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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

( ५६ )

बच्चे के समान रोने लगे। उन्होंने उससे चले जाने को कहने के
कारण अपने को दोषी ठहराया और कहा कि ऐसी अलौकिक स्वामि-
'भक्ति का बदला नहीं हो सकता। अतः धीरे धीरे, वे कोट में लौट
आए और प्रत्येक वस्तु को गई हुई समझ, उन्होंने अपने लोगों से
कहा कि तुम लोग जो उचित समझो वह करो, मैं तो शत्रु के बीच
लड़कर प्राण देने को उद्यत हूँ। इसकी तैयारी में, उनके परिवार की
स्त्रियाँ रंगदेवी के साथ चिता पर जलकर भस्म हो गईं। जब राजा
की कन्या चिता पर चढ़ने लगी तब राजा शोक के वशीभूत हुए।
वे उसे हृदय से लगाकर छोड़ते ही न थे। किंतु उसने अपने को
पिता की गोद से छुड़ाकर अग्नि में विसर्जन कर दिया। जब चौहानों
की सती साध्वी ललनाओं की राख के ढेर के अतिरिक्त और कुछ
न रह गया तब हम्मीर ने मृतक संस्कार किया और तिलांजलि देकर
उनकी आत्माओं को शांत किया। इसके अनंतर वे अपनी बची हुई
स्वामिभक्त सेना को लेकर गढ़ के बाहर निकले और शत्रुओं पर
टूट पड़े। भीषण संमुख युद्ध उपस्थित हुआ। पहले वीरम युद्ध की
कसमस के बीच लड़ते हुए गिरे, फिर महिमासाह के हृदय में गोली
लगी। इसके पीछे जाज, गंगाधर, ताक और क्षेत्रसिंह परमार ने
उनका साथ दिया। सबके अंत में महापराक्रमी हम्मीर सैकड़ों भालों
से बिधे हुए गिरे। प्राण का लेश रहते भी शत्रु के हाथ में पड़ना
बुरा समझ उन्होंने एक ही वार में अपने हाथों से सिर को धड़ से
जुदा कर दिया और इस प्रकार अपने जीवन को शेष किया। इस
प्रकार चौहानों के अंतिम राजा हम्मीर का पतन हुआ ! यह शोच-
नीय घटना उनके राज्य के अठारहवें वर्ष में श्रावण के महीने में हुई।
यहाँ पर यह कथा समाप्त होती है। दोनों के मिलान करने पर
मुख्य मुख्य बातों में आकाश-पाताल का अंतर जान पड़ता है। किस
में कहाँ तक सत्यता है इसका निर्णय करना बड़ा कठिन है। दोनों
कथाओं में हम्मीर के पिता का नाम जैत्रसिंह लिखा है अतएव इस
संबंध में कोई संदेह की बात नहीं जान पड़ती। हम्मीररासो

( ५७ )
में लिखा है कि कि हम्मीर का जन्म विक्रम संवत् ११४१
शाके १००८ में हुआ। साथ ही यह भी लिखा है कि अलाउद्दीन
का जन्म भी इसी दिन हुआ। इस हिसाब से हम्मीर और
अलाउद्दीन का जन्म १०८४ ई० में हुआ। पर अन्य ऐतिहासिक
ग्रंथों से यह बात ठीक नहीं जान पड़ती। हम्मीर महाकाव्य में
हम्मीर के गद्दी पर बैठने का संवत् १३३० (सन् १२८३ ई०) दिया
है। यह ठीक जान पड़ता है। फिर हम्मीर महाकाव्य में लिखा है
कि चौहानराज की मृत्यु उनके राज्य के अठारहवें वर्ष में अर्थात्
संवत् १३४८ (सन् १३०१ ई०) में हुई। अमोर खुशक की तारीख
आलांई में यह तिथि तीसरी जीलकदः ७०० हिजरी (जुलाई १३०१
ई०) दी है। मुसलमानी इतिहासों से विदित है कि सन् १२९६ में
सुलतान अलाउद्दीन मुहम्मदशाह अपने चाचा जलालुद्दीन फीरोज-
शाह को मारकर गद्दी पर बैठा, और सन् १३१६ ई० तक राज्य
करता रहा। इस अवस्था में हम्मीररासो में दिए हुए संवत् ठीक नहीं
हो सकते। कदाचित् यहाँ यह कह देना भी अनुचित न होगा कि
हम्मीररासो में हम्मीर की जो जन्म कुंडली दी है वह भी ठीक नहीं है।
दूसरी बात जो इस काव्य के संबंध में विचार करने की है वह
यह है कि हम्मीर की अलाउद्दीन से लड़ाई क्यों हुई। हम्मीररासो
तथा ऐसे ही अन्य हिंदी काव्यों में मीर महिमाशाह की रक्षा के लिये
युद्ध का होना लिखा गया है और इसमे कोई संदेह नहीं कि इस
अद्भुत कथा से हम्मीर का गौरव बहुत कुछ बढ़ जाता है और कथा
में भी एक अद्भुत रस का संचार हो आता है। पर हम्मीर महाकाव्य
में इसका कहीं नाम भी नहीं है और न कहीं किसी पुराने इतिहास
में इसका वर्णन मिलता है। पर महिमाशाह का हम्मीर के यहाँ
रहना निश्चित है तथा उसके अपने बाल बच्चों को मारकर लड़ाई
में हम्मीर का साथ देने की बात भी ठीक है। यह अवस्था तभी हो
सकती है जब महिमाशाह अपने को हम्मीर का किसी बड़े उपकार
के लिये ऋणी मानता हो। अलाउद्दीन का साथ न देकर हम्मीर का

( ५८ )
साथ देना एक मुसलमान सरदार के लिये निस्संदेह बड़े आश्चर्य की बात
है। हिंदी काव्यों में जिन घटनाओं का उल्लेख है उनका होना तो कोई
असंभव बात है ही नहीं। भारतवर्ष में जितने बड़े युद्ध हुए हैं सब स्त्रियों के
ही कारण हुए हैं। पृथ्वीराज के समय में तो मानों इसकी पराकाष्ठा
हो गई थी। पर मुसलमानों के लिये यह निन्दा की बात थी। इस-
लिये मुसलमान इतिहासकारों का इस घटना को छोड़कर युद्ध का
कुछ दूसरा ही कारण बताना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पर
नयनचंद्र सूरि का कुछ न कहना अवश्य संदेह उत्पन्न करता है।
अलाउद्दीन ने जिस नीचता से रतिपाल को मिला लिया इसका तो
यह कवि पूरा पूरा वर्णन करता है। यहाँ के कुछ श्लोक उद्धृत कर
देना उचित जान पड़ता है—
अंतरंतःपुरं नीत्वा शकेशास्तमभोजयत् ।
अपीप्यत्तद्भगिन्या च प्रतीत्यै मदिरामपि ॥ ८१ ॥
प्रतिश्रुत्य शकेशोक्तं ततः सर्वं स दुर्मतिः ।
विरोधोद्बोधिनीर्वाचो गत्वा राज्ञे न्यरूपयत् ॥ ८२ ॥
[ सर्ग १३ ]
इनसे यह स्पष्ट विदित होता है कि नयनचंद्र कुछ मुसलमानों का
पक्षपाती नहीं था। कुछ लोग कह सकते हैं कि जैनी होने से उसका
विरोधी होना असंभव नहीं है। मेरा अनुमान तो यह है कि उसने
मुसलमानी इतिहासों के आधार पर अपना काव्य लिखा है क्योंकि
उसमें कथित घटनाएँ और सन्-संवत् सब मुसलमानी इतिहासों से
मिलते हैं। जो कुछ हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐतिहासिक दृष्टि
से नयनचंद्र सूरि का काव्य जोधराज के रासो से अधिक
प्रामाणिक है।
तीसरी घटना, जिसपर विचार करना आवश्यक है, वह हम्मीर
की मृत्यु है। दोनों काव्यों से यह सिद्ध होता है कि हम्मीर ने आत्म-
हत्या की। हम्मीररासो में इसका कारण कुछ और ही लिखा है और
हम्मीर महाकाव्य में कुछ और है। जोधराज के अनुसार हम्मीर को

( ५६ )
विजय प्राप्त हुई और विजय के उत्साह में उसने मुसलमानी झंडे
निशानों को आगे करके अपने गढ़ की ओर पयान किया जिसपर
रानियों और रनिवास की अन्य महिलाओं ने यह समझा कि हम्मीर
की हार हुई और मुसलमानी सेना गढ़ को लेने के लिये आ रही है।
इसपर अपने सतीत्व की रक्षा के निमित्त उन्होंने अग्नि में अपने
प्राण दे दिए । इस पर हम्मीर को ऐसी ग्लानि हुई कि उसने भी
अपने प्राण देकर अपने संताप को शांत किया। नयनचंद्र के अनु-
सार रणमल और रतिपाल के विश्वासघात पर विजय की सब आशा
जाती रही और हम्मीर ने पहले राजमहिलाओं को अग्निदेव के
अर्पण कर रण में वीरोचित मृत्यु से मरना विचारा । अंत में जब
उसका शरीर रणक्षेत्र में बिंधकर गिर पड़ा तो उसे आशंका हुई कि
कहीं मुसलमानों के हाथ से मेरे प्राण न जायँ । इसलिये वहीं उसने
अपने मस्तक को अपने हाथ से काटकर इस आशंकित अपमान से
अपनी रक्षा की। दोनों बातों में राजमहिलाओं का अग्नि में आत्म-
समर्पण करना और हम्मीर का आत्महत्या करना मिलता है और
इन घटनाओं के संघटित होने में भी कोई संदेह या आश्चर्य की बात
नहीं है। जो कथा इस संबंध में दोनों काव्यों में दी है वह युक्तिसंगत
जान पड़ती है। कौन कहाँ तक सत्य है, इसका निर्णय करना तो बड़ा
कठिन है, विशेष करके ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में तो इस
संबंध में कुछ करना व्यर्थ है। जोधराज का यह लिखना कि अला-
उद्दीन ने समुद्र में कूदकर अपने प्राण दे दिए, निस्संदेह असत्य जान
पड़ता है। इस युद्ध के १५ वर्ष पीछे तक वह जीता रहा, इसके अनेक
प्रमाण मिलते हैं।
जो कुछ हो, ऐतिहासिक अंश में गड़बड़ रहने पर भी हम्मीर की
कथा बड़ी अद्भुत है और भारतवर्ष के गौरव को बढ़ानेवाली है। कौन
ऐसा स्वदेशाभिमानी होगा जो राजमहिलाओं के जौहर और हम्मीर
की वीरता तथा उसके साहस का वृत्तांत पढ़कर अपने को धन्य न
मानता हो और जिसका हृदय देशगौरव से न भर जाता हो। धन्य

( ६० )

है वह देश जहाँ ऐसे ऐसे वीर हो गए हैं। धन्य हैं वे स्त्रियाँ जो अपने
सतीत्व की रक्षा के लिये बिना कुछ सोचे विचारे इस क्षणभंगुर
'शरीर को नष्ट कर डालती थीं और धन्य हैं वे लोग जो उनके वृत्तांतों
को पढ़कर आनंदित और प्रफुल्लित होते हों और जिन्हें अपने देश
के गौरव की रक्षा का उत्साह होता हो ।
मैं पहले लिख चुका हूँ कि दो हम्मीर हो गए हैं। एक के विषय
में तो मैंने इतना कुछ मसाला इकट्ठा कर दिया है। मेवाड़ के हम्मीर
के विषय में भी कुछ कह देना आवश्यक जानकर ठाकुर हनुवंत सिंह
लिखित मेवाड़ के इतिहास से इनका वृत्तांत उद्धृत कर देता हूँ। वह
इस प्रकार है—
“लखमसी जी के पीछे मुसलमानों से बैर लेनेवाला अब केवल
उनका लड़का अजयसिंह था जो कि केलवाड़े में रहता था। यह
केलवाड़ा अर्वली पर्वत के उच्च प्रदेश में है। वहाँ उसकी रक्षा करने-
वाले भील लोग थे। अजयसिंह जी के बड़े भाई अरसी जी के कुँवर
हम्मीरसिंह को अपने पीछे गद्दी पर बिठलाने का वचन लखमसी
जी ने अजयसिंह से ले लिया था। इससे तथा अजयसिंह के पुत्र के
हम्मीरसिंह के समान पराक्रमी न होने से उनके उत्तराधिकारी हम्मीर-
सिंह ही थे। इनकी माता के विषय में यह कथा प्रसिद्ध है कि एक
दिन अरसी जी युवराजत्व अवस्था में ऊदबा गाँव के जंगल में
आखेट को गए थे। वहाँ जब एक सूअर के पीछे इन्होंने घोड़ा दिया
तो वह भागकर ज्वार के खेत में घुस गया। ज्योंही अरसी जी सूअर
के पीछे खेत में जाने लगे त्योंही एक कन्या ने, जो उस खेत की
चौकसी कर रही थी, इनको भीतर जाने से रोका और कहा कि
ठहरो सूअर को मैं बाहर निकाले देती हूँ। फिर उस लड़की ने ज्वार के
पेड़ को उखाड़ सूअर को दो चार सपाटा लगाकर उसे उनकी ओर
खदेड़ दिया। उस लड़की की निर्भयता को देख आखेटकों को बड़ा
आश्चर्य हुआ। पीछे जब कि वे एक नाले पर विश्राम करने के लिये
ठहरे हुए थे तो सनसनाता हुआ दूर से एक पत्थर का टुकड़ा आया और

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घोड़े की टाँग में ऐसे जोर से लगा कि उसका पैर टूट गया । बहुत ही
छोटे से पत्थर के टुकड़े से घोड़े का पैर टूटा हुआ देख खोजा गया
तो उसकी मारनेवाली भी वही खेत की रखवालिन कन्या निकली ।
पक्षियों के उड़ाने को उसने गोफन में रख कर गिल्ला फेंका था परंतु
दैवयोग से वह घोड़े को आ लगा । जब उसने यह सुना कि घोड़े
को चोट लग गई है तो अरसी जी के पास जाकर अपने बिना जाने
अपराध की क्षमा बड़ी नम्रता से माँगी । संध्या को लौटते समय
अरसी जी को फिर वही कन्या अपने घर को जाती हुई राह में
मिली । यह लड़की माथे पर दूध का मटका रखे और दोनों हाथों
में दो पड़रे ( भैंस के बच्चे ) लिए हुए जा रही थी, उस समय
अरसी जी के साथियों में से एक ने हँसी में उसके दूध को गिरा
देने का विचार किया और वह मनुष्य घोड़ा दौड़ाता हुआ उसके
पास होकर निकला । इससे यह लड़की कुछ भी न घबड़ाई और
अपने हाथ में का एक पड़रा घोड़े के पिछले पैरों में ऐसा मारा कि
घोड़ा और सवार दोनों धरती पर गिर पड़े और हँसी के बदले
उलटी अपनी हानि कर ली । अरसी जी ने घर जाकर निश्चय
कराया तो वह कन्या चंदाना वंश ( चहुवानों की एक शाखा है )
के एक राजपूत की पुत्री निकली । अरसी जी ने उसके बाप को
बुलवाकर उससे अपने विवाह करने के लिये वह लड़की माँगी, परंतु
उस राजपूत ने निषेध कर दिया । घर पहुँचकर जब अपनी स्त्री से
उसने सब वृत्तांत कहा तो वह पति के इस कार्य से बहुत अप्रसन्न
हुई और लग्न स्वीकार करने के लिये अपने पति को फिर अरसी जी
के पास उसने लौटाया । अंत में अरसी जी का उस कन्या के साथ
विवाह हुआ, जिसके पेट से अति पराक्रमी हम्मीरसिंह ने जन्म
लिया । सिंहनी के पेट में तो सिंह ही जन्म लेता है । हम्मीरसिंह
जी बचपन में अपनी ननसाल में रहकर बड़े हुए थे ।
"हम्मीरसिंह के काका अजयसिंह अब केलवाड़े में रहते थे तो
उनकी मुसलमानों के सिवाय पहाड़ियों में रहनेवाले राजपूत सरदारों

( ६२ )

के साथ भी बड़ी लड़ाई रही। इन पहाड़ियों का मुखिया बालेछा
जाति का मूंजा नामी एक राजपूत था जिसके साथ लड़ाई करने में
एक बार अजयसिंह बहुत घायल हुए। इस समय अजयसिंह के दो
पुत्र सजनसी और अजीतसी भी थे जिनकी आयु अनुमान १५ वर्ष
की थी परंतु वे कुछ भी वीरता लड़ाई में न दिखा सके। इससे उन्होंने
अपने भतीजे हम्मीरसिंह को बुला लिया और उनको सब वृत्तांत कह
सुनाया। हम्मीरसिंह अपने दोनों चचेरे भाइयों से बड़े न थे परंतु
तो भी उन्होंने मूँजा बालेछा का सिर काट लाना ऐसा विचार
निश्चय करके वे निकले। थोड़े दिनों में उन्होंने मूंजा का सिर काट
लाकर अपने काका को भेंट किया। अजयसिंह इस बात से बहुत
प्रसन्न हुए, और मूँजा के ही रुधिर से तिलक करके अपने पीछे
हम्मीरसिंह को राज्य का अधिकारी ठहराया। जब अजयसिंह मरे
तो उनसे पहले ही अजमाल मर चुके थे। सजनसी गद्दी के लिये
हम्मीरसिंह को अधिकारी नियत हुआ देख दक्षिण में चले गए,
जिनके वंश में एक ऐसा वीर पुरुष जन्मा कि जिसने मुसलमानों से
पूरा बदला ही न लिया किंतु अपने असामान्य पराक्रम और साहस
से मुसलमानी राज्य का मूलोच्छेदन ही कर दिया। यह पुरुष मरहठों
के राज्य की नींव जमानेवाला सितारे का राजा शिव जी था जो
समस्त भारतवर्ष में विख्यात है। सजनसी से बारहवीं पीढ़ी में यह
हिंदू धर्म्मरक्षक और अतुलित पराक्रमो वीर पुरुष शिव जी हुआ है।
सजनसी जी से पीछे दुलीपजी, सीओजी, भोराजी, देवराज, उग्रसेन,
माहुल जी, खेलुजी जनकोजी, संतोजी, शाहजी और शिव जी हुए।
अजयसिंह के पीछे हम्मीरसिंह सं० १३०१ ई० में मेवाड़ की गद्दी
पर बैठे। उस समय मेवाड़ की गिरती दशा होने से आस-पास के
राजा लोगों ने मेवाड़ के राणाओं को अपना शिरोमणि मानना
छोड़ दिया था। हम्मीरसिंह ने अपने पहाड़ी साथियों को इकट्ठा
करके जिन जिन राजाओं ने इनको अधिष्ठाता मानना छोड़ दिया
था उन सभों को परास्त करके अपने अधीन किया। इस प्रकार

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थोड़े दिनों में हीं हम्मीरसिंह ने अपना गौरव आस पास के राजाओं
पर जमा लिया। अब चित्तौर को किस विधि लूँ इस विचार में
हम्मीरसिंह पड़े।
“हम्मीरसिंह ने चित्तौर के आस-पास का सारा देश लूटकर
उजाड़ डाला, अकेला चित्तौर ही मुसलमानों के अधीन रह गया
था। किसी प्रकार उसे लूँ, यही हम्मीरसिंह का दृढ़ विचार था।
एक दिन उन्होंने अपने सब मनुष्यों को बुलाकर कहा कि "भाइयो !
जिसे जीने की इच्छा हो, जिसे संसार के इन क्षणिक सुखों के बदले
स्वर्ग का सुख छोड़ देना हो, जिसे अपनी प्रतिष्ठा की अपेक्षा प्राण
प्यारे हों, जिसे अपने उग्र वैरी मुसलमानों का डर हो, जिसे अपनी
गई हुई भूमाता को तुर्कों के हाथ में से निकाल लेने की हौस न हो
और जिसको इस अर्वली पर्वत की झाड़ो जंगलों में सदा पड़े रहने
की इच्छा हो, वह भले ही सुख से इस अर्वली की विकट गुह्य
गुफाओं में रहे, यह मेरी आज्ञा हं । जो मेरी भुजा मे बल होगा तो
तुम्हारे चले जाने पर भी अपने कुलदेवता की सहायता स अकेला भी
चित्तौर को लूँगा । तुम लांग सुख से जाओ और जो ईश्वर-इच्छा
से मैं चित्तोर को जल्दी ले सका तो तुमको पाछे बुला लूँगा, उस
समय आ जाना ।” हम्मीरसिंह के मनुष्यों में राजपूत भी थे परंतु
अधिक तो आसपास के भील लोग थे । उन लोगों ने बालकपन से
ही हम्मीरसिंह का पराक्रम देख रखा था और निरंतर उनके साथ
रहने से वे भी राजपूतों के समान ही साहसी और पराक्रमी हो गए
थे और हम्मीरसिंह के चाल-चलन तथा व्यवहार से ही वे लोग
ऐसे प्रसन्न थे कि यदि वे कहते तो प्राण देने को वे लोग उद्यत हो जाते ।
हम्मीरसिंह के उपरोक्त वचनों का उत्तर उन लोगों ने इस प्रकार
दिया—"हम मरेंगे अथवा शत्रुओं को मारेंगे परंतु अपने राजा को
छोड़कर कभी पीछे न हटेंगे, हम अपने कुल को कलंकित न करेंगे,
हम अपने शत्रुओं के हाथ में से अपनी भूमाता को छुड़ाने के लिये
अपने प्राण देंगे और इस जगत् के क्षणस्थायी सुखों को छोड़ स्वर्ग

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का सदैव सुख भोगेंगे ।” इस प्रकार वे एक स्वर होकर बोले कि
मानो एक साथ मेघ की गर्जना हुई । हम्मीरसिंह ने इन वीर राजपूतों
के ऊपर पुष्पों की वृष्टि करके कहा “धन्य हो मेरे प्यारे ! धन्य हो !
धन्य हो क्षत्रिय-पुत्रो ! धन्य हो ! ऐसे ही उत्तर की मैं आशा रखता
था और सोही अंत को मिला । तुम लोगों की शुभचिंतकता से मैं
अपनी भूमाता को छुड़ा सकूँगा । तुम्हारी राजभक्ति और तुम्हारी
एकता देख, तुम्हारा साहस और पराक्रम देख हमारे कुलदेवता
हमारे सहायक होंगे । और मुझे निश्चय है कि हमारा मनोरथ सिद्ध
होगा; इसलिये प्यारे वीर पुरुषो, तैयार हो जाओ । अपने बाल-बच्चों
को इस पहाड़ की सुरक्षित गुफा में छोड़ आओ और उनकी सब
प्रकार रक्षा होती रहे इसके लिये पाँच सहस्र वीर भीलों को नियत
कर चलो ।” हम्मीरसिंह के इन वाक्यों को सुनकर सर्वत्र जय
जयकार होने लगी । उक्त प्रकार के प्रबंध करके वे सब चित्तौर के
लिये पहाड़ों से उतर पड़े ।
“इस समय हम्मीरसिंह के पास पाँच हजार से कुछ अधिक
मनुष्य थे तथापि, ‘एक मराऊ सौ को मारे’ इस कहावत के अनुसार
वे पाँच लाख के समान थे । उन्होंने चित्तौर के चारों ओर का देश
लूट लिया, ग्राम जला दिए, मुसलमानों को पकड़ लिया। चारों ओर
अशांति रहने से व्यापारी व्यापार से और किसान खेती करने से
रुक गए । मुसलमान लोग अपनी प्रजा का रक्षण न कर सके । इससे
प्रजा का समूह हम्मीरसिंह के अधीन हो बसने लगा । इस समय
हम्मीरसिंह की रहन सहन अर्वली पर्वत की चोटियों पर केलवाड़े
में थी । वहाँ जाने का मार्ग बड़ा बेड़ा था । शत्रुओं के अधिकार
कर लेने योग्य कदापि न था । अर्वली पर्वत के भीतरी गुप्त स्थलों
को वहाँ से भाग जाने का मार्ग पृथक् था । ये गुप्त स्थल पहाड़ों की
घनी झाड़ियों में होने से बड़े विकट थे । वहाँ इतने फलादि खाने
योग्य पदार्थ उत्पन्न होते थे कि वर्षों तक सहस्रों मनुष्यों का निर्वाह
हो सकता था । केलवाड़े से पश्चिम ओर का मार्ग खुला था जहाँ

( ६५ )
होकर गुजरात और मारवाड़ का माल व्यापारी लाते थे तथा मित्रता
रखनेवाले भीलों से भोजन की बड़ी सहायता मिलती थी । बाल
बच्चों की रक्षा के लिये जो पाँच सहस्र भील नियत थे वे आवश्य-
कतानुसार रसद पहुँचा जाते थे । अच्छी तरह सोच समझ के और
चतुराई से हम्मीरसिंह ने अपने लिये निर्भय स्थान ढूंढ़ा था । परंतु
हम्मीरसिंह की बुद्धि को भला उनका दुर्दांत शत्रु अलाउद्दीन कैसे सह
सकता था । वह सैन्य लेकर स्वयं आया और उसने अर्वली का
पूर्व भाग जीत लिया । परंतु इससे हम्मीर की कुछ भी हानि न हुई ।
बादशाह ने अर्वली का पूर्वी भाग जीत लिया तो वे दक्षिण भाग में
धूम मचाने लगे । अंत में अलाउद्दीन थक गया और हम्मीरसिंह
को अधीन करने का काम चित्तौर के सूबेदार मालदेव को सौंप
आप दिल्ली को लौट गया ।
मालदेव अपने बल से तो हम्मीरसिंह को वश में कर न सका,
छल से उनको वश में लाने तथा उनके अपमान करने का विचार
कर अपनी पुत्री के विवाह कर देने के बहाने से उसने हम्मीरसिंह के
पास नारियल भेजा । हम्मीरसिंह ने अपने संपूर्ण राजपूत लोगों
तथा साथियों से इस विषय में संमति ली तो उन सभों ने इस संवंध
के स्वीकार करने का निषेध किया, परंतु हम्मीरसिंह ने कहा कि
"भाइयो मेरी समझ में तो यही आता है कि तुम सब भूल रहे हो ।
तुम लोग जो भय बतलाते हो उससे मैं अजान नहीं हूँ परंतु राज-
पूत होकर किसी के डर से अपना निश्चय किया हुआ कार्य्य छोड़
देना यह बड़ी कायरता है । यह राजपूत का नहीं किंतु दासीपुत्र का
काम है । राजपूतों को तो सदा दुःख के समय के लिये कटिबद्ध
रहना चाहिए । राजपूतों को तो एक बार घायल होकर घर भी
छोड़ना पड़ता है, और एक बार बाजे गाजे के साथ गद्दी पर भी
बैठना पड़ता है । जो भेजा हुआ यह टीका न स्वीकार करूँ तो मेरी
माँ की कोख कलंकित होवे । मेरे शूर वीर भाइयो ! मैं यह जानता
हूँ कि तुम लोग अपने प्राणों की अपेक्षा मेरे प्राणों की अधिक चिंता
६

( ६६ )

रखते हो परंतु इसमें तुम्हारी भूल है। घर में बैठे बैठे सवा मन
रुई के गद्दे पर सोते सोते और बातें करते करते सैकड़ों मनुष्य मर
जाते हैं, यह हम सभों से छिपा नहीं है। क्या यह तुम समझते हो
कि जो इस संसार का मारने वा जिलानेवाला है वह हमको जो डर-
कर घर में छिप जावेंगे तो न मारेगा। और जो उसे जीवित रखना
होगा तो हमारा नाम मिटानेवाला कौन है? इसलिये घर में निकम्मे
पड़े पड़े मर जाने से तो शत्रु को मारते मारते मरना ही श्रेष्ठ है,
नहीं तो जीना भी किस काम का है। भला इस बहाने से जिन
स्थानों में मेरे बाप दादे रहते थे, जिन किलों के ऊपर मेरे बाप दादों
के झंडे फहराते थे, जिन जंगलों में मेरे बाप दादों के शरीर का रुधिर
बह चुका है, वे स्थल, वे गढ़ और राजमहल तो देखने को मिलेंगे।
मेरे बाप दादे जिन स्थानों में मरे हैं वहीं मैं भी मरूँगा, उनके साथ
मैं भी स्वर्गधाम पाऊँगा। कहीं हमारे कुल देवताओं ने ही अथवा
हमारी भूमाता ने ही इस बहाने से मुझे वहाँ बुलवाया हो। कदाचित्
उनकी इच्छा यहो हो कि मैं वहाँ जाऊँ, इसलिये वहाँ जाने से वे
भी हमारी सहायता अवश्य करेंगी। भाइयो! मेरी इच्छा है कि
नारियल को स्वीकार करना चाहिए। उनके बचन सुनते ही सब
लोगों में वीर-रस उमड़ आया और यह बात सबने स्वीकार कर ली
और हम्मीरसिंह ने पाँच सौ सवार लेकर चित्तौर जाने का विचार
कर लिया। हम्मीरसिंह अपने छुँटे छुँटाए पाँच सौ सवार लेकर
चित्तौर के निकट पहुँचे, उस समय मालदेव के पाँच लड़के उनकी
अगवानी को आए। द्वार पर तोरण बँधा हुआ न देखा, तथा नगर
में कोई धूमधाम और विवाह की तैयारी न देखी, इससे उन्होंने
मालदेव के पुत्रों से पूछा कि क्यों क्या बात है, विवाह की कुछ
धूमधाम नहीं दीखती। वे कुछ उत्तर न दे सके। इससे हम्मीरसिंह
क्रोध में भरे हुए चित्तौर में जाकर दर्बार में बैठ गए। हम्मीरसिंह
का कोप और उनके मनुष्यों के लाल मुख देख मालदेव के देवते
कूँच कर गए। उनके पकड़ लेने की तो सामर्थ्य कहाँ थी पाँच सौ

२. द्वितीय भाग: मंगोल विद्रोही महिमाशाह को शरण एवं शरणागत धर्म प्रतिज्ञा

( ६७ )
वीर नंगी तलवारें लिए अडिग जमे हुए थे, वहाँ किसकी सांमर्थ्य
थी जो हम्मीरसिंह की ओर देख सके । हम्मीरसिंह अकेले भी माल-
देव और उसके पाँच पुत्र के लिये काफी थे । मालदेव ने डरकर
अपनी पुत्री के साथ हम्मीरसिंह का पाणिग्रहण कर दिया । उस
लड़की ने हम्मीरसिंह को चित्तोर लेने की यह युक्ति बतलाई कि
आपको जिस समय दहेज दिया जाय, उस समय आप उस वृद्ध
महता को जो मेरे पिता का बड़ा चतुर सेवक है अपने लिये माँग
लेना । निदान यही हुआ । इस भाँति विवाह करके हम्मीरसिंह अपने
घर को लौटे । केलवाड़े में लोग बड़े अधीर हो रहे थे परंतु हम्मीर-
सिंह को कुशलपूर्वक लोट आया देख लोग आनंद में मग्न हो गए ।
“इस रानी से हम्मीरसिंह के खेतसा नामक पुत्र जन्मा। जब
खेतसी एक वर्ष का हुआ तो उसकी माता ने अपने वाप को लिखा
कि मुझे अपने क्षेत्रपाल देवता के पगों लगना है, इसलिये मुझे वहाँ
बुला लो । मालदेव उस समय मेर लोगों के साथ लड़ने को गया
हुआ था, इससे उसके भाइयों ने अपनी बहिन को बुला लिया । इस
प्रकार हम्मीरसिंह की स्त्री, उनका पुत्र और कुछ मनुष्य चित्तौर में
प्रविष्ट हुए । उसी बूढ़े महता के यत्न से जो कि मालदेव के यहाँ सेना
का अध्यक्ष रह चुका था, और अब हम्मीरसिंह के यहाँ रहता था
यह परिणाम निकला कि चित्तौर की संपूर्ण राजपूत सेना हम्मीरसिंह
के पक्ष में हो गई । हम्मीरसिंह को गद्दी पर बिठाने के समाचार भेजे
गए । हम्मीरसिंह आगे से ही सावधान होकर आस पास फिरते
रहते थे । यह समाचार पाते ही आ निकले, परंतु इतने ही में शत्रु
की सेना भी लड़ने को आ गई । इस समय हम्मीरसिंह के पास थोड़े
और शत्रु के पास बहुत से मनुष्य थे परंतु बड़े पराक्रम के साथ
अपनी तलवार का स्वाद चखाते हुए हम्मीरसिंह सबको परास्त करके
विजय प्राप्तकर चित्तौर में आ गद्दी पर बैठ गए ।
“अलाउद्दीन उस समय मर गया था और मुहम्मद तुगलक उस
समय बादशाह था । मालदेव यह देखकर कि चित्तौर छिन गया

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और बिना बादशाही मदद के फिर मिलना कठिन है, दिल्ली को
भाग गया।
“चित्तौर के गढ़ पर राणा जी का झंडा फहराता हुआ देख
पहाड़ों में से आसपास के ग्रामों में से तथा गुप्त स्थानों में से निकल
निकलकर टिड्डी दल की भाँति लोग चित्तौर में घुसने लगे। चित्तौर
में से मुसलमानों का राज्य उठ गया और राजपूतों का आ गया,
यह सुनकर लोग आनंद मग्न हो गए और दूर दूर से वहाँ आने
लगे। छोटे और बड़े सब ही लोग मुसलमानों से बदला लेने की
उमंग के साथ आ एकत्रित हुए। जो इस समय मुसलमानों की सेना
चित्तौर लेने को आवे तो उसे कुचल डालो ऐसा वचन सबके मुख
से निकलने लगा। हम्मीरसिंह को सेना की कमी न रही। मुसलमानों
से युद्ध करने की उमंग में चित्तौर में झुंड के झुंड सहस्रों मनुष्य
फिरने लगे। सब कहने लगे कि जो मुसलमानी सेना ऐसे समय में
लड़ने को आ जावे तो उसकी अच्छी दुर्गति हो और वे जो कह रहे
थे सो ही हुआ। मुहम्मद अपने छिने हुए राज्य को लौटाने को
आया। हम्मीरसिंह के पास बिना बुलाए सहस्रों मनुष्य मुसलमानों
के प्राण लेने को आ उपस्थित हुए और उनके उत्साह को देख
राणाजी तत्काल चित्तौर से बाहर लड़ने के लिये निकले। सिंगोली
स्थान के निकट बड़ा संग्राम हुआ। सारांश यह है कि राजपूतों ने
इस उत्कटता से युद्ध किया कि मुसलमानों का एक भी मनुष्य दिल्ली
को लौटकर न जाने दिया।
“इस लड़ाई में स्वयं मुहम्मद पकड़ा गया। मालदेव का पुत्र
हरीसिंह हम्मीरसिंह के साथ द्वंद्व युद्ध करता हुआ मारा गया।
मुहम्मद को तीन महीने तक हम्मीरसिंह ने बँधुआ बनाकर रखा।
पीछे मुहम्मद ने अजमेर, रणथंभौर, नागौर आदि पर्गने सौ हाथी
और पचास लाख रुपया देकर छुटकारा पाया।
“हम्मीरसिंह का बड़ा साला बनवीरसिंह उनके पास नौकरी के
लिये आया। राणा जी ने उसे सत्कारपूर्वक अपने पास रखा और

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उसके निर्वाह के लिये नीमच, जीरण, रतनपुर और कीरार ये पर्गने
जागीर में दिए । जागीर देते समय राणा जी ने उससे कहा कि 'यह
जागीर भोगो और प्रामाणिक रीति से चाकरी देते रहो । तुम एक
समय तुरकों के पादसेवी थे परंतु अब तो अपनी ही जाति के,
स्वधर्मवाले के तथा अपने सगे संबंधी के नौकर हो । जिस भूमि के
लिये मेरे बाप दादों तथा सहस्रों शुभचिंतक पुरुषों ने अपना रुधिर
बहाया था उस भूमि को फिर लौटा लेने का मेरे ऊपर ऋण था सो
मैंने कुलदेवताओं की कृपा से लौटा लिया। तुम अब से तुर्क के
नौकर न रहकर राजपूत के हुए सो ईमानदारी से काम करना।'
बनबीर भी वैसा ही ईमानदार निकला । उसने मरते समय तक शुद्ध
चित्त से सेवा की और चंचल नदी के ऊपर का भीनौर ग्राम जीतकर
मेवाड़ में मिलाया ।
“जब से चित्तौर को मुसलमानों ने ले लिया था तभी से मेवाड़
के राणाओं की प्रतिष्ठा घट गई थी । भरतखंड के समस्त देशी राज्यों
में मेवाड़ के राणा शिरोमणि गिने जाते थे परंतु चित्तौर के निकल
जाते ही इसमें बाधा पड़ गई थी । जो राजा कर देनेवाले थे उन्होंने
कर तथा गद्दी पर बैठते समय भेंट, और आवश्यकता के समय पर
सेना द्वारा सहायता करना आदि सब बंद कर दिया था । उस समय
संपूर्ण क्षत्रिय राज्य निर्बल थे । उनको किसी के आश्रय की आव-
श्यकता थी । जब तक चित्तौर में राणा रहे वे लोग उनके आश्रय
में रहे परंतु चित्तौर निकल जाने से वे दिल्ली के बादशाहों के
अधीन हो गये, परन्तु राणा हम्मीर सिंह जी ने फिर से इस प्रवाह
को फेरा । उन्होंने चित्तौर को मुसलमानों से छीनकर उन फेरफारों
को फिर ज्यों का त्यों कर दिया जिन्हें कि मुसलमानों ने अपने राज्य
समय में कर डाला था । देश के संपूर्ण क्षत्रिय राजा मुसलमानों की
अपेक्षा चित्तौर के राणाओं के अधीन रहने से प्रसन्न हुए । ज्यों ही
हम्मीरसिंह जी ने चित्तौर ले लिया और मुहम्मद को हराया कि
संपूर्ण आर्य वंश के राजा एक के पीछे एक भेंट ले लेकर आए, कर

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देने लगे और यथासमय सेना द्वारा युद्ध में सहायता करने लगे।
इस भाँति मारवाड़, जयपुर, बूँदी, ग्वालियर, चंदेरी, राजौड़, राय-
सेन, सीकरी, कालपी और आबू आदि ठिकानों के राजा हम्मीरसिंह
जी के आज्ञाकारी हुए। हम्मीरसिंह जी भरतखंड के समस्त राजपूत
राज्यों में महाराजाधिराज बन गए। मुसलमानों के आने से पहले इस
देश में मेवाड़ के राजाओं की शक्ति अधिक थी, मुसलमानों के आते
ही वह दिन दिन घटने लगी। हम्मीरसिंह जी ने इस अवनति को
केवल रोका ही नही किंतु मुसलमानों के आने से पहले मेवाड़ की जो
उत्तम दशा थी फिर उसी पर उसे पहुँचा दिया। मुहम्मद के पीछे
किसी भी बादशाह ने चित्तौर के लेने का साहस न किया, इसका
एकमात्र हेतु हम्मीरसिंह जी के पराक्रम का भय था। इसी से हम्मीर-
सिंह के राज्यशासन के पिछले पचास वर्षों में मेवाड़ में अटल शांति
रही और इस दीर्घकाल की शांति ने मेवाड़ देश को व्यापार, धन,
विद्या, सभ्यता, तथा शूर पुरुषों से परिपूर्ण कर दिया। हम्मीरसिंह
जी जैसे बलवान् थे वैसे ही राज्य चलाने में, न्याय करने में, कला-
कौशल को उन्नति देने में प्रवीण थे। उनके राज्य में यह कहावत
पूर्णतया चरितार्थ हो गई थी कि "बाघ और बकरी एक घाट पानी
पीते हैं"; शांति बढ़ने से संपूर्ण व्यापारी, किसान और कारीगर
अपने अपने धंधों में लग गए, इससे देश में संपत्ति बढ़ी जिससे
राज्य की आय में अधिकता हुई। इन्होंने उत्तम उत्तम स्थान बनाकर
कारीगरी की उन्नति की और प्रजा का न्याय यथोचित करके तथा
पुत्रवत् पालन करके सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया। इस भाँति चौंसठ
वर्ष राज्य भोगकर अति वृद्धावस्था में सन् १३६५ ई० में हम्मीरसिंह
जी ने वैकुंठधाम का मार्ग लिया। परम बुद्धिमान् और पराक्रमी
महाराणा हम्मीरसिंह जी अपने पुत्र खेतसी जी के लिये शांति-संपन्न
और विस्तीर्ण राज्य छोड़ गए। मेवाड़पति महाराणा हम्मीरसिंह जी
अपनी अक्षय कीर्ति छोड़कर मरे। वहाँ के लोग उन्हें अब तक
सराहते हैं।"

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इन हम्मीर के विषय में विशेष कुछ लिखना अथवा इनके
संबंध की घटनाओं पर विचार करना मैं आवश्यक नहीं समझता ।
एक तो इनका इस रासो काव्य से कोई संबंध नहीं है, दूसरे यह
भूमिका योंही इतनी बड़ी हो गई है कि अब इसे और बढ़ाना अनु-
चित जान पड़ता है। केवल कथाभाग मैंने इसलिये दे दिया है कि
जिसमें पाठकों को इसके जानने का यहीं अवसर प्राप्त हो जाय और
वे स्वयं इसके विषय में और जानने का उद्योग करें। जिन महाशयों
को हम्मीर के विषय में कुछ लिखने का अवसर प्राप्त हो उन्हें उचित
है कि वे दोनों हम्मीरों को अलग अलग मानकर उनके संबंध की
घटनाओं का उल्लेख करें।
बस अब मुझे हिंदी के प्रेमियों से क्षमा माँगनी है कि एक तो
इस भूमिका के लिखने में इतना विलंब हो गया, दूसरे यह भूमिका
इतनी बड़ी हो गई । आशा है कि पहले अपराध का मार्जन दूसरे
से हो जाय ।
इस भूमिका को समाप्त करने के पहले मैं कुँवर कन्हैया जू और
पंडित रामचंद्र शुक्ल को अनेक धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन्होंने
इसके कई अंशों के लिखने में मुझे बड़ी सहायता दी। साथ ही मैं
कुँअर कृष्णसिंह वर्मा को भी धन्यवाद दिए बिना नहीं रह सकता।
उन्हीं के द्वारा मुझे यह काव्य प्राप्त हुआ । ठाकुर विजयसिंह जी ने
इस काव्य को प्राप्त करने और कुँवर कृष्णसिंह जी की सहायता
करने में जो कष्ट उठाया उसके लिये मैं उनका भी उपकार मानता
हूँ। आशा है कि ये सब महाशय इसी प्रकार मुझपर कृपा बनाए
रहेंगे जिससे मैं अन्य अन्य ऐसे काव्यों के संपादन करने में
समर्थ होऊँ ।
काशी,
६ फरवरी १६०८ \quad } \qquad\qquad\qquad\qquadश्यामसुंदर दास

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो
——————
दोहा
सिंधुर बदन अमंद दुति, बुद्धि सिद्धि वरदाय।
सुमिरत पद-पंकज तुरत, बिघ्न अनेक विलाय ॥ १ ॥
छप्पय
दुरद* वदन बुधि-सदन चंद्र लल्लाट बिराजै ।
भुजा च्यारि आयुद्ध तेज फरसो+ कर राजै १ ॥
इक्क दंत छवि-धाम अरुण सिंदुरमय सोहैं ।
मनो प्रात रबि उदित कहन उपमा कबि को है ॥
कर-कमल माल मोदक लिये उर उदार उपबीत बर ।
सिव सिवा सुवन गणराज तुम देहु सदा वरदाँन वर २ ॥२॥
पुंडरीक सुत सुता तासु पद-कमल मनाऊँ ॥
बिसद÷ बरण ३ बर वसन बिसद भूषण हिय ध्याऊँ ॥
बिसद जंत्र सुर सुद्ध तंत्र तुबरजुत सोहै ।
बिसद ताल इक भुजा द्वितिय पुस्तक मन मोहै ॥
गति राजहंस हंसह चढ़ा रटी सुरन कीरति बिमल ।
जय मात बिमल ४ वरदायिनी देहु सदा वरदाँन बल ॥३॥


१ वर साजै । २ वरदायक वरदान बर । ३ बसन । ४ सदा ।

  • दुरद=द्विरद, गज । + फरसो=परशु । ÷ बिसद=बिमल, सुंदर ।

२ हम्मीररासो
छंद पद्धरी
जय विन्नराज गणईसदेव ।
जय जगदंय जननी सएव१ * ॥
गुरु - पाद - पद्म वंदन सुकीन ।
सब सज्जन पद मन२ लीन कीन ॥ ४ ॥
प्रथिराज राज जग भौ प्रसिद्ध ।
भृगु वंस मध्य प्रगटे सुसिद्ध ॥
नृप चंद्रभाँन तिहिं बंस मध्य ।
किरवाँन+ दाँन दोऊ प्रसिद्ध ॥ ५ ॥
पिच निंवराण जग गाँम नाँम ।
जुत बर्णाश्रम निज धर्म्म धाँम ॥
जय कीरति भुवमंडल उदार ।
अरु तेज प्रतापी बल अपार ॥ ६ ॥
सब कहैं राठ कौ पातस्याह ।
जस श्रवन सुनन को सदा चाह ॥
द्विजराज गौड़कुल जग - प्रसिद्ध ।
बिद्या - बिनीत हरि - धर्म्म - वृद्ध ॥ ७ ॥
सब दया दाँन उद्दार बीर ।
गुण - सागर नागर परम धीर ॥
कुल पंच बृत्त कै मूल जाँन ।
द्विज आदि गौड़३ जानत जहाँन४ ॥ ८ ॥
सौ चौदह सै चालीस च्यार ।
जन - सासन-सागर अति उद्दार ॥
अब सब को किंकर मोहिं जानि ।
१ सहेव । २ हुलसन । ३ सोइ आदि गोर । ४ जानि ।

  • सएव ( सहेव ) = स्वामिनी । * किरवाँन ( किरपान ) = कृपाण ।

हम्मीररासो ३
ऋषि अत्रि गोत्र मैं जन्म मानि ॥ ९ ॥
डिडवरिया राव कहि बिरद ताहिं ।
सुभ राठ देस मैं उदित आहि ॥
तिहिं नाँम गाँम भल बीजवार ।
सब प्रजा सुखी जुत बरण च्यार ॥ १० ॥
जहाँ बालकृष्ण सुत जोधराज ।
गुन जोतिष पंडित कवि समाज¹ ॥
नृप करी कृपा तिहिं पर अपार ।
धन धरा बाजि² गृह बसन सार ॥११॥
बाहन अनेक सत्कार भूरि ।
सब भाँति अजाची कियौ मूरि ॥
नृप एक³ समय दरबार माहिं ।
रासो हमीर कहि⁴ सुन्यौ नाहिं ॥१२॥
नृप प्रस्न⁵ करिय यहु उभे बात ।
सब कहो बंस उत्पति सुतात ।
अरु कहो साहि हम्मीर बैर ।
किहिं भाँति⁶ कंक= बड्ढ्यौ सु फेर ॥१३॥
तब कही प्रथम यह कल्प आदि ।
जल सेष सैन जब है अनादि ॥
नहिं धरणि चंद्र सूरज अकास ।
नहिं देव दनुज नर बर प्रकास ॥१४॥
सब बीज बृक्ष⁷ हरि संग मेलि ।
करि आप जोग निद्रा सकेलि ॥
करि सैन अंत निज सक्ति जानि ।
१ उदार । २ बास । ३ इक । ४ कह्यौ । ५ प्रश्न । ६ बत्त । ७ जुक्त ।
=कंक=ससिश्रु ।