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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अ० २३] भाषाटीकासमेता । (११९)
अथ यवपोलिकाका गुण ।
पोलिका कथिता बल्या कफदोषकरी मता ॥
वृष्या वीर्य्यप्रदा ज्ञेया दोषला वीर्य्यवर्द्धिनी ॥ ३५ ॥
विदलान्नस्य या पर्णा सिद्धा कर्परकेण तु ॥
रुच्या वान्नविशेषेण दोषान् सर्वान् विभावयेत् ॥ ३६ ॥
जवोंकी पोली बलमें हित है, कफदोषको करती है, वीर्यमें हित है, वीर्यको देती है, दोषोंको
उपजाती है और वीर्य्यको बढ़ाती है ॥ ३५ ॥ और तंदूरपर पकायी हुई रोटी रुचिमें हितहै,
ऐसे ही अन्नके दोषके अनुसार सब पदार्थोंको विचारे ॥ ३६ ॥
अथ अन्नके गुणोंका उपसंहार ।
अन्यानि चान्नपानानि नैवोक्तानि महामते ॥
ग्रन्थविस्तारभीरुश्च लोको वक्तुं न च क्षमः ॥ ३७ ॥
हे महामते ! अन्य अन्न और पान नहीं कहे हैं, क्योंकि ग्रन्थके बढ़ जानेसे संसारके लोक
विचारनेको समर्थ नहीं हो सकेंगे ॥ ३७ ॥
अथ थके हुए मनुष्यका भोजननिषेध ।
श्रमात्तु भोजनं यस्तु पानं वा कुरुते नरः ॥
ज्वरः संजायते तस्य छर्दिर्वा तत्क्षणाद्भवत् ॥ ३८ ॥
जो मनुष्य परिश्रम करके शीघ्र भोजनको अथवा पानको करता है, उसके शीघ्र ही ज्वर
अथवा छर्दि उपजती है ॥ ३८ ॥
अथ भोजनके उपरांत मेहनत और सुरतका निषेध ।
कृत्वा तु भोजनं सद्यो व्यायामं सुरतं तथा ॥
यः करोति विपत्तिः स्यात्तस्य गात्रस्य निश्चितम्॥ ३९॥
जो मनुष्य भोजनको करके तत्काल कसरतको अथवा मैथुनको करता है उसके शरीरमें
निश्चय दुःख हो जाता है ॥ ३९ ॥
अथ ठंडा और गरम भोजनका निषेध ।
न चातिशीतं भुञ्जीत नात्युष्णं भोजने हितम् ॥
कुर्य्याद्वातकफौ शीतमुष्णं भवति सारकम् ॥ ४० ॥
अतिशीतल पदार्थको खावे नहीं और अति गरम भोजन भी हित नहीं है, क्योंकि शीतल
भोजन वातको और कफको करता है, गरम भोजन दस्तावर है ॥ ४० ॥
श्रमित आदिकोंके भोजनका निषेध ।
न श्रान्तो भोजनं कुर्य्यान्न व्यायामसमाकुलः ॥
विषमासने न भोक्तव्यं करोति विविधान्गदान् ॥ ४१ ॥

( १२० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
परिश्रमसे थका हुआ और कसरतसे थका हुआ मनुष्य भोजनको करे नहीं और विषम
आसनपर बैठके भोजनको करे नहीं ये अनेक प्रकारके रोगोंको करते हैं ॥ ४१ ॥
भोजनमें फलादिकोंका नियम।
आदौ फलानि भुञ्जीत वर्जयित्वा तु कर्कटीम् ॥
न नक्तं दधि भुञ्जीत भोजनाद्धे न धावनम् ॥४२ ॥
काकडीके बिना सब फलोंको आदिमें खावे रात्रिमें दहीको नहीं खावे और भोजनके
बीचमें उठकर नहीं भागे ( अर्थात् आधा भोजन करके उठना फिरना फिर भोजन करना
उचित नहीं ) ॥ ४२ ॥
भोजनके पीछे बैठनेका नियम ।
भोक्तोपविशति स्थौल्यं बलमुत्तानशायिनः ॥
आयुर्वामकटिस्थितस्य मृत्युर्धावति धावतः ॥ ४३ ॥
जो भोजनको करके बैठता है वह स्थूलपनेको प्राप्त हो जाता है और भोजन करके सीधा
शयन करनेवालेका बल बढ़ता है, भोजन करके बायें करवट शयन करनेसे आयु बढता
है और भोजन करके दौड़नेसे मृत्यु दौड़ती है ॥ ४३ ॥
भोजनमें पानीका नियम ।
नचादौ सलिलं पेयं भोजने पानमाचरेत्॥अर्द्धाहारेण भुञ्जीत तृ-
तीयं व्यञ्जनेन तु॥४४॥चतुर्थं तोयपानेन पूर्णाहारःसुजायते॥४५॥
भोजनके आदिमें पानीको नहीं पीवे भोजन करते हुए पानीको पीवे दो भागके कोष्ठको
भोजनसे पूरित करे और तीसरे भागको व्यंजनसे पूरित करे ॥ ४४ ॥ और चौथे भागको
पानीसे पूरित करे ऐसे पूर्ण भोजन होता है ॥ ४५ ॥
भोजनके ऊपर व्यायाम ।
भोजनोध्वं चंक्रमेत शतपादं शनैः शनैः ॥
पश्चादुत्तानशयनं ततो वामे क्षणं स्वपेत् ॥ ४६ ॥
और भोजन करके सौ १०० पैर हौले हौले चले, पीछे सीधा शयन कर पीछे बायें करवट
दो घडी शयन करे ॥ ४६ ॥
अथ भोजनके उपरांत नेत्रादिकोंका मार्जन।
भुक्त्वोपरि समाचम्य मार्जयेद्दक्षिणाकरैः ॥
पुनर्दक्षिणहस्तेन मार्जयेदुदरं सुधीः ॥ ४७ ॥
भोजन करके पीछे आचमन ले, दाहिने हाथसे मुखको शुद्ध कर पीछे दाहिने हाथ करके
बुद्धिमान् पेटको शोधित करे ॥ ४७ ॥

अ० २३ ] भाषाटीकासमेता । ( १२१ )
अथ अङ्कारका नियम ।
उद्गीरयेत्समुद्गारं न चोद्गारस्य धारणा ॥ ४८ ॥
अङ्कारको अच्छी तरह लेवे, क्योंकि अङ्कारको धारित करना अच्छा नहीं ॥ ४८ ॥
अथ व्यायामादिकोंका नियम ।
व्यायामं च व्यवायं च धावनं पानमेव च ॥ युद्धं गीतं च पाठं च
क्षणमुक्तो विवर्जयेत् ॥ ४९ ॥ न सद्यः पीते पठनं गमनं च न
कारयेत् ॥ न वा वाहनमारोहं विवादं न च कारयेत् ॥ ५० ॥
और भोजन करके दो घडीतक कसरत, मैथुन, दौडना अदि शुद्धि, जलआदिका पान और
कुस्ती आदि युद्ध, गाना, पढ़ाना, इनको वर्जे ॥ ४९ ॥ और तत्काल पानीको पीके पठन और
गमनको न करे । बोझाको उठावे नहीं, सवारी आदिपर चढ़े नहीं, विवादको करेनहीं ॥५०॥
अथ दिनमें शयन करनेका निषेध ।
दिवास्वापं न कुर्य्यात्तु भुक्त्वोपरि च विश्रमेत् ॥ अकालशय-
नाच्छ्लेष्मा प्रतिश्यायः प्रपीनसः ॥५१॥ क्षयशोफशिरोऽर्त्तिश्च
जायते चाग्निमान्द्यता ॥ ५२ ॥
और दिनमें शयनको करे नहीं किंतु भोजनकरके विश्राम करे, अकालमें शयन करनेसे कफ,
जुकाम, पीनसरोग ॥ ५१ ॥ क्षय, शोजा, शिरमें पीड़ा, मंदाग्नि ये उपजते हैं ॥ ५२ ॥
अथ दिनमें शयन कराने लायक मनुष्य ।
मद्यपीते परिश्रान्ते हिक्काश्वासाहुरेषु च ॥ भयशोकक्षुधार्त्तानां
पठानान्मैथुनेन च ॥ ५३ ॥ तथैव वृद्धबाले च भाराक्रान्ते
तथातुरे ॥ अतीसारे च शोफे च तृष्णापानात्ययेऽपि च ॥ ५४ ॥
ग्रीष्मे बाल्ये निशाह्रस्ते दिवा स्वप्नं हितं भवेत् ॥ ५५ ॥ इति आ-
त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे अन्नपानवर्गो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः
॥ २३ ॥ प्रथमस्थानं समाप्तम् ॥ १ ॥
मद्यपान करनेमें, परिश्रमसे थकनेमें, हिचकी और श्वासकी पीड़ामें, भय, शोक और भूख
इनमें, पठन और मैथुनमें ॥ ५३ ॥ वृद्धपना, बालकपना इनमें, बोझेसे थकनेपर, रोगमें
अतीसार और शोजामें, तृषा और पानात्यय रोगमें ॥ ५४ ॥ ग्रीष्मऋतुमें, बाल्यावस्थामें, रात्रि-
के जागनेमें दिनको शयन करना हित है ॥ ५५ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरवि-
दत्तशाह्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने अन्नपानवर्गो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः २३
यहां प्रथमस्थान समाप्त हुआ ।

अथ द्वितीयस्थानम् ।
प्रथमोऽध्यायः १.
आत्रेय उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि द्वितीयस्थानमुत्तमम् ॥
शुभाशुभानि स्वप्नानि स्वास्थ्यारिष्टानि मानुषे ॥ १ ॥ शृणु
पुत्र समासेन यथा वत्स प्रकाश्यते ॥ २ ॥
आत्रेयजी कहते हैं—अब उत्तम द्वितीयस्थानको कहता हूं । मनुष्योंके शुभ-
अशुभ, स्वप्न, स्वस्थपना, अरिष्ट ॥ १ ॥ इनको हे पुत्र ! विस्तारसे सुनो । जैसे हे वत्स !
प्रकाशित किया जाता है ॥ २ ॥
हारीत उवाच ॥ ज्ञातं मया महाप्राज्ञ अन्नपानं तथोत्तमम् ॥
इदानीं ज्ञातुमिच्छामि रोगाणां रोगविज्ञताम् ॥ ३ ॥ कर्मजा
व्याधयो य च तान्वद त्वं महामते ॥ ४ ॥
हारीत बोले—हे महाप्राज्ञ ! अन्नपानकी विधि मैंने जानी । अब रोगवालोंके
रोगोंको जाननेकी इच्छा करता हूं ॥ ३ ॥ हे महामते ! कर्मसे जो व्याधियां उपजतीं हैं
उन्हें आप कहें ॥ ४ ॥
आत्रेय उवाच ॥ कर्मजा व्याधयः सर्वे भवन्ति हि शरीरिणाम्॥
सर्वे नरकरूपाः स्युः साध्यासाध्या भवन्त्यमी ॥५॥ अज्ञातं
यत्कृतं पापं पश्चात्कृच्छ्रं समाचरेत्॥प्रायश्चित्तबलेनापि साध्य-
रूपो भवेद्गदः ॥६॥ क्रियते ज्ञातरूपेण यत्पश्चात्कृच्छ्रमाचरेत्॥
प्रायश्चित्तेन प्रान्ते तु कष्टसाध्यो भवेद्गदः ॥७॥ ब्रह्मघ्नगोध्न-
धरणीपतिघातकश्च आरामतोयधरनाशकपारदाराः ॥ स्वाम्य-
ङ्गनागुरुवधूकूलजामिगामी एते त्रयोदशविधाः प्रबला गदाश्च
॥८॥ पाण्डुः कुष्ठं राजयक्ष्मातिसारो मेहो मूत्रं चाश्मरी मूत्र-
कृच्छ्रम् ॥ शूलः श्वासः कासशोफव्रणाश्च दोषाश्चैते पापरूपा

अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १२३ )

नृणां स्युः ॥९॥ ज्वरो जीर्णं तथा छर्दिभ्रममोहाग्निमान्द्यताः॥
यकृत्प्लीहार्शःशोषाश्च एते चैवोपदूषकाः ॥ १० ॥ व्रणं शूलं
शिरःशूलं रक्तपित्तं तथोर्द्धगम्॥एते रोगा महाप्राज्ञ अभिशा-
पाद्भवन्ति हि ॥११॥ अन्येऽपि बहुधा रोगा जायन्ते दोषस-
म्भवाः ॥ अतो वक्ष्य समासेन शृणु त्वं च महामते ॥१२ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-शरीरधारियोंके कर्मसे उपजनेवाली सब व्याधियां हैं और
सब दुःखरूप हैं साध्य और असाध्य होती हैं ॥५॥ बिना जाने जो किये हुए पापके पीछे कृच्छ्र
चांद्रायण करे, क्योंकि प्रायश्चित्तके बलसे वह पाप साध्य हो जाता है॥६॥जानके पाप करनेके पीछे
कृच्छ्रचांद्रायण करनेसे कष्टसाध्य रोग हो जाता है ॥ ७ ॥ ब्राह्मणको मारनेवाला, गायको
मारनेवाला, राजाको मारनेवाला और बाग तथा जलके स्थानको नाशनेवाला और पराई स्त्रीको
अपनी स्त्री बनानेवाला और स्वामीकी भार्या, गुरुकी भार्या,अपने कुलमें उपजी ऐसी स्त्रियोंसे
भोग करनेवाला ऐसे मनुष्योंके तेरह प्रकारके रोग होते हैं॥ ८ ॥ पांडु, कुष्ठ, राजरोग,
अतीसार, प्रमेह, मूत्ररोग, पथरीरोग, मूत्रकृच्छ्र, शूल, श्वास, खांसी, शोजा, घाव ये पापरूपरोग
उन मनुष्योंके उपजते हैं ॥ ९ ॥ और ज्वर,अजीर्ण छर्दि,भ्रम,मोह,मंदाग्नि, यकृतरोग,तिल्लीरोग,
बवासीर, शोष ये उपरोग कहाते हैं ॥ १० ॥ घाव,शूल, शिरका शूल, शरीरके ऊपरले अंगोंमें
प्राप्त हुआ रक्तपित्त ये रोग हे महाप्राज्ञ ! अभिशापसे होते हैं ॥ ११ ॥ अन्य भी बहुतसे रोग
दोषोंसे उपजते हैं इसवास्ते विस्तारसे मैं कहूँगा । हे महामते तुम सुनो ॥ १२ ॥
अथ कर्मविपाक ।
ब्रह्मघ्नो जायते पाण्डुः कुष्ठी गोवधकारकः॥राजघ्नो राजयक्ष्मी
स्यादतिसार्योपघातकः ॥ १३ ॥ स्वाम्यङ्गनाभिगमने मेहा
रोगा भवन्ति हि॥गुरुजायाप्रसङ्गेन मूत्ररोगोऽश्मरीगदः ॥१४॥
स्वकुलजाप्रसङ्गाच्च जायते च भगंदरः॥शूली परोपतापी च पैशू-
न्याच्छ्वासकासिनः॥१५॥मार्गे विघ्नकरा ये तु जायन्ते पादरो-
गिणः ॥ अभिशापाद्व्रणोत्पत्तिर्यकृद्धापि प्रजायते ॥ १६ ॥
सुरालये जले चापि शकृद्दृष्टिं करोति यः॥गुदरोग़ा भवन्त्यस्य
पापरूपातिदारुणाः ॥१७॥ परतापिद्विजानां च जायन्ते हि

( १२४ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
महाज्वराः॥परान्नविघ्नजननादजीर्णमपि जायते ॥१८॥ गरद्-
श्चर्दिरोगी स्यात्पादाष्टविभ्रमी तथा॥धूर्त्तोऽपस्माररोगी स्या-
त्कदन्नदेऽग्निमान्द्यकम्॥१९॥यकृत्प्लीहो भवेद्रोगो भ्रूणपातकपा-
तकात्॥व्रणं शूलं शिरःशूलं परतापोपकारणात्॥२०॥अपेयपा-
नरतको रक्तपित्ती प्रजायते ॥ दावाग्निदायको यस्तु जायते च
विसर्पवान्॥२१॥बहुवृक्षोपच्छेदी च जायते च बहुव्रणः ॥ पर-
द्रव्यापहाराच्च जायते ग्रहणीगदः ॥२२ ॥ कुनखी स्वर्णस्तेयाच्च
प्रसूतिस्तस्य जायते ।। रौप्यस्तेयाच्चित्रकुष्ठं ताम्रचौराद्विपा-
दिका ॥२३॥ त्रपुश्चौरः सिध्मलश्च मुखरोगी च सीसहृत्॥वर्वरो
लोहचौरः स्यात्क्षारचौरोऽतिमूत्रलः ॥२४॥ घृतचौरोऽन्तरोगी
च तैलचौरोऽतिकण्डुकः॥एतैश्चिह्नैस्तु काणाक्षो वक्रोक्तो वक्र-
लोचनः॥२५॥ दोषवान्स्याच्छ्यावदन्तो दुष्टवाक्कुष्ठदूषणः ॥
रसनाशाज्जिह्वारोगी गोत्रहा लूतिकाव्रणी॥२६॥एते चैव महा-
दोषा अतो वक्ष्यामि निष्कृतिम् ॥कृच्छ्रेण येन सिध्यन्ति पाप-
रूपा इमे गदाः ॥ २७ ॥
ब्राह्मणको मारनेवाला पांडुरोगी होता है,गायको मारनेवाला कुष्ठी होता है, राजाको मारने-
वाला राजरोगी होता है, मनुष्यको मारनेमें सलाह देनेवाला अतीसाररोगी होता है ॥१३॥
स्वामीकी स्त्रीसे भोग करनेसे प्रमेह रोग उपजता है और गुरुकी स्त्रीसे भोग करनेमें मूत्ररोग और
पथरी रोग उपजता है॥१४॥ अपने कुलसे उपजी स्त्रीके संग भोग करनेसे भगंदर रोग उपजता
है, पराये सुखको देख दुःख पानेवालेको शूलरोग होता है, चुगली करनेसे श्वास रोग और खांसी
उपजती है ॥१५॥ मार्गमें विघ्न करनेवालोंके पैरोंमें रोग उपजता है,अभिशापसे घावकी उत्पत्ति
अथवा यकृत् रोग उपजता है ॥ १६ ॥ देवताओंके स्थानमें और पानीमें जो विष्ठाको गेरता है
उसके पापरूपी और दारुण ऐसे गुदाके रोग उपजते हैं ॥१७॥ ब्राह्मणको दुःख देनेसे महा-
ज्वर उपजता है और पराये भोजनमें विघ्नको करनेसे अजीर्ण रोग उपजता है ॥ १८॥ विषको
देनेवालेके छर्दिरोग उपजता है अथवा वह रोगी घुटनोंसे आठ दिशातक भ्रमनेवाला होता है,
धूर्त मनुष्यके मृगीरोग उपजता है और कुत्सित अन्नको देनेवाला मन्दाग्निसे
पीडित होता है ॥ १९ ॥ गर्भको गिरानेवाला यकृत्रोगसे और तिल्लीरोगसे
पीडित होता है, ॥ दूसरेको देख दुःख पानेसे घाव, शूल, शिरका शूल ये उपजते हैं ॥२०॥
नहीं पीनेके योग्य चीजको पीनेवाला रक्तपित्तसे पीडित होता है और वनमें अग्निको

अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १२५ )
लगानेवाला विसर्परोगी हो जाता है ॥ २१ ॥ बहुतसे वृक्षोंको छेदनेवाला बहुत घावोंसे पी-
ड़ित होता है और पराये द्रव्यको हरनेसे ग्रहणी रोग उपजता है ॥ २२ ॥ सोनेकी चोरी कर-
नेसे कुत्सित नखोंवाला हो जाता है, चांदीको चोरनेसे चित्रकुष्ठ उपजता है, तांबको चुरानेसे वि-
पादिका कुष्ठ उपजता है ॥ २३ ॥ रांगको चुरानेसे सेपरोग होता है, सीसाके चुरानेसे मुखरोग
उपजता है, लोहाको चुरानेसे बर्बर संज्ञक रोगको प्राप्त होता है, क्षारको चोरनेवालेको अति-
मूत्ररोग उपजता है ॥ २४ ॥ घृतको चोरनेसे आंतरोग होता है, तेलको चोरनेसे खाजरोग उप-
जता है, दूसरोंमें छिद्रको काढ़नेवाला नेत्रोंसे काणा होता है और टेढ़ा बोलनेवाला टेढ़े नेत्रों-
वाला होता है ॥ २५॥ दोषवालेके काले दंत होते हैं, दुष्टकर्मको करनेवाला कुष्ठरोगी होता है,
रसको नाशनेवाला जीभरोगी होता है, गोत्रके मनुष्योंको नाशनेवाला भूत और घावसे पीड़ित
होता है ॥ २६ ॥ ये सब महादोष हैं इसलिये इनकी निष्कृतिको कहता हूँ जिस कृच्छ्रसे ये
पापरूपी रोग सिद्ध होते हैं ॥ २७ ॥
अथ पाप दोषोंका प्रतिकार ।
गोदानं भूमिदानं च स्वर्णदानं सुरार्चनम् ॥ कृत्वा पश्चात्प्रती-
कारं कुर्यात्पाण्डूपशान्तये ॥२८॥ महापापेषु सर्वस्वं तदर्द्ध-
मुपदोषजे॥ आत्रेयाद्दशषष्ठांशात्कल्प्यं व्याधिबलाबलम्॥२९॥
नवषष्टिकृतं कर्म कुष्ठरोगोपशान्तये ॥ गोभूहिरण्यदानं च तथा
मिष्टान्नभोजनम् ॥ ३० ॥ चतुर्विधं दानमिदं दत्त्वा कुर्यात्प्र-
तिक्रियाम्॥ कदाचिदपि सिध्येत आयुषश्च बलक्रियाम्॥३१॥
मेहे सुवर्णदानं च शूले श्वासे भगन्दरे॥आश्वानडुहदानेन श्वास-
कासाद्विमुच्यते॥३२॥ज्वरे चेश्वरपूजा च रुद्रजाप्यं समाचरेत् ॥
अतिपानान्नदानं च शस्त्रदानं अमातुरे ॥ ३३ ॥ अग्निहोमं
चाग्निमान्द्ये कन्यादानं च गुल्मके॥ मेहाश्मरीविनाशाय
लवणं च प्रदीयते ॥ ३४ ॥ बहुभोजनदानेन शूलरोगाद्विमु-
च्यते ॥ महाज्वरे शान्तिकं च सहस्रं गण्डुकं शिवम् ॥३५ ॥
स्नापयेत्तेन सिद्धिः स्याज्ज्वररोगाद्विमुच्यते॥ घृतमधुप्रदानेन
रक्तपित्तं प्रशाम्यति ॥ ३६ ॥ वनस्पतिसिञ्चनेन विसर्पात्परि-
मुच्यते ॥ विटपिसिञ्चनेनाथ नात्र याति बहुव्रणः ॥ ३७ ॥
चतुर्विधेन दानेन साध्यः स्याद्ग्रहणीगदः ॥ सुवर्णदानात्कुनखी

( १२६ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
श्यावदन्तः सुखी भवेत् ॥ ३८ ॥ रौप्यदानाच्चित्रकुष्ठं साध्यं
वापि प्रदिश्यते॥सिध्मले त्रपुदानं च बर्बरे लोहदानकम्॥३९॥
मुखव्रणे नागदानं गोदानं बहुपुत्रके॥नेत्ररोगे घृतं दद्यात्सुगन्धं
नासिकागदे ॥४० ॥ तैलदानं च कण्डूके रसदानं च जिह्वके॥
श्यावदन्तेन देवानां सत्कृतिः प्रविधीयते॥ ओष्ठरोगेऽपि तद्वच्च
लूतारोगे ददेत गाः ॥ ४१ ॥
गोदान,पृथिवीदान,सोनादान, देवताओंकी पूजा इनको करके पीछे पांडुरोगकी शांतिके लिये
चिकित्साको करे ॥ २८ ॥ महापापोंमें सर्वस्वका दान करे और उपदोषमें घरके धनसे आधा
दान करे । आत्रेयके मतसे व्याधिके बल और अबलको देख घरके धनसे सोलहवां हिस्सा दानको
करे ॥ २९ ॥ कुष्ठरोगकी शांतिके लिये उनहत्तर ६९ प्रकारका कर्म्म करना लिखा है परंतु
गाय भूमि सोनेका दान और मिष्टअन्नका भोजन ॥ ३० ॥ इन चार प्रकारके दानोंको देकर
पीछे कुष्ठकी चिकित्सा करनी,क्योंकि आयुकी शेषतासे कदाचित् चिकित्सा सिद्ध भी हो जाती है
॥ ३१ ॥प्रमेह,श्वास रोग, खांसी,भगंदर इन रोगोंमें सोनेका दान करना, घोड़ा और बैलके दानको
करनेसे मनुष्य श्वासरोग और खांसीसे छुट जाता है॥ ३२॥ ज्वररोगमें महादेवकी पूजा और महा-
देवके स्तोत्रका पाठ करावे और भ्रमरोगमें पानीका और अन्नका दान श्रेष्ठ है ॥ ३३॥ मंदाग्नि
में अग्निमें होम करे, गुल्मरोगमें कन्याका दान करे और प्रमेह तथा पथरीरोगको
दूर करनेके लिये नमकका दान करना ॥ ३४ ॥ बहुतसे भोजनका दान कर-
नेसे मनुष्य शूलरोगसे मुक्त होता है, महाज्वरमें शांतिकर्म करावे और हजारधारावाले कलशेसे
शिवको स्नान करावे ॥ ३५ ॥ इससे सिद्धि होती है और महाज्वर दूर होता है, घृत और
शहदके दानसे रक्तपित्त दूर होता है ॥ ३६ ॥ वनस्पतिको सींचनेसे विसर्परोग दूर होता है,
वृक्षको सींचनेसे घावरोग दूर होता है ॥ ३७॥ चार प्रकारके दानसे ग्रहणी रोग साध्य हो जा
ता है, सोनेके दानसे कुनखी और काले दांतोंवाला सुखी होता है ॥ ३८ ॥ चांदीके दानसे
श्वित्रकुष्ठ साध्य कहा है, सीपरोगमें रांगका दान और बर्बररोगमें लोहेका दान श्रेष्ठ है
॥ ३९ ॥ मुखके घावमें हस्तीका दान हित है और पापडीरोगमें गौका दान हित है, नेत्ररोगमें
घृतको देवे,नासिकाके रोगमें सुगंधका दान करना ॥ ४० ॥ खाजमें तेलका दान और जीभके
रोगमें रसका दान करना, कालें दांतोंके रोगमें देवताओंका सत्कार करना और ओष्ठरोगमें भी
यही विधि है और लूतारोगमें गौका दान देना ॥ ४१॥
अथ अन्यान्य रोगोंका कारण ।
अन्यांश्च कथयिष्यामि मनुष्याणां शरीरगान्॥लज्जितः परनिं-
न्दायां परतर्केण काणगः ॥ ४२ ॥ खरहा स्याद्वक्रनासः पक्षा-

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १२७ )
घातेन पक्षहा ॥ वामनः स्वप्रशंसायां परद्वेष्टातिपिङ्गलः ४३ ॥
परस्य कृत्यकर्त्ता च जायते विकृतात्मकः॥ एते महारोगाश्चान्ये
जायन्ते पापसम्भवाः ॥४४॥ यदि वात्र न सिध्येत्तु परभावो
भवेन्न च ॥ अतो हि प्रायश्चित्तं तु कारयेद्भिषजां वरः ॥४५॥
भूयो जन्मान्तरे यावत्पापं रोग्यथ भुञ्जति ॥ प्रायश्चित्ते कृते
वापि न पुनर्जायते भवे ॥ ४६ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतो-
त्तरे द्वितीयस्थाने पापदोषप्रतीकारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
मनुष्योंके शरीरमें प्राप्त हुए अन्य रोगोंको भी कहूँगा । परायी निंदा करनेवाला मनुष्य लाज-
वाला होता है, दूसरेको तर्क करनेवाला मनुष्य काणा होता है ॥४२॥ गधाको मारनेवाला टेढ़ी
नासिकासे संयुक्त होता है, दूसरेके पक्षको काटनेवाला मनुष्य अर्द्धांगरोगसे पीड़ित होता है,
अपनी प्रशंसा करनेमें मनुष्य वामनाकी योनिको प्राप्त होता है, दूसरोंसे वैर करनेवाला मनुष्य
अतिपिंग शरीरवाला होता है ॥ ४३ ॥ दूसरेके कृत्यको करनेवाला मनुष्य विकृत शरीरवाला
होता है ये सब और भी अन्य महारोग पापसे उपजनेवाले हैं ॥४४॥ यदि रोग सिद्ध न होवें
तो वैद्यवर रोगीको प्रायश्चित्त करावे ॥ ४५ ॥ किये हुए पापको दूसरे जन्ममें भी रोगी भोगता
है परन्तु प्रायश्चित्तके करनेमें फिर वह पापरूपी रोग नहीं उपजता है ॥ ४६ ॥
इति वेरीनिनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
द्वितीयस्थाने पापदोषप्रतीकारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः २.
अथ स्वप्नाध्यायका वर्णन ।
आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र समासेन यथा वत्स प्रकाश्यते ॥
तथारिष्टपरिज्ञानं भेषजं संप्रवक्ष्यते ॥ १ ॥
आत्रेय जी कहते हैं-हें पुत्र ! विस्तारसे जैसे प्रकाशित किया जाता है वैसे ही अरि-
ष्टके परिज्ञानको और औषधको सुनो ॥ १ ॥
अथ वर्ज्य स्वप्न ।
वातिकाः पैत्तिकाश्चैव भयाद्धीनबलादपि ॥
मूत्रान्विष्टे सपित्ते च षट्स्वप्नानि च वर्जयेत् ॥ २ ॥

(१२८) हारीतसंहिता। [द्वितीयस्थाने-
वात, पित्त, भय, हीनबल, मूत्रकी शंका, पित्तका संयोग इनके संयोगसे उपजे ये छः
स्वप्न वर्जित हैं ॥ २ ॥
अथ कालसे स्वप्नफल ।
संवत्सरेण फलदो हि भवेन्निशायां स्वप्नोऽशुभस्य प्रहरे च
शुभस्य वाद्ये ॥ स्याद्वत्सरार्द्धमतियाममथ द्वितीये मासत्रयेण
फलदो भवति तृतीये ॥ ३ ॥ निशावसाने प्रवदन्ति किञ्चिद-
शाहकः स्यात्फलदो मनुष्ये॥वर्षादिने स्यात्तमुशन्ति शान्ताः
षाण्मासिको मध्यदिने प्रदिष्टः॥ ४ ॥
रात्रिके प्रथम पहरमें आया स्वप्न एक वर्षमें शुभ फलको देता है और दूसरे पहरमें आया
स्वप्न छः महीनोंमें फलको देता है और तीसरे पहरमें आया स्वप्न तीन महीनोंमें फलको देता है
॥ ३ ॥ रात्रिके अन्तमें आया स्वप्न दश दिनमें फलको देता है और वर्षामें दुपहरीके समय
आया स्वप्न छः महीनोंमें फलको देता है ॥ ४ ॥
अथ स्वप्नमें शुभ द्रव्य ।
स्वप्नेषु शुभ्राणि शुभानि धीराः सर्वाणि चेमानि विवर्जयित्वा ॥
कार्पासभस्मास्थिकपालशूलं कुर्यान्नराणां विपदं रुजं वा॥५॥
सब श्वेत पदार्थ स्वप्नमें दीखे शुभ कहे हैं,कपास, भस्म,हड्डी, खोपरी छोड़कर इनका दर्शन
स्वप्नमें होवे तो मनुष्योंको दुःख अथवा रोग उपजता है ॥ ५ ॥
अथ अशुभद्रव्य ।
सर्वाणि कृष्णानि विनिन्दितानि स्वप्ने नराणां विपदं रुजं वा ॥
कुर्वन्ति चैतानि हि वर्जयित्वा गोवाजिराजद्विजहस्तिमत्स्यान्६॥
और स्वप्नमें सब प्रकारकी काली चीज निंदित है, जो स्वप्नमें काली चीज दीख जावे तो
सिवाय इनके काली गौ, घोडा, राजा ब्राह्मण, हाथी और मत्स्य मनुष्योंको दुःख अथवा रोग
उपजता है ॥ ६ ॥
अथ शुभ स्वप्नोंका वर्णन ।
मुकुरकुसुमशृङ्गारातपत्रं ध्वजं वा दधि फलमथ वस्त्रं चान्नताम्बू-
लवस्त्रम्। कमलकलशशंखं भूषणं काञ्चनस्य भवति सकलसंप-
च्छ्रेयसे रोगिणां च॥ ७ ॥
शीशा, फूल, श्रृंगार, छत्र,ध्वजा, दही, फल, वस्त्र, अन्न, नागरपान, कमल, कलश,शंख,
सोनेका गहना इनको स्वप्नमें देखना सब प्रकारका सुख और रोगियोंको कल्याण देता है ॥७॥

अ० २] भाषाटीकासमेता । (१३९)
अथ शुभ स्वप्न ।
दिनकरनिशिनाथ मण्डलं तारकस्य विकचकमलकुञ्जः पूर्णप-
द्माकरं वा ॥ तरति सलिलराशिप्रौढनद्याश्च पारं घनसुखविभ-
वाप्तिर्व्याधिनां रोगमुक्तिः ॥ ८ ॥ देवो द्विजो वा पितरो नृपो
वा स्वप्नेषु वाक्यं वदते यथैव ॥ तथैव नान्यच्च भवेन्मनुष्ये
यद्यस्य सौख्यं विपदो रुजो वा ॥ ९ ॥ गोवाजिकुञ्जरनृपाः
सुमनः प्रशस्तं स्वप्नेषु पश्यति नरः सरुजः सुखाय ॥ रोगान्वि-
तश्च रुजनाशनसम्भवाय बद्धोऽपि वै सपदि बन्धविमोचनाय॥
॥१०॥ यो भूषणं पश्यति मन्दिरं वा कन्यां दधि मीनकु-
मारकं वा ॥ सपुष्पवल्लीफलितं द्रुमं वा स्वस्थे धनार्त्ति रुजना-
शनाय ॥ ११ ॥ स्वप्ने पयःपानमतिप्रशस्तं पानं सुराया अज-
भोजनं वा॥घृतं यवागूः कृसरोदनं वा क्षैरेयिकं भोजनकं सुखाय
॥ १२॥ सितो भुजङ्गो दशति कराग्रे नरस्य सुप्तस्य शरीरके-
षु॥ पुत्रस्य लाभं वदते धनं वा नाशं विदध्यादचिराद्रुजां वा
॥१३॥ सश्वेतवस्त्रां रमणीं सुरम्यां स्वप्ने समालिङ्गति यो
मनुष्यः ॥ तस्य प्रकर्षेण सुखं श्रियः स्यात्सुपुत्रलाभश्च रुजां
विनाशः ॥१४॥ यो धान्यपुञ्जं तिलतण्डुलानां गोधूमसिद्धा-
र्थयवादिकानाम् ॥ धान्याप्तिरस्यामयनाशहेतुः स्वप्नेषु शीघ्रं
मनुजे सुखाय ॥१५॥ सफले धनसम्पत्तिर्दीप्ते रोगविनाशनम्॥
सुखं च पुष्पिते ज्ञेयं सम्पूर्णे वाञ्छितं फलम् ॥ १६ ॥
सूर्य, चंद्रमा, तारागण इनके मंडलको देखे और खिले हुए कमलोंके समूहसे
पूरित हुए तालाबको देखे और पानीके समूहसे भरी हुई नदीको तरे और नदीसे पार
हो तो धन तथा सुखकी प्राप्ति हो और रोगको गया जानना ॥ ८ ॥ देवता, पंडित, पितर,
राजा, ये सब जैसे स्वप्नमें वाक्यको कहदेवें तैसे ही मनुष्यको होता है चाहे सुख हो, चाहे
दुःख हो या रोग हो ॥ ९ ॥ गौ, घोड़ा, हस्ती, राजा, फूल, इनके जो मनुष्य स्वप्नमें
देखता है उस रोगीको सुख होता है और इस स्वप्नको देखनेस बंधमें प्राप्त हुआ मनुष्य
शीघ्र छूट जाता ॥ १० जो मनुष्य स्वप्नमें गहनाको और मंदिरको देखता है अथवा
१ अत्र छन्दोभंगः । २ अत्रापि ।
९

( १३० ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
कन्या, दही, मछली, बालक इनको देखता है अथवा फूल और बेलसे फलित हुए वृक्ष-
को देखे ये स्वप्न स्वस्थ मनुष्यकों आवे तो धनकी प्राप्ति होगी और रोगीमनुष्यके रोगका नाश
होवे ॥ ११ ॥ स्वप्नमें दूधका पीना अतिश्रेष्ठ है, मदिराका पीना अथवा बकराके मांसका
भोजन, घृत, गुंडयाणी, खीचड़ी, चावल, दूधका भोजन इनको स्वप्नमें देखे तो सुखकी
प्राप्ति होवे ॥ १२ ॥ मनुष्यके दाहिने हाथके अग्रभागको अथवा शरीरको सफेद सर्प सोते-
हुए डसता है ऐसे स्वप्नसे पुत्रका और धनका लाभ होता है अथवा शीघ्र ही रोगका नाश
होता है ॥ १३ ॥ सफेद वस्त्रोंवाली और रमणीक और सुन्दर ऐसी स्त्रीसे जो मनुष्य
मिलाप करता है उसको अत्यंत स्त्रीसुख और धनकी प्राप्ति होती है और पुत्रका लाभ
और रोगोंका नाश होता है ॥ १४ ॥ जो मनुष्य तिल, चावल, गेहूं, सरसों, जव, अन्न-
का समूह स्वप्नमें देखता है, उसको अन्नकी प्राप्ति और रोगका नाश होता है और
सुख भी मिलता है ॥ १५ ॥ जो मनुष्य स्वप्नमें फल सहित वृक्षको देखे, तो उसको
धनसंपत्ति प्राप्त होती है और जलता हुआ देखे तो रोगका नाश होता है, पुष्पकारिके युक्त
वृक्षको देखे तो सुख होता है और पत्र, पुष्प, फल और शाखा आदिकोंकारके युक्त
वृक्षको देखे तो मनवांछित फल मिलता है ॥ १६ ॥
अथ अशुभ स्वप्नोंका वर्णन ।
काकैः कंकैः करभभुजगैः सूकरोलूकगृध्रैर्जम्बूकेर्वा वृकखरमहि-
ष्यातिऋक्षैः श्वभिश्च ॥ व्याघ्रैर्ग्राहैर्मकरकपिभिर्भक्ष्यमाणं स्व-
कायं पश्येद्योऽसौ भजति नितरां हानिमापद्रुजं वा ॥ १७ ॥
योऽभ्यञ्जितं स्वं मनुजः प्रपश्येत्सर्षिपैस्तैलविशेषणेन ॥ शीघ्रं
रुजार्तिर्भवतीह तस्य वदन्ति धीरा निपुणं विधेयम् ॥ १८ ॥
व्याघ्रोष्ट्रखरसंयुक्ते रथे सौरभसंयुते ॥ उह्यमानो दिशं याम्यां
गच्छेद्व स मृतिं भजेत् ॥१९॥ रक्तवस्त्रां कृष्णवस्त्रां मुक्तकेशां
विसर्पिणीम् ॥ याम्यां स्थितां रुदन्तीं वा गायन्तीमथ पश्यति
॥ २० ॥ अथाह्वयति संक्रुद्धां समालिङ्गति चर्वति॥ यः पश्य-
ति सुखी स स्याद्व्याधितो मृत्युमृच्छति ॥२१॥ यस्य स्वप्ने च
निष्कुष्टदन्तपातः प्रदृश्यते ॥शीय्यन्ते केशरोमाणि स सुखी
चापदं व्रजेत् ॥२२॥ यस्य खड्गा प्रभज्येत तोमरादिप्रहारतः॥
रक्तं च दृश्यते देहे स स्वस्थो व्याधिमृच्छति ॥२३॥ शून्यागारं

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १३१ )
यो मनुष्यः प्रपश्येत्प्रासादं वा देवहीनं च पश्येत्॥तापश्चान्द्रे
पुष्पितानां द्रुमाणां तस्यानिष्टं मृत्युमाशु प्रपद्येत्॥२४॥विप-
श्येन्नरो भिन्नदेवं घटं वाथवा भग्नशाखं तरुं मन्दिरं वा॥विशीर्णं
विपश्येत्सुखी व्याधिपुञ्जं प्रपद्येद्रुजायस्त आशु म्रियेत ॥२५॥
यस्याह्वयन्ति पितरो दिशि दक्षिणस्यामाश्रित्य चाशु तनुते
मनुजस्य मृत्युम् ॥ यश्चैव शूललकुटोद्यतबाणपाणीनाहूयते
स मृतिमाशु लभेन्मनुष्यः॥२६॥कार्पासभस्मास्थिकपालशूलं
चक्रं सपाशं च विलोकयेद्यः ॥ तस्यापदो रोगधनक्षयौ
वा रोगी मृतिं वा तनुतेऽतिकष्टम् ॥ २७ ॥ इति प्रदिष्टानि
शुभानि तानि निशासु सुप्ते मनुजे विशेषात् ॥ तथाशु विज्ञाय
महामते त्वं गदस्य नाशाय विधेहि मन्त्रम् ॥ २८ ॥ स्नानं
च दानं च सुरार्चनं च होमं तथा भाग्यविधानतश्च॥दुःस्वप्न-
मेतेषु विनाशमेति शुभं च सौख्यं च तनोति शीघ्रम् ॥ २९ ॥
इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने स्वप्नाध्यायो नाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
काक, कंक, ऊंट, सर्प, सूकर, उल्लू, गीध, गीदड़, भेंडिया, गधा, भैंसा, तिरखू, कुत्ता,
व्याघ्र, ग्राह, मच्छ, वानर इनसे भक्षित हुए अपने शरीरको देखे उसको हानि, दुःख, रोग
इनकी प्राप्ति होती है ॥ १७॥ जो मनुष्य अपने शरीरको घृत, वसा, तेल आदिसे भीजा-
हुआ देखे उसको रोगकी प्राप्ति शीघ्र होती है, ऐसा वैद्यों ने कहा है। वहां अरिष्टनाशकशांतिवगै-
रह करे ॥ १८ ॥ सिंह, ऊंट, गधा बैल, इनसे जुड़ेहुए रथमें बैठके जो मनुष्य दक्षिणदिशाको
गमन करें उसकी मृत्यु जानना ॥ १९ ॥ रक्तवस्त्रोंको पहननेवाली और कृष्णवस्त्रोंको पहनने-
वाली और छुटेहुए बालोंवाली और दौड़ती हुई और दक्षिणदिशामें स्थित हुई और रोती हुई
ऐसी स्त्रीको जो देखता है ॥ २० ॥ और क्रोधको प्राप्तहुई उस स्त्रीको बुलाता है अथवा
उससे मिलता है ऐसा स्वप्न सुखीको आवे तो रोगकी उत्पत्ति होती है और रोगीको आवे
तो वह रोगी मरजाता है ॥ २१ ॥ स्वप्नमें जिस सुखी मनुष्यके दांत, बाल, रोम ये गिर
पडें उसके रोगकी उत्पत्ति होती है ॥ २२ ॥ जिस सुखी मनुष्यकी स्वप्नमें शय्या टूट जावे
और भालाआदि शस्त्रके प्रहारसे देहमें रक्त दीखे वह मनुष्य व्याधिको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
शून्य हुए स्थानको और देवतासे रहित मंदिरको जो स्वप्नमें देखे और जो स्वप्नमें चंद्रमामें
तापको और फूले हुए वृक्षोंमें तापको देखे उस मनुष्यकी शीघ्र मृत्यु कही है ॥ २४ ॥ जो

( १३२ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
मनुष्य. स्वप्नमें देवतासे रहित मंदिरको और पानीसे रहित कलशोको और टूटी हुई शाखाओं-
वाले वृक्षको देखे अथवा स्थानके नाशको देखे उस रोगी मनुष्यकी मृत्यु हो जाय और सुखी
मनुष्य रोगको प्राप्त होवे ॥ २४ ॥ स्वप्नमें जिसको दक्षिणदिशामें आश्रितहुए पितर बुलाते हों
तब उस मनुष्यकी मृत्यु जानो और जिसको स्वप्नमें शूल, लाठी, फांसी इनको हाथमें
धारनेवाला मनुष्य बुलाता है उसकी शीघ्र मृत्यु जाननी ॥ २६ ॥ जो स्वप्नमें कपास,
हड्डी, भस्म, खोपरी, शूल, चक्र, फांसी, इनको देखे उस मनुष्यके रोग, दुःख, धनका
नाश ये उपजते हैं और ऐसा स्वप्न रोगीको आवे तो मृत्यु अथवा अत्यंत कष्ट होता है ॥ २७॥
रात्रिमें सोते हुए मनुष्यको विशेषकरके ऐसे अशुभ स्वप्न भी कहे हैं. हे महामते ! तैसे ही जानके
रोगके नाशके लिये मंत्रविधिको करना उचित है ॥ २८ ॥ स्नान, दान, देवताकी पूजा,
होम इनसे भाग्यके विधान करके दुःस्वप्न नाशको प्राप्त होता है शुभ और सुख शीघ्र प्राप्त
होता है ॥ २९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधाशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिता-
भाषाटीकायां द्वितीयस्थाने स्वप्नाध्यायो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः ३.
अथ स्वास्थ्यारिष्टम् ।
आत्रेय उवाच ।
शृणु पुत्र महाप्राज्ञ सर्वदेहार्थसाधकम् ॥
वैद्यशास्त्रस्य सारं यत्स्वास्थ्यारिष्टं च मानवे ॥ १ ॥
स्वस्थमनुष्यको अरिष्टवर्णन-आत्रेयजी कहते हैं-हे महाप्राज्ञ ! हे
पुत्र ! संपूर्ण देहके प्रयोजनको साधनेवाला और वैद्यकशास्त्रका सार ऐसे स्वस्थ मनुष्यके
अरिष्टको सुनो ॥ १ ॥
अथ ध्रुवादिकें न देखनेका अरिष्ट ।
यो न पश्येद् ध्रुवं सम्यक्स्वर्णं वा मनुजो बुधः ॥
तस्य षण्मासमध्ये तु मृतिश्चैवोपपद्यते ॥ २ ॥
जो मनुष्य ध्रुवताराको अथवा ध्रुव अर्थात् नासिकाके अग्रभागको और सोनाको अच्छी-
तरह नहीं देखता है, उसका छः महीनोंके मध्यमें मृत्यु होता है ॥ २ ॥
अथ द्वितीयाचंद्रके अदर्शनका अरिष्ट ।
यो वै द्वितीयां हिमधामलेखां नरो न पश्येद्विजहानिरस्य ॥
मासत्रयं प्राप्य शरीरमाशु जीवो व्रजेत्तस्य यमस्य लोकम् ३॥

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( १३३ )
जो मनुष्य किरणोंसे व्याप्त हुआ द्वितीयाका चंद्र नहीं देखें और जिसके दंत गिर पड़े उस
मनुष्यकी तीन महीनोंमें मृत्यु जानना ॥ ३ ॥
अथ कर्णघोष न सुननेका अरिष्ट ।
यः कर्णघोषं न शृणोति हृप्ता मृताश्च यूकाः प्रपतन्ति लाभात्॥
यो वैपरीत्यं विशृणोति शब्दं मासद्वयं प्राप्य जहाति जीवम् ४॥
जो मनुष्य कानमें शब्दको न सुने और गर्वित हुई और मृत हुई जूस और लीख शरीरमें
पड़ जावे और जो विपरीतपनेसे शब्दको विशेष करके सुने वह दो महीनोंमें मृत्युको प्राप्त
होता है ॥ ४ ॥
अथ मुखश्वासादिकका अरिष्ट ।
यः स्वस्थदेहः श्वसते मुखेन नेत्रेऽरुणे श्यावमथैव वक्त्रम् ॥
जिह्वा विशीर्णा दशनाश्च कृष्णाःस्वस्थोऽपि शीघ्रं यमलोकगन्ता ५
जो स्वस्थ शरीरवाला मनुष्य मुख करके श्वासको लेवे और लाल नेत्र हो जावें और काला-
मुख हो जावे और फटी हुई जीभ हो जावे और काले दंत हो जावें ऐसा स्वस्थ भी मनुष्य मृत्युको
शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥
अथ प्रभातमें मस्तकशूलका अरिष्ट ।
यस्य प्रभाते च शिरोव्यथा स्याद्दीपे परिवेषमवेक्षमाणः ॥
विपश्यते यः पटलं च रेणोः स वै मृतिं याति न दीर्घमायुः॥६॥
प्रभातमें जिसके शिरमें पीड़ा हो और जो दीपककी ज्योतिमें मंडलको देखे और जो
आकाशमें धूलीके समूहको विशेष करके देखे वह शीघ्र मरजाता है, दीर्घायु नहीं पाता ॥६ ॥
अथ सूर्य्यबिंबादिकके दर्शनका अरिष्ट ।
यः सूर्य्यबिम्बे शशिनं प्रपश्येद्विना परीवेषमवेक्षमाणः ॥
धूमावृतं वा रविमण्डलं च प्रपश्यते शीघ्रमृतिं स गन्ता ॥७ ॥
जो सूर्यके बिंबमें चंद्रमाको देखे और बिना चंद्र हुए ही मंडलको देखे और धूमोंसे आच्छा-
दित हुआ सूर्यका मंडल दीखे उसकी शीघ्र मृत्यु जानना ॥ ७ ॥
अथ इंद्रधनुष देखनेका अरिष्ट ।
स्वच्छे निरभ्रे गगने च पश्येद्यः शक्रचापं विदिशादिशासु ॥
तथैव विद्यान्नयनाग्रतो यः स शीघ्रमेव यमलोकगन्ता ॥ ८ ॥
जो स्वस्थ और बादलोंसे रहित हुए आकाशमें और दिशा तथा दक्षिणमें इंद्रके धनु-
षको देखें अथवा नेत्रोंके आगे इन्द्रके धनुषको देखें वह मृत्युको प्राप्त होता है ॥ ८ ॥
१ विदिशाया उज्जयिन्या दिशास्त्वर्थाद्दक्षिणदिशासु । २ अत्राख्यानकीवृत्तम्, परंतु तुर्यपादे तगणस्याभा-
वोऽस्ति वर्णस्यादीर्घत्वादतो वृत्तच्छेदः ।

( १३४ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
अथ विपरीत देखने सुननेका अरिष्ट ।
यो नेत्रे मीलितेऽपि द्युतिमथ चपलां पश्यते यः पुरस्तात्कर्णे
रन्ध्रं निरुध्याद्ध्वनिमथ मनुजो न शृणोति कथञ्चित्॥तिक्ता-
दीनां रसानां कथमपि रसनास्वादमात्रं न वेत्ति रौद्रं वैवस्व-
तस्य प्रतिगमनमथो पश्यते मानुषश्च ॥ ९ ॥
जो नेत्रोंके मूंदनेपर भी चपल ज्योतिको आगे देखता है, कानके छेद मूँदकर जो अनहद
नाद नहीं सुनता, कडुवा आदि रस जिसे नहीं समझ पड़ते वह मनुष्य भयंकर यमराजकी ओर
अपनेको जाता हुआ समझे ॥ ९ ॥
अथ शरीरके स्पर्शसे अरिष्टकथन ।
यस्यात्युष्णं शरीरं शिशिरमथ मनुजस्य यस्याविलं च शीतं
नो चेति यस्य हिमजलसिकते रोमहर्षो न यस्य॥ दण्डाघातेन
राजी न भवति स पुनः श्राद्धदेवस्य लोके लोकानां दर्शनाय
द्रुतमतिरुचिरां स्वस्थतां न प्रयाति ॥ १० ॥
जिस मनुष्यका शरीर अतिशय गरम हो और तुरंत ही ठंडा और धूमिल हो जाय, जो
पुरुष ठंढीको और गर्मीको जान सकता नहीं, जिस मनुष्यके शरीरको शीतल जलके बिन्दु-
ओंका या ठंढेबालूरेतके स्पर्श होनेसे रोमांच नहीं होता और दंड (वेत) मारनेसे रेखा न
हो तो वह मनुष्य यमराजके लोकको देखनेके लिये जल्दी करता है और स्वस्थताको वह
पुरुष प्राप्त नहीं होता है ॥ १० ॥
अथ प्रतिबिंब न देखनेसे अरिष्ट ।
तैले जले दर्पणके घृते वा परस्य नेत्रे प्रतिबिम्बमात्मनः ॥
पश्येत्र योऽसौ यमलोकगन्ता जानीहि तं जीवविहीनमेव॥११॥
इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने स्वास्थ्यारिष्टं
नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
जो मनुष्य तेल, पानी, शीशा, दूसरोंके नेत्र, इनमें अपने प्रतिबिंबको नहीं देखता है
उसकी मृत्यु जाननी ॥ ११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहा-
रीतसंहिताभाषाटीकायां स्वास्थ्यारिष्टं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥


१-२ छन्दोभंगः ।

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १३५ )
चतुर्थोऽध्यायः
अथ व्याध्यरिष्टका लक्षण ।
आत्रेय उवाच॥उपद्रवैश्च ये पुष्टा व्याधयो यान्ति वार्यताम्॥
रसायनादिना वत्स तान्मेदेकमनाः शृणु ॥ १ ॥
उपद्रवोंसे युक्त हुए रोग रसायन आदिसे निवारण किये जाते हैं। हे पुत्र ! उन रोगोंको
एकमन होके सुनो ॥ १ ॥
अथ अष्ट महाव्याधियोंका नाम ।
वातव्याधिः प्रमेहश्च कुष्ठमर्शो भगन्दरम्॥ अश्मरी मूढगर्भश्च
तथा चोदरमष्टमम् ॥ २ ॥ अष्टावेते प्रकृत्यैव दुश्चिकित्स्या
महागदाः ॥ ३ ॥
वातव्याधि, प्रमेह, कुष्ठ, बवासीर, भगंदर, पथरी, मूढगर्भ, आठवाँ उदररोग ॥ २ ॥
ये आठों प्रकृति करके महारोग दुश्चिकित्स्य हैं ॥ ३ ॥
अथ आठ महारोगोंके उपद्रव ।
प्राणमांसक्षयश्वासतृष्णाशोषवमिज्वरैः॥मूर्च्छातिसारहिक्काभिः
पुनरेतैरुपद्रुताः ॥ ४ ॥ वर्जनीया विशेषेण भिषजा सिद्धि-
मिच्छता ॥ ५ ॥
बलक्षय, मांसक्षय, श्वासरोग, तृषा, शोष, छर्दि, ज्वर, मूर्च्छा, अतिसार, हिचकी इन
उपद्रवोंसे युक्त हुए पूर्वोक्त महारोग ॥ ४ ॥ सिद्धिकी इच्छा करनेवाले मनुष्यको वर्जने
चाहिये ॥ ५ ॥
अथ ज्वररोगीके अरिष्ट ।
यस्य जिह्वा भवत्तीव्रा पीता वा नीलसम्भवा॥श्वासो भवत्य-
तीवोष्णः शरीरं पुलकांकितम् ॥ ६ ॥ नीलनेत्रेऽरुणे पीते
कण्ठो घुरघुरायते॥न जीवति ज्वरार्त्तस्तु लक्षणं यस्य चेदृशम्
॥७॥ मुखे श्वासो भवेद्यस्य श्वावा दन्तावली पुनः॥ स्तब्ध-
नेत्रो बलाद्यः स्याज्ज्वरात नैव जीवति ॥ ८॥ बहुमूत्री बहु-
श्वासी क्षामोऽरोचकपीडितः ॥ हतप्रभेन्द्रियो यश्च ज्वरी

( १३६ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
शीघ्रं विनश्यति ॥ ९ ॥ यस्यास्ये श्रूयते रक्तं शिरोर्तिर्यस्य
दृश्यते ॥ अन्तर्दाहो बहिःशीतो ज्वरस्तु मृत्युमृच्छति॥१०॥
यस्ताम्यति विसंज्ञस्तु शेत विपतितोऽपि वा॥शीतार्दितोऽन्त-
रुष्णश्च ज्वरेण म्रियते नरः ॥११॥ यो हृष्टरोमा रक्ताक्षो हृदि
संघातशूलवान्॥नित्यं च वक्रेणोच्छ्वासः स ज्वरो हन्ति मान-
वम् ॥१२ ॥ हिक्काश्वासपिपासार्त्तं मूढं विभ्रान्तलोचनम् ॥
सन्ततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षपयति ज्वरः ॥ १३ ॥ आविलाक्षं
प्रताम्यं च तन्द्रायुक्तमतीव च॥ क्षीणशोणितमांसं च नरं नाश-
यति ज्वरः ॥ १४॥ घनं निष्ठीवनं नेत्रं प्लावा रोचकपीडितम्॥
अन्तर्दाहोऽसिता जिह्वा शीघ्रं नाशयति ज्वरः ॥१५ ॥
जिसकी खरखरी, पीली और नीली ऐसी जीभ हो जाय और अत्यंत गरम श्वास आवे
और हर्षित हुए रोमोंकरके युक्त शरीर हो ॥ ६ ॥ नीले, लाल और पीले नेत्र हो जावें
और कंठ घुर्घुर करे ऐसे लक्षण जिस ज्वररोगीके होवें उसका जीवना नहीं है ॥ ७ ॥ जिसके
मुखमें शीघ्र श्वास आव और दंतोंकी पंक्ति काली हो जावे और वरबस स्तंभित नेत्र हो जावें
ऐसा ज्वरसे पीडित रोगी नहीं जीता है ॥ ८ ॥ बहुत मूत्रको करनेवाला और बहुत श्वासको
लेनेवाला और कृश और अरुचिसे पीडित और नष्ट हुई इन्द्रियोंकी कांतिवाला ऐसा ज्वररोगी
शीघ्र मर जाता है ॥ ९ ॥ जिसके मुखसे रक्त गिरे और जिसके शिरमें पीड़ा होवे और
भीतर दाह और बाहर शीत लगे ऐसे ज्वरवाला मर जाता है ॥ १० ॥ जो मोहको प्राप्त
होवे और संज्ञासे रहित हुआ सोवे अथवा निरंतर पतित हुआ करे और बाहर शीतसे और
भीतर गर्मीसे पीडित होवे ऐसा मनुष्य ज्वरसे मर जाता है ॥ ११ ॥ जो हर्षित हुए रोमोंवाला
हो और लालनेत्रोंवाला हो और हृदयमें दारुण शूलवाला हो और निरंतर मुखसे ऊंचे श्वासको
लेता हो ऐसा ज्वररोगी मर जाता है ॥ १२ ॥ हिचकी और श्वाससे पीडित और मूढ़
और विशेष करके भ्रमते हुए नेत्रोंवाला और निरंतर ऊंचे श्वासको लेनेवाला और क्षीण ऐसे
रोगीको ज्वर मार देता है ॥ १३ ॥ धूम्रवर्णवाले नेत्रोंवाला और मोहको प्राप्त हुआ
और तंद्रासे अत्यंत युक्त हुआ, क्षीण हुए रक्त और मांसवाला ऐसे मनुष्यको ज्वर
मार देता है ॥ १४ ॥ बहुत छर्दिवाला और नेत्रोंसे पानीको गिरानेवाला और
अरोचकसे पीडित और भीतर दाह तथा काली जीभसे युक्त ऐसे मनुष्यको ज्वर शीघ्र मार
देता है ॥ १५ ॥
१ 'इन्द्रियार्थेष्वसंवित्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः। निद्रार्तस्येव यस्येहा तस्य तंद्रा विनिर्दिशेत् ॥'

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १३७)
अथ दारुण उपद्रवका अरिष्ट ।
यस्यैकोपद्रवस्यापि शाम्यता नोपदृश्यते ॥ दारुणोपद्रवा-
श्चान्ये भूयिष्ठं बहुरूपवान् ॥ १६ ॥ तेन मृत्योर्वशं याति
सिद्धिं नेच्छति दारुणः ॥ १७ ॥
जिसके एक उपद्रव भी शांत नहीं होवे किंतु अन्य भी बहुतसे उपद्रव उपजते रहें और
बहुतसे रूपोंको धारण करे ॥ १६ ॥ ऐसा मनुष्य मृत्युके वशको प्राप्त हो जाता है, अच्छा
नहीं होता ॥ १७ ॥
अथ अतीसारका अरिष्ट ।
यस्यादौ दृश्यते चैवाप्यतीसारस्तथापरः ॥ श्वासः शोषश्च
यस्य स्यात्सोऽपि शीघ्रं मृतिं व्रजेत् ॥ १८ ॥ श्वासशूलपिपासार्त्तं
क्षीणं ज्वरनिपीडितम् ॥ विशेषेण नरं वृद्धमतीसारो विनाशयेत्
॥ १९ ॥ यस्यातिसारशोफाः स्युस्तथारोचकशूलवान् ॥ सोऽपि
शीघ्रं मृतिं याति बहुभिः प्रतिकर्मभिः ॥ २० ॥
जिसके आदिमें अतीसार उपजे, पीछे श्वास और शोष उपजे वह मनुष्य शीघ्र मर जाता है
॥ १८ ॥ श्वास, शूल, तृष्णा इन करके पीडित, क्षीण और ज्वरसे त्रास पाया हुआ विशेष
करके वृद्ध अतीसारसे नष्ट हो जाता है ॥ १९ ॥ जिसके अतीसार, शोजा, अरुचि, शूल ये
उपजें उस मनुष्यकी बहुतसी चिकित्सा करनेसे भी मृत्यु हो जाती है ॥ २० ॥
अथ सूजनका अरिष्ट ।
बालस्य चातिवृद्धस्य विकलस्य नरस्य च ॥
सर्वाङ्गे जायते शोफः शोफी स म्रियते ध्रुवम् ॥ २१ ॥
बालक, अतिवृद्ध, विकल ऐसे मनुष्योंके संपूर्ण अंगमें शोजा उपजे तो वह निश्चय मर-
जाता है ॥ २१ ॥
अथ शूलका अरिष्ट ।
यस्याध्मानं च शूलं च श्वासस्तृष्णा विमूर्च्छना ॥
शिरोऽर्त्तिर्यस्य दृश्येत शूली मृत्युमवाप्नुयात् ॥ २२ ॥
जिसके अफारा, शूल, श्वास्रोग, तृषा, मूर्छा, शिरमें पीड़ा ये उपजें उसकी मृत्यु हो
जाती है ॥ २२ ॥

( १३८ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-

पाण्डुरोगीका अरिष्ट ।
पाण्डुदन्तनखो यश्च पाण्डुनेत्रश्च मानवः ॥ पाण्डुसङ्घातवां-
श्चैव पाण्डुरोगी विनश्यति ॥२३॥ पाण्डुत्वक्पाण्डुनेत्रे च मूत्रं
वा पाण्डुरं भवेत्॥पाण्डुसंघातवांश्चैव पाण्डुरोगी विनश्यति॥२४॥
पीले दंत और नखोंवाला और पीले नेत्रोंवाला और पीलेपनको सब जगह देखे ऐसा पांडु-
रोगी नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥ पीली खाल होवे,पीले नेत्र होवें और मूत्र भी पीला ही होवे
और पीलेपनको सब जगह देखे ऐसा पांडुरोगी मर जाता है ॥ २४ ॥
अथ क्षयरोगका अरिष्ट ।
शुक्लाक्षमन्नद्वेष्टारमूर्ध्वश्वासनपीडितम् ॥ कृच्छ्रेण बहुमेहंतं
यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ॥२५॥ धातुहीनो भवेद्यस्तु शोफश्वा-
सैर्निपीडितः॥बहुभोज्यो घृणीवांश्च राजयक्ष्मी विनश्यति॥२६
सफेद नेत्रोंवाला और अन्नसे वैर करनेवाला और ऊंचे श्वाससे निरंतर पीडित हुआ और
कष्टसे बहुतवार मूत्रको करता हुआ ऐसा राजरोगी मर जाता है ॥ २५ ॥ धातुओंसे हीन
हुआ, शोजा और श्वाससे पीडित हुआ और बहुतसे भोजनको करता हुआ और दयावाला ऐसा
राजरोगी मर जाता है॥ २६ ॥
अथ श्वासस्रोगका अरिष्ट ।
हुंकारः शीतलो यस्य फूत्कारस्योष्णता भवेत्॥शीघ्रनाडी न
निर्वाहः शीघ्रं याति यमालयम् ॥ २७ ॥ अंगकम्पो गतेर्भंगो
मुखं वा कुङ्कुमप्रभम्॥ उच्चारैन्च भवेद्वायुः स च याति यमा-
लयम् ॥ २८ ॥
जिसके मुखसे हुंकारी निकलनेमें शीतलता होवे और फूत्कारमें गरमाईपना होवे और नाडी
शीघ्र चले, चलनेकी सामर्थ्य नहीं होवे ऐसा रोगी शीघ्र मरजाता है ॥ २७ ॥ जिसके अंग
कांपे और चला जावे नहीं और केसरके समान मुख हो जावे और दस्त जानेके समय वायु
निसरे वह मर जाता है ॥ २८ ॥
अथ बहुत दिनतककें रोगका आरिष्ट ।
चिरं प्रवृद्धरोगस्तु भोजनेऽप्यसमर्थकम् ॥ भग्नगात्रमुपेक्षेत
भेषजोऽप्यरहस्यकम् ॥ एतादृशं नरं ज्ञात्वोपचारः क्रियते
बुधैः ॥ २९ ॥


१ 'घृणा जुगुप्साकृपयो' इति मेदिनी ।