्वनि करता है उस दिशा में शत्रुओं
के ऊपर जय प्राप्त कराता है । यदि अश्व दाहिने पद के अग्रभाग को
उत्क्षिप्त करके आगे होवे तो राजा सम्पूर्ण रिपुओं पर विजय प्राप्त
किया करता है ।
हे नृप श्रेष्ठ! दशमी तिथि में प्रातःकाल में ही नीराजन करना
चाहिए । उसकी अप्राप्ति होने पर उसी द्वादशी में समाचरण करना
चाहिए । हे पार्थिव! अथवा वहाँ पर अभाव होने पर कार्तिक मास में
पञ्चदशी में ऐशानी दिशा में जो अपने पुर से होवे । सोलह हाथों के
मान के दश हाथ प्रमाण से युक्त और सोलह हाथ विस्तार वाला यज्ञ
के लिए मण्डप बनावें और मध्य में वेदी का विनिर्देश करना चाहिए ।
वेदी के उत्तर दिशा में बहुत श्रेष्ठ अश्व वेदी की रचना करे । जहाँ पर
संस्थापित करके पुरोहितों के द्वारा अश्व का पूजन करना चाहिए ।
हे नृप! उदुम्बर की शाखाओं का अथवा अर्जुन की शाखा के
३७० శ్రీ శ్రీकालिका पुराण
मत्स्य, शंख के अंकित चक्रों से और ध्वजों में भूषित करना चाहिए ।
सुवर्ण और रत्नों से तथा अनेक फलों के द्वारा सैन्धव की सिद्धि के
लिए भल्लातक शालिकुष्ठ, तोरण, कण्ठ देश में पुष्टि और शान्ति के
लिए बाँधे । वैष्णव मण्डल की रचना करके दिक्पालों और नवग्रहों
का तथा विश्वेदेवों का और विष्णु मुख्यों का पूजन करना चाहिए ।
पुरोहित तिलों से मिश्रित घृत, यव और पुष्पों में रवि का, वरुण का,
प्रजेश का, इन्द्र देव का, भगवान् विष्णु का होम सात दिन करे ।
एक-एक सहस्र अथवा अष्टोत्तर शत जप करे और चतुर्वर्ग की सिद्धि
के लिए प्रति दिन होम करना चाहिए । समिधायें भी हवन के लिए
पलाश (ढाक) अथवा खदिर की होनी चाहिए । पुरोहित के द्वारा
समिधायें उदुम्बर (गूलर) की हो तथा पीपल की समिधा होम में ग्रहण
करनी चाहिए ।
फलाग्रम्बर से योजित आठ कलश रखे । वे कलश चाँदी, सुवर्ण
अथवा इच्छानुसार मृत्तिका के ही होवें । हरिताल, चन्दन, कुष्ठ,
प्रियंगु, में नसित, अञ्जन, जल्पी, श्वेतदन्ती, भल्लातक, पूर्णकोश,
सहदेवी, शतावर, वज्र, सनगाकु, सुममोराजी, सुगुप्तिका, तुत्थ, करबीर,
तुलसीदल, इन सब को पुरोहित कलशों के मध्य में निक्षिप्त कर देवे ।
हे नृप! नीराजन विधि में शान्ति की कामना से कनक, अम्बुज अथवा
यश के काष्ठों के द्वारा स्रुक् और स्रुव बनवाने चाहिए । उस प्रकार
से एक सप्ताह पर्यन्त पूजा करे । इस प्रकार से पूजन करके नृप एक
सप्ताह तक समाचरण करे । जब तक नीराजन करे तब तक राजा को
गृह में वास करना चाहिए ।
शान्ति की इच्छा रखने वाले नृप को रात्रि के समय में यज्ञ भूमि
में निवास नहीं करना चाहिए । राजा उस अश्व पर अथवा हाथों पर
आरोहण न करे । जब तक एक सप्ताह होवे राजा को दूसरे ही किसी
यान के द्वारा गमन करना चाहिए । अनेक प्रकार के अन्न के व्यञ्जन
से सम्भूत भक्ष्यों से, मधु, पायस, यावको से अथवा मोदकों के द्वारा
बलि करे । एक सप्ताह तक पूर्व में बताते हुए देवताओं की उत्तम बलि
௵ श्रीकालिका पुराण ௵ ३७१
करे । सातवें दिन में बताए हुए देवताओं की उत्तम बलि करे । सातवें
दिन में तोरण के अन्तर में सेवन करते हुए का पूजन करना चाहिए ।
महाबाहुओं वाले दो भुजाओं से युक्त कवच में उज्जवल जाज्वल्यमान
सूर्यपुत्र का पूजन करे । शुक्ल वस्त्र से केशों को उद्ग्रस्थित करके
कुशा को बाँये हाथ में लिए दक्षिण कर को खंड के सहित सित सैन्ध
पर संस्थित नाम में न्यस्त करे । इस प्रकार के रेवन्त को प्रतिमा में
अथवा घट में तोरण के अन्तर में सूर्यदेव की पूजा के विधान से पूजन
करे । रेवन्त अश्व को अथवा गज को पूजित करना चाहिए ।
अहत अम्बर ( वस्त्र ) से संजीव, माला और चन्दन से संयुत सुवर्ण
से विद्ध निस्त्रिश वाला, विचित्र, कवच आदि से युक्त, ऐशानी दिशा
में होमकुण्ड की वेदिका पर जो पूर्व में हुई हैं अश्व और गज के
पालक पृथक्-पृथक् ले जावें । अश्व और गज के ले जाने पर राजा
पूर्व में कथित निमित्त को यत्न के साथ देखे और फल का भी
अवधारण करे । होम कुण्ड की उत्तर दिशा में बाघम्बर चर्म पर स्थित
होकर वेदों के ज्ञाता और अश्वों के ज्ञान रखने वाले के सहित सैन्धव
( अश्व ) को देखकर लाये हुए अश्व के लिए शीघ्र ही सुगन्धित भात
की पिण्डी देवे । पुरोहित वहाँ पर शान्ति मन्त्रों के द्वारा अभिमन्त्रित
करके ही उसे देवे । पुरोहित लाये हुए अश्व के लिए शीघ्र ही सुगन्धित
भात की पिण्डी देवे । पुरोहित वहाँ पर शान्ति मन्त्रों के द्वारा
अभिमन्त्रित करके ही उसे देवे । वह अश्व यति उसका अवघ्राण करे
अथवा अशन करे तो उस अवसर पर सब प्रकार का कल्याण होता है ।
और इसके विपरीत होवे तो अन्यथा हुआ करता है । उदुम्बर की शाखा
आम्र की शाखा कुशा के साथ घट के जल में आप्लावित करके अश्वों
का, हाथियों का, राजा का और सैनिकों का अथवा रथों का स्पर्श
करे । पुरोहित शान्तिक और पौष्टिक मन्त्रों के द्वारा विप्रों के सहित
चतुरंग का सेवन करे ।
दिक्पालों और ग्रहों का वैष्णव मन्त्रों द्वारा बहुत प्रकार से
अभिसिञ्चन करके ऋत्विक् सुवर्ण के दर्पण की, नृप को फिर मन्त्री
३७२ श्रीकालिका पुराण
को, राजपुत्र को तथा अन्य आमात्यों को और सैनिकों को दिखा करके
शिव शार्दूल कम्पन करते हुए सबको दिखावे । मिट्टी से शत्रु से हृदय
में शूल से वेध करे और शिर का खंड से छेदन करना चाहिए ।
आचार्य पीछे कवि को अभिमंत्रित करके फिर प्रभाकर ऐन्द्र मन्त्रों से
स्वयं के लिए मुख में देवे । उस समय में इस मन्त्र से नृप पर उस
समारूढ़ होकर अपने सम्पूर्ण बलों के सहित उत्तर पूर्व दिशा में गमन
करे ।
उस समय में ऋत्विक, पुरोहित, आचार्य सब ही नृप के पीछे
अनुगमन करें और अन्य निमित्तों का विलोकन करें । राजा तुमुल वाद्यों
की ध्वनियों से मेदिनी को मानों विदीर्ण करता हुआ नीराजन में गमन
करे । विविध मणि विद्रुम, मुक्ता आदि स्वर्ण रत्नों से सुभूषित होकर
केवल एक कोस गमन करके राजा पूर्व के द्वार से अपने पुर में प्रवेश
करे और पुरोहित विप्रों के साथ यज्ञ में गमन करे । वहाँ जाकर पीछे
द्विजों के लिए दक्षिणा सुवर्ण, गौ, तिल आदि शक्ति से दान देवे । इस
प्रकार से बलों का और राजाओं का नीराजन करके इस लोक में और
मृत्युगत होकर भी राजा सुस्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति किया करता है । हे
अश्व! आपका उद्भव सागर से हुआ है आप अश्वामृत से सज्जात हैं ।
शिव सत्त्व से इन्द्र का वहन किया करते हैं, उसी से मेरा वहन करें ।
जिस सत्य से रेवन्त का, जिस सत्य से भास्कर का वहन करते हो उसी
सत्य से विजय प्राप्त करने के लिए मेरा वहन करो । इन मूल मन्त्रों के
द्वारा अश्व पर आरोहण का समाचरण करना चाहिए ।
महिषी के आगे समारोहण करके फिर शुद्धान्तः पुर लम्बित करे ।
फिर वह महिषी ( पट्टाभिषक्ता रानी ) को पलंग पर संस्थित राजा का
सिद्धार्थ के सहित दूर्वा क्षतों से स्त्रियों के साथ अभ्यर्चन करना
चाहिए । यह तृतीया में नीराजन में भूमि के ग्रहण करने पर ही करे ।
हे राजन्! यह मैंने आपके सामने नीराजन का क्रम बता दिया है । अब
स्नान का विधान आप मुझसे श्रवण कीजिए ।
[राज्याभिषेक वर्णन]
௬०९ श्रीकालिका पुराण ௬०९ ३७३
[राज्याभिषेक वर्णन]
और्व ने कहा-हे राजन् अब मैं आपको पुण्य स्नान की विधि के
क्रम को बताऊँगा जिसके विधान से ही विघ्न निरन्तर नाश को प्राप्त
हो जाया करते हैं । पौष मास में चन्द्र के पुष्य नक्षत्रगत होने पर राजा
को पुण्य स्नान का समाचरण करना चाहिए । यह स्नान सौभाग्य और
कल्याण के करने वाला होता है और दुर्भिक्ष तथा मरण का अपहरण
करने वाला होता है । विष्टि ( भद्रा ) आदि दुष्ट करण में, व्यतीपात
और वैधृति में वज्र, शूल, हर्षण आदि योग में यदि इसका लाभ होता
है तो तृतीया से युक्त पुष्य नक्षत्र रवि, शौरि और मंगलवार में तब यह
समस्त दोषों की हानि करने वाला होता है । ग्रहदोष होते हैं और राज्यों
में ईतियाँ होती हैं । तब पुष्य नक्षत्र में मासान्तर में भी करना चाहिए ।
यह शान्ति पहले समय में ब्रह्माजी ने गुरु के लिए बताई थी और
जगत्पति ने शक्र आदि समस्त देवों की शान्ति के लिए ही कहा था ।
तुष, केश, अस्थि, वल्मीक, कीट देश आदि से वर्जित, शर्करा, कृमि,
कूष्माण्ड, बहु कृष्ट से रहित, काक, उलूक, कंक, ककोल, गृध्र,
शौनकी से रहित और जलोका आदि से वर्जित, चम्पक, अशोक,
वकुल आदि से विराजित अपने स्थान में हंस और कारण्वों से
समाकीर्ण अथवा शुचिसर के तट पर पुण्य स्नान के लिए राजा को
उत्तम स्नान का ग्रहण करना चाहिए । इसके अनन्तर राजा और पुरोहित
अनेक वाद्यों की ध्वनियों के साथ प्रदोष के समय में उस स्थान पर पूर्व
दिन में गमन करें । उस स्थान की कौबेरी दिशा में पुरोहित स्थित होकर
सुगन्धित चन्दन, पान कर्पूर आदि से अधिवासित गोरोचनाओं से
सिद्धार्थों से, अक्षतों से जो फल आदि के सहित हो, 'गन्ध द्वारा'
इत्यादि मन्त्रों के द्वारा सबके अधिसिक्तों से उस स्थान को अधिवासित
करके वहाँ पर देवगणों का पूजन करना चाहिए ।
भगवान् गणेश, केशव, इन्द्रदेव, ब्रह्मा, देव शंकर उमा के सहित
और समस्त गण देवता और मातृगणों का पुरोहित के साथ राजा अर्चन
करे । मंगल कलशों को स्थापित करे और अनेक प्रकार के नैवेद्यों के
समुदायों का, पायस, स्वादु फल और मोदक तथा यावक देवे । उस
स्थान से भी भूतों को मन्त्र का उच्चारण करते हुए अपसारित करना
चाहिए । जो भूत भूमि के पालक हैं वे यहाँ से अपसरण कर जावें ।
भूतों का विरोध न करते हुए मैं स्नान के कर्म करता हूँ । इसके अनन्तर
दोनों हाथों को पुटित करके राजा इस मन्त्र के द्वारा इन पूज्य देवों का
पुष्प के अभिषेक लिए आवाहन करे । जो यहाँ पर पूजा के अभिलाषी
देव हों वे सब सुरगण यहाँ पर आगमन करें । सब दिशाओं के पालक
हों और जो भी अभागी होंवे आगमन करें । फिर पुष्पों की अञ्जलि
देकर पुनः इस मन्त्र का पाठ करें ।
मेरे इस स्थान को प्राप्त करके आज यहाँ पर बिबुध गण स्थित
हों । रक्षा करने वाले आप पूजा प्राप्त करके और राजा को शान्ति
प्रदान करके स्थित हों । इसके उपरान्त राजा स्वप्न में शुभ और अशुभ
का ज्ञान प्राप्त करे । देवी की पूजा करके रात्रि में स्थान में नृप को स्वयं
ज्ञान करना चाहिए । दोषों के ज्ञाताओं द्वारा सम्मत स्वप्न में शुभ,
अशुभ के फल को जानना चाहिए । यदि बुरे स्वप्न का दर्शन हो तो
पुरुष के अभिषेचन में चौगुना हवन करना चाहिए और सौ गौओं का
दान भी दे । गौ, घोड़ा, हाथी, प्रसाद, पर्वत वृक्ष का आरोहण शुभ
करने वाला और राज्यश्री की वृद्धि करने वाला हुआ करता है । दधि,
देव, सुवर्ण, ब्राह्मण की प्रदर्शन, दुर्वा, वीणा, अक्षत, फल, पुष्प,
क्षत्र, विलेपन, शीतांशु (चन्द्र), चक्र, शत्रु का, पद्म का और सुहृद
का लाभ, रात्रि में क्षय करने वाले हैं । रत्नाकार, भूभृत और उपराग
को देखना, निबड़ के द्वारा बन्धन करने वाला होता है । माँस का
भोजन, पर्वत का विवर्त्तन, नाभि के मध्य में वृक्ष की उत्पत्ति और मृत
पुरुष उतरना, पर्वत को, नदी का तथा स्रोत लाँघना, अपने पुत्र का
मरण, रुधिर और मदिरा का पान, पायस का भोजन तथा मनुष्य पर
आरोहण हे नृप श्रेष्ठ! ये स्वप्न राजा के कल्याण, सुख, सौभाग्य,
राज्य और शत्रुओं का क्षय किया करते हैं । गधा, ऊँट, और महिष का
आरोहण राज्य के नाश करने वाले हैं । रक्त वस्त्र का परिधान,
रक्तमाला और रक्त अनुलेपन, रक्त तथा काली की कामना करता
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३७५
हुआ भी मृत्यु को प्राप्त किया करता है । कूप के अन्दर प्रवेश तथा
दक्षिण दिशा में गति, कीच में निमज्जन या स्नान, भार्या और पुत्र का
विनाश करने वाला होता है ।
अन्य राज्य की प्राप्ति करके महान् कल्याण को प्राप्त किया करता
है । बीस हाथ दीर्घ और सोलह हाथ विस्तार से युक्त सब लक्षणों से
युक्त उत्तम यज्ञ मण्डल की रचना करनी चाहिए । इसके उपरान्त दूसरे
दिन में पूर्वाह्न में मातृगणों की पूजा करे । भीत में लगी हुई वसोर्धारा
तथा वृद्धि, श्राद्ध अर्थात् नान्दीमुख नामक श्राद्ध करे । चन्दन, अगुरु,
कस्तूरी, धूप, कर्पूर के चूर्ण मण्डल स्थान की भली भाँति पूजा करके
उसमें 'हौं शाम्भवे नमः' 'अस्त्राय हूँ फट्' इन दो मन्त्रों को बुध को
लिखना चाहिए ।
मन्त्र का ज्ञाता और मण्डल के ज्ञान रखने वाला पुरुष कम्बल से
उत्पन्न सूत्रों से अथवा कौशेयों से प्रथम स्वस्तिका नामक मण्डल का
लेखन करे । फिर चार हाथ प्रमाण वाला मण्डल लिखना चाहिए ।
मण्डल का पद्म एक हाथ प्रमाण वाला कहा गया है । डेढ़ हाथ के
प्रमाण वाले द्वार होने चाहिए । वह पद्म कर्णिमा के केसरों से
समुज्ज्वल होवे । सफेद, लाल, पीला, कृष्ण और हरा और शीली के
चूर्ण से, कौसुम्भ से तथा हरिदुद्भव हान्द्रि से अन्जन के चूर्ण से
मण्डल की वृद्धि के लिए रचना करे । पद्म के अन्दर से आरम्भ
करके पश्चिमगामी ताल को और पश्चिम के द्वार के मध्य में सौ हाथ
विनिर्दिष्ट करना चाहिए । द्वार के मध्य में सौ हाथ विनिर्दिष्ट करना
चाहिए । द्वार मध्य में प्रत्येक आठ पत्रों वाला होना चाहिए । मण्डल
के भाग में ज्ञात को चूर्णों से पृथक्-पृथक् ही करना चाहिए । चूर्णों
के द्वारा मण्डल की रचना करके फिर सूत्रों को उत्साहित करे । सूत्र
का उत्सारण करके प्रथम मण्डल का अर्चन करना चाहिए । 'भवनाय
नमः' इससे फिर हाथ से विनियोजित करे । मध्यमा, अनामिका और
अंगुष्ठ से इच्छानुसार ऊपर नीचे की ओर मुख वाली अंगुलियों को
करके विचक्षण पुरुष पातन कर देवे ।
३७६ श्रीकालिका पुराण
रेखा समान करनी चाहिए जो विच्छिन्न और पुष्परंजित हो । ज्ञाता
पुरुष के द्वारा अंगुष्ठ के पर्व की निपुणता से समादी करनी चाहिए ।
संसक्त, विषय, स्थूल, विछिन्न, कृसराकृत, पर्यन्त, अर्पित और ह्रस्व
कभी भी नहीं लिखनी चाहिए । यदि रेखा संसक्त हो तो उससे कलह
जानना चाहिए और ऊर्ध्व रेखा में विग्रह होता है । अत्यधिक स्थूल होने
पर व्याधि होती है, विमिश्रत होने पर नित्य पीड़ा होती है । बिन्दुओं
से भय को प्राप्त हुआ करता है, जो कि शत्रु के पक्ष की ओर से हुआ
करता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है । कृपा में अर्थ की हानि होती
है और रेखा छिन्ना हो तो उसमें निश्चय ही मरण हुआ करता है अथवा
अभीष्ट द्रव्य या सुत का वियोग होता है । जो भी कोई न जानकर ही
इच्छा के ही अनुसार मण्डल का लेखन करे तो वह सभी दोषों को
प्राप्त किया करता है जो भी दोष पूर्व में बताये गए हैं । ज्ञान रखने वाले
पुरुष के द्वारा सफेद सरसों और दूर्वा से रेखा करनी चाहिए । मण्डल
बारह होते हैं, उनके नाम विमल, विजय, भद्र, विमान, सुभद्र, शिव,
वर्धमान, देव, शताक्ष, काम्यादक, रुधिर, स्वास्तिक, ये ही बारह
मण्डल हैं । विचक्षणों द्वारा स्थान और यज्ञ के अनुसार ही योजित
करना चाहिए ।
सुरों के समूहों द्वारा अमृत के लिए सागर के मन्थन लिए जाने पर
पीयूष के धारण के लिए विश्वकर्मा के द्वारा निर्मित किए गए थे ।
क्योंकि देवी की कलींकला-कला पृथक्-पृथक् आसन करके वे किए
गए हैं इसी से वे कलश नाम से कीर्तित हुए हैं । कलश नौ ही बताये
गए हैं । अब इनको नाम से समझ लो । गोह्योयगोह्य मरुत, मयूख,
मनोहाचार्य, भद्र, विजय, तनुदूषक, इन्द्रिघन, विजय ये नौ कहे गए
हैं। हे भूप! उनके ही दूसरे नौ नाम भी हैं उनका श्रवण करो जो सदा
ही शान्ति प्रदान करने वाले हैं । प्रथम क्षितीन्द्र कहा गया है दूसरा
जनसम्भव होता है । दो दो पवन और अग्नि हैं, फिर यजमान है ।
कोषसम्भव नाभि में छठवाँ कहा गया है । सोम सातवाँ कहा गया है
और आदित्य आठवाँ है । विजय नाम वाला कलश है वह नवम कहा
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३७७
गया है । वह पंचमुख कहा गया है जो महादेव के स्वरूप का धारण
करने वाला है । घर को पाँच मुखों में पंचवक्त्र स्वयं स्थित है । दिशा
के अनुसार वामदेव आदि नाम से भली भाँति स्थित हैं । मण्डप के
पद्म के अन्दर पञ्चवक्त्र घट का न्यास करना चाहिए । पूर्व की ओर
क्षितीन्द्र का न्यास करके पश्चिम में जल सम्भव का न्यास करे । सोम
का यजन उत्तर में करे तथा सौर का न्यास दक्षिण में करना चाहिए ।
इस रीति से कलशों का न्यास करके उनमें इनका विचिन्तन करे ।
कलशों के मुख में ब्रह्मा है और उनकी ग्रीवा में शंकर स्थित रहते हैं ।
मूल में भगवान् विष्णु संस्थित है और मध्य में मातृगण विराजमान हैं ।
दिक्पाल सब देवता दशों दिशाओं को वेष्टित किया करते हैं ।
कुक्षि में सात सागर हैं और सात द्वीप संस्थित हैं । नक्षत्र, समस्त ग्रह
तथा कुल पर्वत गंगा आदि नव नदियाँ, चारों वेद कलम में ये सभी
विराजमान रहते हैं । रत्न, सब बीज, पुष्प, फल, वज्र, मौक्तिक,
वैदूर्य, महादृम, इन्द्र स्फटिक से युक्त सर्वधाममय विम्ब, नागरोहुम्वर,
बीजपूरक, जम्बीर, काश्मीर, आम्रत, दाड़िम, यश, शाली, नीवार,
गोधूम, जितसर्षय, कुंकुम, अगुरु, कपूर, मदन, रोचन, चन्दन, माँसी,
एला, कुष्ठ, कस्तूरी, पत्र, चूर्ण, जल, निर्यास, काम्बुद, शैलेय, बदर,
जातीपत्र, पुष्प, काल शाक, पृक्वा, देवीपणक वचा, धात्री, मंज्जिष्ठा,
मंगलाष्टक, दूर्वा, मोहिनका, भद्रा, शतावरी वर्णों की सरला, क्षुदास्रह,
देवी, गजाह्वा, पूर्ण, कोषासिता, पीठा, गूंजा, शिर, सक, अनल,
व्यामक, गजदन्त शतपुष्प, पुनर्नवा, ब्राह्मी, देवी, रुद्रा, सर्वसन्धानि इन
सबका समाहरण करके कलशों में निर्धापति करना चाहिए । कलश के
देश के अनुसार, ब्रह्मा, शम्भु, गदाधर का क्रम के अनुसार पूजन करके
मुख्यता से भगवान् शम्भु का यजन करना चाहिए । प्रासाद मन्त्र के
द्वारा शम्भु का और तन्त्र के द्वारा शंकर का प्रथम मध्य में अनेक प्रकार
के नैवेद्यों के निवेदन द्वारा पूजन करना चाहिए । दिक्पालों के घटों में
ही दिक्पालों का अर्चन करे । पूर्व में बाहर स्थापित कलशों में ग्रहों का
पूजन करना चाहिए ।
३७८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
नवग्रहों का और मातृघटों में मातृकाओं का पूजन करना चाहिए ।
सभी देवों का घट में यजन करना चाहिए । उनके घट पृथक्-पृथक्
होते हैं । हे नृप ! पूर्व में नौ ही कहे गए हैं जो मुख्य तथा वर्णित हैं ।
भक्ष्य, भोजन, पेय अनेक भाँति के पुष्प और फल-पावक पायस जो
भी सम्भव योजित हों उनके द्वारा राजा सकल सुरों का पुष्प स्नान के
लिए पूजन करे । मंडल के दक्षिण में कुण्ड का निर्माण करके पायस,
समिधा, शाली सिद्धार्थ, दूर्वा, अक्षत तथा केवल घृत से पूजित सकल
सुरों को ऋत्विक् पुरोहित के सहित नृप वृद्धि के लिए होम के द्वारा
सन्तुष्ट करे । होम के अन्त में मण्डप के उत्तर में वेदिका में पदक के
सहित, रोचना नामक तथा अलंकारों को सबको नियोजित करे । वृद्धि
में अंगुलि से छब्बीस अंगुलिका की अवधि पर्यन्त वृत्त अथवा चौकोर
त्रिकोण संज्ञा वाले पद्म को । फिर पद्म के मध्य में मुगोष्टिक से
रत्नेशों को, श्रीवृक्ष, वरारोहा, शुभावन्त उमा देवी को सब रत्नों से और
अलंकारों से दो हाथ यह बनाना चाहिए । वह एक साथ विस्तार वाला
और नौ हाथ दश अंगुल वाला ऊँचा स्नान के लिए, डेढ़ हाथ का वृत्त
तथा गुणों से अवलम्बित करे । शय्या चौगुनी दीर्घ बनावे और धनुष
के मान वाला पीठ करे । गज और सिंह के द्वारा किए हुए आरोप
वाला और हेम तथा रत्नों से विभूषित सिंह नामक सार्ध विस्तार से
दण्डासन को अथवा व्याघ्र चित्रक पदों के द्वारा उपधानों को करावे ।
अथवा अन्यों के द्वारा निर्मित्त चर्म मृदुतूल से पूरित चार हाथ वाली
परिमाण में सुन्दर लक्षण से युक्त दीर्घ विस्तार से युक्त शय्या गुरु
विद्या से नृप की वितस्ति से अधिक की इच्छा करते हैं ।
केवल सोलह ही वर्ण और चित्र से युक्त करने चाहिए । यान,
सिंहासन, पट्टशय्या के उपकरण आदि राजा के योग्य हो वह वेदी के
उत्तर की ओर न्यस्त करे । उनके पश्चिम में सब प्रकार के रत्नों के
समुदाय से स्वतिक श्रेष्ठ पर्यंक पर जो यज्ञ के काष्ठ के समूह से
निर्मित महान् आस्तरण वाले, अर्धच्छादन से संयुत हो तथा चर्म से
आवृत चतुष्टय वाले, वृषभ के तथा सिंह शार्दूलों के ऊर्ण से आवृत्त
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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
३७९
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रत्नों से समन्वित पादपीठ पर राजा अपने चरणों को समारोपित करके
उस पर्यंक के पीठ पर स्थित चर्म खंड चतुष्टय में रत्नों से शोभित
अनेक अलंकारों से युक्त नृपति का स्नपन करावे । ब्राह्मणों के साथ
सुख से संगत राजा को जो सम्वीन काम्बल वाला कृष्ण और बहुत से
वस्त्रों से शोभित हो उसको कलशों के द्वारा बलि पुष्पादि से और
शालिं चूर्णों से स्नान करावे । आठ, सोलह, बीस, एक सौ आठ
अथवा अधिक कलशों की संख्या बतायी गयी है ।
उस संख्या से उत्तरोत्तर अधिक भी होती है । जय और कल्याणप्रद
मंत्रों से कौर मातृकों से आज्य को तेज समुद्दिष्ट किया है । आज्य पापों
के हरण करने वाला है । आज्य ही सुरागणों का आहार और आज्य
में लोक प्रतिष्ठित है । भूमिगत, अन्तरिक्षस्थ, अथवा दिव्य अर्थात्
दिवलोकगत जो भी आपको कल्मष आ गया है वह सब आज्य के
संस्पर्श से विनाश को प्राप्त होवे । इसके अनन्तर शरीर से कम्बल और
वस्त्र को अलग करके पुष्पों और स्नानीयों से पूरित कलशों के द्वारा
भूप को स्नान करावे । हे नृप श्रेष्ठ! शरीर के तत्त्वार्थ के साधक इन
मन्त्रों से राजा को स्नान करावे । सुरगण आपका अभिषिञ्चन करे और
जो सिद्ध एवं पुरातन हैं, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण,
आदित्य, सुगण, भिषग्वर, दोनों अश्विनी कुमार, देवमाता अदिति,
स्वाहा, लक्ष्मी, सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, कुहू, दिति, सुरमा,
विनिता, कद्रु, जो देव पत्नियां कही गयी हैं वे और देव मातायें सिद्ध
और अप्सराओं के गण सब आपका अभिषिञ्चन करें । नक्षत्र, मुहूर्त्त,
पक्ष, अहोरात्र, सन्धि, सम्वत्सर, निमेष, कला, काष्ठा, क्षण, लव ये
काल के सब अवयव आपका अभिषिञ्चन करे और जो सिद्ध एवं
पुरातन हैं, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण, आदित्य, सुगण,
भिषग्वर, दोनों अश्विनी कुमार, देवमाता अदिति, स्वाहा, लक्ष्मी,
सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, कुहू, दिति, सुरमा, विनिता, कद्रु, जो
देव पत्नियां कही गयी हैं वे और देव मातायें सिद्ध और अप्सराओं के
गण सब आपका अभिषिञ्चन करें । वैमानिक अर्थात् विमानों पर
३८० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
संस्थित रहने वाले सुरों के समुदाय, सागरों के सहित मनुगण सरिताएँ,
महानाग, नाग, किम्पुरुष, वैखानस, महाभाग द्विज और अपनी दाराओं
के साथ सप्तर्षि गण जो ध्रुव के स्थान वाले हैं, मारीच, अत्रि, पुलह,
पुलस्त्य, क्रतु, अंगिरा, भृगु, सनत्कुमार, सनक सनन्दन, दक्ष, जेगीषव्य,
अभिनन्दन ।
एक, दो और तीन, जाबालि, कश्यप, दुर्वासा, दुर्विनीत कण्ड,
कात्यायन, मार्कण्डेय, दीर्घतमा, शनुःशेप, विदूरथ, और्व, सवर्त्तक,
च्यवन, अत्रि, पराशर, द्वैपायन, यव, क्रीति, देवरात, सहात्मज, ये और
अन्य जो भी देव व्रत में परायण हैं वे अपने शिष्यों के सहित और
अपनी दाराओं के साथ तप के ही धन वाले आपका अभिषिञ्चन करें ।
पर्वत, वृक्ष, नदियाँ और परम, पुण्य आयतन, प्रजापति, क्षिति, गौयें,
विश्व की मातायें, दिव्य वाहन, सब लोक, चर और अचर, अग्नियाँ,
पितर, तारा, जहमूत, आकाश, दिशायें, जल, ये और अन्य बहुत से
पुण्य संकीर्तन वाले तथा शुभ सब उत्पातों के नियर्हण करने वाले जलों
के द्वारा आपका अभिषिञ्चन करें । इस प्रकार से इन शुभ प्रदाता दिव्य
मन्त्रों के द्वारा दूसरों के द्वारा अभिषेक करे ।
निम्नलिखित मन्त्रों से व नारायणों से, रौद्रों से, ब्रह्मा और इन्द्र से,
समुद्भवों से, 'आपोहिष्ठा' इत्यादि से, 'हिरण्य' इससे, 'सम्भव'
इससे, सुर, इससे 'मानस्तोके' इस मन्त्र से और 'गन्ध द्वार', इस मन्त्र
के द्वारा, सर्वमंगल मांगल्ये इससे, 'श्रीश्चते', इसके द्वारा और ग्रह
योगियों से इस प्रकार से स्नान का समादन करके कम्बलों से शरीर को
आवृत करके 'सर्व मंगल' इत्यादि मन्त्र के द्वारा कपास से निर्मित वस्त्र
को धारण करना चाहिए । इसके उपरान्त आचमन करके देवों का, गुरु
का और विप्रगणों का अभ्यर्चन करना चाहिए । फिर ध्वज, छत्र,
चामर, घण्टा, अश्व, गज को मन्त्र का जप करके धारण करे और
इसके अनन्तर हुताशन के समीप गमन करना चाहिए । वहाँ पर जाकर
राजा वह्नि के मध्य में वह्नि की श्री का निरीक्षण करें । वहाँ पर
बिन्दुओं के द्वारा निमित्तों की और अनिमित्तों को लक्षित करना
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चाहिए। दैवज्ञ (ज्योतिर्विद) कञ्चुकि, अमात्य, बन्दीजन, पुरवासीजन
से आवृत्त होते हुए तुमुल वाद्यों की ध्वनियाँ से तथा शुभ तौर्यत्रिकों के
साथ युक्त होकर शेष में पुनः शान्ति करके और आशीर्वाच्य करके
द्विजों को विधिपूर्वक सुवर्ण से युक्तपूर्ण दक्षिणा देवे तथा धान्य और
वस्त्र देकर उन सबको विदा करे।
इसके अनन्तर पुरोहित शेष जल से समस्त अमात्यादिक का सेचन
करे तथा तुरंग का, बल का, राष्ट्र का सेचन करना चाहिए। इस
प्रकार से करके पीछे राजा तीन रात्रि पर्यन्त पूर्णतया संयम से युक्त
होकर रहे। माँस का अशन, मैथुन से रहित रहे और मांगल्यों का सेवन
करे। यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त तृतीया तिथि का लाभ है उसमें सदा
शंकर के साथ चण्डिका देवी का अर्चन करना चाहिए। पाञ्चायिकी
विहार आदि के द्वारा तथा शिशुओं के कौतुकों के, वैवाहिक विधि से
शिवा चण्डिका का मोहन करना चाहिए। समस्त चतुष्पथों (चौराहों)
में और देवों तथा देवियों के मन्दिरों में पताकाओं को लगाकर उन्हें
भूषित करे और ऐसा करता हुआ कभी भी दुःख नहीं पाया करता है।
इस रीति से शान्ति यज्ञ को सुसम्पन्न करके तथा पुष्य का अभिसेचन
करके चतुरंगों के साथ, भार्याओं और नरों के साथ राज्य मण्डल से
समन्वित यहाँ पर और परलोक में कभी भी दुखित नहीं हुआ करता
है और इससे बड़ा और श्रेष्ठ कोई भी न यज्ञ होता है और न इससे
उत्तम कोई उत्सव ही हुआ करता है।
इससे बढ़कर कोई भी शान्ति नहीं है और इससे अधिक कोई
कल्याण एवं मंगल नहीं होता है। इस विधान से ही नृप का अभिषेचन
होता है और राजपुरोहित को चाहिए कि इसी विधान से युवराज का
अभिषेक करे। यदि नृप को अभिषेक का समाचरण करना हो तो इसी
विधान से नृप सदा स्थिर होता है। प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने इन्द्रदेव
से यही यज्ञ कहा था। इसी भाँति राजा इस यज्ञ को करके यहाँ पर
और परलोक में कभी दुःख नहीं पाया करता है।
शकध्वजोत्सव वर्णन
३८२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
शकध्वजोत्सव वर्णन
और्व ने कहा-इससे अनन्तर हे राजेन्द्र! अतएव आप शक्रोत्थान
ध्वजोत्सव का श्रवण कीजिए जिसको सम्पादित करके राजा किसी
समय में भी पराभव की प्राप्ति नहीं किया करता है । हरिस्थ परिवार
के दिन श्रवण से युक्त द्वादशी तिथि में राजा को इन्द्रदेव का समाराधन
करना चाहिए । इसको भली भाँति करने से सब प्रकार के विघ्नों की
उपशान्ति हुआ करती है । राज परिवार नाम वाला जिसका वासु नाम
दूसरा है, नृप इसे करे । यह पिछले समय में अतुल यज्ञ प्रवृत्त हुआ
था । नभ मास में, वर्षा ऋतु में, द्वादशी तिथि में, शुक्ल पक्ष में,
पुरोहित बहुत प्रकार के वाद्यों और तूर्यों से समन्वित हो । सबसे प्रथम
इन्द्र के केतु के लिए वृक्ष को आमन्त्रित करके उसको वर्धित करना
चाहिए । सम्वत्सर और वार्धकि मंगल कौतुक किया हुआ हो । उद्यान
में, देवता के आगार में, श्मशान में और मार्ग के मध्य में जो भी तरुवर
समुत्पन्न हों उनका वायस ध्वज में वर्जन कर देना चाहिए । जो बहुत
वल्लियों से संयुत हो, शुष्क हो, बहुत से काँटों से समन्वित हो, कुब्ज
अर्थात् टेढ़ा हो वृक्षादनीय युक्त हो तथा लताओं से छन्न तरु हो उसका
परित्याग कर देना चाहिए ।
जो वृक्ष पक्षियों के निवास से समाकीर्ण हो अर्थात् जिस पर बहुत
से पक्षियों के घोंसले हों, जो बहुत कोटरों से समन्वित हो, जो वायु
और अग्नि से विध्वस्त हो गया हो ऐसे तरु को यत्नपूर्वक वर्जन कर
देवे । जिन वृक्षों का नाम नारी वाला हो, जो अत्यन्त छोटा हो, जो
बहुत ही कृश हों । ऐसे इन सभी वृक्षों का धीर पुरुष इन्द्र के पूजन
में सदा ही वर्णन कर दे । अर्जन, अश्वकर्ण, प्रिय कोषरु, औदुम्बर,
ये पाँच वृक्ष केतु के लिए उत्तम बताए गए हैं, और अन्य देवदारु आदि
तथा शाल आदि वृक्ष जो भी प्रशस्त हैं उनका परिग्रहण करना चाहिए
और जो अप्रशस्त हैं उनका कभी भी ग्रहण न करे । वृक्ष को पकड़
करके रात्रि में स्पर्श करके इस निम्न कथित मंत्र का पाठ करना
चाहिए, जो प्राणी वृक्षों पर है उनके लिए कल्याण हो और आपको
नमस्कार है । राजा आपका वरण करता है । हे नृपोत्तम! कल्याण हो ।
देवराज इन्द्र की ध्वजा के लिए इस पूजा का परिग्रहण करिए । इसके
अनन्तर दूसरे दिन में उसका छेदन करके फिर आठ अंगुल मूल का
ग्रहण करे तथा आगे की ओर से चार अंगुल को छेदन करके उसे जल
प्रक्षिप्त कर देवे । फिर पुर के द्वार पर ले जाकर वहाँ पर केतु का
निर्माण करके भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में केतुका
वेदी प्रवेश करना चाहिए । बाईस हाथ के मान वाला केतु अधम कहा
जाता है । बत्तीस हाथ के मान वाला उससे ज्येष्ठ होता है । बयालीस
हाथ के मान वाला भी होता है । इससे भी अधिक बावन हाथ के मान
वाला उत्तम कहा गया है । हे नृप श्रेष्ठ! इन्द्र की पाँच कुमारियाँ करनी
चाहिए । वे सब शालमयी हों और दूसरी शक्र मातृकाऐं होनी चाहिए ।
केतु के सेतुपाद के प्रमाण वाला तथा मन्त्री के दो हाथ करे । इस रीति
से कुमारियों की रचना करके और मातृका तथा केतु को करके
एकादशी तिथि में शुक्ल पक्ष में उस यष्टि की अधिवासित न करे ।
फिर यष्टि का अधिवास करे तो जो 'गन्ध द्वारा' आदि मन्त्रों के द्वारा
किया जाना चाहिए ।
भगवान् अच्युत का अर्चन करके पीछे शुक्रदेव का पूजन करना
चाहिए । इन्द्रदेव की प्रतिमा का निर्माण के स्वर्ण द्वारा अथवा काष्ठ
के द्वारा करना चाहिए । अन्य किसी उत्तम धातु के द्वारा निर्माण करावे
अथवा सबके अभाव में मृत्तिका से परिपूर्ण करे । उस प्रतिमा को
मण्डल के मध्य में स्थापित करके विशेष रूप से अर्चन करे । इसके
अनन्तर किसी परम शुभ मुहुर्त में राजा केतु को उत्थापित करे । हे
पुरन्दर! आप हाथ में वज्र धारण किए हुए हैं । आप असुरों के हनन
करने वाले हैं, आपके बहुत नेत्र हैं । समस्त लोकों के कल्याण करने
वज्र के लिए यह पूजा ग्रहण कीजिए । हे अमरों के स्वामिन्! आप
सबके धारण करने वाले हैं और सभी देवगणों के द्वारा अभिष्टुत हैं
आप यहाँ पर आगमन कीजिए, यहाँ पदार्पण करिए । आप श्रवण के
आद्यपाद से समुत्थित हुए हैं, आप इस पूजा का ग्रहण कीजिए । हे