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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 524

(५१०)

कबीरपंथी—

पारो ॥ घटंहीं ज्योति उजियारी करै । जो कछु जानि जानि
पर जै ॥ ८ ॥

झझा-झइझा अरुझि सरुझि कित जाना । हीढत दूढत जाय पराना ॥
कोटि सुमेरू दूढि फिरि आवै । जो गढ गढ़ा गढ़हि सो पावै ॥ ६ ॥
अजा-नन्ना निरर्खत नगर सनेहू । आपन करु निरुवार संदेहू ॥
नहिं देखो नहिं आप भजाऊ । जहाँ नहीं तहं तन मन लाऊ ॥ १० ॥
टटा-टट्टा विकट बाट मन माहीं । खोलि कपाट महलमें जाहीं ॥
रहे लटपटे जूटि तेहि माहीं । होहि अटल तेहि कतहुँ न जाहीं ॥ ११ ॥
ठठा ठट्टा ठौर दूरि ठग नोरे । नितके निठुर कीन्ह मन धीरे ॥
जेहि ठग ठगे सब लोग स्याना । सो ठग चीन्हि ठौर पहिचाना ॥ १२ ॥
डडा-डड्डा डर कीन्हे डर होई । डरहीमें डर राखु समोई ॥ जो
डर डरै डरै फिरि आवै । डरहिमें पुनि डरहि समावै ॥ १३ ॥
ढढा-ढट्टा दूढत ई कित जाना । हीढत दूढैत जाय पराना ॥
कोटि सुमेरू दूढि फिरि आवै । जेहि दूढा सो कतहुँ न पावै ॥ १४ ॥
णणा-नन्ना दुई बसाये गाऊँ । रेनन्ना दूढे तेरा नाऊ ॥ सुये एक
जाय तजि घना । मरे इत्यादिक केते गना ॥ १५ ॥
तता-तत्ता अति त्रियो नहिं जाये । तन त्रिभुवनमें राखु छिपाये ॥
जो तन त्रिभुवन माहिं छपावै । तत्वहि मिले तत्वसो पावै ॥ १६ ॥
थथा-थथ्या थाह थहो नहिं जाई । इह थोरे वह थीर रहाई ॥
थोरे थोरे थिर होहु रे भाई । विनु थम्भे जस मंदिल थंभाई ॥ १७ ॥
ददा-दढा देखहु विनशनिहारा । जस देखौ तस करौ विचारा ॥
दशौ द्वारमें तारी लावै । तब दयालको दर्शन पावै ॥ १८ ॥
धधा-धध्या अर्ध माहि उजियारी । अर्धहि छाड ऊर्ध मन तारी ॥

१ जो कछु युगति जानि तन जरै ।

घटही ज्योति उजियारी करै ॥