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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

हित चौरासी • • १४३
की चेष्टा की जाय तो और भी उत्तम होगा। यह तत्व विवेचन की दृष्टि
साम्प्रदायिक दृष्टि नहीं अपितु वस्तु का सूक्ष्म विवेक है-निदर्शन है जिसे चित्त
की उच्च भूमिका में ही समझा जा सकता है, जहाँ पर महात्मा व्यास, ध्रुवदास,
श्रीहरिदास और विहारिन देव जी आदि महा पुरुषों ने जाकर समझा।
कुछ लोग तो इस तत्व विचार से इसलिये भी चौंक उठते हैं कि उनकी
स्थूल दृष्टि में श्रीकृष्ण की अनेकता सी सिद्ध होती दिखती है, इन विचारों से;
किन्तु बात ऐसी है नहीं। वरं इससे तो श्रीकृष्ण तत्व की महानता के साथ
उपासना की महानता का प्रकाश मिलता है। वैसे तो श्रीकृष्ण सदा एक हैं
केवल वे उपासना और भावना के ही विचार से राम, वामन, वाराह नृसिंह की
भाँति, कन्हैया, पूतनारि, माखन-चोर, गोपाल, चीर-चोर, गोपीनाथ,
रासविहारी, मथुरा-वासी, कंसारि, द्वारकावासी और जाने क्या क्या हो जाते
हैं। ठीक इसी प्रकार श्रीहिताचार्य्य पाद उनके जिस अन्तरङ्ग रूप का प्रकाश
करते हैं वह है-
निकुञ्ज केलि विलासी और एक मात्र श्रीराधा प्रियतम। और गोपियों के
साथ उसका"आलिंगन चुंबन पायौ" आदि विलास श्रीराधा प्रियतमा की इच्छा
और कौतुक मात्र है।
– ३७ –
अवतरण – प्रिया श्रीराधा मानवती हैं; अतः श्रीलालजी से विलग किसी
एकान्त कुञ्ज में विराजमान हैं। मानिनि प्रिया के वियोग से व्याकुल प्रियतम
उनके बिना अब जीवन धारण करने में ही असमर्थ से हो रहे हैं। उनकी वियोग
वलित दशा का वर्णन श्रीहित सखी स्वामिनि श्रीराधा से कर रही हैं-मानों इस
वर्णन के बहाने उन्हें प्रियतम के निकट ले चलने के लिये बाध्य कर रही हैं।
श्रीहित सखी अपने प्रयास में सफल भी होती हैं और अन्त में मानिनि प्रिया का
का मान छुड़ा कर प्रियतम के निकट ला देती हैं। इस पद में ऐसी ही मान
जनित विषम विरह व्यथा का वर्णन किया गया है-

१४४ • • हित चौरासी
सारंग
मूल- चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर।
तो बिनु कुँवरि कोटि बनिता जुत,
मथत मदन की पीर॥
गदगद सुर विरहाकुल पुलकित,
स्रवत विलोचन नीर।
क्वासि क्वासि वृषभानु नंदिनी,
विलपत विपिन अधीर॥
बंसी विसिख, व्याल मालावलि,
पंचानन पिक कीर।
मलयज गरल, हुतासन मारुत,
साखा मृग रिपु चीर॥
(जै श्री) हित हरिवंश परम कोमल चित,
चपल चली पिय तीर।
सुनि भयभीत बज्र कौ पंजर,
सुरत सूर रन वीर॥३७॥
भावार्थ-(हित सखी ने मानिनि प्रिया से कहा-) "हे मानिनि ! तुम कुञ
कुटीर क्यों नहीं चलती हो ? देखो, तो कुमारी राधे ! तुम्हारे बिना श्याम सुन्दर
को मदन की बाधा-पीड़ा एक साथ मथे डाल रही है, भले ही वे कोटि कोटि
अन्य नारियों (सखियों) से घिरे हैं। (तुम्हारे बिना) उनकी वाणी गद् गद् है,
शरीर रोमाञ्चित है, चित्त विरहाकुल है और उनके विलोचनों से (निरन्तर) जल
झर रहा है। वे अत्यन्त अधीर होकर समस्त वृन्दावन में "हे वृषभानु नन्दिनी !
कहाँ हो ? कहाँ हो ??" ऐसा विलाप करते फिर रहे हैं। (तुम्हारे विरह में उनके
लिये इस समय) वंशी बाण की तरह वक्षस्थल की मालाएँ सर्प की तरह एवं
कोयल कीर (की मीठी बोलियाँ) सिंह (गर्जना) की तरह जान पड़ रहे हैं।
(अरी ! और तो और) शीतल चन्दन भी विष (जैसा दाहक;) शीतल वायु अग्नि
और वस्त्र तो शाखा मृग के रिपु-कमाच फल की तरह दुखः दायी हो रहे हैं।"

हित चौरासी • • १४५
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि इतना सुनते ही परम कोमल चित्त
श्रीराधा चपलता पूर्वक (शीघ्र) प्रियतम के समीप चल पड़ी। उन सुरत शूर वीर
का आगमन सुनकर वज्र पञ्जर काम भी भय से भीत हो उठा, काँप गया।*
*इस पद में जैसी दशा श्रीराधा विरह में श्रीकृष्ण की वर्णित की गयी है, ऐसी ही
दशा का वर्णन श्रीजयदेव कविराज ने अपने 'गीत गोविन्द' काव्य में श्रीकृष्ण विरहिणी
श्रीराधा की किया है। इन दोनों वर्णनों में भावों का सामञ्जस्य है पात्र भेद से स्वयं
रति वञ्चिता राधा (मानवती नहीं) अपनी दशा का वर्णन अपनी सखी से कर रही हैं-
रिपुमिव सखी संवासोयं शिखीव हिमानिलो,
विषमिव सुधा रश्मिर्यस्मिन् दुनोति मनोगते।
हृदयमदये तस्मिन्नेवं पुनर्वलते वलात्,
कुवलय दृशां वामः कामो निकाम निरङ्कुशः॥
अर्थात् श्रीराधा ने कहा-“हे सखि ! यह लता भवन का निवास इस समय तो वैरी
जैसा लग रहा है, शीतल वायु भी अग्नि ज्वाला की तरह हो गया है और ये सुधामयी
चन्द्र किरणें भी तो विष जैसी मन के लिये दुःख दायी हो रही हैं ! तिस पर फिर यह
निर्दय हृदय हीन निरङ्कुश काम अकारण ही हमारा वाम-उलटा हो रहा है तथा हम
कमल नयनी वाम दृशाओं का हनन कर रहा है। अरी ! इसका यह कृत्य तो मानो
मरे को भी मारने जैसा निन्द्य है !”
इतना कहने के पश्चात् वे फिर अपने आप प्रलाप सा करने लगती हैं-
बाधां विधेहि मल्यानिल पञ्च वाण
प्राणान् गृहाण न गृहं पुनराश्रयिष्ये।
किं ते कृतान्त भगिनि क्षमया तरङ्गै-
रङ्गानि सिञ्च मम शाम्यतु देह दाहः॥
गीत गोविन्द सप्तम सर्ग
अर्थात् “हे मल्यानिल ! तुम अपनी बाधाओं को अवश्य ही मेरे लिये उपस्थित
करो ? और हे मदन ! तुम भी अपने पाँचों वाणों को एक साथ चलाकर मेरे प्राणों को
खींच लो-हरण कर लो, ताकि ये फिर से अपने भवन (इस मेरे देह) का आश्रय न
कर सकें। हे कृतान्त भगिनि ! यमुने !! तुम क्यों क्षमा कर रही हो ? तुम भी अपनी
शीतल वीचियों का सिञ्चन करो, जिससे शीघ्र मेरा देह दाह हो-शरीर जल सके
अस्तु; यह श्रीकृष्ण विरहिणी राधा की दशा है।

१४६ • • हित चौरासी

  • ३८ -
    अवतरण-पुनः मानिनि राधा के प्रति श्रीहित सजनी का अनुरोध है।
    जिसमें ये श्रीलालजी की दशा का वर्णन करते हुए उनके (प्रियतम के) निकट
    चलने के लिये आग्रह कर रही हैं। श्रीप्रियाजी से श्रीहित सखी कहती हैं-
    सारङ्ग
    मूल-वेगि चलहि उठि गहरु करति कत,
    निकुंज बुलावत लाल।
    हा राधा राधिका पुकारत,
    निरखि मदन गज ढाल॥
    करत सहाइ सरद ससि मारुत,
    फूटि मिली उर माल।
    दुर्गम तकत समर अति कातर,
    करहि न पिय प्रतिपाल॥
    (जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर,
    श्रवन सुनत तेहि काल।
    लै राखे गिरि कुच बिच सुंदर,
    सुरत-सूर ब्रज बाल॥३८॥
    भावार्थ-(हित सखी ने कहा-) "हे राधे ! अब शीघ्र उठ चलो, देर क्यों कर
    रही हो ? देखो, तुम्हें प्रियतम श्रीलालजी ने बुलाया है। वे काम रूप गजराज
    को अपनी ओर ढलता आता देखकर "हा राधा ! हा हा राधिके !! इस प्रकार
    पुकार रहे हैं। (और इस समय) शरत्कालीन चन्द्रमा शीतल पवन, तथा उनके
    हृदय की सदा सङ्गिनी माला भी आज विद्रोह पूर्वक (शत्रु रूप काम गज से) जा
    मिली है, अतएव (वे श्रीकृष्ण) युद्ध से अत्यन्त घबराकर अब किसी दुर्गम
    (कठिनाई से जहाँ कोई शत्रु प्रवेश पा सके) स्थल की ताक-खोज में हैं तब (हे
    प्यारी !) तुम चल कर अपने प्रियतम का प्रतिपाल-रंक्षण क्यों नहीं करतीं ?"
    श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (सखी के मुख से) उक्त समाचार अपने
    कानों में पड़ते ही अत्यन्त आतुर होकर वह सुरत शूर बाला-श्रीराधा उसी

हित चौरासी • • १४७
समय चल पड़ी और उसने अपने गिरि कुचों के बीच (दुर्गम स्थल में) सुन्दर
(श्रीलालजी) को ले रखा है-छिपा लिया।

  • ३९ -
    अवतरण-किन्हीं कारणों से श्रीप्रियाजी को मान हो आया है अतः प्रियतम
    से विलग होकर मान कुञ्ज में आज अकेली ही आ बैठी हैं। उन्हें मना लाने के
    लिये श्रीलालजी ने हित सखी को दूती बनाकर भेजा है। हित सखी चतुर
    दूतिका हैं अतएव श्रीवन की शोभा वर्णन, प्रियतम गुण प्रेम, भाव वर्णन, आदि
    कलाओं के द्वारा मानिनि को प्रसन्न करना चाहती हैं और अन्त में प्रियतम से
    मिलाना चाहती हैं। इस पद में इसी लीला का वर्णन है।
    अब मानिनि नायिका प्रिया श्रीराधा से हित सजनी कह रही हैं-
    सारङ्ग
    मूल-खेल्यौ लाल चाहत रवन।
    रचि रचि अपने हाथ सँवारयौ निकुंज भवन।।
    रजनी सरद मंद सौरभ सौं सीतल पवन।
    तो बिनु कुँवरि काम की बेदन मेटब कवन।।
    चलहि न चपल बाल मृगनैनी तजिऽब मवन।
    (जै श्री) हित हरिवंश मिलऽब प्यारे की आरति दवन।।३९।।
    भावार्थ- (श्रीहित अलि ने कहा-) 'हे राधे ! लाल (तुम्हारे प्रियतम)
    विहार (खेल) खेलना चाहते हैं; इसलिये उन्होंने अपने हाथों निकुञ्ज भवन
    रचकर तैयार किया है-सम्हाला है। हे किशोरी (देखो) शरद की रात्रि है और
    मन्द गामी सुगन्ध युक्त शीतल पवन है फिर भला तुम्हारे बिना ऐसा कौन है जो
    काम की वेदना (प्रियतम के हृदय से) मिटा सके ? तब हे बाल मृगनयनि !
    [तुम अपने] मौन का परित्याग करके शीघ्र ही अब क्यों नहीं चल रही हो?
    चलो न! अरी! प्रियतम के दुःखों का दमन करने वाली राधे ! (शीघ्र चल कर)
    अब उनसे मिलो।"

१४८ • • हित चौरासी
– ४० –
अवतरण-पूर्व पद में दूतिका का प्रयास व्यर्थ रहा वह अपनी वचन
चातुरी से नायिका को प्रसन्न नहीं कर सकी और न प्रियाजी ने उसकी कोई
बात ही मानी, अतएव उसने फिर भी उक्त क्रम से अनुनय प्रारम्भ की। उसने
कहा-
सारङ्ग
मूल-बैठे लाल निकुंज भवन।
रजनी रुचिर मल्लिका मुकुलित त्रिविध पवन।।
तूँ सखी काम केलि मन मोहन मदन दवन।
वृथा गहरु कत करति कृसोदरि कारन कवन।।
चपल चली तन की सुधि बिसरी सुनत श्रवन।
(जै श्री) हित हरिवंश मिले रस लंपट राधिका रवन।।४०।।
भावार्थ- (हित सखी ने फिर कहा-) "हे मानिनि ! लाल (तुम्हारी प्रतीक्षा
करते हुए) निकुञ्ज भवन में बैठे हैं। (इस समय) कैसी सुन्दर रुचि दायक रात्रि
है, मल्लिकाएँ खिल रही हैं और शीतल, सुगन्धित पवन धीरे धीरे बह रहा है।
(ऐसे अवसर में) हे सखी ! केवल एक तू ही है जो अपनी काम केलि के द्वारा
मन मोहन के मदन (ताप) का दमन (शमन) कर सकती है, तब हे कृशोदरि !
व्यर्थ विलम्ब क्यों कर रही हो? कारण क्या है?
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि अपने कानों यह सुनते ही
श्रीप्रियाजी को तन सुधि का भी विस्मरण हो गया (-वे श्रीलालजी के विरह
दुःख से अत्यन्त विह्वल होकर) शीघ्रता पूर्वक चल पड़ीं तब रस लम्पट रमण
श्रीलालजी श्रीराधिका से मिले।
– ४१ –
अवतरण-इस इकतालीसवें पद में प्रियतम की अपने प्रेमास्पद के प्रति
एकान्त निष्ठा और द्रवित प्रेम पूर्ण हृदय की सराहना के साथ ऐसा हृदय बनाने
के साधक जनों के लिये सङ्केत है। श्रीश्याम सुन्दर ही यथार्थतः प्रीति तत्व के

हित चौरासी • • १४६
ज्ञाता एवं पालक हैं। वे प्रीति रीति वश अखिल ब्रह्माण्ड नायक होकर भी महा
दीन हैं— 'दीनता' ही उनका अपनापन है-अस्तित्व है।
वे भोगी नहीं अपितु एकान्त वल्लभ प्रेमी हैं तभी तो कोटि कोटि कामिनियों
से आवृत रहकर भी अपनी आराध्या प्राण धन श्रीराधा की ही याचना करते
और उनके विना अन्य सबको नहीं जैसा अनुभव करते हैं।
श्रीलालजी की उक्त हृदय स्थिति की ओर लक्ष्य कराते हुए श्रीहिताचार्य
चरण उपदेश करते हैं कि सत्व प्रज्ञ बुध जनो ! उस प्रेम तत्व की विलक्षणता
का दर्शन अनुभव तो करो जिसने श्रीलालजी जैसे सच्चिदानन्द घन परिपूर्णतम
परात्पर ब्रह्म को भी दीन बना रखा है, परवश कर दिया है; जो पूर्ण सर्व तन्त्र
स्वतन्त्र था। कैसी अनोखी है वह प्रेम की मर्यादा-मैंड?
इस 'प्रेम-मैंड' का पहचानना ही साधक-प्रेमी उपासक की चतुरता है
या नित्यानित्य वस्तु का चरम विवेक है।
अस्तु; अब उस प्रेम मैंड का निरूपण श्रीहिताचार्य पाद करते हैं-
सारङ्ग
मूल-प्रीति की रीति रँगीलोइ जानै।
जद्यपि सकल लोक चूड़ामनि दीन अपनपौ मानै।।
जमुना पुलिन निकुंज भवन में मान मानिनी ठानै।
निकट नवीन कोटि कामिनि कुल धीरज मनहिं न आनै।।
नस्वर नेह चपल मधुकर ज्यौं आँन आँन सौं बानै।
(जै श्री) हित हरिवंश चतुर सोई लालहिं छाड़ि मैंड पहिचानै।।४१।।
भावार्थ-प्रीति की रीति तो केवल रँगीले (प्रेमी) श्रीलालजी ही जानते हैं,
अन्य कोई नहीं; तभी तो वे समस्त लोकों के अधिनायक-सिर मौर होकर भी
अपने आप को (प्रेम परवश) दीन (लघु) मानते हैं। जब यमुना पुलिन पर निकुञ्ज
भवन में श्रीराधिका मान ठान कर मानिनि हो जाती है (या रूठ कर अन्यत्र
चली जाती है तब ये अपने निकट कोटि कोटि कामिनियों के होते रहने पर भी
अपने मन में धैर्य नहीं लाते, (-व्याकुल हो हो जाते हैं अपनी प्रियतमा के
बिना।)

१५० • • हित चौरासी
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं( किंतु उपरोक्त एक निष्ठा के
विपरीत) जो प्रेम चपल भ्रमर की भाँति (क्षण क्षण में) अन्य अन्य किन्हीं से
बनता (और बिगड़ता भी) रहता है वह तो विनाशी है, नश्वर है। (किमधिकं प्रेम
ही नहीं है।)
(अब) जो (उपासक प्रेमी) श्रीलालजी को भी छोड़ (अलग रख) कर इस
(प्रेम मर्यादा) मैंड को पहचानता है वही चतुर है—सच्चा विवेकी है।
टिप्पणी—लालहिं छाड़ि मैंड पहिचानैं—
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु के द्वारा प्रकाशित उपासना मार्ग का लक्ष्य
केवल परात्पर प्रेम तत्व है। प्रेम के सिवाय न प्रिया है न प्रियतम श्रीकृष्ण ही।
वरं ये दोनों प्रेमी प्रेमास्पद श्रीराधावल्लभ लाल भी इस उपासना में प्रेम के दो
रूपान्तरों में ही स्वीकार किये गये हैं। जैसा कि महात्मा श्रीलाड़िली दास जी ने
कहा है—
गौर स्याम सीसीनु में भरयौ रंग अनुराग।
और—
नव किसोर सुकुमार तन मृदु भुज मेले अंस।
जोरी सनी सनेह रस प्रकट करी हरिवंश।।
-हित ध्रुवदास जी
अर्थात् श्रीहरिवंश ने तो स्नेह रस सनी हुई 'जोरी' श्रीराधावल्लभ लाल
को प्रकट किया, अतएव इस प्रेम तत्व के यही प्रकाशक हुए। श्रीहित ध्रुवदास
जी इस बात की साक्षी भर रहे हैं—
प्रकट प्रेम कौ रूप धरि, श्रीहरिवंश उदार।
राधावल्लभ लाल कौ, प्रकट कियौ रस सार।।
उक्त कथन पर से यह समझने की बात है कि इस श्रीहरिवंशोदित
प्रेमोपासना में सामान्य उपासना की त्रिपुटी (उपास्य, उपासक और उपासना)
का लोप होकर अन्ततः केवल एक ही वस्तु की सिद्धि होती है और वह सिद्ध
तत्व है प्रेम।

हित चौरासी • • १५१
हाँ, पाठक गण उपास्य और उपासना को प्रेम तत्व स्वीकार कर लेंगे पर
उन्हें उपासक के प्रेम रूप स्वीकार करने में हिचक होगी किन्तु इस तत्व का
प्रकाश महापुरुषों ने किस प्रकार किया है उसे भी देखिये, वे कहते हैं-
घट घट में परगट दुरयौ, विनु अकार आकार।
पूरि रहयौ हित जगत में, सहज रूप सिंगार॥
हित माते आनँद भरे नैन सवनि सौं चारि।
सकल जगत सौं एकता कहा पुरुष कहा नारि॥

  • श्रीमोहनमत्त जी
    अर्थात् 'वह प्रेम प्रगट रूप से प्रत्येक के हृदय में विना आकार प्रकार के
    छिपा बैठा है; इस तरह वह स्वाभाविक परम सुन्दर शृङ्गार मय बनकर समस्त
    विश्व में छा गया है। ये प्रेम भरे नेत्र जब किसी से मिलकर चार होते हैं, तब
    सबसे एकता ही करते हैं फिर चाहे वह नारी हो या पुरुष प्रेम तो अपने सूत्र से
    बाँध ही लेता है।'
    अज्ञानवश अपना शुद्ध स्वरूप भूलकर 'जीव' जीव बन बैठा है। वैसे तो
    वह तद्रूप ब्रह्म है-प्रेम है। जीव के स्वरूप का प्रकाश करते हुए महात्मा
    श्रीलाड़िलीदास जी कहते हैं-
    भोगी भोगासक्ति सौं, भूलि आपनौ रूप।
    तन तन प्रति मानी भये मैं तू' जगत् स्वरूप॥
    सर्व देहमय विपिन है, सर्व मनोमय लाल।
    सर्व सु इन्द्री सखीगन, सर्व आत्मा बाल॥
    मन भूल्यौ निजु आतमा, इन्द्रिनु मिलि सुख लीन।
    तन अभिमानी जग भयौ, काल कर्म आधीन॥
    भोग रूप सब प्रिया कौ, भोगी मोहन लाल।
    संधि सखी हित दुँहुनि की, मिलवत हैं सब काल॥
    चिदानंद हित सूर्य लौं सकल जगत रहयौ छाइ।
    अहं बदरिया ओट में दुरयौ लह्यौ नहिं जाइ॥
    -सुधर्म बोधिनी

१५२ • • हित चौरासी
भाव यह कि 'भोगासक्ति से ही जीव अपना शुद्ध हित रूप भूलकर भोगी
बन गया और देहाभिमानी बन गया। यही 'मैं तू' रूप जगत् है। वैसे तो समष्टि
देह श्रीवृन्दावन है, समस्त मन श्रीकृष्ण हैं, ऐसे ही समस्त प्राणियों की इन्द्रियाँ
सखीगण हैं और समस्त अनन्त व्यापक आत्मा ही प्रिया श्रीराधा है। मन अपने
आत्म स्वरूप को भूलकर इन्द्रिय सुखों में तल्लीन होकर देहाभिमानी बन गया
फलतः काल और कर्मों के अधीन होना पड़ा उसे। यों तो समस्त भोगों का एक
ध्यष्टि रूप श्रीप्रियाजी-राधिका हैं और भोगी हैं मोहन लाल श्रीकृष्ण। समस्त
भोगों का संयोग ही सखियाँ हैं-संधि है। इस प्रकार यह चिदानन्दमय हित-प्रेम
सूर्य की तरह सर्वत्र प्रकाशित है किन्तु अहङ्कार के बादलों में ढँक जाने से
स्पष्ट दीख नहीं रहा है।
अतः स्पष्ट है कि-
जो रस रीति सबनि तें दूरि।
सो सब विश्व रही भरपूरि॥
-श्री सेवकजी
सारांश यह कि उपासक भी तत्स्वरूप है किंतु भ्रमवश अपने स्वरूप में
अहं का आरोप करके अपने शुद्ध स्वरूप-हित (प्रेम) से वञ्चित है। इसी अपने
स्वरूप हित-प्रेम को पहचानने के लिये श्रीहिताचार्य्य चरण का सङ्केत है-आदेश
है-
चतुर सोई लालहिं छाड़ि मैंड पहिचानै।
क्योंकि वह 'मैंड' (मर्यादा) सिवाय प्रेम के और कुछ नहीं है।

  • ४२ -
    अवतरण-उक्त पद में जिस प्रेम मैंड के पहचानने का आदेश है इस पद
    में उसी प्रेम के स्वरूप का किञ्चित् विचार किया गया है-
    सारङ्ग
    मूल-प्रीति न काहु की कानि बिचारै।
    मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै॥

हित चौरासी • • १५३
ज्यौं सरिता साँवन जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै।
ज्यौं नादहि मन दियैं कुरंगनि प्रगट पारधी मारै।।
(जै श्री) हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहि जारै।
नाइक निपुन नवल मोहन बिनु कौन अपनपौ हारै॥४२॥
भावार्थ-प्रीति किसी की मर्यादा नहीं मानती। अरे ! प्रेम से विशेष विवश
मन को किसी मार्ग कुमार्ग की ओर जाने से कौन निवारण कर सकता है ?
श्रावण मास के जल से उमङ्गे भरती हुई नदी जैसे सीधे समुद्र की ही ओर
दौड़ती है और जिस प्रकार (बहेलिये के द्वारा गाये हुए मधुर) नाद में ही मन
दिये हुए कुरङ्ग (हरिन) को बहेलिया प्रत्यक्ष रूप से मार डालता है, परन्तु फिर
भी इनको बहने और मरने से कोई निवृत्त नहीं कर सकता। उसी प्रकार शलभ
दीपक की अटक (आसक्ति) में अपने देह को भी जला डालता है, (वह भी
किसी मर्यादा को स्वीकार नहीं करता।)
श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु पाद) कहते हैं कि नवल मोहन जैसे निपुण
नायक (प्रेमी) के सिवाय और कौन ऐसा है जो (प्रेम में) अपना
अपनापन-स्वाभिमान भी खो दे या हार जाय।
टिप्पणी—“मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै?”
प्रेमी के हृदय में जब किसी के प्रति दृढ़ आसक्ति का उदय हो जाता है
तब उसके पास उचित किंवा अनुचित का प्रायः विचार विवेक नहीं रह जाता।
वह अपने प्रेमास्पद के लिये प्रेम परवश जो कुछ करता है अपनी समझ में
सर्वथा उचित ही करता है अतः उसे उस पथ पर से विचलित या निवारित
करना कठिन होता है। ऐसा प्रेमी अपने प्रेमास्पद से प्रेम करके जगत् दृष्टि
शास्त्र दृष्टि एवं शिष्ट दृष्टि से अनुचित समझे जाने वाले कार्यों को करके भी
अनुचित समझता ही नहीं। अथवा यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि उसके
पास इस उचित अनुचित के विचारा विचार के लिये न समय है न बुद्धि और
आवश्यकता ही। वह तो अपने प्रेमास्पद से इतना तल्लीन हो जाता है कि दूसरों
के द्वारा कहा गया शास्त्रोक्त किंवा सामाजिक कथन उसके लिये व्यर्थ प्रलाप
से अधिक कुछ नहीं है।

१५४ • • हित चौरासी
वह अपने जिस प्रेम पथ पर चल रहा है, उसके लिये उसका वही अपना
सुपथ है। यदि इस 'प्रेम सुपथ' के सिवाय दूसरों के द्वारा इङ्गित किया हुआ
अन्य कोई सुपथ है भी; तो उस प्रेमी को उस सुपथ की आवश्यकता नहीं। वह
अपने एकान्त हृदय में जिस प्रेम और प्रेमास्पद को पाकर सुखी है, वे दोनों
उस प्रेमी के लिये कोटि कोटि ब्रह्मानन्द से भी महान् हैं अत्युच्च हैं। तभी तो
गोपियाँ श्रीकृष्ण की मधुर मुरली की तान पर और कर-स्पर्श मात्र पर
कोटि-कोटि ब्रह्म सुख को न्यौछावर कर देती हैं। वे कह उठती हैं-
ज्यौं करतल आभास कै कोटिक ब्रह्म लखाय।
सुधि बुधि सब मुरली हरी प्रेम ठगौरी लाय॥
प्रियतम सङ्ग और मिलन के समक्ष मुक्ति भुक्ति क्या वस्तु हैं ? मानों
उनकी कोई गणना ही नहीं ! वे प्रेम वावली गोपियाँ कह उठती हैं-
जौं नहिं लहियै सजन तौ धूरि मुकति मुँह दीन।
तभी तो गोकुल की इन कुल बधुओं पर गुरुजनों की उचित शास्त्रोक्त
शिक्षा का कोई असर ही नहीं हुआ; क्योंकि वे सभी प्रेमासक्त थीं न ! कविवर
विहारीलाल ने उनका प्रेम परिचय देते हुए कहा है-
किती न गोकुल कुल बधू काहि न केहि सिख दीन।
कौन जु तजी न कुल गली, ह्रै मुरली सुरलीन॥
ठीक भी तो है। जब प्रेम देवता किसी की कानि विचारें तब न। वे तो
किसी की कुछ मानते ही नहीं। अनन्तः गोकुल की कुल बधुओं ने भी वही
किया, जो उनसे प्रेम ने कराया; क्योंकि वे बेचारी विवश थीं, अशक्त थीं।
इस पद में श्रावण सरिता, नाद मुग्ध हरिण एवं दीपक मुग्ध शलभ के
उदाहरण मूढ़ जाति के प्रेमियों के हैं। अतएव यहाँ केवल यह समझने की
आवश्यकता है कि प्रेमी विवेक शून्य होता और प्रेम पर मिटना जानता है। जिस
प्रेम में लाभ हानि विचार पूर्वक प्रेम करने की प्रेरणा है वह प्रेम नहीं है केवल प्रेम
की भ्रमात्मक छाया है, क्योंकि वह प्रेम किया गया है, स्वभावतया हुआ नहीं है
और प्रेम तो वही है जो अपने आप प्रकट हो जाय। किसी शायर ने क्या ही
अच्छा कहा है-

३. पद ५१-७०: मान-लीला, सखी-भाव एवं अनन्य रस-उपासना

हित चौरासी • • १५५
इश्क पर जोर नहीं यह वो आतिश 'गालिब'।
जो लगाये न लगे और बुझाये न बुझे॥
अहा ! क्या ही सुन्दर?
जो लगाये न लगे और बुझाये न बुझे।
तात्पर्य यह कि प्रेम साधन से प्राप्त नहीं होता, अपने आप प्रकट होता है
और प्रकट होने के पश्चात् उसका तिरोभाव भी नहीं होता। महात्मा कबीरदासजी
कहते हैं-
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै सीस देय लै जाय॥
प्रेम किसे कहते हैं ?
छिनहिं चढ़ै छिन ऊतरै, सो तो प्रेम न होय।
अघट प्रेम पिंजर बसै, प्रेम कहावै सोय॥
—कबीर
देवर्षि नारद भी अपने प्रेम दर्शन (भक्ति सूत्र) में कुछ ऐसा ही कह रहे हैं-
प्रकाशते क्वापि पात्रे
सूत्र ५३
अर्थात् 'यह प्रेम किसी विरले (योग्य) पात्र में ही प्रकट होता है।'
वह प्रेम प्रतिक्षण वर्द्धन शील है-
प्रतिक्षण वर्द्धमानम् सूक्ष्मतर सूक्ष्ममनुभव रूपम्।
—नारद भक्ति सूत्र ५४
अर्थात् 'यह प्रेम प्रत्येक क्षण बढ़ने वाला, सूक्ष्म से सूक्ष्म और अनुभव
रूप है।'
जिस किसी भाग्यशाली के हृदय में इन प्रेम भगवान् का उदय होता है
उसका हृदय उसके वश का नहीं रह जाता, वह तो सर्वथा प्रेम के अधीन हो
जाता है। वह प्रेमी नाद मुग्ध मृग एवं दीपक आसक्त शलभ की तरह अपने
प्रेमास्पद पर मर मिटने के लिये तत्पर रहता है प्रतिक्षण, प्रसन्नता पूर्वक।
प्रियतम से एकाकार होने के पूर्व जितने क्षण जुदाई के बीतते हैं वास्तव में वही

१५६ • • हित चौरासी
उसके लिये मौत के क्षण है। परवाना कहता है-
शमे को फानूस में देखा तो परवाने यूँ बोले।
क्यों जलाते हो नाहक कि हमें जलने नहीं देते।।
इस जल जाने या प्रेम पर मिट जाने की बात इन प्रेमियों से ही पूछी जा
सकती है कि उन्हें इस वलिदान में क्या सुख है ?
'कोई परवाने से पूछे कि जलने में मजा क्या है ?'
बस, यही उत्सर्ग ही प्रेमियों का जीवन है। इस प्रेम का गन्तव्य लक्ष्य है
द्वैत की सृष्टि मिटाकर प्रियतम से एक हो जाना। इस प्रेम के अद्वैत पद तक
पहुँचने के लिये प्रेमी सब कुछ कर सकता है। लोक और वेद की सुदृढ़ बेड़ियों
को वह सरलता पूर्वक तड़ातड़ तोड़ फेंकता है तब उसके मार्ग का कण्टक
कोई भी नहीं बन सकता। वह पूर्ण निष्कण्टक निरङ्कुश बनकर जिस मार्ग से
चल पड़ता है वही उसका सुपथ होता है। ऐसे ही दीवाने आशिक के लिये रसज्ञ
जन मुग्ध कण्ठ से सराहना कर उठते हैं-
कोई न पहुँचा वहाँ तक आसिक नाम अनेक।
इश्क चमन के बीच में आया मँजनू एक।।
-श्रीनागरीदासजी
और ऐसा आशिक ताज मँजनू ही परवर दिगार अल्लाह से कह भी
सकता है कि यदि हुजूर को जरूरत थी कि कैश (मँजनू) हुजूर के कदमों से
मुहब्बत करे तो हुजूरे आलम लैला बनकर इस दीवाने के सामने क्यों न आ
गये ? ख़ता मुआफ हों इसने तो अपना सब उसी एक माहरू पर निसार कर
दिया है।
धन्य है प्रेम देव ! तेरी दीवानगी !!
सचमुच कोई तेरा मार्ग नहीं रोक सकता। तभी तो तुमने अखिल लोक
चूड़ामणि निपुण नायक नवल मोहन के स्वाभिमान-अपनपै को किसी के चरणों
में चढ़ा देने के लिये वाध्य कर दिया !
अस्तु; प्रेम तो प्रेम है। उसमें ईश्वरीय और मानवीय (हकीकी और मजाजी)
का भेद व्यर्थ और बुद्धि कृत है। तभी तो इसमें चलने वाले के लिये

हित चौरासी • • १५७
'मार्ग-अपमार्ग' का भेद उठाकर श्रीहिताचार्य्य पाद प्रेमी का मार्ग प्रशस्त कर
रहे हैं।
– ४३ –
अवतरण—मानवती श्रीप्रियाजी को मना कर ले आने के लिये श्रीलालजी
अपनी निज सखी हित सजनी दूतिका से चिरौरी कर रहे हैं। किसी कारण वश
आज पुनः श्रीप्रियाजी रूठ गयी हैं; इसलिये प्रियतम उनके वियोग में अत्यन्त
व्याकुल हैं। प्रियतम सखी को अपनी प्रियतमा के समीप भेज रहे हैं; क्योंकि
उन्हें अच्छी तरह विदित है कि भले ही वे इस समय मान किये बैठी हैं पर
उनका स्वभाव कोमल है, वे भोली हैं। यही बात उन्होंने दूतिका को समझायी
है। श्रीलालजी इस पद में दूतिका से कह रहे हैं-
सारङ्ग
मूल-अति नागरि वृषभानु किसोरी।
सुनि दूतिका चपल मृगनैनी, आकरषत चितवत चित गोरी।।
श्रीफ़ल उरज कंचन सी देही, कटि केहरि गुन सिंधु झकोरी।
बैंनी भुजंग चंद्र सत वदनी, कदलि जंघ जलचर गति चोरी।।
सुनि 'हरिवंश' आजु रजनी मुख, बन मिलाइ मेरी निज जोरी।
जद्दपि मान समेत भामिनी, सुनि कत रहत भली जिय भोरी।।४३।।
भावार्थ- (श्रीलालजी ने कहा-) “हे दूतिके ! सुन; वृषभानु किशोरी अत्यन्त
चतुर है; जब वह चपल मृगलोचनि गोरी अपने मनोहर नेत्रों से अवलोकन
करती है तो मानो उसी क्षण-देखते ही चित्त का आकर्षण कर लेती है। उस
नागरी की देह प्रभा स्वर्ण की सी है तथा उरोज हैं श्रीफल की भाँति। कटि सिंह
जैसी है और (उसमें इतने गुण हैं) मानो वह गुण रूप समुद्र में अच्छी तरह
सराबोर की हुई है। उस शत शत चन्द्र जैसे मुखमयी-शत मयङ्क मुखी वेणी
क्या है; मानो भुजङ्ग ! (चिकनी-चिकनी) कदली जैसी जङ्घाएँ है और चरणों
में ऐसी गति है मानो उसने जलचर-हंस की चाल ही छीन ली है।”
हे हरिवंश दूतिके ! (ध्यान पूर्वक) सुन ! आज संध्या समय मेरी अपनी
जोड़ी (अत्यन्त अन्तरङ्ग प्रिया आत्म स्वरूपा श्रीराधा) को वन में अवश्य ही

१५८ • • हित चौरासी
मिला। यद्यपि वह भामिनि मानवती है फिर भी वह (अपने स्वभाव से) भली और
भोली है। (तेरे द्वारा मेरा निवेदन) सुन कर भी भला वह वहाँ कैसे बैठी रह
सकती है ? अवश्य आ मिलेगी।"

  • ४४ -
    अवतरण-श्रीलालजी के उक्त सन्देश को लेकर दूती नायिका श्रीराधा
    के समीप गयी और नायिका के रूप, गुण, यौवन, स्वभाव आदि की प्रशंसा
    करती हुई उसे नायक के समीप चलने के लिये प्रोत्साहित करने लगी।
    दूतिका-श्रीहित सजनी ने मानिनि नायिका श्रीप्रियाजी से कहा-
    सारङ्ग
    मूल- चलि सुंदरि बोली वृंदावन।
    कामिनि कंठ लागि किन राजहि,
    तूँ दामिनि मोंहन नौतन घन॥
    कंचुकी सुरंग विविध रँग सारी,
    नख जुग ऊन बने तरे तन।
    ये सब उचित नवल मोंहन कौं,
    श्रीफल कुच जोवन आगम धन॥
    अतिसै प्रीति हुती अंतरगत,
    (जैश्री) हित हरिवंश चली मुकुलित मन।
    निविड़ निकुंज मिले रस सागर,
    जीते सत रति राज सुरत रन॥४४॥
    भावार्थ-(दूतिका ने श्रीप्रियाजी से कहा-)"हे सुन्दरि ! चलो !! तुम्हें
    (प्रियतम ने) वृंदावन में बुलाया है। हे कामिनि ! तुम तो हो दामिनि जैसी और
    मोहन नूतन घन की भाँति। तब फिर तुम उनके कण्ठ में (घन में दामिनि की
    भाँति) लग कर क्यों नहीं शोभित होतीं ? हे प्यारी ! तुम्हारे तन पर जो यह
    सुरङ्ग कञ्चुकि, विविध रँगमयी साड़ी और सोलह शृङ्गार शोभित हैं तथा
    श्रीफल जैसे कुच मण्डल नवीन यौवन रूप धन, यह सभी कुछ नवल मोहन के
    ही लिये तो उचित है !"

हित चौरासी • • १५६
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (श्रीप्रियाजी के) हृदय में (श्रीलालजी
के लिये) अत्यन्त प्रीति थी; इसलिये प्रसन्न मन होकर (प्रियतम के निकट) चल
पड़ी और दोनों रस सागर, सघन निकुअ भवन में मिले; पश्चात् उन्होंने सुरत
युद्ध में शत शत काम देवों को जीत लिया।
टिप्पणी-
'नख जुग ऊन बने तेरे तन'
हाथ और पावों के क्रम से दस, दस के योग से सम्पूर्ण नखों की संख्या
बीस है। हाथों के नखों जुग ऊन अर्थात् दो कम कर देने से हाथ के आठ नख
और इसी प्रकार पैर के दस नखों में से जुग (=दो) ऊन (=कम) कर देने पर
आठ पैर के नख हुए इस तरह गणना सोलह (आठ+आठ) रही। "यही सोलह
हे राधे तेरे तन पर शोभित हैं।" यह कहने का भाव है कि तू सोलह शृङ्गारों से
युक्त है। इन सोलह शृङ्गारों का परिचय इस प्रकार है-
प्रथम सकल सुचि, मज्जन, अमल वास,
जावक सुदेश, केश पाश कौ सुधारिवौ।
अंग राग, भूषन विविध, मुख बास, राग;
कज्जल कलित, लोल लोचन निहारिवौ।।
बोलनि, हँसनि, चित चातुरी, चलनि चारु;
पल पल प्रति पतिव्रत प्रति पारिवौ।
'केसौदास' सविलास कहत प्रवीन राय;
यहि विधि सोरह सिंगारहू सिंगारिवौ।।
-केशवदास जी

  • ४५ -
    अवतरण-निभृत निकुअ भवन से निकल कर रसिक किशोर किशोरी
    ललित गल बहियाँ दिये मन्द मधुर गति से सखियों की ओर चले आ रहे हैं।
    साथ में ललिता आदि प्रवीण सखियाँ शोभा पा रही हैं; जिन्होंने इस युगल को
    नवीन नवीन दिव्य आभूषणों से अच्छी प्रकार सुसज्जित किया है। दर्शन करने

१६० • • हित चौरासी
वाली सखियाँ युगल की मनोहर शृङ्गार पूर्ण छवि का दर्शन करके मुग्ध हो
जाती है। तभी श्रीहित सखीजी अन्यान्य सखियों से श्रीप्रियाजी की उक्त दर्शनीय
छवि का वर्णन करती हुई, कहती हैं-
सारङ्ग
मूल-आवति श्रीवृषभानु दुलारी।
रूप रासि अति चतुर सिरोमनि अंग अंग सुकुमारी।।
प्रथम उबटि मज्जन करि सज्जित नील बरन तन सारी।
गुंथित अलक तिलक कृत सुंदर सैंदुर माँग सँवारी।।
मृगज समान नैन अंजन जुत रुचिर रेख अनुसारी।
जटित लवंग ललित नासा पर दसनावलि कृत कारी।।
श्रीफल उरज कँसूभी कंचुकि कसि ऊपर हार छवि न्यारी।
कृस कटि उदर गँभीर नाभि पुट जघन नितंबनि भारी।।
मनौं मृनाल भूषन भूषित भुज स्याम अंस पर डारी।
(जै श्री) हित हरिवंश जुगल करिनी गज विहरत वन पिय प्यारी।।
भावार्थ-(श्रीहित सखी ने कहा- हे सखियो !) अत्यन्त चतुर शिरोमणि,
रूप की राशि (अपार रूपवती) एवं अङ्ग-अङ्ग में परम सुकुमारी श्रीवृषभानु
दुलारी आ रही हैं। उन्होंने प्रथम तो उबटन पूर्वक स्नान किया है और तत्पश्चात्
अपने श्रीअङ्ग पर नील वर्ण की सारी सज्जित की है। उनकी अलक-लटें गुँथी
हुई हैं, ललाट पटल पर सुन्दर तिलक किया गया है और सिन्दूर से माँग भी
सँवारी गयी है। श्रीराधा के मृग छौने के से सुन्दर नयन अञ्जन से युक्त कजरारे
है और (उन नयनों की नोकों से आगे क्रमशः आगे बढ़ती हुई) रुचिर (कज्जल)
रेखा (नेफा) अनुसारी गयी है। सखि ! ललित नासिका पुट पर मणि-जटित
लवङ्ग (स्वर्ण पुष्प) शोभित है और दन्त पंक्ति भी (ताम्बूल, मिस्सीआदि रङ्गों से
रँगी हुई गहरी ललामी से) राग रञ्जित सी दिख रही है। कँसूभी कञ्चुकि के
द्वारा कसे हुए श्रीफल जैसे उरोजों के ऊपर लहराते हुए हारों की छवि कुछ
न्यारी (विलक्षण) ही है। अहा ! कटि तो अत्यन्त कृश (पतली) है, उदर पर
गम्भीर नाभि कुण्ड है और जघन तथा नितम्ब पुष्ट हैं-विशाल हैं।"

हित चौरासी • • १६१
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "वृषभानु दुलारी विविध भूषणों से
भूषित अपनी कमल नाल सी कमनीय बाहु लता को श्रीश्याम सुन्दर के कन्धे
(अंस) पर डाल कर ऐसे विहार कर रही हैं जैसे कोई गज गजी-करि करिणी
युगल। हे सखि ! इस प्रकार श्रीवन में पिय प्यारी (सदा) विहार ही करते रहते हैं।"
– ४६ –
अवतरण-श्रीवृन्दावन के सघन निकुञ्ज में युगल किशोर किसी
अनिर्वचनीय एकान्त सुरत विहार में निमग्न हैं। श्रीहित सखी उसका अवलोकन
करके परम आनन्दित हो रही हैं और सखियों से वर्णन करके उस रस का
मानों प्रवाह प्रवाहित कर रही हैं-
सारङ्ग
मूल-विपिन घन कुंज रति केलि भुज मेलि रुचि,
स्याम स्यामा मिले सरद की जामिनी।
हृदै अति फूल समतूल पिय नागरी,
करिनि करि मत्त मनौ विविध गुन रामिनी॥
सरस गति हास परिहास आवेस बस,
दलित दल मदन बल कोक रस कामिनी।
(जै श्री) हित हरिवंश सुनि लाल लावन्य भिदे,
प्रिया अति सूर सुख सुरत संग्रामिनी॥४६॥
भावार्थ-(श्रीहित सहचरि ने कहा-"सखी ! आज) शरद की रात्रि में
श्रीश्याम और श्यामा वृन्दावन की सघन कुञ्ज में मिले हैं, वे परस्पर गलबहियाँ
दिये रुचि पूर्वक रति विलास की क्रीड़ा कर रहे हैं। अरी! रस विलास में
समतुल्य (बराबर) प्रियतम एवं नागरी दोनों के हृदयों में अपार प्रसन्नता है
[वे रति केलि की रुचि के कारण ऐसे प्रतीत होते हैं] मानो मत्त करि एवं
करिणि नाना प्रकार की गुण कला पूर्वक रमण कर रहे हों। (उस रति केलि में)
कामिनि (श्रीप्रियाजी) ने अपनी सरस गति, हास परिहास (प्रेम) आवेश और
कोक रस के बल से कामदेव के दल के दल (समूहों को) दलित कर दिये-मथ
डाले हैं।"

१६२ • • हित चौरासी
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं" हे सखी ! सुन !! सुरत सुख सङ्ग्राम में
अत्यन्त शूर वीर प्रियाजी के लावण्य-अनुपम सौन्दर्य पर प्रियतम तल्लीन हो
गये-भिद गये।
– ४७ –
अवतरण-इस पद में वन विहार के अवसर पर श्रीलालजी के मन में
उत्पन्न हुए संभ्रम का वर्णन है। श्रीलालजी के मन में श्रीप्रियाजी से मिलने-
आलिङ्गन करने की तीव्र अभिलाषा जाग उठी है और प्रियाजी उनकी उस
अभिलाषा को समझ कर भी पूर्ण न करके अपितु छिपकर, झमक कर एक
प्रकार से धोखा दे रही हैं। वे वृन्दावन के पत्र पत्र, पुष्प पुष्प में अपना रूप
प्रकाशित कर देती हैं जिससे लालजी उनके यथार्थ रूप को नहीं पहचान
पाते-धोखा खा जाते हैं, तब वे सखियों के उपहास के पात्र भी बन जाते हैं
किन्तु फिर भी भेंट करने का लोभ संवरण न कर सकने के कारण वे भ्रमर का
रूप धारण करते और तब पत्र पुष्प राजित प्रिया रूप का आलिङ्गन करना
चाहते हैं...इत्यादि।
'प्रीति-विवश प्रेमी की स्थिति कैसी होती है ? इसका परिचय यही 'श्याम'
है' ऐसा सब परिकर ने स्वीकार किया। इस लीला और सिद्धान्त का पूर्ण
रसास्वाद श्रीहिताचार्य्य के श्रीवचनों से कीजिये-
सारङ्ग
मूल-वन की लीला लालहिं भावै।
पत्र प्रसून बीच प्रतिबिंबहिं नख सिख प्रिया जनावै।।
सकुच न सकत प्रकट परिरंभन अलि लंपट दुरि धावै।
संभ्रम देति कुलकि कल कामिनि रति रन कलह मचावै।।
उलटी सबै समझि नैननि में अंजन रेख बनावै।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रीति रीति बस सजनी स्याम कहावै।।४७।।
भावार्थ-श्रीलालजी को वन की लीला बड़ी प्यारी लगती है, तभी तो
उन्हे वहाँ के फूल पत्तों पर पड़े हुए प्रति बिम्बों में भी नख सिख प्रिया रूप ही