हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १५६
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (श्रीप्रियाजी के) हृदय में (श्रीलालजी
के लिये) अत्यन्त प्रीति थी; इसलिये प्रसन्न मन होकर (प्रियतम के निकट) चल
पड़ी और दोनों रस सागर, सघन निकुअ भवन में मिले; पश्चात् उन्होंने सुरत
युद्ध में शत शत काम देवों को जीत लिया।
टिप्पणी-
'नख जुग ऊन बने तेरे तन'
हाथ और पावों के क्रम से दस, दस के योग से सम्पूर्ण नखों की संख्या
बीस है। हाथों के नखों जुग ऊन अर्थात् दो कम कर देने से हाथ के आठ नख
और इसी प्रकार पैर के दस नखों में से जुग (=दो) ऊन (=कम) कर देने पर
आठ पैर के नख हुए इस तरह गणना सोलह (आठ+आठ) रही। "यही सोलह
हे राधे तेरे तन पर शोभित हैं।" यह कहने का भाव है कि तू सोलह शृङ्गारों से
युक्त है। इन सोलह शृङ्गारों का परिचय इस प्रकार है-
प्रथम सकल सुचि, मज्जन, अमल वास,
जावक सुदेश, केश पाश कौ सुधारिवौ।
अंग राग, भूषन विविध, मुख बास, राग;
कज्जल कलित, लोल लोचन निहारिवौ।।
बोलनि, हँसनि, चित चातुरी, चलनि चारु;
पल पल प्रति पतिव्रत प्रति पारिवौ।
'केसौदास' सविलास कहत प्रवीन राय;
यहि विधि सोरह सिंगारहू सिंगारिवौ।।
-केशवदास जी
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अवतरण-निभृत निकुअ भवन से निकल कर रसिक किशोर किशोरी
ललित गल बहियाँ दिये मन्द मधुर गति से सखियों की ओर चले आ रहे हैं।
साथ में ललिता आदि प्रवीण सखियाँ शोभा पा रही हैं; जिन्होंने इस युगल को
नवीन नवीन दिव्य आभूषणों से अच्छी प्रकार सुसज्जित किया है। दर्शन करने