हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३८ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
पाण्डुरोगीका अरिष्ट ।
पाण्डुदन्तनखो यश्च पाण्डुनेत्रश्च मानवः ॥ पाण्डुसङ्घातवां-
श्चैव पाण्डुरोगी विनश्यति ॥२३॥ पाण्डुत्वक्पाण्डुनेत्रे च मूत्रं
वा पाण्डुरं भवेत्॥पाण्डुसंघातवांश्चैव पाण्डुरोगी विनश्यति॥२४॥
पीले दंत और नखोंवाला और पीले नेत्रोंवाला और पीलेपनको सब जगह देखे ऐसा पांडु-
रोगी नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥ पीली खाल होवे,पीले नेत्र होवें और मूत्र भी पीला ही होवे
और पीलेपनको सब जगह देखे ऐसा पांडुरोगी मर जाता है ॥ २४ ॥
अथ क्षयरोगका अरिष्ट ।
शुक्लाक्षमन्नद्वेष्टारमूर्ध्वश्वासनपीडितम् ॥ कृच्छ्रेण बहुमेहंतं
यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ॥२५॥ धातुहीनो भवेद्यस्तु शोफश्वा-
सैर्निपीडितः॥बहुभोज्यो घृणीवांश्च राजयक्ष्मी विनश्यति॥२६
सफेद नेत्रोंवाला और अन्नसे वैर करनेवाला और ऊंचे श्वाससे निरंतर पीडित हुआ और
कष्टसे बहुतवार मूत्रको करता हुआ ऐसा राजरोगी मर जाता है ॥ २५ ॥ धातुओंसे हीन
हुआ, शोजा और श्वाससे पीडित हुआ और बहुतसे भोजनको करता हुआ और दयावाला ऐसा
राजरोगी मर जाता है॥ २६ ॥
अथ श्वासस्रोगका अरिष्ट ।
हुंकारः शीतलो यस्य फूत्कारस्योष्णता भवेत्॥शीघ्रनाडी न
निर्वाहः शीघ्रं याति यमालयम् ॥ २७ ॥ अंगकम्पो गतेर्भंगो
मुखं वा कुङ्कुमप्रभम्॥ उच्चारैन्च भवेद्वायुः स च याति यमा-
लयम् ॥ २८ ॥
जिसके मुखसे हुंकारी निकलनेमें शीतलता होवे और फूत्कारमें गरमाईपना होवे और नाडी
शीघ्र चले, चलनेकी सामर्थ्य नहीं होवे ऐसा रोगी शीघ्र मरजाता है ॥ २७ ॥ जिसके अंग
कांपे और चला जावे नहीं और केसरके समान मुख हो जावे और दस्त जानेके समय वायु
निसरे वह मर जाता है ॥ २८ ॥
अथ बहुत दिनतककें रोगका आरिष्ट ।
चिरं प्रवृद्धरोगस्तु भोजनेऽप्यसमर्थकम् ॥ भग्नगात्रमुपेक्षेत
भेषजोऽप्यरहस्यकम् ॥ एतादृशं नरं ज्ञात्वोपचारः क्रियते
बुधैः ॥ २९ ॥
१ 'घृणा जुगुप्साकृपयो' इति मेदिनी ।