काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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यह नियम है कि जिन वस्तुओं का भाव जिस प्रमाण से विदित होता है
उनका अभाव भी उसी प्रमाण से विदित होता है। जिस प्रकार भूतल में घट
का भाव आलोकादि सहकारी सहकृत मनःसंयुक्त निर्दोष नेत्र से ही विदित होता
है, उसी प्रकार घटाभाव भी उसी प्रमाण से विदित होता है। यह स्पष्ट है कि
जिसके भाव का ज्ञान कर्णेन्द्रिय से होता है, उसके अभाव का ज्ञान नेत्रेन्द्रिय से
नहीं हो सकता। शब्द का ज्ञान कर्णेन्द्रिय से होता है, शब्द के अभाव-ज्ञान के
लिए कर्णेन्द्रिय की ही आवश्यकता होती है, किसी अन्य प्रमाण की नहीं।
प्रकृत में राम, सीता, लक्ष्मण, अयोध्या, लंका आदि का ज्ञान आधुनिक
प्रत्यक्षानुमान तथा आधुनिक इतिहास से नहीं हो सकता। रामायण एवं पुराणों
के अनुसार राम का प्रादुर्भाव करोड़ों वर्ष पूर्व चौबीसवें त्रेता में हुआ है।
आधुनिक ऐतिहासिक युग एवं प्रागैतिहासिक काल की सम्पूर्ण अवधि विद्वानों ने
छः हजार वर्ष के भीतर ही मानी है। ऐसी स्थिति में राम के चरित्रों के
सम्बन्ध में वर्तमान इतिहास का चंचु प्रवेश ही नहीं सकता। उस सम्बन्ध में
सम्पूर्ण जानकारी अब वाल्मीकि के रामायण से ही प्राप्त हो सकती है।
वाल्मीकि रामायण का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि रामायण का
निर्माण कुछ संवाददाताओं या टेलीप्रिन्टरों से भेजे गये समाचारों के आधार
पर नहीं हुआ। उसका निर्माण महर्षि वाल्मीकि ने समाधिजनित ऋतम्भरा
प्रज्ञा के द्वारा अतीत अनागत, वर्तमान, स्थूल, सूक्ष्म, सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट सभी
वस्तुओं का साक्षात्कार करके राम, लक्ष्मण सीता आदि के हँसित, भासित,
इंगित, चेष्टित आदि सभी व्यापारों का पूर्ण रूप से साक्षात्कार किया। महर्षि
वाल्मीकि अलौकिक मुनि थे। वे लौकिक गति और दिव्य गति द्वारा भी सर्व
जगह आ जाकर सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त कर सकते थे। अतः सेतुबन्ध और
समुद्रलंघन आदिकों के सम्बन्ध में रामायण के वर्णन की उपेक्षा नहीं की जा
सकती। इनके विषय में वाल्मीकि रामायण ही सबसे बड़ा प्रमाण माना जायेगा।
सेतुबन्धन कल्पना नहीं
रामायण में वर्णित रामेश्वर की स्थापना वर्तमान इतिहास से भी प्रमाणित
होती है। सहस्राब्दियों से भारत के कोने-कोने से लोग रामेश्वर का दर्शन करने
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