कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 362, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३६५
राजा की महिषी प्रमुख तुमको चाहती हैं यदि आपकी स्पृहा हो तो वहाँ
पर मैं योजित कर दूँगी । सचिव तुमको चाहता है । हे वरवर्णिनि!
आपके योग्य भी है यदि आपकी श्रद्धा हो तो में उसका संगम कराने
के लिए समर्थ हूँ । इस रीति से तथा अनेक उपायों से और उत्तरों के
द्वारा भार्याओं, पुत्र, दुहित्रियों, स्नुषाओं, सचिवों, पुत्रों, सेवकों, आदि
का शोधन करना चाहिए । काम की उपधाओं से अविशुद्ध के बिना
ही कुछ विचार किए हुए विघात कर देना चाहिए । स्त्रियों को दण्ड
के द्वारा योजित करे और ब्राह्मणों को प्रवासित कर देवे । मोक्ष के मार्ग
में अवसक्त तथा हिंसा और पैशुन्य से रहित, क्षमा को ही एक सार
मानने वाले सचिव का राजा को परिवर्जन कर देना चाहिए ।
जो मोक्ष मार्ग में विशेष रूप से शक्त हों, दण्ड योग्य भी हों तो
भी उन्हें दण्ड नहीं देना चाहिए । वह सर्वत्र सम बुद्धि वाला हैं इसी
कारण से उसको परिवर्जित कर देवे । उपधाओं का यह सूत्र है । पुनः
उपधा का बहुत सा विवेचन किया गया है । उशना ने इसका अच्छा
विवेचन किया है । वहाँ पर उसके शास्त्र में इसका बोध करे । राजा
को दूसरों के साथ निरन्तर विग्रह का भली प्रकार से आचरण नहीं
करना चाहिए । भूमि, वित्त, मित्र, लाभों से जब से निश्चय हो जावें
तो ही विग्रह होते हैं । उत्तम नृपों के द्वारा स्वतः अंगों में सदा प्रसाद
ही करना चाहिए । कोष की रक्षा और निरन्तर सञ्चय भली भाँति
करना चाहिए । राजा को अपने मंत्रीगण विद्या में विशारद विप्रों को
ही करना चाहिए । जो विशेष रूप से धर्मशास्त्र के ज्ञाता, कुलीन, धर्म
और अर्थ में कुशल एवं सरल स्वभाव वाले होवें । उनके साथ ज्ञान
की मन्त्रणा करे और अत्यंत अधिक बहुतों के साथ कभी भी समाचरण
करे । एक-एक के ही साथ मन्त्रणा का विशेष निश्चय करे ।
अरण्य से निशिलोक में मन्त्रणा करे किन्तु रात्रि में कभी भी
मन्त्रणा नहीं करना चाहिए । मन्त्रणा के गृह में छोटे बच्चों को, शाखा
मृगों को, (बन्दरों) षण्डों को, शुकों को, सारिकाओं को तथा विकृत
मनुष्यों को वर्जित कर देना चाहिए । नृपों के मन्त्र भेदों में भी जो दूषण