कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
हो जाता है वह परम दक्ष सैकड़ों नृपों के द्वारा भी समाधान नहीं किया
जा सकता है । जो दण्ड के योग्य है उनको तो अवश्य दण्ड देवे और
जो अदंडनीय हों उनको दण्ड नहीं देना चाहिए । जो दण्ड के योग्य हैं
उनको दण्ड न देते हुए और जो दण्ड के योग्य नहीं है उनको दण्ड देते
हुए राजा निन्दा को प्राप्त करके चोर के पाप को प्राप्त किया करता
है । प्रकार, अट्टालिका और तोरणों के द्वारा दुर्ग में समता करनी
चाहिए । राजा को चाहिए कि भूषित नगर से दूर में दुर्गाश्रय करे ।
राजाओं का बल दुर्ग है और नित्य ही दुर्ग की प्रशंसा की जाती है ।
एक ही धनुर्धारी दुर्ग में स्थित होकर सौ शूरों से युद्ध किया करता है ।
इसी कारण से दुर्ग को प्रशस्त कहा जाया करता है । दुर्ग कई प्रकार
के होते हैं, जल दुर्ग होता है, भूमि दुर्ग है, और वृक्ष दुर्ग होता है ।
अरण्य मरु दुर्ग, शैल से समुद्भूत दुर्ग और परिखा से उद्भूत दुर्ग होता
है । नृप का जैसा अपने देश का दुर्ग हो वैसा ही दुर्ग करना चाहिए ।
दुर्ग की रचना करते हुए त्रिकोण और धनुष की आकृति वाला पुर
बनाना चाहिए । वर्तुल और चतुष्कोण की रचना करे अन्य प्रकार से
नगर में नहीं करना चाहिए । मृदंग की आकृति वाला दुर्ग निरन्तर कुल
के नाश करने वाला होता है । जिस प्रकार से पहले राक्षसों का राजा
रावण की लंका पुरी में दुर्ग से युक्त थी । राजा बलि को शोणित नाम
वाला पुर था और दुगों में प्रतिष्ठित था । क्योंकि वह व्यञ्जाकार था
और शिवा बलि मनोभ्रष्ट थी । शल्वराज का सौभाग्य नगर पाँच कोनों
वाला था । जो राज्य दिवलोक में है वह भ्रष्ट हो जायेगा और जो
अयोध्या नामक इक्ष्वाकुओं नृपों का पुरा था वह भी धनुष की आकृति
वाला था । इसलिए विजयप्रद हुआ था । दुर्ग की भूमि में दुर्गा का
यजन करना चाहिए और द्वारा पर दिक्पालों का यजन करे । विधान
से पूजन करके नृप जय को प्राप्त किया करता है ।
इसलिए राजा को अपना दुर्ग निरन्तर जय की वृद्धि के लिए
करना चाहिए । राजा ब्राह्मणों को सदा किसी से भी अवमानीकृत न
करे । राजा विप्रों को अवमान करके यहाँ पर और मृत्युगत होकर भी