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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 275 में से

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पृष्ठ 164

१५८ • • हित चौरासी
मिला। यद्यपि वह भामिनि मानवती है फिर भी वह (अपने स्वभाव से) भली और
भोली है। (तेरे द्वारा मेरा निवेदन) सुन कर भी भला वह वहाँ कैसे बैठी रह
सकती है ? अवश्य आ मिलेगी।"

  • ४४ -
    अवतरण-श्रीलालजी के उक्त सन्देश को लेकर दूती नायिका श्रीराधा
    के समीप गयी और नायिका के रूप, गुण, यौवन, स्वभाव आदि की प्रशंसा
    करती हुई उसे नायक के समीप चलने के लिये प्रोत्साहित करने लगी।
    दूतिका-श्रीहित सजनी ने मानिनि नायिका श्रीप्रियाजी से कहा-
    सारङ्ग
    मूल- चलि सुंदरि बोली वृंदावन।
    कामिनि कंठ लागि किन राजहि,
    तूँ दामिनि मोंहन नौतन घन॥
    कंचुकी सुरंग विविध रँग सारी,
    नख जुग ऊन बने तरे तन।
    ये सब उचित नवल मोंहन कौं,
    श्रीफल कुच जोवन आगम धन॥
    अतिसै प्रीति हुती अंतरगत,
    (जैश्री) हित हरिवंश चली मुकुलित मन।
    निविड़ निकुंज मिले रस सागर,
    जीते सत रति राज सुरत रन॥४४॥
    भावार्थ-(दूतिका ने श्रीप्रियाजी से कहा-)"हे सुन्दरि ! चलो !! तुम्हें
    (प्रियतम ने) वृंदावन में बुलाया है। हे कामिनि ! तुम तो हो दामिनि जैसी और
    मोहन नूतन घन की भाँति। तब फिर तुम उनके कण्ठ में (घन में दामिनि की
    भाँति) लग कर क्यों नहीं शोभित होतीं ? हे प्यारी ! तुम्हारे तन पर जो यह
    सुरङ्ग कञ्चुकि, विविध रँगमयी साड़ी और सोलह शृङ्गार शोभित हैं तथा
    श्रीफल जैसे कुच मण्डल नवीन यौवन रूप धन, यह सभी कुछ नवल मोहन के
    ही लिये तो उचित है !"