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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 275 में से

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पृष्ठ 160

१५४ • • हित चौरासी
वह अपने जिस प्रेम पथ पर चल रहा है, उसके लिये उसका वही अपना
सुपथ है। यदि इस 'प्रेम सुपथ' के सिवाय दूसरों के द्वारा इङ्गित किया हुआ
अन्य कोई सुपथ है भी; तो उस प्रेमी को उस सुपथ की आवश्यकता नहीं। वह
अपने एकान्त हृदय में जिस प्रेम और प्रेमास्पद को पाकर सुखी है, वे दोनों
उस प्रेमी के लिये कोटि कोटि ब्रह्मानन्द से भी महान् हैं अत्युच्च हैं। तभी तो
गोपियाँ श्रीकृष्ण की मधुर मुरली की तान पर और कर-स्पर्श मात्र पर
कोटि-कोटि ब्रह्म सुख को न्यौछावर कर देती हैं। वे कह उठती हैं-
ज्यौं करतल आभास कै कोटिक ब्रह्म लखाय।
सुधि बुधि सब मुरली हरी प्रेम ठगौरी लाय॥
प्रियतम सङ्ग और मिलन के समक्ष मुक्ति भुक्ति क्या वस्तु हैं ? मानों
उनकी कोई गणना ही नहीं ! वे प्रेम वावली गोपियाँ कह उठती हैं-
जौं नहिं लहियै सजन तौ धूरि मुकति मुँह दीन।
तभी तो गोकुल की इन कुल बधुओं पर गुरुजनों की उचित शास्त्रोक्त
शिक्षा का कोई असर ही नहीं हुआ; क्योंकि वे सभी प्रेमासक्त थीं न ! कविवर
विहारीलाल ने उनका प्रेम परिचय देते हुए कहा है-
किती न गोकुल कुल बधू काहि न केहि सिख दीन।
कौन जु तजी न कुल गली, ह्रै मुरली सुरलीन॥
ठीक भी तो है। जब प्रेम देवता किसी की कानि विचारें तब न। वे तो
किसी की कुछ मानते ही नहीं। अनन्तः गोकुल की कुल बधुओं ने भी वही
किया, जो उनसे प्रेम ने कराया; क्योंकि वे बेचारी विवश थीं, अशक्त थीं।
इस पद में श्रावण सरिता, नाद मुग्ध हरिण एवं दीपक मुग्ध शलभ के
उदाहरण मूढ़ जाति के प्रेमियों के हैं। अतएव यहाँ केवल यह समझने की
आवश्यकता है कि प्रेमी विवेक शून्य होता और प्रेम पर मिटना जानता है। जिस
प्रेम में लाभ हानि विचार पूर्वक प्रेम करने की प्रेरणा है वह प्रेम नहीं है केवल प्रेम
की भ्रमात्मक छाया है, क्योंकि वह प्रेम किया गया है, स्वभावतया हुआ नहीं है
और प्रेम तो वही है जो अपने आप प्रकट हो जाय। किसी शायर ने क्या ही
अच्छा कहा है-