हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १३७)
अथ दारुण उपद्रवका अरिष्ट ।
यस्यैकोपद्रवस्यापि शाम्यता नोपदृश्यते ॥ दारुणोपद्रवा-
श्चान्ये भूयिष्ठं बहुरूपवान् ॥ १६ ॥ तेन मृत्योर्वशं याति
सिद्धिं नेच्छति दारुणः ॥ १७ ॥
जिसके एक उपद्रव भी शांत नहीं होवे किंतु अन्य भी बहुतसे उपद्रव उपजते रहें और
बहुतसे रूपोंको धारण करे ॥ १६ ॥ ऐसा मनुष्य मृत्युके वशको प्राप्त हो जाता है, अच्छा
नहीं होता ॥ १७ ॥
अथ अतीसारका अरिष्ट ।
यस्यादौ दृश्यते चैवाप्यतीसारस्तथापरः ॥ श्वासः शोषश्च
यस्य स्यात्सोऽपि शीघ्रं मृतिं व्रजेत् ॥ १८ ॥ श्वासशूलपिपासार्त्तं
क्षीणं ज्वरनिपीडितम् ॥ विशेषेण नरं वृद्धमतीसारो विनाशयेत्
॥ १९ ॥ यस्यातिसारशोफाः स्युस्तथारोचकशूलवान् ॥ सोऽपि
शीघ्रं मृतिं याति बहुभिः प्रतिकर्मभिः ॥ २० ॥
जिसके आदिमें अतीसार उपजे, पीछे श्वास और शोष उपजे वह मनुष्य शीघ्र मर जाता है
॥ १८ ॥ श्वास, शूल, तृष्णा इन करके पीडित, क्षीण और ज्वरसे त्रास पाया हुआ विशेष
करके वृद्ध अतीसारसे नष्ट हो जाता है ॥ १९ ॥ जिसके अतीसार, शोजा, अरुचि, शूल ये
उपजें उस मनुष्यकी बहुतसी चिकित्सा करनेसे भी मृत्यु हो जाती है ॥ २० ॥
अथ सूजनका अरिष्ट ।
बालस्य चातिवृद्धस्य विकलस्य नरस्य च ॥
सर्वाङ्गे जायते शोफः शोफी स म्रियते ध्रुवम् ॥ २१ ॥
बालक, अतिवृद्ध, विकल ऐसे मनुष्योंके संपूर्ण अंगमें शोजा उपजे तो वह निश्चय मर-
जाता है ॥ २१ ॥
अथ शूलका अरिष्ट ।
यस्याध्मानं च शूलं च श्वासस्तृष्णा विमूर्च्छना ॥
शिरोऽर्त्तिर्यस्य दृश्येत शूली मृत्युमवाप्नुयात् ॥ २२ ॥
जिसके अफारा, शूल, श्वास्रोग, तृषा, मूर्छा, शिरमें पीड़ा ये उपजें उसकी मृत्यु हो
जाती है ॥ २२ ॥