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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(४१६)

कवीरपंथी—

तौलना एक न देना दोई ॥१५॥ अलख पुरुष देखा समदिष्टी ।
हाथ पसार आवे नहिं सुष्टी ॥ पांच तत्त्वते न्यारा होई । तौलना
एक न देना दोई ॥ १६ ॥ पानीसे पतला करि जाना । धूवाँते
अति झीन बखाना ॥ मनही आवे मनही जाई । मन ही काल
सबनको खाई ॥ मन चंचलही लखे जु कोई । तौलना एक न
देना दोई ॥१८॥ मनही जल थल मनहिं अकासा । मनही पांच
तत्त्व परकासा ॥ मनको रूप देख नहिं होई । तौलना एक न देना
दोई ॥१९॥ ब्रह्मादिक सनकादिक भाई । तेऊ मनके हाथ बिकाई ॥
मन सावज बस करे जु कोई । तौलना एक न देना दोई ॥२०॥
कौन सु सुनिवर मनको मारै । मनको मारि कौनको तारै ॥ उल्टा
मने निज मने समोई । तौलना एक न देना दोई ॥२१॥ अगम
अगाध वार नहिं पारा । गुरुगम शब्दहिं किया विचारा ॥ कहैं
कवीर हम देखा सोई । तौलना एक न देना दोई ॥ २२ ॥

इति रमैनी निरख परखकी ॥

सत्यनाम ।

॥ अथ शब्द पारखकी रमैनी ॥ ×

सिगी निसदिन अनहद बाजे । सदा रहे उन मुनिके छाजे ॥
सुरति शब्दमें रहे समाई । कहे कवीर गलतान रहाई ॥१॥ बहुत
दिवसका सूता जागा । खोलि कपाट नामसो लागा । धन सतगुरु
जिन राह बताई । कहैं कवीर सब विपत मिटाई ॥२॥ घटमें भया
नामका हेला । मूल गहा जब खेलम खेला । मोह मायाकी काटी
फांसी । कहैं कवीर मिटी चौरासी ॥ ३ ॥ स्वामी जो संसारसे
न्यारा । सो कहिये साहबका प्यारा । आशा तजिके रहे निरासा ।

× यह शब्द मुझे—सेवक मातादीन कवीर पंथी—करनेलपुरा इन्दौरसे मिला था—जो बहुत
पुराना लिखा हुआ है । एकही प्रति होने के कारण ज्यों का त्यों रहने दिया है । पाठक और प्रतिसे मिलानकर
सुधार सकते हैं ॥

शब्दावली

(४१७)

कहै कवीर तब देख तमासा ॥ ४ ॥ हाथ ठीकरा गलेमें कंथा ।
निर्गुन होके यकड़े पंथा । ज्ञान चिरागी घटमें जूपी । कहै कवीर
सो सुक्त सहूपी ॥ ५ ॥ फाँटा टूटा कंथा पहिरे । मनसा ममता
घटमें गहिरे । ताकी चौकी मान बढाई । कहै कवीर सो दिया
उठाई ॥ ६ ॥ मनराजा सरगुनमें भीजे । ज्यों छेरी खटिककी धीजे ।
निरगुन सेती लाजा मरई । कहैं कवीर जिव कैसे तरई ॥ ७ ॥
फाँसी लिया हाथमें माया । ज्यों बाघिन बकरेको खाया । पल
पल सो गँवावे रोई । कहैं कवीर ऐसा दुख होई ॥ ८ ॥ मायाका
जोरा है पंदा । यासे डबरा कोइ कोइ बंदा । स्वास उसास सुमिरन
लागा । कहैं कवीर विषय सब भागा ॥ ९ ॥ जैसे सरपिनि
किया कुँडाला । कोइ बन्धा कोई दीया टाला । कहैं कवीर
कुडाला पेलै । निर्भय होय जगतमें खेलै ॥ १० ॥ यह संसार
कुँडाला माहीं । जाको सरपिनि धर धर खाहीं । कहै कवीर कोइ
बाहर आवे । ताको माया नाहि सतावे ॥ ११ ॥ व्यवहार करै
औ ऊंचा बोले । निसि दिन फूला फूला ढोलै ॥ माँग तांग कर
करै रसोई । कहैं कवीर नफा नहिं काई ॥ १२ ॥ बहुत जतन करि
जगत परमोघे । अपने घटको नाहीं सोघे । अंधा शब्द करै नहिं
परिचय । कहै कवि ब्रह्म कैसे दरसे ॥ १३ ॥ दुनिया सेती बक
बक सूवा । ज्यों नलनीने पकरचो सूवा । ऊपर पाँव तले भइ मूड़ी ।
कहै कवीर संसारी बूड़ी ॥ १४ ॥ रात दिवस कर ज्ञान पुकारे ।
मन इन्द्रीको नाहीं मारे । कहैं कवीर सुनो नर लोई । कागा हँसा
कैसे होई ॥ १५ ॥ कठिन धारना हंसकी भाई । ज्यों नटनी कर
वरत चढाई । चढै बरत वह तन मन साधै । कहैं कवीर वहि कला
अगाधै ॥ १६ ॥ सुरत निरत सो नटनी खेलै । तन संभालि आगे
पग मेलै । ऐसी धरन नाम जेहि आवे । कहैं कवीर सो हंस कहावे

कवीरपंथी- शब्दावली १४

(४१८)

कवीरपंथी—

॥१७॥ अन्तर लागी करमकी टाटी । दशो दिशा सुरत जो फाटी ।
धोखा चिन्तामें दिन बीता । कहैं कवीर यों रहिगा रीता ॥१८॥
जाग शिताबी अब का सोवे । टाला-टूलीमें दिन खोवे । छाड़ि
अनेक एकको धावे । कहैं कवीर निर्भय होय जावे ॥१९॥ बाँका
गढको बेगइ लीजे । पीछे नहीं पयाना कीजे । सन्मुख जूझे सोई
सुरा । कहैं कवीर साहेबका पूरा ॥२०॥ आठपहर जो मान पुकारे ।
घटका बैरी चुनचुन मारे । अगम पंथका नाम बोहारे । कहैं कवीर
नहि जमके सारे ॥२१॥ हिंदू तुरुक दोऊ सो न्यारा । मुखसो
बचन कहे नहि खारा । राह ऊजडकी लीजे भाई । कहैं कवीर
झांखा नहि खाई ॥२२॥ छन्द व्याधिसो न्यारा रहना । निशिदिन
साहिबसाहिब कहना । कहैं कवीर समझकर देखो । आन बसी सो
नाहि न लेखो ॥२३॥ सार शब्दका थाला झेलै । निर्भय होय
जगतमें खेलै ॥ कहैं कवीर क्या संशय कीया । नाम पियाला
भरभर पीया ॥२४॥ शून्य मँडलमें तारी लागी । सूती सुरति
भडक दै जागी ॥ कहैं कवीर पियासो लागी । मनकी दुविधा
तबहीं आगी ॥२५॥

सा०-डोरी लागी डर मिटा, सुरत रही गरनाय ।
सुरत सुहागिन हो रही, पर घर परत न जाय ॥

इति श्री शब्द पारखा सम्पूर्ण ।

सत्यनाम ।

॥ सर्वांगवत्तीसी रमैनी ॥

काबी कौन ?

सोइ काजी जो होय समाना । दिल दरिआवमें रहे समाना ॥
परम जोतिपर आसन करई । सो काजी भवसागर तरई ॥१॥

शब्दावली

(४१९)

मुक्ता कौन ?

सो मुक्ता जो मनका धीरा । आप आपनी चीन्है पीरा ॥
सहज झून्धमें रहे समाई । सो मुक्ता विहिश्त को जाई ॥२॥

दुर्वेग कौन ?

सोई दुर्वेग जो दिलका सुरा । घट परचेमें देखे नूरा ॥
ज्ञान ध्यानकी बातें करई । सो दुर्वेग जगतमें तरई ॥३॥

शेष कौन ?

सोई शेष जो शेखी धरई । घट परिचय कर मन सो तरई ॥
मनसा मार करै पिसमाना । मन जीते सो शेख बखाना ॥४॥

फकीर कौन ?

सोई फकीर जो फांके काला । इन्द्री जिह्वा एकहि नाला ॥
इन्द्री जिह्वा दोष परहरई । काया खोज अलह चित धरई ॥५॥

पठान कौन ?

सो पठान जो परमादहिं तोरे । अलख पुरुष घट माहिं निहोरे ॥
निरगुन कालसे तिनका तूरा । सोई पठान जगतमें सुरा ॥६॥

सव्यद कौन ?

सो सव्यद जो सरा विचारे । वेद कितेबसे रहे निनारे ।
वेद कितेब दोनों परिहरई । निर्गुण नाम निरंतर धरई ॥७॥

काफिर कौन ?

सो काफिर कदी न लौलावे । दुनिया त्याग नहीं मन भावे ।
घटको छाडि अनत नहिं जाई । विचमें सुवे लखे न खुदाई ॥८॥

हिन्दू कौन ?

सोई हिन्दू जो हिरदय समाना । पाप छोडि करै पुण्य निधाना ॥
निरगुन नाम निरंतर ध्यावे । जरा मरणमें बहुरि न आवे ॥९॥

ब्राह्मण कौन ?

सोई ब्राह्मण जो ब्रह्म पहिचाना । जीव शीवमें रहे समाना ॥
तीन लोकमें ब्रह्म परचाना । ब्रह्म छाडि पूजे नहिं आना ॥१०॥

(४२०)

कवीरूपंयी-

क्षत्री कौन ?

सो क्षत्री जो जमा संभारे । काम क्रोध गुन हिरदय जारै ॥
काम क्रोध तन तजे गुमाना । सो क्षत्री रहे निरवाना ॥११॥

वैश्य कौन ?

सो वैश्य जो करै व्योपारा । सत्य शब्द ले हाट पसारा ॥
झूठ कपटको त्यागन कीन्हा । सब जीवनको भोजन दीन्हा ॥१२॥

शूद्र कौन ?

सोई शूद्र जो सेवा मन लीन्हा । आतमराम सकल घट चीन्हा ॥
सेवाको फल पावै सोई । जरा मरन दुख नासै दोई ॥ १३ ॥

बुलहा—कोरी कौन ?

सो बुलहा जो कोरै विधाना । बिन धरनीको बुने जो बाना ।
बाना बुनकै करै ठिकाना । खुवा प्रान जो वा घर जाना ॥१४॥

राजा कौन ?

राजा सो जो विलसे राजू । निसि दिन करै सत्यको काजू ।
हाथ अन्तर कबहुँ न धरई । सब जीवनकी रच्छा करई ॥१५॥

कायथ कौन ?

सो कायथ जो कथी विलोवे । पाप पुन्यका संसा खोवे ॥
मिथ्या वचन कबहुँ नहिं कहई । निसिदिन ओट नामकी गहई ॥१६॥

योगी कौन ?

सो योगी जो खोजे आपा । लिप्त न होवे पुन्य अरु पापा ॥
आपा मध्ये करै विचारा । काम क्रोध ते रहे निनारा ॥ १७ ॥

संन्यासी कौन ?

संन्यासी करै सबको न्यासा । काम क्रोधको मेटै फाँसा ॥
कनक कामिनि जीते झारी । सतगुरु शब्द दिल माहिं विचारी ॥१८॥

बैरागी कौन ?

सो बैरागी जो राग न करई । बीत राग होय जग संचरई ॥
व्यापक ब्रह्म घटहीमें देखे । सो बैरागी है हमरे लेखे ॥ १९ ॥

रामानन्दी कौन ?

रामहिं छाड़ि न आन ध्यावे । घट घट महाँ राम चित लावे ॥
भेदभाव कबहुँ नहिं माने । सो रामानन्दी साँच बखाने ॥२०॥

शब्दावली ।

(४२१)

शैव कौन ?

सो शैव जो शिवोऽहम गावे । जीव शीवको भेद मिटावे ॥
छाड़ि अमंगल मंगल रांचे । रहिअ जांच कबहुँ नहिं जांचे ॥२१॥

वैष्णव कौन ?

वैष्णव सोई जो व्यापक जाने । भक्त भगवंत एक करि माने ॥
दया क्षमा उर धरे विचारू । एक दोयका करे निवारू ॥२२॥

कर्म कौन ?

कर्मो सोई जो कर्म कमावे । अकरम छोड़ि सुकरम को धावे ।
पाप पुण्यकी आस बहाई । एक नाम रहै लवलार्ह ॥२३॥

उपासक कौन ?

इष्ट देवको निकटहिं जाने । रहे सदा सन्मुख मनमाने ॥
उपास्य देवको धरे ध्याना । सद्गुरु दया होय निर्वाना ॥२४॥

ज्ञानी कौन ?

ज्ञानी सोई जो ज्ञेय पहिचाने । आत्मम ब्रह्म एक करि जाने ॥
द्वैत भावको देह उड़ाई । कहैं कवीर ज्ञानी सतभाई ॥२५॥

पंथी कौन ?

पंथी होय सुपंथहि चाले । छाँडे पथ न कुपथ पग डाले ।
सद्गुरु बचन सदा मन आने । वेद संत सोइ पंथ बखाने ॥२६॥

गृही कौन ?

गिरही होय गिरहको जाने । पांच तत्व गुण तीन पिछाने ।
करि पिछान न्यारा होय जाई । आत्मतत्वमें रहे समाई ॥२७॥

वैद्य कौन ?

वैद्य सोई जो नाड़ि पिछाने । रोग अरोगका भेद बखाने ।
पात्र कुपात्रका करे विचारा । औषध नाम करे परचारा ॥२८॥

मंत्री कौन ?

मंत्री सोई जो मंत्र विचारे । राज काजको भले सँझारे ।
रय्यत राजा बसि करि राखे । नाम सुधारस निसि दिन चाखे ॥२९॥

(४२२)

कवीरपंथी

गुरु कौन ?

गुरु सोई जो ज्ञान सिखावे । मनका संशय दूर बहावे ॥
करम भरम सब देह बहाई । सांचा सतगुरु सोह कहाई ॥ ३० ॥

इष्ट कौन ?

इष्ट सोई जो सबका होई । जहां न भेद भाव कछु कोई ।
अखंडस्वरूप अस्तिबखानो । कहैं कवीर निजआतमजानो ॥ ३१ ॥

रहनी कौन ?

ऐसी रहनी रहै जु कोई । मुक्ति पंथको पावे सोई ॥ भाव भक्ति
दोऊ समतूला । कहैं कवीर सो पावे मूला ॥ ३२ ॥

पच्छापच्छी कारने, सब जग गया भुलान ।

निर्पच्छ होयके हरि भजे, सोई संत सुजान ॥ १ ॥

आस पास जग बंधिया, आश रहै लिपटाय ।

नाम आश पूरन करै, सबै आश मिट जाय ॥ २ ॥

जो तू चाहे मुइझको, मते कुछ राखे आश ।

मुइझ सरीखा होय रहू, सब कुछ तेरे पास ॥ ३ ॥

इति श्रीसर्वांग वत्तीसी रमैनी ॥

रमैनी सोलहतिथिकी ॥

आउ संत मिलि उतरो पारा । सोलह तिथिका करो विचारा ॥
सोरह तिथिकी कथूँ रमैनी । धरम दास यह लोक निसैनी ॥ १ ॥
अमावस जो मन दिठ होई । आतम परिचय सुआ न कोई ॥
(अमावस आसन दिठ होई । आतम परिचय मानै सोई) ॥ २ ॥
पडिवा प्रीति पियासूँ लागी । संशय गयो द्वैत सब भागी ॥ गुरु
प्रताप दया जब कीन्हा । दिलका धोखा सब हर लीन्हा ॥ ३ ॥
बूहज भीतर बोले ओई । अन्दर रांचे जोगी सोई ॥ तीजै तीन
गुननसे न्यारा । जो बूझे सो उतरै पारा ॥ ४ ॥ चौथे चित चैतन
सो लाग। दिलका धोखा सबहीं भागा ॥ पाँचै मिलि गुरु पूरा

शब्दावली

(४२३)

पाया । बहुरि न जोनी संकट आया ॥ ५ ॥ छठईं छूति करो मत कोई । सब घट ब्रह्म व्यापक होई ॥ सातम नाम सुधा रस पीजे । निर्मल नाम साहेबको लीजे ॥ ६ ॥ ( सातें सतनाम रस पीजे । सिरके सांटे साहिब लीजे ॥ ) आठम अनुभव लेहु बिचारी । सब घट पुरुष कहूँ नहि नारी ॥ ७ ॥ नौ नारी देखो इक साथ । है हीरा जो आवै हाथा ॥ दशों दिसा मन काहेको धावे । अन्दर खोजे साहब पावे ॥ ८ ॥ ग्यारह आवागमन न होई । जो सतनामहिं चीन्हे कोई ॥ द्वादश ऊपर बोले ओई । जरा मरन दुख नासे सोई ॥ ९ ॥ ( द्वादश ऊपर बोले सोई । जरा मरनके भरम न होई ॥ तेरस तनकी तपन बुझाई । होय लौलीन साहब गुन गाई ॥ १० ॥ चौदश चञ्चल निश्चल कीन्हा । तब साहिब आपन करि लीन्हा ॥ पूनो प्रेम पियाला पीजै । सिरके सांटे साहिब लीजै ॥ ११ ॥ सोलह तिथि यहि विधि भाखा । सबहि कला विचार अभिलाखा ॥ सोलह कला सम्पूर्णन भयऊ । कहैं कवीर सत लोके गयऊ ॥ १२ ॥

साखी-सोरह सुत सो पुरुषके, सोरह कला विहार ।

सत्यलोक सो पावई, सोलह करे विचार ॥

अथ रमैनी अक्षर छण्डकी ॥

अच्छर खानी अच्छर बानी । अच्छरसे अच्छर उत्पानी ॥ अच्छर आदि बसे आकास । अच्छर चन्द सूर परकास ॥ १ ॥ अच्छर ब्रह्मा विष्णु महेस । अच्छर नारद गौरि गनेस ॥ अच्छर धरनि पवन औ पानी । अच्छर आदिहि अगम बखानी ॥ २ ॥ अच्छर नव औतार जो भयऊ । बिन अच्छर कोउ भेद न लहेऊ ॥ बिन अच्छर नाहिं निवेरा । अच्छर बिन सब पुंघ कुहेरा ॥ ३ ॥ अच्छर निरंकार परमाना । अदली अच्छर अदल अमाना ॥ अच्छर काया अच्छर माया । अच्छर जग सतगुरु हो आया ॥ ४ ॥

(४२४)

कवीरपंथी—

अच्छर मंत्र जंत्र सब पूजा । विन अच्छर कोइ और न दूजा ॥
अच्छरमें सब जगत भुलाना । विन अच्छर नहिं उपजे ज्ञाना ॥६॥
अच्छर विन कारज नहिं रती । विन अच्छर पावे नहिं गती ॥
अच्छरमें सब जग उपजाया । अच्छर शून्य विशून्य समाया ॥६॥
अच्छर आवै अच्छर जाई । अच्छर काल सबनको खाई ॥
अच्छर सबका भारै लेखा । अच्छर गुप्त परगट होय देखा ॥७॥
सतगुरु अच्छर आनि बतावा । जीवनको भय फंद छुडावा ॥
निअच्छर की पावे सहिदानी । कहैं कवीर तब छूटे प्रानी ॥८॥
सार्वी-अच्छर पावे प्रेम सो, धोखा देह बहाय ।

प्रेम भक्ति जाने विना, जिव परले तर जाय ॥ १ ॥

रमनी । प्रेम अच्छरकी ।

अच्छर प्रेम लखै जो कोई । प्रेम विना सब दुनी विगोई ॥
जो कोइ करै प्रेम मो बासा । जरा मरणकी छूटै आसा ॥ १ ॥
जोगी गोरख बहु विधि गावैं । बहुत प्रेम सो नाद बजावैं ॥ नाद
बजाय भेद नहिं पावैं । छूटै प्रान बहुत पछतावैं ॥२॥ एक प्रेम
संन्यास विचारे । तीरथ वरत करि काया गारै ॥ करै तपस्या
होमैं काया । अच्छर प्रेम कहो कहैं पाया ॥३॥ एक प्रेमसे पढ़ै
पुराना । करम भरम कथि भावै ज्ञाना ॥ पाप पुण्य बहु विधि
अरथावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ ४ ॥ एक प्रेम गहि
कुलकी कानी । डालि तोड आमकी आनी ॥ करवा चौथ करै बहु
पूजा । अच्छर प्रेम कहो कहैं सूजा ॥ ५ ॥ तुरुक कतल करि
दीन बनावै । पीर औलिया बहुत मनावै ॥ आयत बैत हदीस
अति गावै । धारै प्रेम मक्के चलि जावै ॥ ६ ॥ पढ़ै प्रेम औ हुरी
चलावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ जीव दया दिलमें पहिचाना ।
सोई प्रेम निज प्रेम समाना ॥ ७ ॥

शब्दावली

(४२५)

प्रेम प्रेम सबही कहै, प्रेम न चीन्है कोय ।
जाहि प्रेम साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय ॥ २ ॥

रमैनी रहनी गहनी ।

रहनि गहनि पावे जो कोई । शब्द सार निअच्छर सोई ॥
अच्छरमें निहअच्छर सारा । ताहि पाय कोइ हंस हमारा ॥ १ ॥
हंस होय परखे वह वानी । अच्छर भेद करै पहिचानी ॥ अच्छर
भेद करै कडिहारी । निहअच्छर मई हंस उवारी ॥ २ ॥ अच्छर
निहअच्छर भेद निनारा । जो परखे सो भवजल पारा ॥ कहै
कवीर जो कहै विचारै । आप तरे औरनको तारे ॥ ३ ॥

शब्द सार निहअच्छरा, जब तब करियो याद ।

अन्त फलेगी माहिली, ऊपरकी सब बाद ॥ ३ ॥

रमैनी यमजाल ।

तीन लोक जम जाल पसारा । नेम धर्म षटकर्म अचारा ॥
आचारे सब दुनी भुलानी । सार शब्द कोउ विरले जानी ॥ १ ॥
सत्तपुरुषको जाने कोई । तीन लोक जाते पुनि होई ॥ करम भरम
तजि शब्द समावे । इस्थिर ज्ञान अमरपद पावे ॥ २ ॥ सत्यशब्द
को करे विचारा । सो छूटे जमजाल अपारा ॥ कहै कवीर जिन
तत्त विचारा । सोहँ शब्द है अगम अपारा ॥ ३ ॥

शब्द हमारा सत्य है, सुनि मत जाहु सरख ।

जो चाहे निज मुक्तिको, लीजो शब्दहिं परख ॥ ४ ॥

रमैनी—सांचाकडिहार ॥

नाम अमलमें रहे मतवाला । प्रेम अमीका पीवे प्याला ॥
ज्ञान दीष निज भीतर बारा । सो कहिये सांचा कडिहारा ॥ १ ॥
और अमलको रंग न करई । माया ममताको पर हरई ॥ सार
शब्दमें ध्यान लगावे । सो कडिहार जम जाल बचावे ॥ २ ॥
दया छमा औ शील विचारा । धीरज धरम संतोष अचारा ॥

(४२६)

कवीरपंथी—

यह सब धरे ममता मारे । सो कडिहार जगत जल तारे ॥३॥
शब्द सरोतर हिरदय साँचा । छाडि परपंच सत्यसे राँचा ॥
सत्यनाम मो रहै न काँचा । सो कडिहार जगत सो बाँचा ॥४॥
कुल करनाको मेटै धोखा । समता ज्ञान सु अंतर पोखा ॥
ज्ञान रतनके पूरे नौका । सो कडिहार बैठिहै चौका ॥५॥
दया छिमा संतोष विचारा । शील वैराग ज्ञान अधारा ॥
काम क्रोध चिन्ता नहि परई । सो कडिहार आरति करई ॥६॥
आसा वासा मनको नासे । माया मोह न फटके पासे ॥
कर्म कला सो तिनका तोरे । सो कडिहार नारियल मोरे ॥७॥
सिख साखा सब प्रेम बढावैं । बहुत भांति ते सेवा लावैं ॥
कोटिक शिष्य करै सनमाना । रह कडिहार शब्द लपटाना ॥८॥
गुरुका शब्द सदा परकासे । भेद भरम का दुविधा नासे ॥
नहिं तो कालरूप कडिहारा । सब जीवनका करै अहारा ॥९॥
लोभ मोहकी धरे सगाई । शब्द छाडि जग करै ठगाई ॥
शब्द चाल हिरदे नहि आवे । सो कडिहार कस लोक सिधावे ॥१०॥

आसन चाँपै फूलके, धरै जु जमको भाव ।

कहैं कवीर तब जानि है, पड़े वज्रको चाव ॥६॥

रमनी—सत्यनाम ।

सत्यनाम सुमिरो मन माहीं । जहवाँ रजनी वासर नाही ॥
आदि अन्त नहि धरनि अकासा । पावक पवन न नीर निवासा ॥१॥
चन्द सूर तहवाँ नहि कोई । प्रात सांझ तहवाँ नहि दोई ॥
कर्म भर्म पुण्य नहि पापा । तहवाँ जपियो अजपा जापा ॥२॥
झलमलाट चहुँदिस ऊँजियारा । वरषे तहाँ अगरकी धारा ॥
तहँ सतगुरुको आसन होई । कोटि माहिं जन पहुँचे कोई ॥३॥
दसो दिसा झिलमिल तहँ छाजा । बाजे तहाँ सु अनहद बाजा ॥
तहवाँ हंसा ध्यान लगावे । बहुरि न जोनी संकट आवे ॥४॥

शब्दावली

(६२७)

उहवाँको सुख वरनि न जाई । सतगुरु मिलै तो देह लखाई ॥
ज्यों गुंगाको सुपना देखो । ऐसो जीवत जनम को लेखो ॥ ५ ॥

सा०-मन पवना दुइ थिर हुआ, भया प्रेम परकास ।

जीवातम जहँ रमि रहा, पूरन ब्रह्म विलास ॥ ६ ॥

रमनी—रहनी पहचान ।

सतगुरु सो सतनाम सुनावे । और गुरु कोइ काम न आवे ॥
तीरथ सोई जो मोछै पापा । मित्र सोई जो हरे संतापा ॥ १ ॥
जोगी सो जो काया सोधे । बुद्धि सोई जो नाहि विरोधे ॥ पण्डित
सोई जो आगम जानै । भक्त सोई जो भय नहि आने ॥ २ ॥
दाते जो औगुन परहरई । ज्ञानी सोइ जीवता मरई ॥ सुक्ता सोई
सतनाम अराधे । श्रोता सोई जो सुरतिहिं साधे ॥ ३ ॥ सेवक
सोई गहै विश्वासा । निसिदिन राखै संतन आसा ॥ सतगुरु का
लोपै नहि बाचा । कहै कवीर सो सेवक सांचा ॥ ४ ॥

जीवन मरन जानै नहीं, अंध भया सब जाय ।

द्वारे दाद न पावई, अनेक जनम पछताय ॥ ७ ॥

अथ कवीर अष्टाङ्गयोग प्रारम्भः ।

अविगत योग रमनी ॥ १ ॥

अविगत लीला अगम अपारा । धरनी धन्यो संत औतारा ॥
अविगत लीला अगम अलेखा । अबरन बरन रूप नहि रेखा ॥ १ ॥
जा गति सुरनर सुनि नहि पाई । अविगतकी गति वरनि नहि जाई ॥
शेष सहस मुख निसिदिन गावैं । उस्तुति करत पार नहि पावैं
॥ २ ॥ वेद कोटि सहस गुण गावे । अविगतकी गति बरनि नहि
जावे ॥ कहैलों कहौ कहा नहि जाई । अविगतिकी गति अविगति
भाई ॥ ३ ॥

(४२८)

कवीरपंथी-

सा०-अविगतिकी गति विगत है, मन बुधि चितते दूर ।
आपा मेटि सतगुरु मिलै, पावे दरस हजूर ॥ १ ॥

कर्मयोग रमैनी ॥ २ ॥

योगी योग बहुत जो करई । क्रिया योगते नहिं निस्तरई ॥
फिर फिर आवै फिर फिरि जाई । कर्महि कर्म बहुत उरझाई ॥
होय निहकर्म नाम जो ध्यावे । योनी संकट बहुरि न आवे ॥ कर्महि
कर्म बँधा बहु भारा । कर्महि कर्म अटका संसारा ॥ देह कर्म जो
दीन उठाई । मनका कर्म छुटै नहिं भाई ॥ जब लग मनका कर्म
न खोवे । तब लग मन निरमल नहिं होवे ॥ मनकी क्रिया जबै
मिटि जाई । तब प्रभु मिलै सहजमें आई ॥ मने निरञ्जन आपुहिं
होई । याको जाने विरला कोई ॥

तन क्रियाको खाड़िके, मन क्रिया रुचि राख ।
कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निज भाख ॥ २ ॥

तत्कर्मयोग रमैनी ॥ ३ ॥

तन कर करनी देहु बहाई । मन कर करनी सत्य मिलाई ॥
मनकी क्रिया सत्य जो होई । ताहि समान क्रिया नहिं कोई ॥ १ ॥
सांख्य योग करना है-सारा । जेहिते उतरे भवजल पारा ॥ सत
क्रिया ते ज्ञानी भयऊ । सत क्रिया साहब मिलि गयऊ ॥ २ ॥
सत क्रिया सत पुरुषहिं ध्यावे । सत क्रिया सतनाम मिलावे ॥ सत
क्रिया जग होय उदासा । सत क्रियाते मुक्ति निवासा ॥ ३ ॥

समौ०-सत्य क्रिया निर्वाण है, है तन मन ते भिन्न ।
मन पवना दिठ करि गहै, सत्यनाम निज चिन्ह ॥ ३ ॥

अष्टांगयोग अन्तर्गत.

सांख्य योग रमैनी ॥ ४ ॥

अब मैं सांख्य योग बतलाऊँ । योग अष्टाङ्गके लछन दिख-
लाऊँ ॥ इक इकके चारि चारि लच्छन । जो जाने सो होय
विचच्छन ॥ १ ॥ यों तो कहे लछन बतीसा । अष्टांगयोगमें एकहि

शब्दावली

(४२९)

दीसा । अष्टांगयोग सांख्य जो जाने । और लच्छन बत्तीस पिछाने ॥ २ ॥ प्रथम योग ज्ञान बखाना । दूसर विचार कहै परमाना ॥ तीसर योग विवेकहिं जाने । चौथा योग शील परधाने ॥ ३ ॥ पँचवां योग संतोष बखाना । योग निरवैर छठवहिं माना ॥ सतवाँ सहज योग है भाई । अठवाँ शून्य एक लौलाई ॥ ४ ॥

समौ-तेई भवसागर तरे, या करनी निज सार ।
सत क्रिया सतसो गहै, सत्यनाम आधार ॥ ४ ॥

ज्ञानयोग १ रमैनी ॥ ५ ॥

प्रथम योग ज्ञान है भाई । तेहिते सुख परमपद पाई ॥ निरालंब अलब न कोई । सतगुरु इच्छा होय सो होई ॥ १ ॥ करम भरम तजि साहब जाने । भली बुरी कछु चित्त न आने ॥ निरवासिक वास नहिं कोई । जड़ल वस्ती एके होई ॥ २ ॥ होय निरभय रहै ततसारा । बाहर भीतर अलख अपारा ॥ द्वैत विचार न मनमें आवे । आतमरूप सदा दरसावे ॥ ३ ॥

समौ-एक नामको जानिके, दूजा देह बहाय ।

तीरथ वरत जप तप नहीं, आतम ब्रह्म समाय ॥ ५ ॥

विचारयोग २ रमैनी ॥ ६ ॥

दूजा योग विचार सम्हारे । निरमोही होय आप विचारे ॥ लै निरद्वन्द्व रहै जगमाहीं । जगके सुखसों लागे नाहीं ॥ १ ॥ मातु पिता सुत नारि निभावे । काम क्रोध मद लोभ भुलावे ॥ होय निशंक शब्द सो लागे । अनहद सुनै आतमा जागे ॥ २ ॥ देह अदेह करै निरुवारा । देही छोड़ विदेह पैसारा ॥ देह छोड़ विदेह समाना । हँसा पावे पद निर्वाना ॥ ३ ॥

समौ-जो कुछ करे सुविचारके, पाप पुन्य ते न्यार ।

नाम कवीरा जानिके, जाय पुरुष दरबार ॥ ६ ॥

(४३०)

कवीरपंथी—

विवेकयोग ३ रमनी ॥७॥

तीजो योग विवेक कहावे । विन विवेक कोइ पार न पावे ॥
जाके समाधान मन होई । भली बुरी कहि जावे कोई ॥ १ ॥
समदर्शी सम ज्ञान विचारे । सब घट भीतर ब्रह्म निहारे ॥ प्रीति
गहै सो नाम समाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥ २ ॥
जाके शान्ति होय घट माहीं । कोइ कछु कहो क्रोध मन नाहीं ॥
सोइ विवेकी सत पद जाने । सबहीं आतम एक पिछाने ॥ ३ ॥

समौ—जब लग नहीं विवेक मन, तब लग लगै न तीर ।

भवसागर नामी तरे, अस कथि कहैं कवीर ॥ ७ ॥

शील योग ४ रमनी ॥८॥

चौथा योग शील कहि दीन्हा । बिना शील साहब नहिं चीन्हा ॥
निर्मल सोचहिं सोच विचारे । सुच रुच दया धरम डर धारे ॥ १ ॥
मनको संयम करै जो जानी । पांचो पकड़ि एक घर आनी ॥
सत्यशब्द भासे संसारा । सतही ते उतरे भवपारा ॥ २ ॥ होय
सरोतर सत्य बखाने । भावे भला बुरा कोइ मानै ॥ बुरा कर्म ते
लजा करई । बिना विचार नहीं पगु धरई ॥ ३ ॥ जो काहुको
होय उपकारा । मन बच कर्म करै उपचारा ॥ शीलवान जग
अस बुधि पाई । आपन दिसि वह चूके नाहीं ॥ ४ ॥ शील पाइ
इन्द्री निज साधे । गुरुगम पन्थ नाम अवराधे ॥ जियत मरै
सोई शिलवन्ता । शब्द विचारि गहै मगु कन्ता ॥ ५ ॥

समौ—शील छमा जब ऊपजे, अलख दृष्टि तब होय ।

बिना शील पहुँचे नहीं, कोटि कथै जो कोय ॥ ८ ॥

संतोषयोग ५ रमनी ॥९॥

पंचवों योग संतोष बखाना । विन संतोष बूढे अज्ञाना ॥ मानो
नहीं रंक औ राजा । होय अमान नहिं काहुसो काजा ॥ १ ॥
नर्क स्वर्ग बंछे नहिं कोई । होय अबंछक साहिब सोई ॥ मन

शब्दावली

(४३१)

स्थिर करि प्रेम उपजावे । अनहद शब्द सुने चित लावे ॥ २ ॥
जो कछु कर्म योगते आवे । जानि प्रारब्ध शीस चढावे ॥ मनमें
छोभ न लावे कबहीं । जो कछु आवे सह ले सबहीं ॥ ३ ॥ होनी
होय टले नहिं काहू । करि असंतोष मिले का लाहू ॥ संतोषी हो
ऐसी मति राखे । निराश वचन कबहुं नहिं भाखे ॥ ४ ॥ सोई
योग संतोष कमावे । काल जाल ते जीव छुडावे ॥ विन संतोष
काल सुख जाई । पाई संतोष काल बहाई ॥ ५ ॥

समौ-निरमल शब्द प्रकाश करि, रह सुख सेज समय ।
सत्यनाम संतोष विन, सत्यलोक नहिं जाय ॥९॥

निरवर योग ६ रमैनी ॥ १० ॥

छठवें योग है निरवैरा । जासे जगमें होय निवेरा ॥ सब घट
भीतर एक करि जाने । होय सुहृद प्रेमहि परमाने ॥ १ ॥ सुखदाई
सबहिनको भावे । जल सरूप होय अग्नि बुझावे ॥ शीतल होय
सबहिनको भावे । समता होय तुरमता पावे ॥ २ ॥ निरवैरी
निहकाम रहावे । साई सेती नेह लगावे ॥ साईके सबही जग
माहीं । कापर दाय़ा कापर नाहीं ॥ ३ ॥ अपनो रूप जगत
विखराना । कोहे आपन कोहै आना ॥ कासन बैर करो मोर भाई ।
अपनहि रूप रहा जग छाई ॥ ४ ॥ अपनो दांत जीभको काटे ।
तो कहैं कोई जीभ कहैं छांटे ॥ आपन अंगुरी आंख गडावे । तो
कहैं अंगुरी काटि गिरावे ॥ ५ ॥ एकहि आतम सकल समाना ।
मायाके गुण आनहि आना ॥ अहै निजरूप सकलमें एकै । जो
वस काशी सो बस मकै ॥ ६ ॥ मायावश हो सब जग भूला ।
मोर तोरके गर्वहिं फूला ॥ निरवैरी निहकाम सु होवे । सतगुरु
ज्ञान बैर सब खोवे ॥ ७ ॥

समौ-कंचन कांच है एक सम, दुष्ट मित्र सब एक ।
दूजा भाव न जानई, एक नामकी टेक ॥ १० ॥

(४३२)

कवीरपंथी—

सहज योग ७. रसनी ॥ ११ ॥

सतवाँ योग सहज है मीता । सहज भावसो सबही जीता ॥
एक विचार प्रेम उपजावे । पाँचै इन्द्री सहज समावे ॥ १ ॥
निरलोभी होय लोभ भुलावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥
निरल्लेप कितहुँ नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागै ॥
सहज ध्यान रहै लौलाई । सहजे सहजे पार लगाई ॥ ३ ॥
जा घट ज्ञान सहज समावे । सहजे माया आप भुलावे ॥
सहजे परिचय आतम होई । ब्रह्मरूपमें सहज समोई ॥ ४ ॥
सहज समाधि भले जग जाने । गुरु प्रतापते सहज पिछाने ॥
जप तप योग सहजमें आवे । काया कष्ट न कबहुँ करावे ॥ ५ ॥
आतम परिचय सहजहिं पावे । खुले नैन सो दरस करावे ॥
विना सहज दूसर कछु नहीं । सहजेमें सब रहा समाई ॥ ६ ॥
सहज योग जो कोई धरै । आप तरे औ जगको तारे ॥
सहजहिं आतम ब्रह्म प्रकाशा ॥ सहजे जीव मुझान विलासा ॥ ७ ॥
विना सहज नहीं भव पारा । विना सहज बूढे भव धारा ॥
कहे कवीर सुनो नर लोई । सहजे सहज भया सब कोई ॥ ८ ॥

समौ-सब जग झूठा जानिके, गहे नाम सत सार ।

सहजे सहजे प्रकट भया, सतगुरु शब्द सम्हार ॥ ११ ॥

शून्य योग ८ । रसनी ॥ १२ ॥

आठम योग शून्य है नीके । विना नाम जप लागु सुफीके ॥
सहजे नाम विदेह समावे । विना नाम कहाँ सुख पावे ॥ १ ॥
शून्यहिते सब जग उपराजा । शून्यहिते भव शब्द अवाजा ॥
शून्य सहज एक नाम विराजे । अनहद बाजा बाजन बाजे ॥ २ ॥
सहज शून्य जो लावे ध्याना । अलख लखे आप बलवाना ॥
नाम सहज शून्यमें होई । अलखहिं लखे आप है सोई ॥ ४ ॥

शब्दावली

(४३३)

सहज शून्य जो ध्यान लगावे । भौजल तरत वार नहीं लावे ॥
सुराते शब्दमें सहज समावे । सहज समाधि परमपद पावे ॥६॥
जब लग नाम विदेह न आवे । तब लग सहज समाधि न पावे ॥
ध्यान विदेह औ ज्ञान विदेहा । सहज समाधिमें चहिये एहा ॥६॥
ध्यान विदेह लखे जब प्रानी । विदेह नाम मिले परमानी ॥ काया
नाम सबे जग जाने । नाम विदेह विरले पहिचाने ॥ ७ ॥

समौ-ज्ञान विचार विवेकसो, शील संतोष समय ।

नाम गहे निरभय रहै, सहज सतलोक समय ॥ १२ ॥

शब्द सनेही होय रहै, जगते रहै उदास ।

सुख सागरमें घर करै, सत्य नाम विश्वास ॥

अब्दांगयोगका सार (१) ज्ञान परीक्षा साखी ।

ज्ञानी लक्षण चार हैं, सुनि त्यागो विस्माद ।

निरालंब निहभ्रमपुनि, निर्वासिक निहस्वाद ॥ १ ॥

भावार्थ-ज्ञानकी परीक्षा चार गुणोंसे होती है-

१ निरालम्ब, २ निःभ्रम, ३ निर्वासना, ४ निःस्वाद ॥

(२) विचार परीक्षा ।

विचार परीक्षा चार है, निर्मोही निरबन्द ।

निःशंक निरावरण सोई, छुटे कालको फन्द ॥ २ ॥

भावार्थ-विचार योगकी प्राप्ति इन चार लक्षणोंसे जानी जाती है-१ निर्मोही होवे, २ निर्वन्ध हो, ३ निःशंक हो, ४ निरावरण अर्थात् आत्मरूपमें सन्देह न हो ॥

(३) विवेक परीक्षा ।

सर्वज्ञी सुचेत होय, सावधान मन मार ।

सार आही सुजानिये, विवेक परीक्षा चार ॥ ३ ॥

भावार्थ-१ सर्वज्ञी अर्थात् किसी बातको सुनतेही उसकी तहको पहुँच जाना । २ सुचेत अर्थात् सदा हृदयका जाग्रत

(४३४)

कवीरपंथी-

रखना, गाफिल न होना, प्रमादमें न भूलना, ३ सावधान मन इन्द्री आदि सबोंपर सदा दृष्टि रखना, जिसमें ये ठगने न पावें। ४ सारग्राही-कैसा भी प्रसंग उलटा-सुलटा सम्मुख आकर उपस्थित हो उसमेंसे उत्तम सार ले लेना ॥

(४) शील परीक्षा ।

शुचि साधन संयम करन, श्रवण करन गुरु वानि ।
विनय वचन सब सो कहै, रूप आपनो जानि ॥४॥

भावार्थ-जिसमें शील आता है-उसमें चार गुण आकर वास करते हैं। १ पवित्रता-भीतर बाहर दोनों प्रकारसे पवित्र रहता है। २ संयम-शारीरिक मानसिक जितने कार्य हैं सब नियम पूर्वक करता है। ३ गुरुकी वाणी और उपदेशमें श्रद्धा (विश्वास) रखता है। ४ नम्रता-सबके साथ कोमलतासे वरतता है।

५ संतोष परीक्षा ॥ ४ ॥

संतोष परीक्षा सुनि लीजे । अयाची अमानी मन दीजे ॥
स्थिर वाच्छा नहि करई । सो संतोषी संत उच्चरई ॥५॥

भावार्थ-जिसके हृदयमें संतोषका वास होता है वह- १ अयाँची-अर्थात् यथा प्राप्त संतुष्ट रहकर उसीमें निर्वाह कर लेता है किसीसे याचना करनेकी इच्छा नहीं रखता। २ अमानी-मिथ्या अभिमान कर आप दुःखी नहीं होता; दूसरोंको भी दुःखी नहीं करना। ३ स्थिर-अर्थात् सदा धैर्यके साथ अपना सब कार्य करता है कभी घबराता नहीं। ४ अबाँछित-यथा प्राप्तमें संतुष्ट रहनेवाला अधिककी वांछाही क्यों करेगा।

६ निर्वर परीक्षा ४.

सुहिरदयता शीतलता, समता जान सुजान ।
सुखदाई सब जीवको, निरवैरी पहिचान ॥ ६ ॥
भावार्थ-निर्वैरता जिसमें आती है वह- १ सुहृद होजाता है

शब्दावली

(४३५)

किसीके साथ किसी अवस्थामें भी छल कपटका वर्ताव नहीं करता । २ शीतलता-अर्थात् सदा शान्त अकोध रहता है । ३ समता-धारण करता है अर्थात् सब जीवोंके सुख दुःखोंको अपने आत्माके समानही समझकर उनसे समानता वरतता है । ४ सुखदाई-सबके लिये सुखदाई होता है अर्थात् कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिससे किसीको दुःख होवे ।

७ सहज परीक्षा ४.

निह प्रपंच निहतरंग रु, निर्द्भन्द निरलेप ।
चारौ लक्षण सहजके, मिटे सकल विशेष ॥ ७ ॥

भावार्थ-सहजयोग अर्थात् सहज वृत्तिको धारण करनेवालोंमें चार गुण स्वभावसेही वास करते हैं । १ निष्प्रपंचता-सहज वृत्तिवाला पुरुष प्रपंचमें कभी नहीं फँसता-जहाँ कहीं प्रपंचकी वृद्धि देखता है आप वहाँसे खसक जाता है । २ निहतरङ्ग-नाना प्रकारके मनके तरङ्गोंसे अपनेको बचा रखता है । ३ निर्द्भन्द-द्रन्दसे अलग रहता है । ४ निलैप-सदा सबमें रहते हुए भी निलैप-रहता है ।

“सब संग रसिये सब संग बसिये सबका लीजे नाम ।
हाँजी हाँजी सबकी कीजे. रहिये अपने ठाम ॥”

८ शून्य ।

लव धीरज अरु ध्यान जो, मिली समाधि है चार ।
ये लक्षण हैं शून्यके, किये संत प्रचार ॥ ८ ॥

भावार्थ-शून्य अथवा समाधिवानके ४ लक्षण हैं । १ लव-एक ओर वृत्ति लगी रहै. २ धीर्य-जिस काममें लगे दृढ होकर लगे. ३-ध्यान-जिधर वृत्ति जाय उधरही तन्मय हो जावे. ४-समाधि-ध्येय वस्तुमें ऐसा निमग्न हो जाना कि, जुदाई जान न पड़े ॥