जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 583, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ें( चौखम्भा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला ४ )
महाराजाधिराजभोजकृतं
सरस्वतीकण्ठाभरणम्
( चित्रप्रकरणसहितम् )
प्रथमो भागः
रत्नदर्पणाख्यसंस्कृत-स्वरूपानन्दभाष्यनाम हिन्दी व्याख्याद्वयोपेतम्
व्याख्याकार-
डॉ० कामेश्वरनाथ मिश्र, एम. ए., पी-एच. डी., साहित्याचार्य
महाराजाधिराज भोज की साहित्यसेवा जनकथा बन चुकी है। साहित्य, कला,
धर्म, दर्शन आदि का संरक्षण ही नहीं, सम्पादन भी उन्होंने किया है। आयुर्वेद से लेकर
आध्यात्मिक साधना तक का कोई भी क्षेत्र उनसे अछूता न रहा। अलंकारशास्त्र के क्षेत्र
में उनके कीर्तिस्तम्भ 'सरस्वतीकण्ठाभरण' नामक ग्रन्थ को प्रकाशित करते हुए हमें
हर्ष हो रहा है।
इस ग्रन्थ के प्रथम परिच्छेद में काव्य-लक्षण, गुण तथा दोषों का सूक्ष्म विवेचन है।
द्वितीय परिच्छेद में शब्दालङ्कार का निर्णय करते समय चित्रालङ्कार का विवेचन एवं
वर्गीकरण जितना वैज्ञानिक, विशद्, पूर्ण एवं व्यवस्थित यहाँ है, वैसा किसी भी अलङ्कार-
शास्त्र के ग्रन्थ में नहीं है। यही स्थिति तृतीय परिच्छेद में अर्थालङ्कार के निरूपण में भी
है। उभयालङ्कार का भी पृथक् से इतना विस्तृत विवेचन भोज ने ही किया है। पूरा
चतुर्थ परिच्छेद इसी के निरूपण पर दिया गया है। पञ्चम परिच्छेद में 'शृङ्गार' को
रसराजता सिद्ध करते हुए महाराजाधिराज ने अन्य रसों तथा भावों की समीक्षा तो की
ही है, आनुषङ्गिक रूप से सम्बद्ध नायक, नायिका आदि के विषय में भी प्रचुर सामग्री
प्रदान की है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि महाराज भोज ने काव्य के प्रत्येक क्षेत्र
को छुआ और सोने में सुगन्ध भर दी।
साथ में 'रत्नदर्पण' नाम की संस्कृत टीका भी यावदुपलब्ध दी गई है। धन्यवाद है
तरुण किन्तु प्रौढ़ समीक्षक डॉ० कामेश्वर नाथ मिश्र को जिन्होंने सरल, सुस्पष्ट एवं भाव-
ग्राहिणी हिन्दी भाषा में ग्रन्थ की गूढ़तम ग्रन्थियों तथा रहस्यों को उद्घाटित किया है।
डॉ० मिश्र की लेखनी में अद्भुतशक्ति है जिसने गूढ़तम विषय को स्पष्टतम कर दिया है।
यथास्थान दिये गये रेखाचित्रों, ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक विवेचनों से ग्रन्थ निखर
उठा है। भूमिका में विद्वान् भाष्यकार ने राजा भोज के जीवन, ग्रन्थकर्तृत्व, आध्यात्मिक
अभिरुचि तथा उनको सम्मत काव्यलक्षण, चित्रालङ्कार, रस आदि पर शोधपूर्ण दृष्टि
डाली है। अन्त में विविध परिशिष्टों से ग्रन्थ की उपयोगिता और भी बढ़ गयी है।
विश्वास है कि छात्रों, अध्यापकों तथा काव्यशास्त्र के जिज्ञासुओं को प्रचुर सामग्री मिलेगी
और वे लाभान्वित होंगे ! ३५-००