काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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अर्थात् राजकुमार की स्वयं व्यक्तिगत सम्पत्ति बहुत थी । भगवान् श्री
राम वह भी चाहते तो ले जा सकते थे क्योंकि वह राज्य की नहीं थी ।
जब उन्होंने दान किया तो उसे ले जाने में कोई बाधा नहीं थी । उनके मामा
के यहाँ से जो शत्रुञ्जय नामक हाथी उन्हें मिला था उसका दान उन्होंने
वसिष्ठ जी के पुत्र सुयज्ञ को एक हजार निष्क ( स्वर्णमुद्रा ) दक्षिणा के साथ
दे दिया । ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ अगस्त्य और विश्वामित्र को बुला कर उनका
पूजन कर दान के लिये ऐसे रत्नों की वर्षा की जैसे खेत में मेघ जल की वर्षा
करता है । वाल्मीकिरामायण में बहुत प्रकार से दान का वर्णन किया गया
है । भगवान् राम अपनी अपने नाम वाली अँगूठी अपने साथ ले गये थे ।
इन्द्र के हाथ में जैसे वज्र है, विष्णु के हाथ में चक्र है, और भगवान् त्रिनेत्र-
धारी शङ्कर के हाथ में त्रिशूल है, वैसे ही द्विज के हाथ में पवित्री है ।
'यथा वज्रं सुरेन्द्रस्य यथा चक्रं हरेस्तथा ।
त्रिशूलं च त्रिनेत्रस्य तथा विप्रपवित्रकम् ॥'
यह पवित्री सुवर्ण की बहुत पवित्र मानी गयी है ।
'अन्यान्यपि पवित्राणि कुशदूर्वामयानि च ।
हेमालयपवित्रस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥'
यह वचन हेमाद्रि से उद्धृत है । अर्थात् कुश दूर्वा की अन्य पवित्रियाँ
सुवर्ण पवित्री ( अंगूठी ) की सोलहवीं कला ( पसँहा ) के बराबर भी नहीं
होतीं । यह सुवर्ण पवित्री अनामिका के मूल में पहिननी चाहिये ।
अत्रि का वचन है—
'अनामिकामूलदेशे पवित्रं धारयेद् द्विजः ।'
गुरु द्रोण के हाथ में भी यही पावित्री थी जिसे सूखे कुएँ में डालकर
उन्होंने गुल्ली के साथ निकाल कर कौरव, पाण्डवों को चकित कर दिया था ।
रही पादुका की बात उसे तो भरत जी अपने साथ अभिषेक सामग्री के
साथ ले गये थे उसी में वह गयी थी । जब भगवान् श्री राम ने वन से राज्य
के लिये अयोध्या लौटना कथमपि स्वीकार नहीं किया तब भरत जी के मन