काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( २७ )
राम की अँगूठी
सांकलिया आदि कुछ सज्जन यह भी कहते हैं कि भगवान् श्रीराम ने मुनि
का वेष धारण करके जब राज्य की कोई सम्पत्ति न लेकर वन की यात्रा की
तब फिर उनके पास अंगूठी कहाँ से आई ? और स्वर्णभूषित रत्नजटित पादुका
कहाँ से आई ? अंगूठी तो भगवान् श्रीराम ने हनुमान् को सीतान्वेषण के लिए
प्रस्थान के समय और रत्नजटित स्वर्णभूषित पादुका भरत को चित्रकूट से
अयोध्या वापस आते समय दी थी । अतः इन अंशों को प्रक्षिप्त मानना चाहिए ।
दूसरी बात यह है कि धातुद्रावण ( धातुओं के गलाने ) का ज्ञान लोगों को
बाद में हुआ । पहले तो लोग पत्थरों और हड्डियों के औजारों से लड़ते थे ।
लोहे का तीर बहुत बाद में बना । फिर उन पर नामोटंकन तो ईसा सन् के
आस-पास ही लोगों ने जाना । अतः बाल्मीकीय रामायण में रामनामांकित
अंगुलीय का वर्णन और रत्नजटित स्वर्णभूषित पादुका का वर्णन पीछे मिलाया
गया है । परन्तु वैसी शंका निर्मूल ही है, क्योंकि दण्डकारण्य प्रस्थान के समय
माता कौशल्या के पास जब उनकी अनुज्ञा प्राप्त करने भगवान् श्रीराम गये,
तब माता ने राजकुमारों के योग्य आसन दिया । उस पर न बैठ कर केवल
उसका स्पर्श करके कहा कि—मुझे दण्डकारण्य जाना है । इस आसन से अब
क्या मतलब ? मेरे लिए तो विष्टर आसन इस समय चाहिए । चौदह वर्ष
निर्जन वन में मुनियों के समान ( मसाला आदि डालकर बनाया हुआ मांस
नहीं ) कन्दमूल फल से जीवनयात्रा चलाते हुए रहना है ।
'गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे ।
विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः ॥ २८ ॥
चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने ।
कन्दमूलफलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम् ॥ २९ ॥
( अयो० का० २० )
यहाँ प्रश्न उठता है कि वे वन में गृहस्थाश्रम में गये हैं अथवा वानप्रस्थ
आश्रम में ? उत्तर स्पष्ट है—अयोध्या में गृहस्थाश्रम में हैं । वहाँ से उनका
निर्वासन हो रहा है । आश्रमान्तर प्राप्ति की कोई बात नहीं। गृहस्थ ही रहकर
( २८ )
वे वनवास में गये हैं। राज्य की सम्पत्ति उन्होंने छुई नहीं। फिर भी भगवान्
श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा है कि—महाराज जनक के यज्ञ में महात्मा वरुण ने
रौद्रदर्शन (देखने से ही हृदय कँपा देने वाले) दो धनुष, दो दिव्य अभेद्य
कवच तथा सदा बाणों से भरे रहने वाले दो तरकस और सूर्य के समान चमकीले
दो हेम (स्वर्ण) परिष्कृत तलवार ये सब हमको दहेज में दिये थे। आचार्य
के घर से उन्हें लेकर तुम शीघ्र आओ।
'ये च राज्ञे ददौ दिव्ये महात्मा वरुणः स्वयम् ।
जनकस्य महायज्ञे धनुषी रौद्रदर्शने ॥ २९ ॥
अभेद्ये कवचे दिव्ये तूणीचाक्षयसायकौ ।
आदित्यविमलाभौ द्वौ खड्गौ हेमपरिष्कृतौ ॥ ३० ॥'
(अयो० का० ३१)
जिस धनुष को भगवान् राम ने तोड़ा वह धनुष भी वरुण ने महाराज
जनक के पूर्वजों को दिया था। उसकी चर्चा जगदम्बा सीता ने माता अनसूया
के सामने तथा महाराज जनक ने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र और राम, लक्ष्मण के
समक्ष किया है। दण्डकारण्य में महर्षि अगस्त्य ने स्वर्ण और हीरा जटित
विश्वकर्मा द्वारा निर्मित विष्णुदैवत दिव्य धनुष, ब्रह्मा जी द्वारा प्रदत्त अमोघ
सूर्य के समान तेजस्वी दिव्य बाण और इन्द्र द्वारा दिये हुये जाज्वल्यमान बाणों
से सदा भरे रहने वाले दो तूणीर तथा सुवर्ण की म्यान और मुट्ठी वाली तलवार
भी दी है।
'इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम् ।
वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ ३२ ॥
अमोघः सूर्यसंकाशो ब्रह्मदत्तः शरोत्तमः ।
दत्तौ मम महेन्द्रेण तूणी चाक्षयसायकौ ॥ ३३ ॥
सम्पूर्णौ निशितैर्बाणैर्ज्वलद्भिरिव पावकैः ।
'महारजतकोशोऽयमसिर्हेमविभूषितः ॥ ३४ ॥
(अरण्यकाण्ड १२)
( २९ )
अर्थात् राजकुमार की स्वयं व्यक्तिगत सम्पत्ति बहुत थी । भगवान् श्री
राम वह भी चाहते तो ले जा सकते थे क्योंकि वह राज्य की नहीं थी ।
जब उन्होंने दान किया तो उसे ले जाने में कोई बाधा नहीं थी । उनके मामा
के यहाँ से जो शत्रुञ्जय नामक हाथी उन्हें मिला था उसका दान उन्होंने
वसिष्ठ जी के पुत्र सुयज्ञ को एक हजार निष्क ( स्वर्णमुद्रा ) दक्षिणा के साथ
दे दिया । ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ अगस्त्य और विश्वामित्र को बुला कर उनका
पूजन कर दान के लिये ऐसे रत्नों की वर्षा की जैसे खेत में मेघ जल की वर्षा
करता है । वाल्मीकिरामायण में बहुत प्रकार से दान का वर्णन किया गया
है । भगवान् राम अपनी अपने नाम वाली अँगूठी अपने साथ ले गये थे ।
इन्द्र के हाथ में जैसे वज्र है, विष्णु के हाथ में चक्र है, और भगवान् त्रिनेत्र-
धारी शङ्कर के हाथ में त्रिशूल है, वैसे ही द्विज के हाथ में पवित्री है ।
'यथा वज्रं सुरेन्द्रस्य यथा चक्रं हरेस्तथा ।
त्रिशूलं च त्रिनेत्रस्य तथा विप्रपवित्रकम् ॥'
यह पवित्री सुवर्ण की बहुत पवित्र मानी गयी है ।
'अन्यान्यपि पवित्राणि कुशदूर्वामयानि च ।
हेमालयपवित्रस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥'
यह वचन हेमाद्रि से उद्धृत है । अर्थात् कुश दूर्वा की अन्य पवित्रियाँ
सुवर्ण पवित्री ( अंगूठी ) की सोलहवीं कला ( पसँहा ) के बराबर भी नहीं
होतीं । यह सुवर्ण पवित्री अनामिका के मूल में पहिननी चाहिये ।
अत्रि का वचन है—
'अनामिकामूलदेशे पवित्रं धारयेद् द्विजः ।'
गुरु द्रोण के हाथ में भी यही पावित्री थी जिसे सूखे कुएँ में डालकर
उन्होंने गुल्ली के साथ निकाल कर कौरव, पाण्डवों को चकित कर दिया था ।
रही पादुका की बात उसे तो भरत जी अपने साथ अभिषेक सामग्री के
साथ ले गये थे उसी में वह गयी थी । जब भगवान् श्री राम ने वन से राज्य
के लिये अयोध्या लौटना कथमपि स्वीकार नहीं किया तब भरत जी के मन
( ३० )
में वह आशंका घर कर गयी जिसकी सम्भावना कौसल्या ने का थी । जैसे
सिंह कभी दूसरे द्वारा आनीत मांस खाना नहीं चाहता इसी प्रकार परभुक्त
राज्य को राम स्वीकार नहीं करेंगे ।
‘न· पुरेणाहृतं भक्ष्यं व्याघ्रः खादितुगच्छति ।
एवमेव नरव्याघ्रः परलीढं न मन्यते ॥’
( अयो० ६१ )
अतः भरत जी ने स्वर्णभूषित पादुका श्री राम के सम्मुख रखकर कहा—
“हे भगवान् ! आप अपने चरणों को इन दोनों पादुकाओं पर रख दीजिये,
ये ही राजसिंहासनस्थ होकर सम्पूर्ण जनों का योग-क्षेम निर्वाह करेंगी ।”
‘अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते ।
एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः ॥’
( अयो० ११२ )
भरत जी ने राज्य को भगवान् श्री राम का धरोहर माना ।
‘भरतः शिरसा कृत्वा सन्यासं पादुके ततः ॥ १५ ॥
( अयो० ११५ )
यदि भगवान् रामचन्द्र के पास स्वर्णभूषित पादुका होती तो भरत जी
उनसे यह नहीं कहते कि इस पर ‘अधिरोह’ चढ़ चाइये ।
ऐतरेय ब्राह्मण में सौवर्ण पलङ्ग का वर्णन है, जिस पर बैठ कर होता
सम्राट् की स्तुति करता है । सुवर्ण द्रावण का ज्ञान यदि उस समय न होता
तो सुवर्ण का तार या शय्या कैसे बनती ? इसी प्रकार नामांकन की बात है।
मुद्राराक्षस नाटक का आधार ही राक्षस के नाम वाली मुद्रा ( अंगूठी ) है ।
अभिज्ञान शाकुन्तल में महाकवि कालिदास ने भी दुष्यन्त के नाम वाली अंगूठी
को ही प्रत्यभिज्ञा ( पहचान का साधन ) बताया है । भगवान् श्री राम ने
हनुमान् जी को अपने नाम से अंकित अँगूठी जगज्जननी सीता के पहचान के
लिये दी ।
( २२ )
'ददौ तस्य ततः प्रीतः स्वनामाङ्कोशोभितम् ।
अंगुलीयमभिज्ञानं राजपुत्र्याः परन्तपः ॥ १२ ॥'
( किष्किन्धा० ४४ )
हनुमान् जी ने जगज्जननी सीता से कहा कि 'हे देवि ! मैं रामदूत बानर
हूँ। देखो राम नाम से अंकित यह अंगूठी मैं लाया हूँ ।''
'वानरोऽहं महाभागे दूतो रामस्य धीमतः ।
रामनामाङ्कितं चेदं पश्य देव्यंगुलीयकम् ॥ २ ॥'
( सुन्दर० ३६ )
भरत जी को भी हनुमान् जी ने सुनाया कि मैंने रामनाम वाली अँगूठी
सीता के अभिज्ञान के लिये दी है ।
अभिज्ञानं मया दत्तं रामनामांगुलीयकम् ॥ ४५ ॥'
( युद्ध काण्ड १२६ )
इसी तरह भगवान् राम के नामों वाले बाणों की चर्चा भी रामायण
में है।
इसी प्रकार सीता रावण के वश में कैसे हो इसका विचार करते हुए
महोदर ने रावण से कहा कि आप सीता को प्राप्त करके उसके भोग में क्यों
विलम्ब कर रहे हैं ? आप जब चाहें तब सीता वश में हो सकती है। मैंने
कुछ उपाय सोचा है यदि आप को जँचे तो उसके अनुसार आप कार्य करें ।
हम द्विजिह्व संह्लादी कुम्भकर्ण और वितर्दन ये पाँच महावीर राम का वध
करने जा रहे हैं, इसकी घोषणा करा दीजिये । हम लोग युद्ध में जाकर यदि
शत्रु विजय कर लेते हैं तो दूसरे उपाय की आवश्यकता नहीं । यदि शत्रु मरा
नहीं और हम लोग युद्ध में बचे रहे तो युद्ध से वापस आ जायेंगे । हम लोगों
का शरीर रामनामांकित बाणों से क्षत-विक्षत होगा, रुधिर शरीर से निकल
रहा होगा । हम लोग मिथ्या ही कहेंगे कि हम लोगों ने राम और लक्ष्मण को
खा लिया है और आप के चरणों में प्रणाम करेंगे । आप बनावटी प्रसन्नता
दिखाते हुये हम लोगों की इच्छा के अनुसार इनाम दें। ऐकान्त में सीता के
( ३२ )
पास जाकर आप उसे अनेक प्रकार की सान्त्वना दें। धनधान्य रत्नों का लोभ
दें तब सीता आप के वश में हो जायगी।
'लब्ध्वा पुरस्ताद् वैदेहीं किमर्थं त्वं विलम्बसे ।
यदीच्छसि तदा सीता वशगा ते भविष्यति ॥ २० ॥
दृष्टः कश्चिदुपायो मे सीतोपस्थानकारकः ।
रुचितश्चेत्तवया बुद्ध्वा राक्षसेन्द्र ततः शृणु ॥ २१ ॥
अहं द्विजिह्वः संह्लादी कुम्भकर्णो वितर्दनः ।
पञ्च रामवधायैते निर्यान्तीत्यवघोषय ॥ २२ ॥
ततो गत्वा वयं युद्धं दास्यामस्तस्य यत्नतः ।
जेष्यामो यदि ते शत्रून् नोपायैः कार्यमस्ति नः ॥ २३ ॥
अथ जीवति नः शत्रुर्वयं च कृतसंयुगाः ।
ततः समभिपत्स्यामो मनसा यत्समीक्षितम् ॥ २४ ॥
वयं युद्धादिहेष्यामो रुधिरेण समुक्षिताः ।
विदार्यंस्वतनूं बाणै रामनामाङ्कितैः शरैः ॥ २५ ॥
भक्षितो राघवोऽस्माभिर्लक्ष्मणश्चेति वादिनः ।
ततः पादौ ग्रहीष्यामः त्वं नः कामं प्रपूरय ॥ २५ ॥
भक्षितः समुहृद्रामो राक्षसैरिति विश्रुते ।
अकामा त्वद्वशं सीता नष्टनाथा भविष्यति ॥ २६ ॥
(युद्धकाण्ड सर्ग ६८)
इसी प्रकार डाक्टर साकलिया एवं उनके जैसे कुछ नवीन पुरातत्त्वविदों ने
रामायण की कतिपय घटनाओं तथा विशिष्ट स्थानों की प्रामाणिकता तथा उनके
सम्बन्ध में नये सूत्र के अन्वेषण के बाद विवाद उठाया है।
डाक्टर साकलिया ने वाल्मीकीय रामायण को पूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ माना
है। वे उसे महाकाव्य मानते हैं। परन्तु उसमें वर्णित सेतुबन्ध, हनुमान द्वारा
समुद्र पार गमन, अँगूठी प्रसंग, लंका की स्थिति तथा कुछ ऐसी ही घटनाओं
को उन्होंने अप्रमाणिक तथा काल्पनिक माना है। इस सम्बन्ध में उनके तर्क
अत्यन्त आधारहीन तथा परस्पर विरोधी ज्ञात होते हैं।
( ३३ )
यह नियम है कि जिन वस्तुओं का भाव जिस प्रमाण से विदित होता है
उनका अभाव भी उसी प्रमाण से विदित होता है। जिस प्रकार भूतल में घट
का भाव आलोकादि सहकारी सहकृत मनःसंयुक्त निर्दोष नेत्र से ही विदित होता
है, उसी प्रकार घटाभाव भी उसी प्रमाण से विदित होता है। यह स्पष्ट है कि
जिसके भाव का ज्ञान कर्णेन्द्रिय से होता है, उसके अभाव का ज्ञान नेत्रेन्द्रिय से
नहीं हो सकता। शब्द का ज्ञान कर्णेन्द्रिय से होता है, शब्द के अभाव-ज्ञान के
लिए कर्णेन्द्रिय की ही आवश्यकता होती है, किसी अन्य प्रमाण की नहीं।
प्रकृत में राम, सीता, लक्ष्मण, अयोध्या, लंका आदि का ज्ञान आधुनिक
प्रत्यक्षानुमान तथा आधुनिक इतिहास से नहीं हो सकता। रामायण एवं पुराणों
के अनुसार राम का प्रादुर्भाव करोड़ों वर्ष पूर्व चौबीसवें त्रेता में हुआ है।
आधुनिक ऐतिहासिक युग एवं प्रागैतिहासिक काल की सम्पूर्ण अवधि विद्वानों ने
छः हजार वर्ष के भीतर ही मानी है। ऐसी स्थिति में राम के चरित्रों के
सम्बन्ध में वर्तमान इतिहास का चंचु प्रवेश ही नहीं सकता। उस सम्बन्ध में
सम्पूर्ण जानकारी अब वाल्मीकि के रामायण से ही प्राप्त हो सकती है।
वाल्मीकि रामायण का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि रामायण का
निर्माण कुछ संवाददाताओं या टेलीप्रिन्टरों से भेजे गये समाचारों के आधार
पर नहीं हुआ। उसका निर्माण महर्षि वाल्मीकि ने समाधिजनित ऋतम्भरा
प्रज्ञा के द्वारा अतीत अनागत, वर्तमान, स्थूल, सूक्ष्म, सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट सभी
वस्तुओं का साक्षात्कार करके राम, लक्ष्मण सीता आदि के हँसित, भासित,
इंगित, चेष्टित आदि सभी व्यापारों का पूर्ण रूप से साक्षात्कार किया। महर्षि
वाल्मीकि अलौकिक मुनि थे। वे लौकिक गति और दिव्य गति द्वारा भी सर्व
जगह आ जाकर सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त कर सकते थे। अतः सेतुबन्ध और
समुद्रलंघन आदिकों के सम्बन्ध में रामायण के वर्णन की उपेक्षा नहीं की जा
सकती। इनके विषय में वाल्मीकि रामायण ही सबसे बड़ा प्रमाण माना जायेगा।
सेतुबन्धन कल्पना नहीं
रामायण में वर्णित रामेश्वर की स्थापना वर्तमान इतिहास से भी प्रमाणित
होती है। सहस्राब्दियों से भारत के कोने-कोने से लोग रामेश्वर का दर्शन करने
३
( ३४ )
जाते हैं। गंगोत्री से जल लेकर अति प्राचीन काल से धर्मप्राण जनता वहाँ
चढ़ाने जाती है। धर्मशास्त्र और वेदान्तशास्त्र की मान्यतानुसार सेतुबन्ध
रामेश्वर के दर्शन से ब्रह्महत्याओं के पाप दूर होते हैं। पुराणों में इन बातों का
विशद वर्णन है। कूर्मपुराण पूर्व भाग के बीसवें अध्याय में आये इन श्लोकों से
रामेश्वर की महत्ता तथा प्राचीनता स्पष्ट होती है—
'ये त्वया स्थापितं लिंगं द्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः।
महापातकसंयुक्तास्तेषां पापं विनश्यतु ॥ ४ ॥
अन्यानि चैव पापानि स्नातस्यात्र महोदधौ।
दर्शनादेव लिङ्गस्य नाशं यान्ति न संशयः ॥ २० ॥
यावत्स्थास्यन्ति गिरयो यावदेषा च मेदिनी।
यावत्सेतुश्च तावच्च स्थास्याम्यत्र तिरोहितः ॥ २१ ॥
इसी प्रकार के अन्य वचन स्कन्द पुराण तथा अन्य पुराणों में भी मिलते
हैं। इन वचनों तथा मान्य ग्रन्थों के प्रमाणों के अतिरिक्त रामेश्वर नाम ही
रामेश्वर मूर्ति और मन्दिर का भगवान् राम के साथ असाधारण सम्बन्ध स्थापित
करता है। अतः सेतुबन्ध रामेश्वर की घटना वाल्मीकि रामायण द्वारा वर्णित
रामेश्वर से भिन्न वस्तु नहीं हो सकती।
सेतु निर्माण की घटना मात्र कल्पना नहीं है। वाल्मीकि रामायण में सेतु
निर्माण की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है। उसका प्रारम्भ,
समाप्ति, नाप जोख सब पर रामायण में प्रकाश डाला गया है। वाल्मीकि
रामायण के युद्ध काण्ड के २२ वें सर्ग के ५० से ७२ वें श्लोकों तक प्रतिदिन
कितना निर्माण हुआ, कितने दिन में बनकर तैयार हुआ इसका ब्योरेवार वर्णन
किया गया है। प्रथम दिन १४ योजन, दूसरे दिन २०, तीसरे दिन २१, चौथे
दिन २२ एवं पाँचवें दिन २३ योजन के अनुपात से पाँच दिनों में सेतु बनकर
पूर्ण तैयार हुआ था। इसकी लम्बाई १०० योजन तथा चौड़ाई १० योजन
थी। आधुनिक युग मे विभिन्न देशों में निर्मित अत्यन्त विशाल सेतुओं की
उपस्थिति उक्त सेतुबन्धन की घटना को वास्तविक मानने को बाध्य
करती है।
( ३५ )
समुद्र वर्णन तथा दक्षिण भारत की स्थिति
वाल्मीकि रामायण में समुद्र, समुद्र की लहरें, जल-जन्तुओं, रत्नों, तटीय
वस्तुओं, चन्द्रमा के कारण आने वाले समुद्री, ज्वार भाटों तथा अन्य समुद्र से
सम्बद्ध वस्तुओं का जितना सजीव वर्णन किया गया है, उतना जीवन्त वर्णन
किसी भी ऐसे व्यक्ति के द्वारा सम्भव नहीं है जिसने कभी समुद्र देखा ही न
हो । उदाहरण के लिये सुन्दर काण्ड के प्रथम सर्ग में हनुमान् जी द्वारा समुद्र
गमन के समय का वर्णन प्रस्तुत है ।
'समुत्पतति वेगात्तु वेगात्ते नरोहिणः ।
संहृत्य विटपान् सर्वान् समुत्पेतुः समन्ततः ॥ १।४५ ॥'
उन वृक्षों से नाना वर्ण के पुष्पों के समुद्र में गिरने से ऐसा लग रहा था
आकाश में सुन्दर-सुन्दर रमणीय तारायें एक साथ उदय हो गई हों ।
'तस्य वेगसमुद्भूतैः पुष्पैस्तोयमदृश्यत ।
ताराभिरभिरामाभिरुदिताभिरिवाम्बरम् ॥ १।५६ ॥
आकाश मार्ग से वायु में तैरते हुये हनुमान जी के दोनों बाहुओं के मध्य
शरीर से टकराता हुआ वायु-मेघ के समान गर्ज रहा था ।
'तस्य वानरसिंहस्य प्लवमानस्य सागरम् ।
कक्षान्तरगतो वायुर्जीमूत इव गर्जति । १।६५ ॥'
समुद्र के जिस-जिस अंश से हनुमान जी निकलते थे वहाँ-वहाँ समुद्र में
तूफान आ जाता था ।
यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः ।
स तु तस्याङ्गवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते ॥ १।६९ ॥
महान् वेग वाले हनुमान महा समुद्र में उठी हुई मेरु और मन्दर के तुल्य
बड़ी-बड़ी तरङ्गों को गिनते हुए से चले जा रहे थे ।
मेरुमन्दरसंकाशानुद्गतान् स महार्णवे ।
अत्यक्रामन्महावेगस्तरङ्गान गणयन्निव ॥ १।७३ ॥
( ३६ )
हनुमान जी के वेग जन्य वायु से समुद्र का जल आकाश में चला जाता
था । नीचे तिमि, नक्र, बड़ी-बड़ी मछलियां बड़े-बड़े कच्छप ऐसे दिखाई देते थे
जैसे कपड़ा हट जाने पर देह दिखाई देता है ।
'तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा ।
वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् ॥ १७५ ॥
समुद्र में रहने वाले सर्पों ने आकाश मार्ग पर हवा में तैरते हुए हनुमान जी
को देखकर गरुड़ समझ लिया ।
'क्रममाणं समीक्ष्याथ भुजगाः सागरङ्गमाः ।
व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्णमिव मेनिरे ॥ १७४ ॥'
महाबली कपि श्रेष्ठ हनुमान समुद्र में जिस-जिस मार्ग से निकलते थे उधर-
उधर ऐसा लगता था मानो जल के पनाले बह रहे हों ।
'येनासौ याति बलवान् वेगेन कपिकुञ्जरः ।
तेन मार्गेण सहसा द्रोणीकृत इवार्णवः ॥ १८०॥
इतना ही नहीं श्री वाल्मीकि ने समुद्र का ऐसा सजीव वर्णन किया है,
जैसा आज तक किसी कवि ने किया ही नहीं ।
वाल्मीकि रामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ में वर्णित वस्तु के विषय में
'अमुक स्थान पर ही होगी' की कल्पना निस्सार है । क्योंकि रामायण में वर्णित
वस्तुओं, घटनाओं एवं स्थानों के विषय में तो निश्चितता है । परन्तु आधुनिक
लोगों द्वारा तथाकथित अन्वेषणों के विषय में तो अनिश्चय की स्थिति बनी ही हुई
है । ऐसी स्थिति में निश्चित प्रमाण को छोड़कर अप्रामाणिकता की ओर दौड़ना
अन्धकारयुक्त मकान में वस्तुओं को खोजने के लिए प्रयास करने के समान है ।
महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् राम के समुद्र तक पहुँचने के विभिन्न मार्गों
का विशद वर्णन किया है । आज भी उसी मार्ग से दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा
हो जाया करती है । किष्किन्धा में बालि को मारकर राम ने चौमासा किया
था । वह किष्किन्धा दक्षिण भारत में आज किष्किन्धा नाम से ही प्रसिद्ध है ।
वाल्मीकि रामायण में वर्णित किष्किन्धा की स्थिति को छोड़कर बिना किसी
प्रमाण के बेलारी या अन्य किसी स्थान पर उस स्थान की कल्पना वास्तविकता
को अस्वीकार करना है। नासिक पञ्चवटी आदि स्थानों के विषय में भी शंकायें
उठायी गई हैं। जो सर्वथा निर्मूल हैं।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नासिक का सम्बन्ध रामायण की
महत्वपूर्ण घटना शूर्पणखा की नासिका-छेदन से है। पञ्चवटी भी वहीं है।
रामायण में दोनों स्थानों का आस पास होना प्रमाणित होता है। आधुनिक
काल में भी पञ्चवटी और नासिक एक ही स्थान पर हैं। इन स्थानों का
वाल्मीकि रामायण के वर्णन से सादृश्य सम्बन्ध प्रतीत होता है। महाकवि ने
रामायण में लगभग दो सौ आठ स्थानों का वर्णन किया है। इनमें से अधिकांश
स्थान आज भी दक्षिण भारत में ही है। गोदावरी, कृष्णा, बरदा आदि नदियाँ,
आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, केरल आदि स्थान दक्षिण भारत में ज्यों के त्यों
विद्यमान हैं।
समुद्र सम्बन्धी पर्वतों का वर्णन भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वे पर्वत
आज भी विभिन्न नामों से विभिन्न रूपों में अवस्थित हैं। वाल्मीकि रामायण में
लंका जाते समय हनुमान का महेन्द्र पर्वत किष्किन्धा (काण्ड ६७ सर्ग श्लोक
३८) तथा लौटते समय अरिष्ट पर्वत (सुन्दर काण्ड ५६ सर्ग श्लोक २६)
पर चढ़ना बताया गया है।
इसी तरह सुवेल, सह्य, मलय इत्यादि पर्वतों का भी वर्णन किया गया
है। इन सब वाल्मीकि रामायण में वर्णित एवं आधुनिक जगत् में प्रसिद्ध
वस्तुओं एवं स्थानों में वाल्मीकि रामायण में वर्णित अर्थ ही प्रमाणित होता
है। अतः यह कहना तथ्यों से विपरीत है कि महर्षि वाल्मीकि को दक्षिण
भारत की भौगोलिक स्थिति एवं उसके रीति रिवाजों के बारे में कोई जानकारी
नहीं थी।
जहाँ तक दक्षिण में शव गाड़ने की प्रथा का प्रश्न है, आधुनिक इतिहास
आधार पर उसे प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। आधुनिक इतिहास मात्र
हजार वर्ष पुराना है जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णित बाली के शव
( ३८ )
... की घटना करोड़ों वर्ष पुरानी घटित घटना है । रामायण की संस्कृति,
सर्वथा वैदिक संस्कृति है । राम, रावण, बाली इत्यादि वैदिक संस्कृति के व्यक्ति
थे । हनुमान जी भारतीय संस्कृति के अध्येता थे । वैदिक संस्कृति में 'भस्मान्तम्
शरीरम्' इत्यादि वेद मन्त्र के अनुसार प्राचीन शवदाह का ही समर्थन किया
गया है । अतः बाली एवं रावण के शवदाह का आदेश देना वैदिक संस्कृति के
अनुसार सर्वथा उपयुक्त था । शव को गाड़ने की कल्पना कथंचित् हो भी तो वह
मध्यकाल की बात हो सकती है । इसको दक्षिण भारत का शाश्वतिक धर्म नहीं
माना जा सकता ।
उधर भारत में भी साधु, संन्यासी, संत, महात्मा इत्यादियों को जलाया
नहीं जाता, उनकी समाधि बनती है, छोटे एवं असंस्कृत बालकों के शव के
साथ भी यही होता है । कहीं-कहीं प्लेग इत्यादि की बीमारी में मरे वयस्क
पुरुषों के शवों को भी गाड़ा ही जाता है, उन्हें जलाया नहीं जाता है । हमारे
यहाँ शवों के संबंध में सर्वत्र दहन, खनन एवं प्लावन की परम्परा हैं । अतः
इनमें से किसी एक को किसी भाग विशेष की परम्परा नहीं माना जा सकता ।
जिस प्रकार किसी मुस्लिम बहुल प्रदेश में कब्रों को देख कर यह निर्विवाद
निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यहाँ केवल कब्र ही बनती रही हैं,
उसी प्रकार किसी स्थान विशेष पर शव गाड़ने की प्रक्रिया को लेकर यह नहीं
कहा जा सकता कि वहाँ पर सदा शव गाड़े ही जाते रहे हैं । यह बात तत्का-
लिक ऐतिहासिक हो सकती है पर शाश्वतिक ऐतिहासिक नहीं है ।
जहाँ तक वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थानों का प्रश्न है, वह अत्यन्त
ही महत्त्वपूर्ण है । वानरराज सुग्रीव ने बन्दरों द्वारा सीता के अन्वेषण के लिये
जिन स्थानों का वर्णन किया है वह अत्यन्त सजीव तथा किसी भी अन्वेषण
करने वाले के लिये महत्त्वपूर्ण सामग्री सिद्ध हो सकती है । प्रारम्भ में जो-जो
घटनाएं जिन-जिन स्थानों पर घटित हुई थीं, लंका विजय के पश्चात् लौटते
भगवान् राम ने भगवती सीता से उन सभी स्थानों तथा घटनाओं का वर्णन
किया है ।
( ३९ )
अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद्विभुः ॥ २२ ॥
एतत्तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ॥ २० ॥
सेतुबन्ध इतिख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् ।
एतत्पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥
एष सेतुर्मया वद्धः सागरे लवणार्णवे ॥ १७ ॥
कैलाश शिखराकारे त्रिकूटशखरे स्थिताम् ।
लंकामीक्षस्व वैदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥
यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता वलात् ॥ ४५ ॥
एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥ ४६ ॥
( युद्ध काण्ड सर्ग १२३ )
इसी तरह हिरण्यनाभ पर्वत १८, किष्किन्धा २२, ऋष्यमूक ३८, पम्पा
४०, पर्णशाला आश्रम ४२, ४४, शवरी मिलन स्थल ४१, अगस्त्य एवं
शरभंग मुनियों के आश्रम ४६, चित्रकूट ४९, भरद्वाज आश्रम ५१, शृङ्गवेर-
पुर ५२, इत्यादि स्थानों का वर्णन भगवान् राम ने किया है ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थान पूर्ण प्रामाणिक
हैं । अब भी उन स्थानों की स्थिति तथा तीर्थ की दृष्टि से उनके महत्त्व पर
किसी भी मान्य विद्वान् ने अपना मतभेद नहीं व्यक्त किया है ।
डाक्टर साकलिया ने वाल्मीकि रामायण को पूर्ण प्रामाणिक माना है
फिर उसी ग्रंथ के किसी अंश को क्यों अप्रामाणिक माना जाय यह तर्क की
दृष्टि से समझ में नहीं आता । ऐसा करना किसी मुर्गी के आधे अंग को पकड़कर
खा जाने तथा आधे अंग को अण्डा देने के लिये रख छोड़ने की घटना के
समान है ।
लंका की स्थिति
ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रामायण में वर्णित स्थानों के लिये
वाल्मीकि रामायण ही सबसे बड़ा प्रामाणिक ग्रन्थ है । इस रामायण के अनु-
सार लंका समुद्र से सौ योजन दूर थी । इन लोगों द्वारा पूर्वी मध्य प्रदेश,
( ३६ )
हनुमान जी के वेग जन्य वायु से समुद्र का जल आकाश में चला जाता
था । नीचे तिमि, नक्र, बड़ी-बड़ी मछलियाँ बड़े-बड़े कच्छप ऐसे दिखाई देते थे
जैसे कपड़ा हट जाने पर देह दिखाई देता है ।
'तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा ।
वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् ॥ १७५ ॥
समुद्र में रहने वाले सर्पों ने आकाश मार्ग पर हवा में तैरते हुए हनुमान जी
को देखकर गरुड़ समझ लिया ।
'क्रममाणं समीक्ष्याथ भुजगाः सागरङ्गमाः ।
व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्णमिव मेनिरे ॥ १७४ ॥'
महाबली कपि श्रेष्ठ हनुमान समुद्र में जिस-जिस मार्ग से निकलते थे उधर-
उधर ऐसा लगता था मानो जल के पनाले बह रहे हों ।
'येनासौ याति बलवान् वेगेन कपिकुञ्जरः ।
तेन मार्गेण सहसा द्रोणीकृत इवार्णवः ॥ १८०॥
इतना ही नहीं श्री वाल्मीकि ने समुद्र का ऐसा सजीव वर्णन किया है,
जैसा आज तक किसी कवि ने किया ही नहीं ।
वाल्मीकि रामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ में वर्णित वस्तु के विषय में
'अमुक स्थान पर ही होगी' की कल्पना निस्सार है । क्योंकि रामायण में वर्णित
वस्तुओं, घटनाओं एवं स्थानों के विषय में तो निश्चितता है । परन्तु आधुनिक
लोगों द्वारा तथाकथित अन्वेषणों के विषय में तो अनिश्चय की स्थिति बनी ही हुई
है । ऐसी स्थिति में निश्चित प्रमाण को छोड़कर अप्रमाणिकता की ओर दौड़ना
अन्धकारयुक्त मकान में वस्तुओं को खोजने के लिए प्रयास करने के समान है ।
महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् राम के समुद्र तक पहुँचने के विभिन्न मार्गों
का विशद वर्णन किया है । आज भी उसी मार्ग से दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा
हो जाया करती है । किष्किन्धा में बालि को मारकर राम ने चौमासा किया
था । वह किष्किन्धा दक्षिण भारत में आज किष्किन्धा नाम से ही प्रसिद्ध है ।
वाल्मीकि रामायण में वर्णित किष्किन्धा की स्थिति को छोड़कर बिना किसी
( ३७ )
प्रमाण के बेलारी या अन्य किसी स्थान पर उस स्थान की कल्पना वास्तविकता
को अस्वीकार करना है। नासिक पञ्चवटी आदि स्थानों के विषय में भी शंकायें
उठायी गई हैं। जो सर्वथा निर्मूल हैं।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नासिक का सम्बन्ध रामायण की
महत्त्वपूर्ण घटना शूर्पणखा की नासिका-छेदन से है। पञ्चवटी भी वहीं है।
रामायण में दोनों स्थानों का आस पास होना प्रमाणित होता है। आधुनिक
काल में भी पञ्चवटी और नासिक एक ही स्थान पर हैं। इन स्थानों का
वाल्मीकि रामायण के वर्णन से सादृश्य सम्बन्ध प्रतीत होता है। महाकवि ने
रामायण में लगभग दो सौ आठ स्थानों का वर्णन किया है। इनमें से अधिकांश
स्थान आज भी दक्षिण भारत में ही है। गोदावरी, कृष्णा, वरदा आदि नदियाँ,
आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, केरल आदि स्थान दक्षिण भारत में ज्यों के त्यों
विद्यमान हैं।
समुद्र सम्बन्धी पर्वतों का वर्णन भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वे पर्वत
आज भी विभिन्न नामों से विभिन्न रूपों में अवस्थित हैं। वाल्मीकि रामायण में
लंका जाते समय हनुमान का महेन्द्र पर्वत किष्किन्धा (काण्ड ६७ सर्ग श्लोक
३९) तथा लौटते समय अरिष्ट पर्वत (सुन्दर काण्ड ५६ सर्ग श्लोक २६)
पर चढ़ना बताया गया है।
इसी तरह सुवेल, सह्य, मलय इत्यादि पर्वतों का भी वर्णन किया गया
है। इन सब वाल्मीकि रामायण में वर्णित एवं आधुनिक जगत् में प्रसिद्ध
वस्तुओं एवं स्थानों में वाल्मीकि रामायण में वर्णित अर्थ ही प्रमाणित होता
है। अतः यह कहना तथ्यों से विपरीत है कि महर्षि वाल्मीकि को दक्षिण
भारत की भौगोलिक स्थिति एवं उसके रीति रिवाजों के बारे में कोई जानकारी
नहीं थी।
जहाँ तक दक्षिण में शव गाड़ने की प्रथा का प्रश्न है, आधुनिक इतिहास
के आधार पर उसे प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। आधुनिक इतिहास मात्र
६ हजार वर्ष पुराना है जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णित बाली के शव
२. द्वितीय खण्ड: सौर, चान्द्र, नाक्षत्र काल-भेद एवं कर्मकाण्ड विनियोग
( ३८ )
दाह की घटना करोड़ों वर्ष पुरानी घटित घटना है । रामायण की संस्कृति,
सर्वथा वैदिक संस्कृति है । राम, रावण, बाली इत्यादि वैदिक संस्कृति के व्यक्ति
थे । हनुमान जी भारतीय संस्कृति के अध्येता थे । वैदिक संस्कृति में 'भस्मान्तम्
शरीरम्' इत्यादि वेद-मन्त्र के अनुसार प्राचीन शवदाह का ही समर्थन किया
गया है । अतः बाली एवं रावण के शवदाह का आदेश देना वैदिक संस्कृति के
अनुसार सर्वथा उपयुक्त था । शव को गाड़ने की कल्पना कथंचित् हो भी तो वह
मध्यकाल की बात हो सकती है । इसको दक्षिण भारत का शाश्वतिक धर्म नहीं
माना जा सकता ।
उधर भारत में भी साधु, संन्यासी, संत, महात्मा इत्यादियों को जलाया
नहीं जाता, उनकी समाधि बनती है, छोटे एवं असंस्कृत बालकों के शव के
साथ भी यही होता है । कहीं-कहीं प्लेग इत्यादि की बीमारी में मरे वयस्क
पुरुषों के शवों को भी गाड़ा ही जाता है, उन्हें जलाया नहीं जाता है । हमारे
यहाँ शवों के संबंध में सर्वत्र दहन, खनन एवं प्लावन की परम्परा हैं । अतः
इनमें से किसी एक को किसी भाग विशेष की परम्परा नहीं माना जा सकता ।
जिस प्रकार किसी मुस्लिम बहुल प्रदेश में कब्रों को देख कर यह निर्विवाद
निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यहाँ केवल कब्र ही बनती रही हैं,
उसी प्रकार किसी स्थान विशेष पर शव गाड़ने की प्रक्रिया को लेकर यह नहीं
कहा जा सकता कि वहाँ पर सदा शव गाड़े ही जाते रहे हैं । यह बात तत्का-
लिक ऐतिहासिक हो सकती है पर शाश्वतिक ऐतिहासिक नहीं है ।
जहाँ तक वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थानों का प्रश्न है, वह अत्यन्त
ही महत्त्वपूर्ण है । वानरराज सुग्रीव ने बन्दरों द्वारा सीता के अन्वेषण के लिये
जिन स्थानों का वर्णन किया है वह अत्यन्त सजीव तथा किसी भी अन्वेषण
करने वाले के लिये महत्त्वपूर्ण सामग्री सिद्ध हो सकती है । प्रारम्भ में जो-जो
घटनाएँ जिन-जिन स्थानों पर घटित हुई थीं, लंका विजय के पश्चात् लौटते
भगवान् राम ने भगवती सीता से उन सभी स्थानों तथा घटनाओं का वर्णन
किया है ।
( ३९ )
अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद्विभुः ॥ २२ ॥
एतत्तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ॥ २० ॥
सेतुबन्ध इतिख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् ।
एतत्पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥
एष सेतुर्मया बद्धः सागरे लवणार्णवे ॥ १७ ॥
कैलाश शिखराकारे त्रिकूटशखरे स्थिताम् ।
लंकामीक्षस्व वैदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥
यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता वलात् ॥ ४५ ॥
एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥ ४६ ॥
'( युद्ध काण्ड सर्ग १२३ )
इसी तरह हिरण्यनाभ पर्वत १८, किष्किन्धा २२, ऋष्यमूक ३८, पम्पा
४०, पर्णशाला आश्रम ४२, ४४, शबरी मिलन स्थल ४१, अगस्त्य एवं
शरभंग मुनियों के आश्रम ४६, चित्रकूट ४९, भरद्वाज आश्रम ५१, शृङ्गवेर-
पुर ५२, इत्यादि स्थानों का वर्णन भगवान् राम ने किया है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थान पूर्ण प्रामाणिक
हैं। अब भी उन स्थानों की स्थिति तथा तीर्थ की दृष्टि से उनके महत्व पर
किसी भी मान्य विद्वान् ने अपना मतभेद नहीं व्यक्त किया है।
डाक्टर साकलिया ने वाल्मीकि रामायण को पूर्ण प्रामाणिक माना है
फिर उसी ग्रंथ के किसी अंश को क्यों अप्रामाणिक माना जाय यह तर्क की
दृष्टि से समझ में नहीं आता। ऐसा करना किसी मुर्गी के आधे अंग को पकड़कर
खा जाने तथा आधे अंग को अण्डा देने के लिये रख छोड़ने की घटना के
समान है।
लंका की स्थिति
ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रामायण में वर्णित स्थानों के लिये
वाल्मीकि रामायण ही सबसे बड़ा प्रामाणिक ग्रन्थ है। इस रामायण के अनु-
सार लंका समुद्र से सौ योजन दूर थी। इन लोगों द्वारा पूर्वी मध्य प्रदेश,
दक्षिणी बिहार, पश्चिमी बंगाल एवं छोटा नागपुर के आस-पास लंका की स्थिति
का जो निर्धारण करना है। उसके लिये अभी कोई प्रमाण भी नहीं है। आज
भी लंका नाम से ही जब प्रसिद्ध द्वीप है तब फिर 'लक्का' को 'लंका' कहा
होगा' यह कहने की आवश्यकता ही क्या है। यह नहीं कहा जा सकता कि
लंका नाम की कोई चीज नहीं थी । वर्तमान श्री लंका भी हमारे मत में
रावण की लंका नहीं है। इस लंका का दूसरा नाम सिलोन भी है। ग्रन्थों में
इस सिंहलद्वीप को रावण की लंका से विभिन्न बतलाया गया है।
भारतीय पौराणिक भूगोल के अनुसार आज की श्री लंका महाभारत
का सिंहल द्वीप ही है। वास्तविकता यह है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित
रावण की लंका सर्व साधारण के लिये आज लुप्त हो गई है। वहाँ दीर्घजीवी
लोग रहते हैं। वे सामान्य व्यक्ति द्वारा नहीं देखे जा सकते । आधुनिक भूगोल
वेत्ता भी यह मानते हैं कि सहस्राब्दियों में भूगोल में पर्याप्त परिवर्तन हो
जाया करता है। यह मान्यता बहुसम्मत है कि जहाँ आज हिमालय है वहाँ
पहले समुद्र था। स्वयं डाक्टर साकलिया ने यह माना है कि कुछ टीले ऐसे
रहें होंगे जो इस समय आस्ट्रेलिया की ओर बढ़ गये होंगे। अतः रावण की
लंका आध्यात्मिक एवं भौगोलिक दोनों कारणों से ही लुप्त हो गई है। लंका
को मध्यप्रदेश अथवा इधर-उधर खोजना एक व्यर्थ का प्रयास है। वाल्मीकि
रामायण की कतिपय घटनाओं को अप्रामाणिक मानने के लिये कुछ भी ठोस
तर्क प्रस्तुत नहीं किये गये हैं।
जहाँ तक रावण की जाति एवं संस्कृति का सम्बन्ध है, वाल्मीकि रामा-
यण के अनुसार वह वैदिक संस्कृति में दीक्षित कर्मनिष्ठ ब्राह्मण था। वह
परम तपस्वी पुलस्त्य का पौत्र तथा विश्रवा मुनि का पुत्र था ! आज भी
भारत में पुलस्त्य गाँव प्रचलित है। इन प्रमाणों के रहते हुए भी उसे दूसरी
जाति का व्यक्ति मानने की निराधार कल्पना करना सर्वथा अनुचित है।
यह सही है कि वाल्मीकि रामायण की कथाएँ युगों से गायी जाती रही
हैं। ऐसी स्थिति में यदि उन कथाओं में प्रमाण विरुद्ध अंश आ जाय तो उसमें
कुछ कल्पना का अंश आ सकता है। पर इन कथाओं में ऐसी कोई प्रामाणि-
( ४१ )
विरुद्ध बात नहीं पाई गई है। इसके विपरीत युग से प्रचलित इन कथाओं
में आश्चर्यजनक रूप से एकरूपता बनी हुई है। यह तथ्य वाल्मीकि रामायण
की प्रामाणिकता के लिये सबसे बड़ा आधार है।
हमारे यहाँ वेदों की आचार्य परम्परा मानी जाती है। गुरु-शिष्य सम्प्रदाय
परम्परा से जैसे वेदों की रक्षा होती रही है, वैसे ही गुरु-शिष्य परम्परा से ही
रामायण तथा पुराण की भी रक्षा होती रही है। इसीलिए रामायण में यदि
कोई नयी चीज प्रवृष्ट हुई तो उसे रामायण का प्रसिद्ध अंश न मानकर क्षेपक
की संज्ञा दे दी गयी। वाल्मीकि रामायण के टीकाकारों ने तत्तत्क्षेपकों को
न मानने का यही आधार बताया कि 'इनकी सम्प्रदाय प्राप्त व्याख्या नहीं है'
अतः क्षेपक प्रमाण नहीं माने जा सकते। बस; इसी सम्प्रदाय विशेष के कारण
ही वाल्मीकि रामायण के मौलिक रूप की रक्षा होती रही है। अतः यह
कहना ठीक नहीं है कि वाल्मीकि रामायण की कथाओं में कालान्तर में व्यापक
काट छांट किया गया। रामायण में महाभारत की चर्चा नहीं है। महाभारत
एवं काव्यों में तथा कालिदास, अश्वघोष प्रभृति कवियों ने भी रामायण की
चर्चा की है। बौद्ध जातकों तथा जैन ग्रन्थों में रामायण का वर्णन है पर वह
प्रामाणिक नहीं। इस लिये इनके आधार पर राम कथाओं के भिन्न रूप
बने भी हैं पर वाल्मीकि रामायण में जो इसकी चर्चा है वही प्रामाणिक है।
अनेक विदेशी विद्वानों ने भी राम कथा के सम्बन्ध में वाल्मीकि रामायण
को ही सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। भारतीय संस्कृति का
संदेशवाहक यह महान् ग्रन्थ रामकथा सागर में युगों से भारतीयों को गोता
लगवाता हुआ आज भी प्रत्येक भारतीय को उसमें गोता लगा कर अपने जीवन
को मानवता के उदात्त आदर्शों के अनुसार जीने की पवित्र प्रेरणा दे रहा है।
ऐसे प्रामाणिक ग्रन्थ को छोड़ कर निराधार कल्पना के सहारे नयी खोजों का
दावा करना बौद्धिक स्तर से नीचे उतरने की बात है।
आधुनिक लोग वाल्मीकि रामायण के अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर
एवं लंका इन पाँच काण्डों को प्रामाणिक मानते हैं और कहते हैं कि इनमें राम
( ४२ )
को भगवान् का अवतार नहीं माना गया, पर वाल्मीकि रामायण में प्रारम्भ
से लेकर अन्त तक सर्वत्र ही राम को विष्णु का अवतार माना गया है । अतः
राम को गुप्त काल में विष्णु का अवतार कहा गया, यह बात पूर्णतया
गलत है ।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण की सभी घटनाएँ पूर्ण
प्रामाणिक हैं । भारतीय संस्कृति, परम्परा तथा धार्मिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों
के मूल रहस्य इसी ग्रन्थ में सुरक्षित हैं । मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम
को आधुनिक इतिहास की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता । किसी मान्य ग्रन्थ
के कुछ अंश को प्रामाणिक तथा कुछ को अपनी आधारहीन बातों को सिद्ध न
कर सकने की दशा में अप्रामाणिक मानने की दुराग्रही दृष्टि का परित्याग इस
समय अत्यावश्यक है । सभी लोगों को धार्मिक तथा आध्यात्मिक ग्रन्थों की
बातों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने के प्रयास से अपने को दूर रखने का
प्रयास करना चाहिए ।
धार्मिक ग्रन्थों के विषय में ऐसी बातों से तनाव एवं विवाद का वातावरण
पैदा हो जाता है । हमें ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना है जिससे इस समय
देश में कोई दूसरी समस्या उपस्थित हो । रामायण की घटनाओं के विषय में
धर्माचार्यों का निर्णय ही एकमात्र दिशानिर्देशक होना चाहिए ।
कालनिर्धारण में पूर्वाग्रह अनुचित
यद्यपि मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद अनादि हैं, अनादि काल से ही हम लोगों के
पूर्वज उन्हें अपौरुषेय मानते आये हैं, मीमांसादि शास्त्रों में इनकी अनादिता
अपौरुषेयता बड़े समारोह से सिद्ध की गई है, तथापि मेक्समूलर, प्रो० वेण्टली,
प्रो० बायो, प्रो० वेबर, प्रिसिपल थीबो, म० म० सुधाकर द्विवेदी,
लोकमान्य तिलक, पं० शंकर बालकृष्ण दीक्षित, ज्योतिर्विद् केतकर आदि ने वेदों
का निर्माण काल ६ हजार वर्ष माना है । गोडबोले, लेले, आदि इससे अधिक
चौबीस हजार वर्ष आगे बढ़े हैं । पुरातत्त्वज्ञ दास बाबू ८० हजार वर्ष वेद काल
मानते हैं ।