जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
१०२ जगजीवन साहिब की बानी
॥ शब्द ३८ ॥
नाम मंत्र सम नाहीं कोय ।
प्रगट पुकारि कहत हौं सोय ॥ १ ॥
अंतर डोरी राखहु लाय ।
सोवत जागत बिसरि न जाय ॥ २ ॥
बोलहु नाहिं बहुत बतलाहु ।
अंतर भजि ले याहै लाहु१ ॥ ३ ॥
जो पै कोटिउ तिरथ अन्हाय ।
मन का मैल तबहुँ नहिं जाय ॥ ४ ॥
करै तपस्या तन काँ जारी ।
नाम बिना गै सबै बिगारी ॥ ५ ॥
दूध पियहि तस मूरिहि खाय ।
भावै घर माँ खाय अघाय ॥ ६ ॥
जगजीवन बिस्वास बस राम ।
तेहि कौ सुफल सिद्ध भा काम ॥ ७ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
राम क भजन करहु मन माहीं ।
जीवन जन्म सुफल जग माहीं ॥ १ ॥
भूलहु नाम न तब सुख पाय ।
राम मंत्र सुमिरहु मन लाय ॥ २ ॥
बिनु सुमिरन गति मुक्ति न होय ।
सब्द सत्य कहि भाखत सोय ॥ ३ ॥
सुमिरत ब्रह्मा सुमिरत सेस ।
सुमिरत गौरी और गनेस ॥ ४ ॥
(१) लाभ ।
कर्म भर्म निषेध । १०३
सुमिरत, निस्तु जोति मन जानी ।
निर्गुन निर्मल सो पहिचानी ॥ ५ ॥
जगजीवन सतगुरु कौ ध्यान ।
निसु दिन रहौं चरन लिपटान ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४० ॥
सत मत कहत अहौं सुनाइ ।
तत्त सार बिचार कीन्ह्यौ नाम रटना लाइ ॥ १ ॥
बेद ग्रंथन छानि लीन्ह्यो भर्म नाहिं भुलाइ ।
बैठि दृढ़ ह्वै जुक्ति माहीं आस सब बिसराइ ॥ २ ॥
नाम की गति कहौं कहँ लौं सेस संभू गाइ ।
करत बरनन ब्रह्म मन महँ बेद परगट गाइ ॥ ३ ॥
तीनि त्यागै साध जन कोइ चौथ का घर पाइ ।
जगजीवन गुरु चरन गहि कै बैठु थिर ह्वै जाइ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४१ ॥
मन महँ जाइ फकीरी करना ।
रहै एकांत तंत तें लागा, राग निर्त नहिं सुनना ॥ १ ॥
कथा चारचा पढ़ै सुनै नहिं, नाहिं बहुत बक बोलना ।
ना थिर रहै जहाँ तहँ धावै, यह मन अहै हिंडोलना ॥ २ ॥
मैं तैं गर्ब गुमान बिबादहिं, सबै दूर यह करना ।
सीतल दीन रहै मरि अंतर, गहै नाम की सरना ॥ ३ ॥
जल पषान की करै आस नहिं, आहै सकल भरमना ।
जगजीवन दास निहारि निरखि कै,
गहि रहु गुरु की सरना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४२ ॥
साधो सुमिरहु नाम रसाला ।
१०४ जगजीवन साहब की बानी
बकबादी बेबादी१ निंदक । *
तेहि का मुँह करु काला ॥ १ ॥
साखी सब्द जोरि कै लीन्ह ।
जहाँ तहाँ लै झगरा कीन्ह ॥ २ ॥
भजहीं नाहिं बकहिं अधिकार ।
बाझि रहे माया के जार ॥ ३ ॥
सूकर स्वान बुद्धि तेहिं आइ२ ।
नहिं उद्धार नर्क परै जाइ ॥ ४ ॥
करहीं बहुत गरब अभिमान ।
ता तें बिसरि गयो वह ज्ञान ॥ ५ ॥
भेष अलेख अंत कछु नाहीं ।
तिन तो गर्व करैं मन माहीं ॥ ६ ॥
करि दिनताय नवै सिर नाइ ।
तबहिं सुमति कछु उपजै आइ ॥ ७ ॥
जगजीवन दास देत उपदेस ।
नाम भजहु तब मिटै अँदेस ॥ ८ ॥
॥ शब्द ४३ ॥
अन्तर सुमिरहु नामहीं बिसरावहु नाहीं ।
मूल मंत्र ईहै अहै बसि रहु तेहिं माहीं ॥ १ ॥
देखहु दृष्टि पसारि कै कोऊ थिर नाहीं ।
नीरहिं तें पैदा भये फिर खाक मिलाहीं ॥ २ ॥
कर्म फाँस सब जग पर्यो कोउ छूटत नाहीं ।
छूटे कोउ कोउ दास जन जुक्ती जिन माहीं ॥ ३ ॥
(१) बिवादी । (२) है ।
कर्म भर्म निषेध । ५८५
डोरी पोढ़ि लगाइ कै सतगुरुहिं मिलाहीं ।
जगजीवन अस निरखि कै चरनन लिपटाहीं ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४४ ॥
ए मन नामहिं सुमिरत रहौ ।
परगट भेद न काहू कहौ ॥ १ ॥
परगट कहे नाहिं भल होइ ।
सुमिरन मन तें जाइह खोइ ॥ २ ॥
परपंची निंदक तें दूरी ।
तब सुभ भजन होइ भरपूरी ॥ ३ ॥
बकवादी बीबादी त्यागू ।
सत्त सुकृत नामहिं में लागू ॥ ४ ॥
यहि तें सुख नाहीं अधिकारा ।
कहै पुरान औ ज्ञान बिचारा ॥ ५ ॥
सबहिन कहा पिया सो जिया ।
जिन केहु भक्ति माँगि कै लिया ॥ ६ ॥
सतगुरु के चरनन लिपटाना ।
साधू सोई भे निरबाना ॥ ७ ॥
जगजीवन करि प्रगट बखान ।
गुरु के चरन तजि भजहु न आन ॥ ८ ॥
॥ शब्द ४५ ॥
इत उत आसा देहु त्यागि ।
सत्त सुकृत तें रहहु लागि ॥ १ ॥
मन तुम नाम रटहु रट लाइ ।
रहु सचेत नहिं बिसरि जाइ ॥ २ ॥
१४
१०६ जगजीवन साहब की बानी
काया भीतर तीरथ कोटि।
जानि परत नहिं मन की खोटि ॥ ३ ॥
ठाढ़े बैठे पग चलाइ।
तस पौढ़े¹ चित अनत न जाइ ॥ ४ ॥
रात दिवस धुनि छूटै नाहिं।
ऐसे जपत रहहु मन माहिं ॥ ५ ॥
गगन पवन गहि करहु पयान।
तहवाँ बैठि रहहु निरबान ॥ ६ ॥
गुरु के चरन गहहु लिपटाइ।
निरखहु सूरति सीस उठाइ ॥ ७ ॥
या है ब्यापि रहे सब माहिं।
देखत न्यारा कतहूँ नाहिं ॥ ८ ॥
जगजीवन कहि मथि पुरान।
यहि तैं सत मत और न आन ॥ ९ ॥
॥ समाप्त ॥
(१) लेटे।
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