जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( चौखम्बा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला १ )
अथर्ववेद-परिशिष्ट
सम्पादक—जार्ज मेलवील बोलिंग तथा जुलियस फॉन नेजलीन
हिन्दी-टिप्पणियों सहित सम्पादन
डॉ० रामकुमार राय
हर्ष का विषय है कि चौखम्बा ओरियन्टालिया ( वाराणसी ) द्वारा अथर्ववेद-परिशिष्ट
का पुनः प्रकाशन हुआ है। इस प्रकाशन का महत्त्व इसलिए और अधिक हो गया है कि
यह संस्करण नागरी लिपि में प्रथम बार प्रकाशित हुआ है। इससे पूर्व प्रस्तुत ग्रन्थ का
प्रकाशन १९०९ ई० में हुआ था। परन्तु वह संस्करण रोमन-लिपि में ही था।
पहले अलग-अलग कार्य करते हुए उक्त दोनों विद्वानों ने आगे चलकर सम्मिलित प्रयास
से इस कार्य को सम्पन्न किया। श्रीवेबर महोदय एवं श्री मॉरिस ब्लूमफील्ड ने इस ग्रन्थ
पर कुछ कार्य किया था। उन्हीं दोनों विद्वानों ने अलग-अलग इस विशिष्ट ग्रन्थ के संपादन
की संपादकों को प्रेरणा दी थी। १८९८ ई० के आस पास वेबर ने फॉन नेजलीन को
तथा ब्लूमफील्ड ने बोलिंग को अथर्ववेद-परिशिष्ट के संपादन की दिशा में संप्रेरित किया।
उन दोनों पण्डितों ने कार्यों के विवरण का इस ग्रन्थ के अपने प्राक्कथन में स्वयं उल्लेख
किया है। उसे देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि कितने श्रम, मनोयोग और अध्य-
वसाय के साथ उक्त संपादन-कार्य संपन्न हुआ था। उस समय तक अथर्ववेद-परिशिष्ट की
जितनी सामग्री मिल सकी थी—उन सब के आधार पर श्रमसाध्य निष्ठा द्वारा दोनों
विद्वानों ने परिशिष्ट का संपादन किया था। जिस जिस व्यक्ति या संस्था द्वारा सहायता
मिल सकती थी, सबको प्राप्त करने की एवं उसके उचित उपयोग की दिशा में उन दो
विद्वानों ने कुछ भी उठा नहीं रखा था।
चौखम्बा ओरियन्टालिया एवं नागरी लिपि के रूपान्तरकार संपादक श्री रामकुमार
राय धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने इस चिर प्रतीक्षित कार्य को संपन्न किया। प्रत्येक परिशिष्ट
के आरम्भ में हिन्दी में सम्बद्ध परिशिष्ट का सार संक्षिप्त रूप से देने के कारण एवं अन्त
में उद्धरण सूची और शब्दानुक्रमणिका के कारण ग्रन्थ का महत्त्व बढ़ गया है।
इस ग्रन्थ में नित्य, नैमित्तिक तथा विभिन्न अवसरों, पर्वों, परिस्थितियों आदि से संबद्ध
कर्मों का—आख्यानों, संवादों आदि द्वारा महत्त्वपूर्ण वैदिक-धार्मिक विधि-विधानों सहित
वर्णन मिलता है। प्रस्तुत अपूर्ण से भासमान इस कोशात्मक परिशिष्ट-ग्रन्थ के बहत्तर
( ७२ ) परिशिष्टों में न जाने कितने शाखीय विधान, विचार और उपाय आदि वर्णित हैं।
अतः दुष्प्राप्य, दुर्लभ, चिरप्रतीक्षित एवं महत्त्वपूर्ण इस 'अथर्ववेदपरिशिष्ट' के प्रस्तुत
संस्करण का प्राच्यविद्या के अनुशीलनकर्त्ता पण्डितों में निश्चय ही समादर होगा। इस
सत्प्रयास का हम स्वागत करते हैं। हमें विश्वास है कि दूसरा संस्करण शीघ्र ही प्रकाशित
होगा और तब हिन्दी अनुवाद-सहित यह हमारे सामने आयेगा। इसी आशा के साथ
प्रकाशक तथा 'हिन्दी नोट्स' के साथ वर्त्तमान ग्रन्थ प्रस्तुतकर्त्ता संपादक को बधाई देते
हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है। करुणापति त्रिपाठी
भूतपूर्व वाइसचांसलर, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
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