जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
( चौखम्भा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला २ )
धाराधीश्वर भोजकृतः
तत्त्वप्रकाशः
तात्पर्यदीपिका-वृत्ति-व्याख्याद्वयः-हिन्दीभाषानुवादसहितः
सम्पादक
डॉ० कामेश्वरनाथ मिश्र, एम. ए., पी-एच. डी., साहित्याचार्य
( उ० प्र० संस्कृत अकादमी द्वारा पुरस्कृत )
भारतीय जीवन में शैवधर्म एवं दर्शन का विशेष महत्त्व रहा है। उत्तरभारत
में काश्मीरीय शैवदर्शन तथा दक्षिण भारत में सिद्धान्त-शैवदर्शन विशेष रूप से
प्रचलित रहे। 'तत्त्वप्रकाश' सिद्धान्त-दर्शन के प्रमेयों का स्पष्ट ज्ञान कराने
वाला प्रमुख ग्रन्थ है। तत्त्वों का निरूपण इसलिये भी अधिक निभ्रान्त है क्योंकि
धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति एवं साहित्य के अद्भुत उन्नायक महाराज भोज ने
इसी सम्प्रदाय की दीक्षा ली थी और उन्होंने यहाँ साधना के अनुभवों को उतारा
है। उनके विचारों का विशद विवेचन करने के लिये श्रीकुमारदेवरचित 'तात्पर्य-
दीपिका' तथा अघोरशिवाचार्यरचित 'वृत्ति' दोनों को साथ में जोड़ दिया गया
है। डॉ० मिश्र ने अथक परिश्रम करके जिज्ञासुओं के लाभार्थ कारिकाओं का
हिन्दी-अनुवाद करके, विवेकपूर्वक पाठान्तरों का निर्धारण कर ग्रन्थ को
प्रामाणिक एवं परिनिष्ठित रूप प्रदान किया है। ग्रन्थ के अन्त में सन्दर्भों का
आकारनिर्देश, दोनों टीकाओं में उद्धृत ग्रन्थ एवं ग्रन्थकारों की सूची, पारि-
भाषिक शब्दकोश एवं उपयोगी ग्रन्थों का उल्लेख परिशिष्ट के रूप में जोड़ा
गया है। अन्त में दिये गये तत्त्वों की उत्पत्ति के रेखाचित्र से सारा विषय स्वतः
स्पष्ट हो जाता है।
विद्वान् सम्पादक ने भूमिका में शैवदर्शन के प्रकार, सिद्धान्तशैवदर्शन का
अभिप्राय, सिद्धान्तसाहित्य, सिद्धान्तदर्शन, भोज, श्रीकुमार तथा अघोरशिवाचार्य
के व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर शोधपूर्ण प्रकाश डाला है। भूमिकामात्र को पढ़
लेने से संस्कृत तथा दर्शन के अनुरागियों को 'सिद्धान्त' के साहित्य तथा
प्रतिपाद्य विषयों के ज्ञान के लिये अन्य ग्रन्थ देखने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
हिन्दी में इस दर्शन से सम्बद्ध इतनी सामग्री अभी तक प्रकाश में नहीं आयी है।
ग्रन्थ का अध्ययन करने से सिद्धान्तशैवदर्शन से सम्बद्ध समस्त विषयों का
परिचय मिल जायेगा। हिन्दी माध्यम से सिद्धान्तदर्शन तथा भोज के कृतित्व
और साधना पर प्रचुर प्रकाश डालने वाला और दक्षिण भारतीय धर्म तथा
साधना को हिन्दीभाषा के द्वारा उत्तर भारत में फैला कर उत्तर और दक्षिण में
समन्वय स्थापित करनेवाला यह प्रथम ग्रन्थ होगा। ३०--००
( चौखम्भा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला ४ )
महाराजाधिराजभोजकृतं
सरस्वतीकण्ठाभरणम्
( चित्रप्रकरणसहितम् )
प्रथमो भागः
रत्नदर्पणाख्यसंस्कृत-स्वरूपानन्दभाष्यनाम हिन्दी व्याख्याद्वयोपेतम्
व्याख्याकार-
डॉ० कामेश्वरनाथ मिश्र, एम. ए., पी-एच. डी., साहित्याचार्य
महाराजाधिराज भोज की साहित्यसेवा जनकथा बन चुकी है। साहित्य, कला,
धर्म, दर्शन आदि का संरक्षण ही नहीं, सम्पादन भी उन्होंने किया है। आयुर्वेद से लेकर
आध्यात्मिक साधना तक का कोई भी क्षेत्र उनसे अछूता न रहा। अलंकारशास्त्र के क्षेत्र
में उनके कीर्तिस्तम्भ 'सरस्वतीकण्ठाभरण' नामक ग्रन्थ को प्रकाशित करते हुए हमें
हर्ष हो रहा है।
इस ग्रन्थ के प्रथम परिच्छेद में काव्य-लक्षण, गुण तथा दोषों का सूक्ष्म विवेचन है।
द्वितीय परिच्छेद में शब्दालङ्कार का निर्णय करते समय चित्रालङ्कार का विवेचन एवं
वर्गीकरण जितना वैज्ञानिक, विशद्, पूर्ण एवं व्यवस्थित यहाँ है, वैसा किसी भी अलङ्कार-
शास्त्र के ग्रन्थ में नहीं है। यही स्थिति तृतीय परिच्छेद में अर्थालङ्कार के निरूपण में भी
है। उभयालङ्कार का भी पृथक् से इतना विस्तृत विवेचन भोज ने ही किया है। पूरा
चतुर्थ परिच्छेद इसी के निरूपण पर दिया गया है। पञ्चम परिच्छेद में 'शृङ्गार' को
रसराजता सिद्ध करते हुए महाराजाधिराज ने अन्य रसों तथा भावों की समीक्षा तो की
ही है, आनुषङ्गिक रूप से सम्बद्ध नायक, नायिका आदि के विषय में भी प्रचुर सामग्री
प्रदान की है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि महाराज भोज ने काव्य के प्रत्येक क्षेत्र
को छुआ और सोने में सुगन्ध भर दी।
साथ में 'रत्नदर्पण' नाम की संस्कृत टीका भी यावदुपलब्ध दी गई है। धन्यवाद है
तरुण किन्तु प्रौढ़ समीक्षक डॉ० कामेश्वर नाथ मिश्र को जिन्होंने सरल, सुस्पष्ट एवं भाव-
ग्राहिणी हिन्दी भाषा में ग्रन्थ की गूढ़तम ग्रन्थियों तथा रहस्यों को उद्घाटित किया है।
डॉ० मिश्र की लेखनी में अद्भुतशक्ति है जिसने गूढ़तम विषय को स्पष्टतम कर दिया है।
यथास्थान दिये गये रेखाचित्रों, ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक विवेचनों से ग्रन्थ निखर
उठा है। भूमिका में विद्वान् भाष्यकार ने राजा भोज के जीवन, ग्रन्थकर्तृत्व, आध्यात्मिक
अभिरुचि तथा उनको सम्मत काव्यलक्षण, चित्रालङ्कार, रस आदि पर शोधपूर्ण दृष्टि
डाली है। अन्त में विविध परिशिष्टों से ग्रन्थ की उपयोगिता और भी बढ़ गयी है।
विश्वास है कि छात्रों, अध्यापकों तथा काव्यशास्त्र के जिज्ञासुओं को प्रचुर सामग्री मिलेगी
और वे लाभान्वित होंगे ! ३५-००
( चौखम्भा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला ३ )
मन्त्र-योग-संहिता
मूल सहित अंग्रेजी अनुवाद
डॉ० राम कुमार राय
प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
यह एक मात्र उच्च कोटि की मन्त्र योग की पुस्तक है जिसमें क्रमवार कदम-
कदम पर मन्त्र योग का स्पष्टीकरण पाया जा सकता है। यह मन्त्र-योग के
सभी सोलहों अङ्गों का विवेचन करता है । अर्थात् भक्ति, शुद्धि, आसन, पञ्चाङ्ग
सेवन, आचार, धारणा, दिव्य-देश-सेवन, प्राण-क्रिया, मुद्रा, तर्पण, हवन, बलि,
याग, जप, ध्यान और समाधि । इस संहिता में सभी तरीकों एवं व्यवहारों की
इतनी पूर्ण व्याख्या हुई है कि यह संहिता एक हस्त पुस्तक के रूप में प्रयोग की
जा सकती है जो मन्त्र-साधना का प्रायोगिक दिशा प्रदान कर सकती है ।
इसके अतिरिक्त यह विस्तार से बराबर मन्त्र फलित ज्योतिष ( नक्षत्र विद्या,
दैवज्ञ विद्या ) की अवधारणा करता है । जिसकी सहायता से कोई एक उसकी
सत्यता का निर्णय कर सकता है। मन्त्र साधना के लिए अपने लिए उचित
मन्त्र का चुनाव कर सकता है। साधना के लिए समय और स्थान का चुनाव
पहले से निश्चित करना कि किसको गुरु बनाया जाय और मन्त्र साधना में कैसे
आगे बढ़ा जाय ।
हमारा उद्देश्य है उन सभी आवश्यक तत्त्वों का जो मन्त्र साधना के लिए
आवश्यक है और जो समर्थ ( फलोत्पादक ) मन्त्र हैं उनकी विस्तृत जानकारी
देना । आचरण की प्रकृति यहाँ तक बढ़ गयी है कि इस वर्गीकृत पुस्तक में
हिन्दुओं का प्राचीन विज्ञान भी है और वह इतना वैज्ञानिक है कि यह उच्च
शिक्षा प्राप्त करने वालों या शिक्षितों में एवं सभी बातों में सन्देह करने वालों
को भी प्रभावित करती है और वे सभी मन्त्रों की सफलता एवं उसके प्रभाव
( गुण ) के विषय में समझने लगते हैं ।
इसीलिए हमने कार्य क्षेत्र के बाहर जो साधक सारे विश्व में फैले हुए हैं
उनके लिए प्रथम बार अंग्रेजी अनुवाद के साथ इसे प्रस्तुत करने का प्रयास किया
है तथा इसे उस विस्तृत क्षेत्र में साधकों में प्रवेश पाने के योग्य बनाया है ।
इसमें बहुत अधिक चार्ट, आकृति ( मानचित्र ) एवं तस्वीरें हैं जो साथ-साथ
एक रास्ते का निर्माण करती हैं और जो अधिक ग्राह्य हैं अर्थात् समझ में आने
योग्य हैं । ३५-००
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ज्योतिष-ग्रन्थाः
जन्मपत्रदीपकः । पं० विन्ध्येश्वरी प्रसाद
द्विवेदी कृत हिन्दी टीका नोट्स युक्त ५-००
सूर्यसिद्धान्तः । (भारतीय खगोलविद्या
का ग्रंथ) पं० श्री कपिलेश्वर चौधरी
कृत 'तत्त्वामृत' संस्कृत टीका, नोट्स
आदि सहित ४५-००
मुहूर्तमार्तण्डः । नारायण दैवज्ञ कृत । पं०
कपिलेश्वरशास्त्री कृत 'मार्तण्डप्रका-
शिका' संस्कृत-हिन्दी टीका सहित १५-००
चापीयत्रिकोणगणितम् । श्री नीलाम्बर
झा कृत । पं० श्री अच्युतानन्द झा कृत
'विविध वासना' विशद टीका युक्त ४-००
सिद्धान्तशिरोमणिः । भास्कराचार्य
कृत । स्वकृत 'वासना भाष्य'सहित ।
पं० मुरलीधर ठाकुर कृत 'प्रभा-
वासना' टीका, नोट्स, प्रमाण आदि
युक्त । प्रथम भाग १०-००
नरपतिजयचर्यास्वरोदयः । श्री नरपति
कविकृत । पं० गणेशदत्त पाठक कृत
'सुबोधिनी' सं० हिन्दी टीका सहित ४५-००
गणितकौमुदी । पं० गणपति देव शास्त्री
कृत । १-२ भाग । द्वितीय भाग २-५०
जातकालंकारः । श्री गणेश दैवज्ञ कृत ।
श्री हरभानु शुक्ल कृत संस्कृत टीका
सहित । श्री दीनानाथ झा कृत
'भावबोधिनी' हिन्दी टीका सहित ४-००
आचार्य भास्कर (भास्कराचार्य-एक
अध्ययन) लेखक-पं० रामजन्म मिश्र ५-००
प्रश्नचण्डेश्वरः । दैवज्ञरामकृष्णविर-
चितः । सान्वय, हिन्दी भाषा टीका
एवं टिप्पणियों से शोभित, व्याख्या-
पं० रामजन्म मिश्र ७-५०
जातकपारिजातः । श्री वैद्यनाथ कृत ।
पं० कपिलेश्वर चौधरी कृत 'सुधा
शालिनी' संस्कृत टीका तथा पं०
मातृप्रसाद पाण्डेय कृत 'विमला'
हिन्दी टीका सहित ७५-००
प्राप्तिस्थान :-
चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी
( काशी संस्कृत ग्रन्थमाला ४६ )
श्रीमच्छतानन्द विरचिता
भास्वती
श्रीमातृप्रसाद ( दैवज्ञभूषण ) पाण्डेयेनकृता
‘छात्रबोधिनी' संस्कृतभाषाटीकासहिता
आचार्यरामजन्ममिश्रेण संशोध्य टिप्पण्यादिभिरलंकृता
श्रीमान् आचार्य शतानन्द द्वारा विरचित भास्वती करण ग्रन्थ है। इसका
निर्माण ई० सन् १०९९ में हुआ था। आचार्य वाराह मिहिर के सूर्य-सिद्धान्त के
आधार पर जो सम्प्रति पञ्चसिद्धान्तिका में उपलब्ध है, बनी है। पहले इस ग्रन्थ
का बहुत अधिक प्रयोग था। उस समय इसकी अनेक संस्कृत टीकायें मिलती थीं
किन्तु समय ने विशिष्ट गुणयुक्त अत्युपयोगी इस ग्रन्थ को भी लुप्तप्रायः कर
दिया। इसमें ग्रहों का क्षेपक शक १०२१ की स्पष्ट मेष-संक्रान्ति काल (गुरुवार)
का है। इसमें अहर्गण के आधारपर ग्रहों को स्पष्ट करने की विधि नहीं है
वरन् ग्रहों की वार्षिक गति के अनुसार है जिससे गणना करने में बड़ी सुविधा
है। आचार्य ने शतांश प्रणाली से गणित का काम किया है अर्थात् राशि अंश
कला विकला लिखने के स्थान पर राशि के सौवें भाग में या नक्षत्र के सौवें भाग
में ग्रहस्थिति बतायी है। जैसे चन्द्रमा की एक वर्ष की गति ९७० ५/६ नक्षत्र शतांशों
में बतायी गई है जिसका अर्थ है—
९७० ५/६ / १०० नक्षत्र = (९७० ५/६ / १००) x ८०० कला
= ७७६६ २/३ कला = ४ राशि १२ अंश ४६ कला ४० विकला
इसी प्रकार शनि का क्षेपक ५१४ शतांश राशि है जिसका अर्थ दशमलव
भिन्न में ५.१४ राशि हुआ। इस प्रकार आधुनिकतम गणितोपयुक्त यह ग्रन्थ
शीघ्र प्रकाश में आ रहा है। ( १९८४ ) ४०-००
प्राप्तिस्थान—चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी-२२१००१