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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 275 में से

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पृष्ठ 156

१५० • • हित चौरासी
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं( किंतु उपरोक्त एक निष्ठा के
विपरीत) जो प्रेम चपल भ्रमर की भाँति (क्षण क्षण में) अन्य अन्य किन्हीं से
बनता (और बिगड़ता भी) रहता है वह तो विनाशी है, नश्वर है। (किमधिकं प्रेम
ही नहीं है।)
(अब) जो (उपासक प्रेमी) श्रीलालजी को भी छोड़ (अलग रख) कर इस
(प्रेम मर्यादा) मैंड को पहचानता है वही चतुर है—सच्चा विवेकी है।
टिप्पणी—लालहिं छाड़ि मैंड पहिचानैं—
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु के द्वारा प्रकाशित उपासना मार्ग का लक्ष्य
केवल परात्पर प्रेम तत्व है। प्रेम के सिवाय न प्रिया है न प्रियतम श्रीकृष्ण ही।
वरं ये दोनों प्रेमी प्रेमास्पद श्रीराधावल्लभ लाल भी इस उपासना में प्रेम के दो
रूपान्तरों में ही स्वीकार किये गये हैं। जैसा कि महात्मा श्रीलाड़िली दास जी ने
कहा है—
गौर स्याम सीसीनु में भरयौ रंग अनुराग।
और—
नव किसोर सुकुमार तन मृदु भुज मेले अंस।
जोरी सनी सनेह रस प्रकट करी हरिवंश।।
-हित ध्रुवदास जी
अर्थात् श्रीहरिवंश ने तो स्नेह रस सनी हुई 'जोरी' श्रीराधावल्लभ लाल
को प्रकट किया, अतएव इस प्रेम तत्व के यही प्रकाशक हुए। श्रीहित ध्रुवदास
जी इस बात की साक्षी भर रहे हैं—
प्रकट प्रेम कौ रूप धरि, श्रीहरिवंश उदार।
राधावल्लभ लाल कौ, प्रकट कियौ रस सार।।
उक्त कथन पर से यह समझने की बात है कि इस श्रीहरिवंशोदित
प्रेमोपासना में सामान्य उपासना की त्रिपुटी (उपास्य, उपासक और उपासना)
का लोप होकर अन्ततः केवल एक ही वस्तु की सिद्धि होती है और वह सिद्ध
तत्व है प्रेम।