हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
हित चौरासी • • १८६
ये हैं वे दृग चापि (विशेष आँखें) जिनसे लालजी का मन मृग बेधा गया-
वह चितवनि औरै कछू जेहिं बस होत सुजान।
अस्तु; यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि ऐसी कितनी ही उपमाएँ हैं,
जहाँ उपमा और उपमेय दोनों को एकत्र करने की आवश्यकता नहीं रहती।
केवल एक के ही रख देने से दोनों का काम चल जाता है।
देखिये-
नेत्रान्तस्ते विकीर्णाद्भुत कुसुम धनुश्चण्ड सत्काण्ड कोटिः।
- श्रीराधा सुधा निधि
अर्थात् "आपके नेत्र कोणों से पुष्प धन्वा कामदेव के कोटि कोटि प्रचण्ड
शर विखरते रहते हैं।"
यहाँ केवल 'कुसुम धनुः तो वताया किन्तु वाणों का विशेषण 'चण्ड' और
संख्या सत्काण्ड कोटि' कहकर सङ्केत कर दिया गया। इसी प्रकार हित चौरासी
के इक्यावनवें पद में केवल बहुत सी उपमाएँ दी गयी हैं उपमेय का पता तक
नहीं है पर वे सब उपमेय उपमाओं के सहारे पकड़ में आ जाते हैं,
नव नारंग कनक हीरावलि विद्युत सरस जलज मनि गोरी।
पूरित रस पीयूष जुगल घट कमल कदलि खंजन की जोरी ।।
कहने का तात्पर्य यह कि "चापि" का विशेष (खास) ऐसा अर्थ लेकर
पंक्ति का अर्थ करने से कोई खास आपत्ति नहीं आती। जैसी कि चापि का वाण
अर्थ लेने में आती है।
कहीं कहीं 'चापि' का अर्थ चँपा कर या चाँप (दबा) कर ऐसा लिया गया
है और सम्पूर्ण पङ्क्ति को यों बिठाया गया है-
अपनी भृकुटि धनुषों से दृग [रूपी वाण] दबाकर (चँपाकर) वे (प्रियाजी)
वलात्कार पूर्वक (लालजी के) मानस मृग का वेधन कर रही हैं।
यहाँ दृगों को वाण माना गया है; चूँकि वाण के लिये कोई शब्द नहीं है।
'चापि' का दबाकर अर्थ भी उपयुक्त है पर चापि का वाण पर्याय तो कुछ जँचता
ही नहीं। जिन्होंने चापि का पर्याय वाण लिखा; तो क्यों लिखा? वही जानें।
१६० • • हित चौरासी
- ५८ -
अवतरण - शरद् की सुहावनी रात्रियों में जब प्रिया प्रियतम के मिलन
की सुख घड़ियाँ हों, नायक का मन मसोस देने वाले नायिका मान की कल्पना
भी कितनी दुःख प्रद है; रसज्ञ जन जानते हैं। आज श्रीप्रियाजी मानवती हैं।
हित सखी जी मनाते मनाते थक सी गयी हैं। उन्होंने लाख प्रयत्न किये पर
प्रियाजी का मान न टूटा, अन्त में कहना पड़ा-“राधिके ! जानती हो इस मान
का परिणाम क्या होगा ? मैंने जो तुमसे प्रियतम की दशा कही है, उसे केवल
दूती के उद्दीपन वाक्य समझ कर टाल रही हो ! वे तो तुम्हारे बिना अपने
जीवन और यौवन को भी नगण्य मान बैठे हैं-उनसे उदास हो चुके हैं। जाकर
तुम्हारे न आने का सन्देश कहने का विलम्ब है। फिर क्या होगा..... ?”
सखी अञ्चल में मुँह ढाँप फफक कर रो पड़ी। अब मानिनि ने समझी,
बड़ी देर में वस्तु स्थिति। तब कहीं मान टूटा।
श्रीहित सखी ने कहा श्रीराधा मानिनि से-
गौरी
मूल-तेरे हित लैन आई, धंन ते स्याम पठाई;
हरति कामिनि घन कदन काम कौ।
काहे कौं करत बाधा, सुनि री चतुर राधा;
भैंटि कैं मैंटि री माई प्रगट जगत भौ।।
देखि री रजनी नीकी, रचना रुचिर पी की;
पुलिन नलिन नभ उदित रौंहिनी धौ।
तू तौऽब सयानी; तैं मेरी एकौ न मानी;
हौं तोसौं कहत हारी जुवति जुगति सौं।।
मोंहनलाल छबीलौ, अपने रंग रँगीलौ;
मोहत विहंग पसु मधुर मुरली रौ।
वे तौऽब गनत तन जीवन जौवन तब;
(जै श्री) हित हरिवंश हरि भजहि भामिनि जौ।।५८।।
हित चौरासी • • १६१
भावार्थ-(हित सखी ने कहा-) "हे कामिनि ! मैं तो केवल तेरे ही कारण
(प्रेम वश) तुझे लेने आयी हूँ; मुझे श्याम सुन्दर ने वन से यहाँ भेजा है, तब आप
अब चल कर काम की सघन पीड़ा का हरण क्यों नहीं करतीं ? अरी चतुर
राधा ! सुन तो सही, (तू ये) अकारण (व्यर्थ) बाधाएँ क्यों उपस्थित करती है ?
सखी ! श्रीलालजी से मिलकर जगत् के भय को प्रकट रूप से मिटा डाल ।
अरी ! देख तो सही, कैसी सुन्दर रास रचना प्रियतम ने की है, कितनी नीकी
रात है ? यमुना पुलिन पर कमल खिल रहे हैं और आकाश में रोहिणी पति
चन्द्रमा भी उदित है। सखी ! वैसे तो तू बड़ी सयानी (चतुर) है पर तूने आज
मेरी एक न मानी ! अरी युवति ! मैं तो सौ सौ युक्तियों के साथ (वे बातें) तुझसे
कह कर हार गयी।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र (सखी भाव से) कहते हैं-"हे भामिनि ! मोहन लाल
एक तो छबीले हैं दूसरे अपने रङ्ग में रँगीले भी; तिस पर फिर वे मुरली के मधुर
स्वर से पशु पक्षियों तक को भी मुग्ध (मोहित) करने वाले हैं। यदि तुम आज
चलकर उनका सेवन करोगी तो ही वे अब अपने जीवन और यौवन को कुछ
गिनेंगे, (कुछ समझ कर रखना चाहेंगे;) अन्यथा नहीं ।
टिप्पणी-
हरि भजहि भामिनि जौ
यहाँ भजहि का भावार्थ 'सेवन करना' ऐसा है; भजन पूजन नहीं। यह
शब्द भज् सेवायाम् धातु से बना है अतः सेवन करने का तात्पर्य है यहाँ,
प्रियतम को रस दान पूर्वक मिलन सुख देने से।
इस रस विलास प्रकरण में भजन क्रिया का लक्षण कुछ और है। श्रीप्रियाजी
प्रियतम का भजन करें इसका अर्थ है वे चलकर उनकी विरह ज्वाला, काम
पीड़ा शान्त करें।
फिर जब मिलन होकर परस्पर में-
सरस गति हास परिहास आवेस बस,
दलित दल मदन बल कोक रस कामिनी।
१६२ • • हित चौरासी
(जै श्री) हित हरिवंश सुनि लाल लावन्य भिदे,
प्रिया अति सूर सुख सुरत संग्रामिनी॥
क्रीड़ा प्रारम्भ होती है, तब इस रस विलास प्रकरण का भजन समझा
जाता है-भजन क्रिया सम्पन्न होती है।
- ५९ -
अवतरण-अब एक सैद्धान्तिक पद के द्वारा जगत् मिथ्यात्व प्रकाश के
साथ श्रीश्यामा श्याम के चरणों की सत्यता का निरूपण करते हैं। इन सत्य
स्वरूप चरणों की सत्यता चरणों की प्राप्ति में श्रीश्यामा श्याम के तदीय जन ही
प्रधान हेतु है अतएव उनका ही चरणाश्रय महान् और उचित है तथा इस काल
व्याल ग्रस्त जगत् से छुड़ा लेने वाला है।
अब जो लोग अपने मन को अनेकों स्थानों में नचाते किन्तु युगल
सरकार में नहीं लगाते वे कितनी बड़ी भूल कर रहे हैं। उनकी न तो कहीं
स्थिति है और न वे सुखी ही हैं। क्योंकि सच्चा सुख तो युगल किशोर के रसिक
जनों के श्रीचरणों में है और वही मुमुक्षु जनों के लिये आश्रय ग्रहण करने योग्य
हैं। श्रीहिताचार्य्य चरण इस पद में इसी सिद्धान्त का निरूपण कर रहे हैं-
गौरी
मूल-यह जु एक मन बहुत ठौर करि, कहु कौनें सचु पायौ।
जहँ तहँ विपत्ति जार जुवती लौं, प्रगट पिंगला गायौ॥
द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि, परत कौन पै धायौ।
कहिधौं कौन अंक पर राखै, जौ गनिका सुत जायौ॥
(जै श्री) हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ।
यह जिय जानि स्याम स्यामा पद कमल संगि सिर नायौ॥५९॥
[यह पद ओरछे के स्वनाम धन्य पण्डित प्रवर श्री हरिराम जी 'व्यास'
के प्रश्न के उत्तर में कहा गया था, जिससे प्रभावित होकर व्यासजी श्री
आचार्यपाद के शिष्य हो गये। इसी पर उन्होंने कहा है-श्रीहरिवंश कृपा करी,
मिटे व्यास के संस ।।]
हित चौरासी • • १६३
भावार्थ - इस एक मन को बहुत स्थानों पर लगाकर कहो किसने सुख
पाया ? उस (बहुत जगह मन को नचाने वाले) को तो जार युवती (व्यभिचारिणी)
की भाँति जहाँ तहाँ दुःख ही दुःख है, पिङ्गला वेश्या ने इसका स्पष्ट गान किया
है। दो घोड़ों को एक साथ जोड़ कर भला हठ पूर्वक उन दोनों के ऊपर कौन
बैठ कर उन्हें दौड़ा सकता है ? तुम्हीं बताओ गणिका से उत्पन्न पुत्र को कौन
पिता अपनी गोद में ले (अर्थात् वह किसका पुत्र कहा जाय ?)
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं यह विश्व प्रपञ्च एक दम झूठा
है-असत् है और काल सर्प से ग्रसित है (अर्थात् अवश्य विनाशी है;) ऐसा
अपने हृदय में समझ कर मैंने श्रीश्यामा श्याम पद कमल सङ्गी-रसिक भक्त
जनों को अपना मस्तक झुका दिया अर्थात् उनके प्रति समर्पण पूर्वक मैंने
उनका ही एक मात्र चरणाश्रय ग्रहण किया है।
टिप्पणी-
"प्रगट पिंगला गायौ"
सुख मन की एकाग्रता में है, इधर उधर भटकाने में नहीं। पिङ्गला नाम
की वेश्या अमलात्मा ब्रह्म ज्ञानियों की नगरी विदेह नगरी जनक पुर की निवासिनि
होकर भी वेश्या वृत्ति से जीवन यापन करती थी। वह अपने सुख रूप आत्म
तत्व को न जान कर पर पुरुषों में सुख ढूँढ़ती थी। एक दिन वह व्यभिचारिणी
अर्ध रात्रि तक अनेक पुरुषों की प्रतीक्षा करती रही पर उस दिन उसके पास
कोई भी न आया, तब वह बहुत दुःखी और निराश हुई। अब उसे अपने सुख
रूप आत्मा का ध्यान हुआ। उसने इसी शोक अज्ञान ओर भूल के लिये जो
पश्चात्ताप किया है, वह पिङ्गला गीत के नाम से श्रीमद्भागवत में वर्णित है उसे
हम यहाँ अविकल रूप में उद्धृत करते हैं उस पिङ्गला ने कहा-
अहो मे मोह विततिं पश्यता विजितात्मनः।
या कान्तादसत: कामं कामये येन वालिशा।।
सन्तं समीपे रमणं रति प्रदं,
वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय।
अकामदं दुःख भयाधि शोक,
मोह प्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा।।
अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा
साङ्केत्य वृत्याति विगर्ह्य वार्त्तया।
स्त्रैणन्नराद्यार्थ तृषोऽनुशोच्या-
-त्क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती।।
यदास्थिभिर्निर्मित वंश वंश्य
स्थूणं त्वचा रोम नखैः पिनद्धम्।
क्षरन्नवद्वारमगार मेत-
द्विण्मूत्र पूर्णं मदुपैति कान्या।।
विदेहानां पुरे ह्यास्मिन्नहमेकैव मूढ़ धीः।
यान्यमिच्छन्त्यस्मादात्मदात्काममच्युतात्।।
सुहृत्प्रेष्ठ तमो नाथ आत्माचायं शरीरिणाम्।
तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा।।
कियत्प्रियं ते व्यभजन्कामा ये कामदा नराः।
आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा काल विद्रुताः।।
नूनं मे भगवान्प्रीतो विष्णुः केनापि कर्मणा।
निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जातः सुखावहः।।
मैवं स्युर्मन्द भाग्यायाः क्लेशा निर्वेद हेतवः।
येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुषः शममृच्छति।।
तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्य सङ्गताः।
त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्वरम्।।
सन्तुष्टा श्रद्धधत्येतद्यथा लाभेन जीवती।
विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै।।
संसार कूपे पतितं विषयै र्मुषिते क्षणम्।
ग्रस्तं कालाहिनात्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्वरः।।
आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात्।
अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत्।।
श्रीमद्भागवत स्क०११अ०८ श्लोक ३० से ४२ तक
हित चौरासी • • १६५
अर्थात् (पिङ्गला ने कहा-) "अहो ! मुझ इन्द्रिय परायणा के मोह का
विस्तार तो देखो, जो मैं मूर्खा इन तुच्छ एवं असद्बुद्धि कामियों से सुख की
कामना करती हूँ। अरे ! मैं बड़ी बुद्धिहीन हूँ, जो अपने समीप ही रमण करने वाले
तथा नित्य रति और धन के देने वाले इन प्रियतम सत्पुरुष परमेश्वर को छोड़
कर कामना पूर्ति में असमर्थ तथा दुःख, भय, राग शोक और मोह आदि देने
वाले इन तुच्छ पुरुषों को भजती हूँ। अहो! मैंने इस अति निन्दनीय
आजीविका-वेश्यावृत्ति से व्यर्थ ही अपने आत्मा को तपाया। हाय ! मैं इन स्त्री
लम्पट, अर्थ लोलुप और अनुशोचनीय पुरुषों द्वारा खरीदे हुए शरीर से रति
और धन की इच्छा करती थी। जो अस्थिमय टेढ़े तिरछे बाँसों एवं थूनियों से
बना है, त्वचा, रोम और नखों से पूर्ण है तथा नाशवान भी है। मल और मूत्र से
तो भरा ही है। जो नव द्वारों वाला घर रूप देह है उसका मेरे सिवाय और कौन
सेवन करेगी। इस विदेह नगरी में एक मैं ही ऐसी मूर्खा और दुष्टा हूँ, जो इन
आत्म प्रद अच्युत परमात्मा को छोड़ कर किसी अन्य से अपनी कामना पूर्ण
कराना चाहती हूँ। ये सब शरीर धारियों के सुहृद, प्रियतम, स्वामी और आत्मा हैं;
अब मैं इनके ही हाथ बिककर लक्ष्मीजी के समान इन्हीं के साथ रमण करुँगी।"
(फिर वह अपने आप को सम्बोधन करके कहने लगी-) "अरी ! ये जो
भोग और भोगों के देने वाले पुरुष हैं इन्होंने तेरा कितना प्रिय साधन किया ?
अथवा और भी आदि अन्त वाले पुरुष तथा काल से भयभीत देव गण हैं वे भी
अपनी स्त्रियों को कितना सन्तुष्ट कर पाते हैं ? अवश्य ही मेरे किसी शुभकर्म
से श्रीभगवान् प्रसन्न हुए हैं, जिससे कि इस दुराशा से मुझको ऐसा सुखकारक
वैराग्य उत्पन्न हुआ है। यदि मेरा भाग्य मन्द होता तो मुझको ये कष्ट न उठाने
पड़ते जो वैराग्य के हेतु हैं; जिसके द्वारा जीव गृह आदि के बन्धनों को काटकर
शान्ति लाभ करता है, अतः अब मैं इस उपकार को शिरोधार्य कर विषय
जनित दुराशा को छोड़ उस जगदीश्वर की ही शरण में जाती हूँ। अब मैं
सन्तोष और श्रद्धा पूर्वक प्रारब्ध वश जो कुछ मिलेगा उसी से जीवन निर्वाह
करंती हुई इस आत्म रूप प्रियतम (रमण) के साथ ही विहार करूँगी। संसार
कूप में पड़े हुए विषय वासनाओं से नष्ट दृष्टि और काल रूपी सर्प से डसे हुए
इस आत्मा (जीव) की रक्षा केवल परमात्मा को छोड़ कर और कर ही कौन
१६६ • • हित चौरासी
सकता है ? जिस समय जीव सम्पूर्ण विषयों से उपरत हो जाता है, उस समय
वह स्वयं ही अपना रक्षक हो जाता है, अतः प्रमाद रहित होकर इस जगत को
निरन्तर काल रूपी सर्प से ग्रस्त हुआ देखे।”
अस्तु; उक्त उद्धरण में बहुत स्पष्ट है कि पिङ्गला ने अपने मन को
अनेकों जारों में लगाकर अशान्त बना डाला और पश्चात् उपरत होकर उसने
उस मन को अपने आत्मा में एक जगह स्थिर किया तब सुखी हुई। उसके मन
की एकाग्रता ही सुख का कारण बनी।
इस एक उदाहरण से प्रत्येक बहुमुखी मन वाले साधक, उपासकों को
उपदेश किया गया है जो युगल किशोर किंवा अपने किन्ही भी इष्ट देव की
उपासना प्रेम मार्ग से करना चाहते हैं; वे अपने मन को बखेरें नहीं वरं एकत्र
करके-सँमेट कर उसे अविचल भाव से अपने प्रभु के चरणों से बाँध दें।
(२) टिप्पणी-
द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि परत कौन पै धायौ।
कहिधौं कौन अंक पर राखै जो गनिका सुत जायौ।।
जैसे दो घोड़ों पर कोई एक साथ नहीं बैठ सकता, इसी प्रकार अनेक
स्थानों पर मन भी एक साथ नहीं लगाया जा सकता अर्थात् परमार्थ और
संसार दोनों एक साथ नहीं हो सकते सादृश्यता से। किसी एक का महत्व तो
कम होगा ही। यह संसार और संसार की वस्तुओं में मन का लगाना ही परमार्थ
या प्रेम पथ का व्यभिचार है। मन को इस व्यभिचार वृत्ति से निकाल कर एक
निष्ठ करना होगा।
व्यभिचारी मन गणिका के बेटे की तरह है। गणिका पुत्र किस बाप का
बेटा है निश्चित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार अनेक देवी देवताओं का
उपासक वास्तव में किस एक देवता का है क्या पता? ऐसी दशा में जबकि वह
एक साथ अनेकों का है, उसका मन भी अविचल भाव से एक किसी में नहीं
लग सकता।
हित चौरासी • • १६७
अब विचारणीय यह है कि इस एक मन को अनन्य भावेन कहाँ स्थिर
रूप से लगा देना चाहिये और कहाँ नहीं ? दो वस्तुएँ सामने हैं एक काल सर्प
ग्रसित संसार और दूसरे नित्य विहारी प्रेम स्वरूप श्रीराधावल्लभ। इसका उत्तर
श्रीहिताचार्य पाद इसी पद की अन्तिम दो पङ्क्तियों में दे रहे हैं-
हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ।
यह जिय जानि स्याम स्यामा पद कमल संगि सिर नायौ।।
श्रीश्यामा श्याम के चरण कमल सङ्गियों का ही सङ्ग करना जीव का
परम धर्म है। इसे प्राप्त करके वह मानो श्यामा श्याम का प्रेम पा गया। अतः
विश्व प्रपञ्च की स्मृति भुलाकर अनन्य भाव से केवल हित मय श्रीराधा
वल्लभलाल का ही हो रहे।
- ६० -
अवतरण- श्रीप्रियाजी का रूप सौन्दर्य एक अपार और अथाह सागर
है किंवा सुमेरु गिरि है अथवा वह अवर्णनीय वस्तु है जिसका पार कोई और तो
कहकर पावेगा ही क्यों स्वयं अखिल लोक नायक, रसिक चूड़ामणि,परात्पर
ब्रह्म, अनन्त शक्ति भगवान्-श्रीकृष्ण भी नहीं पा सकते। वे केवल उनके रूप
को देखा करते हैं, अनिमेष भाव से चकोरवत् किन्तु तृप्ति होती ही नहीं। वे
अनन्त रूप होकर उस मुख माधुरी का पान करना चाहते हैं। वे दर्शन के समय
पलकों का गिरना भी सह नहीं सकते, कोटि कोटि कल्पों के समान मानते हैं
एक पलक मात्र को। स्वयं श्रीलालजी इस पद में अपने हृदय एवं नेत्रों की
प्रेमाकुल, रूपाकुल दशा का वर्णन करते हैं श्रीहिताचार्य पाद के शब्दों में-
गौरी
मूल-कहा कहौं इन नैननि की बात।
ये अलि प्रिया वदन अंबुज रस अटके अनत न जात।।
जब जब रुकत पलक संपुट लट अति आतुर अकुलात।
लंपट लव निमेष अंतर ते अलप कलप सत सात।।
श्रुति पर कंज दृगंजन कुच बिच मृग मद है न समात।
( जै श्री ) हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात।।६०।।
१६८ • • हित चौरासी
भावार्थ - (श्रीलालजी अपनी प्रिय सखी हित सजनी से कहते हैं-
"सखी !) मैं अपने इन नयनों की क्या बात कहूँ ? ये मेरे नयन भ्रमर श्रीप्रिया
मुख कमल के रस में अटक कर अब अन्यत्र कहीं जाते ही नहीं। जब जब
कभी ये नयन पलक सम्पुट में अलक लटों के कारण अन्तराय (विक्षेप) प्राप्त
करते हैं; तब तब अत्यन्त आतुर होकर घबरा उठते हैं। ये रस लोलुप (नेत्र)
लव निमेष काल के अन्तर से भी कम अन्तर को सैकड़ों सैकड़ों कल्पों के
समान अनुभव करते हैं।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (श्रीलालजी के नयन श्रीप्रियाजी के)
कानों में कमल (आभूषण बनकर) आँखों में अञ्जन और कुचों के बीच में मृग
मद बन कर भी नहीं समाते) अर्थात् शान्ति तो पाते नहीं वरं उनके हृदय में रूप
और प्रेम की तृषा बढ़ती ही रहती है।) इसलिये श्याम वपु श्रीलालजी उनकी
नाभि सरोवर के जलचर मीन बन जाने की याचना कर रहे हैं; (ताकि निरन्तर
मीन वृत्ति से श्रीप्रियाजी का रूप रस पान करने के लिये मिला करे, वह मेरा
जीवन ही बन गया।)
टिप्पणी-जिस अपार रूप ने श्रीलालजी को परवश कर दिया है, उसकी
एक दिशा की ओर श्रीहित ध्रुवदास जी सङ्केत कर रहे हैं; क्योंकि समग्रता से
कहने के लिये तो कोई समर्थ ही नहीं। वे कहते हैं-
प्यारीजू की मुसकनि, बीजुरी सी कौंधि जाति;
प्यारेजू के उर ते न रेखा सी टरति है।
भरि भरि आवैं नैन, कैसेहूँ न पावैं चैन;
बान की सी अनी हियैं खरक्यौ करति हैं।।
लाड़िली नवेली अलबेली खानि माधुरी की;
सहज सुभाइनि में सर्वसु हरति है।
'हित ध्रुव' नये नये छवि के तरंग उठैं;
रीझि सीस चन्द्रिका जु पगुनु ढरति है।
इस अपार रूप को देख देख कर प्रियतम श्याम सुन्दर की क्या दशा हो
जाती है वह भी देखिये-
हित चौरासी • • १६६.
ज्यों ज्यों लाल देखैं मुख नैननि कौं तृषा होति;
प्यारीजू कौ रूप मानौं प्यास ही कौ रूप है।
डीठि डीठि रही मिलि जैसें एक धारा ध्रुव;
हौंहू भूली देखि दसा अतिही अनूप है॥
कौन रस स्वाद गह्यौ कैसेहूँ न जात कह्यौ;
जानत न छाँह अरु कैसी होत धूप है।
और सुख जेते सब भये हैं पतंग रस-
राज के सुखनि पर प्रेम भान भूप है॥
इसी अनूप रूप पर इस रसोपासना की भिति खड़ी है-
नैन पगनि चलिबौ तहाँ जौं ध्रुव बनहि तौ जाइ॥
- ६१ -
अवतरण - आज श्रीश्याम सुन्दर एवं श्रीप्रियाजी अपने समस्त वृन्दावन
परिकर सहचरियों के साथ रास क्रीड़ा कर रहे हैं। इन रास परायण श्रीलाल
की छबि का ही इस पद में वर्णन है-
गौरी
मूल-आजु सखी बन में जु बने प्रभु नाचत हैं ब्रज मंडन।
वैस किसोर जुवति अंसनु पर दियें विमल भुज दंडन॥
कोंमल कुटिल अलक सुठि सोभित अवलंबित जुग गंडन।
मानहु मधुप थकित रस लंपट नील कमल के खंडन॥
हास विलास हरत सबकौ मन काम समूह विहंडन।
(जै श्री) हित हरिवंश करत अपनौ जस प्रकट अखिल ब्रह्मंडन॥६१॥
भावार्थ- (श्रीहित अलि ने कहा-)"हे सखी ! आज नव किशोर ब्रज
भूषण प्रभु श्रीश्याम सुन्दर तरुणि गणों के कन्धों पर अपने विमल वाहु दण्डों
को रखे बन ठन कर वृन्दावन में नाच रहे हैं। उनके दोनों गालों का सहारा लिये
कोमल, घुँघराली और काली काली अलकावली बड़ी सुन्दर शोभा पा रही है।
(ऐसा ज्ञात होता है) मानो रस लम्पट मधुप गण नील कमल के दलों पर (या
कोष पर) लुभा कर अटक गये हैं।"
२०० • • हित चौरासी
"सखी ! वे लालजी अपने हास विलास से सबके मनों का हरण करते
हुए काम समूह को तो मानों तितर वित्तर किये दे रहे हैं। (श्रीहित हरिवंशचन्द्र
महाप्रभु कहते हैं) इस प्रकार वे अपना यश समस्त ब्रह्माण्डों में प्रकट कर रहे हैं।"
– ६२ –
अवतरण—इस पद में केवल ललिता आदि आठ प्रधान सखियों के
साथ युगल सरकार के रास नृत्य का वर्णन है। अन्य सखियाँ सम्मिलित नहीं
है। वे केवल दर्शिका हैं। रास नृत्य का वर्णन श्रीहित सखी अपनी सखियों से
कर रही हैं-
गौरी
मूल- खेलत रास दुलहिनी दूलहु।
सुनहु न सखी सहित ललितादिक,
निरखि निरखि नैननि किन फूलहु॥
अति कल मधुर महा मौहन धुनि,
उपजत हंस सुताः के कूलहु।
थेई थेई वचन मिथुन मुख निसरत,
सुनि सुनि देह दसा किन भूलहु॥
मृदु पद न्यास उठत कुंकुम रज,
अद्भुत बहत समीर दुकूलहु।
कबहुँ स्याम स्यामा दसनांचल-
कच कुच हार छुवत भुज मूलहु॥
अति लावन्य, रूप, अभिनय, गुन,
नाहिन कोटि काम समतूलहु।
भृकुटि विलास हास रस बरषत
(जै श्री) हित हरिवंश प्रेम रस झूलहु॥६२॥
भावार्थ – "हे सखियो ! सुनो न ! ललिता आदिक सखियों के सहित
दुलहिनि श्रीराधा और दूलह श्रीलालजी रास क्रीड़ा कर रहे हैं। अरी ! तुम सब
हित चौरासी • • २०१
उस रास को अपने नेत्रों देखकर फूल उठो न-परम प्रसन्न हो जाओ ! उस
रास में, सूर्य कन्या यमुना के पुलिन पर अत्यन्त सुन्दर मधुर एवं महा मोहन
ध्वनि (कङ्कण किङ्किणि, नूपुर, वंशी, ताल, रबाब, मुरज, मृदङ्ग आदि बाजों
की) प्रकट हो रही है। दोनों (दुलहिनि एवं दूलह) के मुखों से 'थेई थेई' वचन
उच्चरित होते हैं, उन्हें सुन सुन कर तुम अपनी देह सुधि क्यों नहीं भूल रही हो
अर्थात् भूल रही हो, क्योंकि रास अत्युत्तम है न !"
(रास नृत्य के समय) "मृदु पद न्यास (पैर पटकने) से केशर की धूल
(ऊपर आकाश में) उठ रही है और वायु प्रवाह से वस्त्र भी (किसी रस पूर्ण)
अद्भुत गति से फहरा रहे हैं; [ अथवा यमुना के दोनों कूलों में अद्भुत रीति से
समीर बह रहा है।] कभी-कभी श्याम श्यामा के अधर, केश, उरोज हार एवं
भुजमूल को छू देते हैं।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी भाव से) कहते हैं-' 'सखियों! दोनों
के अत्यन्त लावण्य रूप अभिनय एवं गुणों की समता में कोटि-कोटि काम भी
नहीं हैं।""
(अब श्रीहित सखी युगल किशोर के प्रति कहती हैं) "हे रसिक युगल
किशोर ! आप इसी प्रकार अपनी भृकुटियों के नर्तन पूर्वक हास विलास रस
का वर्षण करते हुए (सदा) प्रेम रस में झूलिये।
– ६३ –
अवतरण-श्रीमद्भागवत के अन्तर्गत रास पञ्चाध्यायी के प्रारम्भिक
अध्याय में वर्णन आता है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया का आश्रय
लेकर रास रसोत्सव करने की इच्छा की। यह उनका आत्म रमण था। श्रीशुकदेव
जी कहते हैं-
भगवानपि ता रात्रीः शरदत्फुल्ल मल्लिका।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥
श्रीमद्भाग० १०/२९/१
२०२ • • हित चौरासी
अर्थात् “परीक्षित् ! जिन रात्रियों में मल्लिका के फूल खिल उठे थे, शरद्
काल की उन श्रेष्ठ रात्रियों को देखकर भगवान् ने भी योगमाया का आश्रय
लेकर रमण करने की इच्छा की।”
भगवान् के इच्छा करते ही सम्पूर्ण अनुकूल वातावरण तत्काल तैयार हो
गया। चन्द्र देव अपनी सुधा रश्मियों से श्रीवन को अनुरञ्जित करते हुए उदित
हो आये, जिससे दिशाएँ विदिशाएँ लाल लाल रङ्ग से जगमगा उठी, उस समय
ऐसा प्रतीत हुआ मानो यह अरुणिम बाल चन्द्र अपनी प्रिया से फाग खेलकर
मुख में गुलाल मर्षण किये उठ चला आया है। चन्द्रोदय से वन की समस्त
लताएँ, ओषधियाँ वृक्ष, विटप, तरु जीवन-रस पाकर लहलहा उठे, लताएँ
फूल गयीं। फूलों से सौरभ उधार लेकर पवन उसे ले चला पर भार अधिक
होने से धीरे-धीरे ही चलता रहा। उसने समस्त वन को सौरभ से भर दिया।
धीरे धीरे चन्द्र देव गगन में आगे बढ़े। प्रकाश और भी उज्ज्वल धवल हुआ।
अब तो मानों उनकी किरण डोरियों से एक रश्मि वितान सा तन गया।
तब मन मोहन ने अपनी प्रेम राग-गायिका मनोहर मुरली को अधरों से
लगाया। वह अधर सुधा का पान करके मुग्ध कण्ठ से गा उठी मद-विह्वल-कारी
मीठी तान। उसे सुना ब्रज की प्रेम मयी बालाओं ने। वे तान की डोर से बँधी
श्याम सुन्दर के पास आयीं। फिर आगे क्या क्या हुआ वह सब श्रीहिताचार्य्य
चरण बता रहे हैं-
गौरी
मूल-मोहन मदन त्रिभंगी।
मोहन मुनि मन रंगी।।
मोहन मुनि सघन प्रगट परमानँद गुन गंभीर गुपाला।
सीस किरीट श्रवन मनि कुंडल उर मंडित बन माला।।
पीतांबर तन धातु विचित्रित कल किंकिनि कटि चंगी।
नख मनि तरनि चरन सरसीरुह मोहन मदन त्रिभंगी।।
मोहन बैंनु बजावै।
इहिं रव नारि बुलावै।।
हित चौरासी • • २०३
आई ब्रज नारि सुनत बंसी रव गृह पति बंधु विसारे।
दरसन मदन गुपाल मनोहर मनसिज ताप निवारे॥
हरषित वदन बंक अवलोकनि सरस मधुर धुनि गावै।
मधुमय स्याँम समान अधर धरैं मोहन बैनु बजावै॥
रास रच्यौ बन माँही।
विमल कलप तरु छाँहीं॥
विमल कलपतरु तीर सुपेशल सरद रैन वर चंदा।
सीतल मंद सुगंध पवन बहै तहाँ खेलत नंद नंदा॥
अदभुत ताल मृदंग मनोहर किंकिनि शब्द कराहीं।
जमुना पुलिन रसिक रस सागर रास रच्यौ बन माँही॥
देखत मधुकर केली।
मोहे खग मृग बेली॥
मोहे मृगधैनु सहित सुर सुंदरि प्रेम मगन पट छूटे।
उडगन चकित थकित ससि मंडल कोटि मदन मन लूटे॥
अधर पान परिरंभन अति रस आनँद मगन सहेली।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक सचु पावत देखत मधुकर केली॥६३॥
भावार्थ—मोहन मदन का भी संमोहन करने वाले ललित त्रिभङ्गी है, वे
मुनियों के भी मन को आनन्दित करने वाले हैं। ये मुनि मन मोहन गोपाल गुणों
में गम्भीर और परम आनन्द की प्रकट रूप से श्रेष्ठ घनीभूत मूर्त्ति हैं। अहो !
उनके मस्तक पर किरीट, कानों में मणिमय कुण्डल और वक्षस्थल पर वनमाला
शोभित है एवं सुन्दर कटि देश पर मधुर करधनी विराज रही है। कमल जैसे
चरणों के नख सूर्यकान्त मणि की भाँति जगमगा रहे हैं, ऐसे सुन्दर हैं ये मोहन
मदन त्रिभङ्गी।
वे मन मोहन मुग्ध करने वाली वंशी बजा रहे हैं और वंशी के मीठे स्वर
से (ब्रज) नारियों को बुला रहे हैं। उस वंशी का मधुर स्वर सुनते ही ब्रज नारियाँ
अपने अपने घर, पति, एवं बंधुओं (कुटम्बीजनों) को भूलकर (मोहन के पास)
आ गयीं। उन्होंने मनोहर मदन गोपाल का दर्शन करके काम ताप का निवारण
किया। (ब्रज बालाओं ने दर्शन किया कि श्याम सुन्दर अपने) प्रसन्न वदन हैं,
२०४ • • हित चौरासी
उनकी चितवन कुछ तिरछी अवलोकन से युक्त है और वे सरस तथा मधुर
ध्वनि से वंशी में कुछ गा रहे हैं। इस तरह ये मधुमय श्याम सुन्दर मोहन वेणु
को अपने अधरों पर समान रूप से धारण किये बजा रहे हैं।
अब उन्होंने वृन्दावन के विमल कल्पवृक्ष के नीचे रास रचना की। एक
तो पवित्र कल्पतरु, दूसरे यमुना का सुन्दर तट, शारदीय रात्रि, और तिस पर
परम सुन्दर चन्द्रदेव। शीतल और सुगन्ध पूर्ण पवन मन्द मन्द बह रहा है ऐसे
रम्य स्थल में नन्द नन्दन रास खेल रहे हैं। उस रास में अद्भुत ताल और
मनोहर मृदङ्गों के साथ किङ्किणियाँ भी मधुर और मनोहर शब्द कर रही हैं।
श्रीवृन्दावन यमुना पुलिन पर रसिक नन्द नन्दन ने इस रस सागर रास की
रचना की है।
इस केलि को, मधु पान करने वाले रसिक भ्रमर देख रहे हैं और उस पर
पशु पक्षी, लता वेलि सभी मुग्ध हैं। इन मोहित मृग और धेनुओं के साथ सुर
नारियाँ भी मोहित हो गयीं और प्रेम मग्न हो जाने के कारण उनके वस्त्र आदि
भी (छूट छूट कर) अङ्गों से खिसकने लगे। आकाश में तारागण (रास देखकर)
चकित हो गये, चन्द्र मण्डल थकित हो गया। और कोटि कोटि काम देवों के
मन भी लूट लिये मन मोहन ने। आनन्द मग्न हो गयीं सहेलियाँ, अधरामृत के
पान एवं आलिङ्गन के अत्यन्त रस से।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि इस मधुकर केलि (अर्थात्
रसिक भ्रमर रूप श्रीलालजी की रास क्रीड़ा) को देखकर रसिक (इस दिव्य
रस के आस्वादन करने वाले रसिक प्रेमी जन किंवा सखियाँ, वृन्दावन का
परिकर आदि) सुख पा रहे हैं।
टिप्पणी—यह श्रीमद्भागवत वर्णित रास पञ्चाध्यायी के भावों से तो मिलता
ही है अपितु कहीं कहीं तो श्लोकों के शब्दार्थ और उनकी शृङ्खला तक पायी
जाती है। इससे कहा जा सकता है कि इसमें श्रीहिताचार्य्य पाद ने नित्य रास
का नहीं वरं महारास का वर्णन किया है किन्तु श्रीमद्भागवत के महारास और
आचार्य्य वर्णित इस पद में एक अन्तर यह है कि श्रीमद्भागवत में अनेक
गोपियों के साथ श्रीकृष्ण ने अनेक रूप धारण किये हैं पर यहाँ श्रीकृष्ण केवल
हित चौरासी • • २०५
एक राधा प्रियतम ही हैं। इसका कारण यह है कि आचार्य्य पाद के इष्टाराध्य
श्रीराधावल्लभ लाल—श्रीकृष्ण, एक नारी व्रती पति और दक्षिण नायक है
किन्तु श्रीमद्भागवत के श्रीकृष्ण जार, उपपति बहुनायक और प्रेमास्पद हैं।
चूँकि यहाँ पर श्रीआचार्य्य पाद ने महा रास का वर्णन श्रीमद्भागवतानुसार
ही किया है किन्तु फिर भी एक बात लक्ष्य में रखने की है कि सर्वत्र आपका
लक्ष्य रस और रसिकता ही है। यहाँ तक कि आप उस रसिकता को रस
विलास को मार्ग और अपमार्ग में भी खोज निकालते हैं तथा उसके प्रमाण भी
ले लेते हैं मूढ़ पशु पक्षी कीट पतङ्गों से तब फिर ब्रज लीला या महारास में उन्हें
रस का दर्शन नहीं होगा क्या ऐसा सम्भव है ? उन्होंने रस को कहाँ तक नीचे
उतर कर देखा है; आप देखिये—
प्रीति न काहु की कानि विचारै।
मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै।।
ज्यौं साँवन सरिता जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै।
ज्यौं नादहि मन दिये कुरंगनि प्रगट पारधी मारै।।
जै श्री हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहिं जारै।
फिर जो लोग महाप्रभु के सिद्धान्त पर ब्रज और निकुञ्ज का झगड़ा
(विवाद) खड़ा करते हैं उन्होंने शायद श्रीहिताचार्य्य के मर्म बेधन की ओर
लक्ष्य नहीं किया है। वे व्यासजी के इस वाक्य को समझें—
"हुतौ रस रसिकन कौ आधार"
स्वयं आचार्य्य पाद इस पद की वर्णना में जो शब्द रखते हैं वे दृष्टव्य हैं,
साथ साथ लक्ष्य में लाने योग्य हैं—
(१) रसिक रस सागर रास रच्यौ बन माँहीं।
(२) अधर पान परिरंभन अति रस, आनँद मगन सहेली।
(३) रसिक सचु पावत...............
पद का अन्तिम वाक्यांश 'रसिक सचु पावत' स्पष्ट कर रहा है कि यह
महा रास केलि रसिक जनों के रस आस्वादनार्थ है, उनकी अपनी वस्तु है।
२०६ • • हित चौरासी
इसका वर्णन भी रस आस्वादनार्थ किंवा रस वर्णन के लिये है कोई व्रज लीला
वर्णन इसका लक्ष्य नहीं। यह तो निर्विवाद है कि लक्ष्य की गति पर से ही वर्णन
की गति जानी जाती है। अब यहाँ यह जानना चाहिये कि महारास का वर्णन
होने पर भी इस पद में रस का ही वर्णन है।
श्रीहिताचार्य्य पाद ने श्रीमद्भागवत में से भी अपनी इष्ट वस्तु रस कैसे
और कहाँ से खोज निकाली है ? उसे देखिये, यहाँ प्रसङ्गानुसार यथा क्रम
श्रीमद्भागवत से इस पद के भावों का सामञ्जस्य प्रकट किया जाता है-
(१) 'मौंहन बैंनु बजावै' इस भाव का प्रकाश निम्न चरण से मिलता है-
जगौ कलं वाम दृशां मनोहरम्।
श्रीमद्भागवत १०/२९/३
अर्थात् "वंशी में वाम दृशा गोपियों के मन का हरण करने वाला गीत
(श्याम सुन्दर ने) गाया।" जिसे सुनकर ब्रज बालाएँ आ गयीं।
(२) "आईं व्रज नारि सुनत वंसी रव"
अब इसका भाव साम्य श्रीमद्भागवत में किस प्रकार है उसे देखिये-
निशम्य गीतं तदनङ्ग वर्द्धनं
व्रजस्त्रियः कृष्ण गृहीत मानसाः।
आजग्मु रन्योन्यमलक्षितोद्यमाः
स यत्र कान्तो जव लोल कुण्डलाः॥
१०/२९/४
अर्थात् "उस कामोद्दीप गान के कान में पड़ते ही समस्त व्रज बालाएँ
श्रीकृष्ण में आसक्त चित्त होकर एक दूसरे से अपनी चेष्टा छिपाती हुईं अपने
कान्त के पास आयीं। उस समय अत्यन्त वेग के कारण उनके कानों के
कुण्डल हिलते जाते थे।"
इस आगमन के समय उन व्रज बालाओं को उनके भ्राता, पति, बन्धु
वर्गों ने रोका तो सही पर वे किसी प्रकार भी न रुकीं। उनकी अवहेलना करके
भी श्रीकृष्ण से जा मिलीं। आचार्य्य पाद कहते हैं-
हित चौरासी • • २०७
(आई ब्रज नारि सुनत बंसी रव) गृहपति बंधु विसारे-
अब श्रीमद्भागवत में देखिये-
ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृ बन्धुभिः।
गोविन्दापहृतात्मानो न न्यवर्त्तन्त मोहिताः।।
श्रीमद्भा. १०/२९/८
अर्थात् उनके पति, पिता भ्राता और बन्धुओं ने उन्हें बहुत कुछ रोका
किन्तु श्रीगोविन्द ने उनके चित्तों को ऐसा कुछ खींच लिया था कि वे मुग्ध
बालाएँ उनके रोके न रुक सकीं।"
उन्होंने आकर मदन मोहन का दर्शन किया और उनके विरह जन्य काम
ताप की शान्ति हो गयी। महाप्रभु और श्रीमद्भागवत का भाव साम्य देखिये-
(४)"दरसन मदन गुपाल मनोहर मनसिज ताप निवारे" -
और
सर्वास्ता केशवालोक परमोत्सव निर्वृताः।
जहुर्विरहजं तापं प्राज्ञं प्राप्य यथा जनाः।।
श्रीमद्भाग. १०/३२/९
अर्थात् "जैसे मुमुक्षु जन ब्रह्मवेत्ता को पाकर संसार ताप से छूट जाते हैं,
उसी प्रकार श्रीकृष्ण दर्शन के परमोल्लास से आनन्दित होकर उन समस्त
गोप बालाओं का विरह ताप दूर हो गया।"
पश्चात् रास क्रीड़ा प्रारम्भ हुई-
"रास रच्यौ बन माँही"
और
तत्रारभत गोविन्दो रास क्रीडामनुव्रतैः।
रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपी मण्डल मण्डितः।।
श्रीमद्भा. १०/३३/२-३
अर्थात् "फिर वहाँ गोविन्द ने रास क्रीड़ा प्रारम्भ की वे गोपियों के मण्डल
में शोभित होकर रास के महोत्सव में सम्प्रवृत्त हुए।"
इसी प्रकार दोनों प्रसङ्गों में रास नृत्य का सरस वर्णन मिलाइये-
२०८ • • हित चौरासी
(६) "अदभुत ताल मृदंग मनोहर किंकिनि शब्द कराहीं"
-हित चौरासी
एवं-
वलयानां नूपुराणां किङ्किणीनां च योषिताम्।
सप्रियाणामभूच्छब्दस्तुमुलो रास मण्डले।।
-श्रीमद्भा. १०/३३/६
अर्थात् "रास मण्डल में नृत्य करती हुई गोपियों के कङ्कण नूपुरों एवं
किङ्किणियों का तुमुल शब्द होने लगा।"
इस रास नृत्य का दर्शन करके देवताओं की सुन्दरियाँ मोहित हो गयीं।
आचार्यपाद लिखते हैं-
(७)
"मोहे मृग धैनु सहित सुर सुंदरि प्रेम मगन पट छूटे।
उडगन चकित थकित ससि मण्डल कोटि मदन मन लूटे॥"
यही भाव श्रीमद्भागवत में भी-
कृष्ण विक्रीडितं वीक्ष्य मुमुहुः खेचर स्त्रियः।
कामार्दिताः शशाङ्कश्च सगणो विस्मितोऽभवत्।।
-श्रीमद्भां. १०/३३/१९
अर्थात् "श्रीकृष्ण के इस विक्रीड़न को देखकर देवताओं की स्त्रियाँ
कामातुरा होकर मोहित हो गयीं और चन्द्रमा भी अपने गणों (उडगण आदि) के
सहित चकित हो गया।"
रास ने सबको चकित तो कर दिया। और ब्रज बालाओं ने जो सुख लूटा
उसका भी वर्णन करते हैं दोनों व्यास नन्दन-
(८)
अधर पान परिरंभन अति रस आनँद मगन सहेली।
यह तो हुआ 'हित चौरासी में अब श्रीमद्भागवत में व्यासनन्दन शुकदेव
जी क्या कहते हैं-