काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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में वह आशंका घर कर गयी जिसकी सम्भावना कौसल्या ने का थी । जैसे
सिंह कभी दूसरे द्वारा आनीत मांस खाना नहीं चाहता इसी प्रकार परभुक्त
राज्य को राम स्वीकार नहीं करेंगे ।
‘न· पुरेणाहृतं भक्ष्यं व्याघ्रः खादितुगच्छति ।
एवमेव नरव्याघ्रः परलीढं न मन्यते ॥’
( अयो० ६१ )
अतः भरत जी ने स्वर्णभूषित पादुका श्री राम के सम्मुख रखकर कहा—
“हे भगवान् ! आप अपने चरणों को इन दोनों पादुकाओं पर रख दीजिये,
ये ही राजसिंहासनस्थ होकर सम्पूर्ण जनों का योग-क्षेम निर्वाह करेंगी ।”
‘अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते ।
एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः ॥’
( अयो० ११२ )
भरत जी ने राज्य को भगवान् श्री राम का धरोहर माना ।
‘भरतः शिरसा कृत्वा सन्यासं पादुके ततः ॥ १५ ॥
( अयो० ११५ )
यदि भगवान् रामचन्द्र के पास स्वर्णभूषित पादुका होती तो भरत जी
उनसे यह नहीं कहते कि इस पर ‘अधिरोह’ चढ़ चाइये ।
ऐतरेय ब्राह्मण में सौवर्ण पलङ्ग का वर्णन है, जिस पर बैठ कर होता
सम्राट् की स्तुति करता है । सुवर्ण द्रावण का ज्ञान यदि उस समय न होता
तो सुवर्ण का तार या शय्या कैसे बनती ? इसी प्रकार नामांकन की बात है।
मुद्राराक्षस नाटक का आधार ही राक्षस के नाम वाली मुद्रा ( अंगूठी ) है ।
अभिज्ञान शाकुन्तल में महाकवि कालिदास ने भी दुष्यन्त के नाम वाली अंगूठी
को ही प्रत्यभिज्ञा ( पहचान का साधन ) बताया है । भगवान् श्री राम ने
हनुमान् जी को अपने नाम से अंकित अँगूठी जगज्जननी सीता के पहचान के
लिये दी ।