जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 582, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ें( चौखम्भा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला २ )
धाराधीश्वर भोजकृतः
तत्त्वप्रकाशः
तात्पर्यदीपिका-वृत्ति-व्याख्याद्वयः-हिन्दीभाषानुवादसहितः
सम्पादक
डॉ० कामेश्वरनाथ मिश्र, एम. ए., पी-एच. डी., साहित्याचार्य
( उ० प्र० संस्कृत अकादमी द्वारा पुरस्कृत )
भारतीय जीवन में शैवधर्म एवं दर्शन का विशेष महत्त्व रहा है। उत्तरभारत
में काश्मीरीय शैवदर्शन तथा दक्षिण भारत में सिद्धान्त-शैवदर्शन विशेष रूप से
प्रचलित रहे। 'तत्त्वप्रकाश' सिद्धान्त-दर्शन के प्रमेयों का स्पष्ट ज्ञान कराने
वाला प्रमुख ग्रन्थ है। तत्त्वों का निरूपण इसलिये भी अधिक निभ्रान्त है क्योंकि
धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति एवं साहित्य के अद्भुत उन्नायक महाराज भोज ने
इसी सम्प्रदाय की दीक्षा ली थी और उन्होंने यहाँ साधना के अनुभवों को उतारा
है। उनके विचारों का विशद विवेचन करने के लिये श्रीकुमारदेवरचित 'तात्पर्य-
दीपिका' तथा अघोरशिवाचार्यरचित 'वृत्ति' दोनों को साथ में जोड़ दिया गया
है। डॉ० मिश्र ने अथक परिश्रम करके जिज्ञासुओं के लाभार्थ कारिकाओं का
हिन्दी-अनुवाद करके, विवेकपूर्वक पाठान्तरों का निर्धारण कर ग्रन्थ को
प्रामाणिक एवं परिनिष्ठित रूप प्रदान किया है। ग्रन्थ के अन्त में सन्दर्भों का
आकारनिर्देश, दोनों टीकाओं में उद्धृत ग्रन्थ एवं ग्रन्थकारों की सूची, पारि-
भाषिक शब्दकोश एवं उपयोगी ग्रन्थों का उल्लेख परिशिष्ट के रूप में जोड़ा
गया है। अन्त में दिये गये तत्त्वों की उत्पत्ति के रेखाचित्र से सारा विषय स्वतः
स्पष्ट हो जाता है।
विद्वान् सम्पादक ने भूमिका में शैवदर्शन के प्रकार, सिद्धान्तशैवदर्शन का
अभिप्राय, सिद्धान्तसाहित्य, सिद्धान्तदर्शन, भोज, श्रीकुमार तथा अघोरशिवाचार्य
के व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर शोधपूर्ण प्रकाश डाला है। भूमिकामात्र को पढ़
लेने से संस्कृत तथा दर्शन के अनुरागियों को 'सिद्धान्त' के साहित्य तथा
प्रतिपाद्य विषयों के ज्ञान के लिये अन्य ग्रन्थ देखने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
हिन्दी में इस दर्शन से सम्बद्ध इतनी सामग्री अभी तक प्रकाश में नहीं आयी है।
ग्रन्थ का अध्ययन करने से सिद्धान्तशैवदर्शन से सम्बद्ध समस्त विषयों का
परिचय मिल जायेगा। हिन्दी माध्यम से सिद्धान्तदर्शन तथा भोज के कृतित्व
और साधना पर प्रचुर प्रकाश डालने वाला और दक्षिण भारतीय धर्म तथा
साधना को हिन्दीभाषा के द्वारा उत्तर भारत में फैला कर उत्तर और दक्षिण में
समन्वय स्थापित करनेवाला यह प्रथम ग्रन्थ होगा। ३०--००