हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६५ )
होकर गुजरात और मारवाड़ का माल व्यापारी लाते थे तथा मित्रता
रखनेवाले भीलों से भोजन की बड़ी सहायता मिलती थी । बाल
बच्चों की रक्षा के लिये जो पाँच सहस्र भील नियत थे वे आवश्य-
कतानुसार रसद पहुँचा जाते थे । अच्छी तरह सोच समझ के और
चतुराई से हम्मीरसिंह ने अपने लिये निर्भय स्थान ढूंढ़ा था । परंतु
हम्मीरसिंह की बुद्धि को भला उनका दुर्दांत शत्रु अलाउद्दीन कैसे सह
सकता था । वह सैन्य लेकर स्वयं आया और उसने अर्वली का
पूर्व भाग जीत लिया । परंतु इससे हम्मीर की कुछ भी हानि न हुई ।
बादशाह ने अर्वली का पूर्वी भाग जीत लिया तो वे दक्षिण भाग में
धूम मचाने लगे । अंत में अलाउद्दीन थक गया और हम्मीरसिंह
को अधीन करने का काम चित्तौर के सूबेदार मालदेव को सौंप
आप दिल्ली को लौट गया ।
मालदेव अपने बल से तो हम्मीरसिंह को वश में कर न सका,
छल से उनको वश में लाने तथा उनके अपमान करने का विचार
कर अपनी पुत्री के विवाह कर देने के बहाने से उसने हम्मीरसिंह के
पास नारियल भेजा । हम्मीरसिंह ने अपने संपूर्ण राजपूत लोगों
तथा साथियों से इस विषय में संमति ली तो उन सभों ने इस संवंध
के स्वीकार करने का निषेध किया, परंतु हम्मीरसिंह ने कहा कि
"भाइयो मेरी समझ में तो यही आता है कि तुम सब भूल रहे हो ।
तुम लोग जो भय बतलाते हो उससे मैं अजान नहीं हूँ परंतु राज-
पूत होकर किसी के डर से अपना निश्चय किया हुआ कार्य्य छोड़
देना यह बड़ी कायरता है । यह राजपूत का नहीं किंतु दासीपुत्र का
काम है । राजपूतों को तो सदा दुःख के समय के लिये कटिबद्ध
रहना चाहिए । राजपूतों को तो एक बार घायल होकर घर भी
छोड़ना पड़ता है, और एक बार बाजे गाजे के साथ गद्दी पर भी
बैठना पड़ता है । जो भेजा हुआ यह टीका न स्वीकार करूँ तो मेरी
माँ की कोख कलंकित होवे । मेरे शूर वीर भाइयो ! मैं यह जानता
हूँ कि तुम लोग अपने प्राणों की अपेक्षा मेरे प्राणों की अधिक चिंता
६