कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौंतीसी । (४३७)
य कहिये त्यागको या कहिये प्राप्तको । सो हे जीव! त्यागते नामसंन्यासतै
प्राप्तजे साहब होई हैं ते साहब जगत् में पूरि रहे हैं । जौन भरिपूरिकह्यो सो साह-
बको सौलभ्यगुण दिखायो न जानै ताको जगत्तै दूरिहै अर्थात् बाहरहै । तैं
यया जे साहबहैं ते कहै हैं कि, हे भाई ! सुनों हमरे सेयेते कहे हमरेन सेवातैं
सबको जय करनेवाला जो काल ताहूते जयपावै औरी तरहतैं कालते जय नहीं
पावै है साहब त्यागहीते मिलैं हैं तांमें प्रमाण ॥ दोहा ॥ “बिगरी जन्म अनेक-
की सुधरै अबहीं आज । होय रामको रामजपि तुलसी तजि कुसमाज” ॥ य
त्यागको औ प्राप्त को कहै हैं तामें प्रमाण॥“यमौर्यः कीर्तितः शिष्टैर्यो वायुरिति
विश्रुतः । याने यातरि या त्यागेकथितः शब्दवेदिभिः” ॥ २७ ॥
ररा रारि रहा अरु झाई । राम कहे दुख दारिद जाई ॥
ररा कहै सुनौ रे भाई । सत गुरु पूंछिकै सेवहु आई ॥२८॥
र कहिये कामको स कहिये अग्निको । सो हे जीव तैं कामाग्निमें अरुझि
रहो है तामें जरो जाइहै यामें दुःख दरिद्र न जाइगो रामनाम कहेते दुःख दरि
द्रजाइहै । सो हे भाई ! सुनो रराकहे रसरूप जे साहब तिनको ज्ञानाग्निते कर्म-
लायकै सतगुरु जे साहबके जाननवारे तिनसों समुझिकै रामनामको सेवहु ।
रामनाम के सेवनकी युक्ति बूझिकै रको काम अर्थ छोड़िकै र कामको औ अग्नि-
को कहै हैं तामें प्रमाण ॥ “रैंश्च कामेऽनले सूर्ये रुश्च शब्दे प्रकीर्तितः” ॥२८॥
लला तुतेरे वात जनाई । ततुरे पावै परचै पाई ॥
अपना ततुर और को कहई । एकै खेत दुनो निरवहई॥२९॥
ल कही इन्द्रको ला कही लक्ष्मीको । सो हे जीव ! तैं इन्द्रकी नाईं लक्ष्मी
पाइकै तत्त्वकी बातैं जनावैहै सो तत्त्व तब पावैगो जब साधुन्ते परचै पावैगो ।
सो हे जीव ! “तत्त्वंराति गृह्णातीति तत्त्वरः” अपना तत्त्व जेहैं यथार्थ साहब
तिनको नहीं जानैहै और औरको ज्ञान सिखवै है सो एकखेत जोहै एकहृदय
तेरो तामें दोनों निर्ब हैं अर्थात् का दोनों निर्बहैं हैं? नहीं निर्ब है हैं कि, तैं
अज्ञानी बनोरहे है। और को ज्ञानकथै है तौका और के ज्ञानलगै है? नहीं लगे-
है । जो तैंहूं ज्ञानीहोइहै तौ तेरो ज्ञानौ कथिबो औरको लगै औ जो ततुरे पाठ
१-‘य’ यम, वायु, ‘या’ सवारी, जानेवाले और छोड़नेको कहते हैं ।
२-‘र’ कामदेव, अग्नि और सूर्यको कहतेहैं । ‘रु’ शब्दकरनेमें होताहै ।