सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 201

हित चौरासी • • १६५
अर्थात् (पिङ्गला ने कहा-) "अहो ! मुझ इन्द्रिय परायणा के मोह का
विस्तार तो देखो, जो मैं मूर्खा इन तुच्छ एवं असद्बुद्धि कामियों से सुख की
कामना करती हूँ। अरे ! मैं बड़ी बुद्धिहीन हूँ, जो अपने समीप ही रमण करने वाले
तथा नित्य रति और धन के देने वाले इन प्रियतम सत्पुरुष परमेश्वर को छोड़
कर कामना पूर्ति में असमर्थ तथा दुःख, भय, राग शोक और मोह आदि देने
वाले इन तुच्छ पुरुषों को भजती हूँ। अहो! मैंने इस अति निन्दनीय
आजीविका-वेश्यावृत्ति से व्यर्थ ही अपने आत्मा को तपाया। हाय ! मैं इन स्त्री
लम्पट, अर्थ लोलुप और अनुशोचनीय पुरुषों द्वारा खरीदे हुए शरीर से रति
और धन की इच्छा करती थी। जो अस्थिमय टेढ़े तिरछे बाँसों एवं थूनियों से
बना है, त्वचा, रोम और नखों से पूर्ण है तथा नाशवान भी है। मल और मूत्र से
तो भरा ही है। जो नव द्वारों वाला घर रूप देह है उसका मेरे सिवाय और कौन
सेवन करेगी। इस विदेह नगरी में एक मैं ही ऐसी मूर्खा और दुष्टा हूँ, जो इन
आत्म प्रद अच्युत परमात्मा को छोड़ कर किसी अन्य से अपनी कामना पूर्ण
कराना चाहती हूँ। ये सब शरीर धारियों के सुहृद, प्रियतम, स्वामी और आत्मा हैं;
अब मैं इनके ही हाथ बिककर लक्ष्मीजी के समान इन्हीं के साथ रमण करुँगी।"
(फिर वह अपने आप को सम्बोधन करके कहने लगी-) "अरी ! ये जो
भोग और भोगों के देने वाले पुरुष हैं इन्होंने तेरा कितना प्रिय साधन किया ?
अथवा और भी आदि अन्त वाले पुरुष तथा काल से भयभीत देव गण हैं वे भी
अपनी स्त्रियों को कितना सन्तुष्ट कर पाते हैं ? अवश्य ही मेरे किसी शुभकर्म
से श्रीभगवान् प्रसन्न हुए हैं, जिससे कि इस दुराशा से मुझको ऐसा सुखकारक
वैराग्य उत्पन्न हुआ है। यदि मेरा भाग्य मन्द होता तो मुझको ये कष्ट न उठाने
पड़ते जो वैराग्य के हेतु हैं; जिसके द्वारा जीव गृह आदि के बन्धनों को काटकर
शान्ति लाभ करता है, अतः अब मैं इस उपकार को शिरोधार्य कर विषय
जनित दुराशा को छोड़ उस जगदीश्वर की ही शरण में जाती हूँ। अब मैं
सन्तोष और श्रद्धा पूर्वक प्रारब्ध वश जो कुछ मिलेगा उसी से जीवन निर्वाह
करंती हुई इस आत्म रूप प्रियतम (रमण) के साथ ही विहार करूँगी। संसार
कूप में पड़े हुए विषय वासनाओं से नष्ट दृष्टि और काल रूपी सर्प से डसे हुए
इस आत्मा (जीव) की रक्षा केवल परमात्मा को छोड़ कर और कर ही कौन