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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(४१७)

कहै कवीर तब देख तमासा ॥ ४ ॥ हाथ ठीकरा गलेमें कंथा ।
निर्गुन होके यकड़े पंथा । ज्ञान चिरागी घटमें जूपी । कहै कवीर
सो सुक्त सहूपी ॥ ५ ॥ फाँटा टूटा कंथा पहिरे । मनसा ममता
घटमें गहिरे । ताकी चौकी मान बढाई । कहै कवीर सो दिया
उठाई ॥ ६ ॥ मनराजा सरगुनमें भीजे । ज्यों छेरी खटिककी धीजे ।
निरगुन सेती लाजा मरई । कहैं कवीर जिव कैसे तरई ॥ ७ ॥
फाँसी लिया हाथमें माया । ज्यों बाघिन बकरेको खाया । पल
पल सो गँवावे रोई । कहैं कवीर ऐसा दुख होई ॥ ८ ॥ मायाका
जोरा है पंदा । यासे डबरा कोइ कोइ बंदा । स्वास उसास सुमिरन
लागा । कहैं कवीर विषय सब भागा ॥ ९ ॥ जैसे सरपिनि
किया कुँडाला । कोइ बन्धा कोई दीया टाला । कहैं कवीर
कुडाला पेलै । निर्भय होय जगतमें खेलै ॥ १० ॥ यह संसार
कुँडाला माहीं । जाको सरपिनि धर धर खाहीं । कहै कवीर कोइ
बाहर आवे । ताको माया नाहि सतावे ॥ ११ ॥ व्यवहार करै
औ ऊंचा बोले । निसि दिन फूला फूला ढोलै ॥ माँग तांग कर
करै रसोई । कहैं कवीर नफा नहिं काई ॥ १२ ॥ बहुत जतन करि
जगत परमोघे । अपने घटको नाहीं सोघे । अंधा शब्द करै नहिं
परिचय । कहै कवि ब्रह्म कैसे दरसे ॥ १३ ॥ दुनिया सेती बक
बक सूवा । ज्यों नलनीने पकरचो सूवा । ऊपर पाँव तले भइ मूड़ी ।
कहै कवीर संसारी बूड़ी ॥ १४ ॥ रात दिवस कर ज्ञान पुकारे ।
मन इन्द्रीको नाहीं मारे । कहैं कवीर सुनो नर लोई । कागा हँसा
कैसे होई ॥ १५ ॥ कठिन धारना हंसकी भाई । ज्यों नटनी कर
वरत चढाई । चढै बरत वह तन मन साधै । कहैं कवीर वहि कला
अगाधै ॥ १६ ॥ सुरत निरत सो नटनी खेलै । तन संभालि आगे
पग मेलै । ऐसी धरन नाम जेहि आवे । कहैं कवीर सो हंस कहावे

कवीरपंथी- शब्दावली १४