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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 548 में से

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पृष्ठ 165

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( १३३ )
जो मनुष्य किरणोंसे व्याप्त हुआ द्वितीयाका चंद्र नहीं देखें और जिसके दंत गिर पड़े उस
मनुष्यकी तीन महीनोंमें मृत्यु जानना ॥ ३ ॥
अथ कर्णघोष न सुननेका अरिष्ट ।
यः कर्णघोषं न शृणोति हृप्ता मृताश्च यूकाः प्रपतन्ति लाभात्॥
यो वैपरीत्यं विशृणोति शब्दं मासद्वयं प्राप्य जहाति जीवम् ४॥
जो मनुष्य कानमें शब्दको न सुने और गर्वित हुई और मृत हुई जूस और लीख शरीरमें
पड़ जावे और जो विपरीतपनेसे शब्दको विशेष करके सुने वह दो महीनोंमें मृत्युको प्राप्त
होता है ॥ ४ ॥
अथ मुखश्वासादिकका अरिष्ट ।
यः स्वस्थदेहः श्वसते मुखेन नेत्रेऽरुणे श्यावमथैव वक्त्रम् ॥
जिह्वा विशीर्णा दशनाश्च कृष्णाःस्वस्थोऽपि शीघ्रं यमलोकगन्ता ५
जो स्वस्थ शरीरवाला मनुष्य मुख करके श्वासको लेवे और लाल नेत्र हो जावें और काला-
मुख हो जावे और फटी हुई जीभ हो जावे और काले दंत हो जावें ऐसा स्वस्थ भी मनुष्य मृत्युको
शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥
अथ प्रभातमें मस्तकशूलका अरिष्ट ।
यस्य प्रभाते च शिरोव्यथा स्याद्दीपे परिवेषमवेक्षमाणः ॥
विपश्यते यः पटलं च रेणोः स वै मृतिं याति न दीर्घमायुः॥६॥
प्रभातमें जिसके शिरमें पीड़ा हो और जो दीपककी ज्योतिमें मंडलको देखे और जो
आकाशमें धूलीके समूहको विशेष करके देखे वह शीघ्र मरजाता है, दीर्घायु नहीं पाता ॥६ ॥
अथ सूर्य्यबिंबादिकके दर्शनका अरिष्ट ।
यः सूर्य्यबिम्बे शशिनं प्रपश्येद्विना परीवेषमवेक्षमाणः ॥
धूमावृतं वा रविमण्डलं च प्रपश्यते शीघ्रमृतिं स गन्ता ॥७ ॥
जो सूर्यके बिंबमें चंद्रमाको देखे और बिना चंद्र हुए ही मंडलको देखे और धूमोंसे आच्छा-
दित हुआ सूर्यका मंडल दीखे उसकी शीघ्र मृत्यु जानना ॥ ७ ॥
अथ इंद्रधनुष देखनेका अरिष्ट ।
स्वच्छे निरभ्रे गगने च पश्येद्यः शक्रचापं विदिशादिशासु ॥
तथैव विद्यान्नयनाग्रतो यः स शीघ्रमेव यमलोकगन्ता ॥ ८ ॥
जो स्वस्थ और बादलोंसे रहित हुए आकाशमें और दिशा तथा दक्षिणमें इंद्रके धनु-
षको देखें अथवा नेत्रोंके आगे इन्द्रके धनुषको देखें वह मृत्युको प्राप्त होता है ॥ ८ ॥
१ विदिशाया उज्जयिन्या दिशास्त्वर्थाद्दक्षिणदिशासु । २ अत्राख्यानकीवृत्तम्, परंतु तुर्यपादे तगणस्याभा-
वोऽस्ति वर्णस्यादीर्घत्वादतो वृत्तच्छेदः ।