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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 275 में से

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पृष्ठ 211

हित चौरासी • • २०५
एक राधा प्रियतम ही हैं। इसका कारण यह है कि आचार्य्य पाद के इष्टाराध्य
श्रीराधावल्लभ लाल—श्रीकृष्ण, एक नारी व्रती पति और दक्षिण नायक है
किन्तु श्रीमद्भागवत के श्रीकृष्ण जार, उपपति बहुनायक और प्रेमास्पद हैं।
चूँकि यहाँ पर श्रीआचार्य्य पाद ने महा रास का वर्णन श्रीमद्भागवतानुसार
ही किया है किन्तु फिर भी एक बात लक्ष्य में रखने की है कि सर्वत्र आपका
लक्ष्य रस और रसिकता ही है। यहाँ तक कि आप उस रसिकता को रस
विलास को मार्ग और अपमार्ग में भी खोज निकालते हैं तथा उसके प्रमाण भी
ले लेते हैं मूढ़ पशु पक्षी कीट पतङ्गों से तब फिर ब्रज लीला या महारास में उन्हें
रस का दर्शन नहीं होगा क्या ऐसा सम्भव है ? उन्होंने रस को कहाँ तक नीचे
उतर कर देखा है; आप देखिये—
प्रीति न काहु की कानि विचारै।
मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै।।
ज्यौं साँवन सरिता जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै।
ज्यौं नादहि मन दिये कुरंगनि प्रगट पारधी मारै।।
जै श्री हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहिं जारै।
फिर जो लोग महाप्रभु के सिद्धान्त पर ब्रज और निकुञ्ज का झगड़ा
(विवाद) खड़ा करते हैं उन्होंने शायद श्रीहिताचार्य्य के मर्म बेधन की ओर
लक्ष्य नहीं किया है। वे व्यासजी के इस वाक्य को समझें—
"हुतौ रस रसिकन कौ आधार"
स्वयं आचार्य्य पाद इस पद की वर्णना में जो शब्द रखते हैं वे दृष्टव्य हैं,
साथ साथ लक्ष्य में लाने योग्य हैं—
(१) रसिक रस सागर रास रच्यौ बन माँहीं।
(२) अधर पान परिरंभन अति रस, आनँद मगन सहेली।
(३) रसिक सचु पावत...............
पद का अन्तिम वाक्यांश 'रसिक सचु पावत' स्पष्ट कर रहा है कि यह
महा रास केलि रसिक जनों के रस आस्वादनार्थ है, उनकी अपनी वस्तु है।