सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 213

हित चौरासी • • २०७
(आई ब्रज नारि सुनत बंसी रव) गृहपति बंधु विसारे-
अब श्रीमद्भागवत में देखिये-
ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृ बन्धुभिः।
गोविन्दापहृतात्मानो न न्यवर्त्तन्त मोहिताः।।
श्रीमद्भा. १०/२९/८
अर्थात् उनके पति, पिता भ्राता और बन्धुओं ने उन्हें बहुत कुछ रोका
किन्तु श्रीगोविन्द ने उनके चित्तों को ऐसा कुछ खींच लिया था कि वे मुग्ध
बालाएँ उनके रोके न रुक सकीं।"
उन्होंने आकर मदन मोहन का दर्शन किया और उनके विरह जन्य काम
ताप की शान्ति हो गयी। महाप्रभु और श्रीमद्भागवत का भाव साम्य देखिये-
(४)"दरसन मदन गुपाल मनोहर मनसिज ताप निवारे" -
और
सर्वास्ता केशवालोक परमोत्सव निर्वृताः।
जहुर्विरहजं तापं प्राज्ञं प्राप्य यथा जनाः।।
श्रीमद्भाग. १०/३२/९
अर्थात् "जैसे मुमुक्षु जन ब्रह्मवेत्ता को पाकर संसार ताप से छूट जाते हैं,
उसी प्रकार श्रीकृष्ण दर्शन के परमोल्लास से आनन्दित होकर उन समस्त
गोप बालाओं का विरह ताप दूर हो गया।"
पश्चात् रास क्रीड़ा प्रारम्भ हुई-
"रास रच्यौ बन माँही"
और
तत्रारभत गोविन्दो रास क्रीडामनुव्रतैः।
रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपी मण्डल मण्डितः।।
श्रीमद्भा. १०/३३/२-३
अर्थात् "फिर वहाँ गोविन्द ने रास क्रीड़ा प्रारम्भ की वे गोपियों के मण्डल
में शोभित होकर रास के महोत्सव में सम्प्रवृत्त हुए।"
इसी प्रकार दोनों प्रसङ्गों में रास नृत्य का सरस वर्णन मिलाइये-