हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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उनकी चितवन कुछ तिरछी अवलोकन से युक्त है और वे सरस तथा मधुर
ध्वनि से वंशी में कुछ गा रहे हैं। इस तरह ये मधुमय श्याम सुन्दर मोहन वेणु
को अपने अधरों पर समान रूप से धारण किये बजा रहे हैं।
अब उन्होंने वृन्दावन के विमल कल्पवृक्ष के नीचे रास रचना की। एक
तो पवित्र कल्पतरु, दूसरे यमुना का सुन्दर तट, शारदीय रात्रि, और तिस पर
परम सुन्दर चन्द्रदेव। शीतल और सुगन्ध पूर्ण पवन मन्द मन्द बह रहा है ऐसे
रम्य स्थल में नन्द नन्दन रास खेल रहे हैं। उस रास में अद्भुत ताल और
मनोहर मृदङ्गों के साथ किङ्किणियाँ भी मधुर और मनोहर शब्द कर रही हैं।
श्रीवृन्दावन यमुना पुलिन पर रसिक नन्द नन्दन ने इस रस सागर रास की
रचना की है।
इस केलि को, मधु पान करने वाले रसिक भ्रमर देख रहे हैं और उस पर
पशु पक्षी, लता वेलि सभी मुग्ध हैं। इन मोहित मृग और धेनुओं के साथ सुर
नारियाँ भी मोहित हो गयीं और प्रेम मग्न हो जाने के कारण उनके वस्त्र आदि
भी (छूट छूट कर) अङ्गों से खिसकने लगे। आकाश में तारागण (रास देखकर)
चकित हो गये, चन्द्र मण्डल थकित हो गया। और कोटि कोटि काम देवों के
मन भी लूट लिये मन मोहन ने। आनन्द मग्न हो गयीं सहेलियाँ, अधरामृत के
पान एवं आलिङ्गन के अत्यन्त रस से।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि इस मधुकर केलि (अर्थात्
रसिक भ्रमर रूप श्रीलालजी की रास क्रीड़ा) को देखकर रसिक (इस दिव्य
रस के आस्वादन करने वाले रसिक प्रेमी जन किंवा सखियाँ, वृन्दावन का
परिकर आदि) सुख पा रहे हैं।
टिप्पणी—यह श्रीमद्भागवत वर्णित रास पञ्चाध्यायी के भावों से तो मिलता
ही है अपितु कहीं कहीं तो श्लोकों के शब्दार्थ और उनकी शृङ्खला तक पायी
जाती है। इससे कहा जा सकता है कि इसमें श्रीहिताचार्य्य पाद ने नित्य रास
का नहीं वरं महारास का वर्णन किया है किन्तु श्रीमद्भागवत के महारास और
आचार्य्य वर्णित इस पद में एक अन्तर यह है कि श्रीमद्भागवत में अनेक
गोपियों के साथ श्रीकृष्ण ने अनेक रूप धारण किये हैं पर यहाँ श्रीकृष्ण केवल