कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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होते हैं । क्योंकि सत् शब्द साधु वाचक हुआ करता है । उनका जो भी
आचरण है वह सदाचार कहा जाया करता है । आगमों में, पुराणों में
और संहिताओं में जिस प्रकार से कहे गए उन समुद्दिष्ट सदाचारों में
गृहस्थ की भाँति ग्रहण करना चाहिए । वेदों के पाठों के द्वारा ऋषियों
का यजन करे और होमों के द्वारा देवगणों का पूजन करे । श्राद्धों के
द्वारा पितृगणों को तृप्त करे तथा बस्तियों के द्वारा भूतों को संतृप्त
करना चाहिए । मैत्र, प्रसाधन, स्नान, दन्त, धावव, अञ्जन यह सब
गृहस्थ की ही भाँति करे तथा निषेकाद्य विधि को करना चाहिए । राजा
को चाहिए कि षट्कर्मों में सभी ओर से विप्रों की नियुक्ति करे । उसी
भाँति क्षत्रिय आदि को अपने-अपने धर्म में नियोजित करे । जो अपने
शास्त्रोक्त धर्म का परित्याग करके पराये के धर्म का समाचरण करे
उसको राजा एक सौ पण का दण्ड देवे और फिर उसको उसी विहित
धर्म में नियोजित करना चाहिए ।
एक सम्वत्सर में होने वाले कृत्यों में विशेष रूप से इनका
समाचरण करना चाहिए । हे राजन्! राजा उन विशेषों का अवश्य ही
समाचरण करे, उनका श्रवण मुझसे कर लो । शरत्काल में अष्टमी के
दिन दुर्गा का परिपूजन करे । दशमी तिथि में बल की वृद्धि के लिए
नीराजन करना चाहिए । पौष मास में तृतीया में पुष्य का अभिषेक करे
और नृप पञ्चमी में श्रीदेवी का पूजन करके चरण करे । हे नृप श्रेष्ठ!
धन धान्य की वृद्धि के लिए श्रीयज्ञ का समाचरण करना चाहिए ।
श्रेष्ठ मास में दशहरा के दिन भगवान् विष्णु की इष्टि का समाचरण
करे । द्वादशी में हरिस्थ रवि के दिन में इन्द्रदेव की पूजा करनी
चाहिए । राजा को इन यज्ञों का विशेष रूप से बहुत व्यय के द्वारा
करना चाहिए । इनके किए जाने पर बल, राज्य और कोष भी वृद्धि
को प्राप्त होते हैं । इन यज्ञों को न किए जाने पर देश में दुर्भिक्ष
( अकाल ) और मरण होता है । सब प्रकार की ईतियाँ होती हैं ।
( टिड्डी आदि ईतियाँ हुआ करती है ) अतएव इनको विशेष रूप से
करना चाहिए । शारत्काल में महाष्टमी तिथि में दुर्गा की पूजा की
विधि है ।