हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ३
ऋषि अत्रि गोत्र मैं जन्म मानि ॥ ९ ॥
डिडवरिया राव कहि बिरद ताहिं ।
सुभ राठ देस मैं उदित आहि ॥
तिहिं नाँम गाँम भल बीजवार ।
सब प्रजा सुखी जुत बरण च्यार ॥ १० ॥
जहाँ बालकृष्ण सुत जोधराज ।
गुन जोतिष पंडित कवि समाज¹ ॥
नृप करी कृपा तिहिं पर अपार ।
धन धरा बाजि² गृह बसन सार ॥११॥
बाहन अनेक सत्कार भूरि ।
सब भाँति अजाची कियौ मूरि ॥
नृप एक³ समय दरबार माहिं ।
रासो हमीर कहि⁴ सुन्यौ नाहिं ॥१२॥
नृप प्रस्न⁵ करिय यहु उभे बात ।
सब कहो बंस उत्पति सुतात ।
अरु कहो साहि हम्मीर बैर ।
किहिं भाँति⁶ कंक= बड्ढ्यौ सु फेर ॥१३॥
तब कही प्रथम यह कल्प आदि ।
जल सेष सैन जब है अनादि ॥
नहिं धरणि चंद्र सूरज अकास ।
नहिं देव दनुज नर बर प्रकास ॥१४॥
सब बीज बृक्ष⁷ हरि संग मेलि ।
करि आप जोग निद्रा सकेलि ॥
करि सैन अंत निज सक्ति जानि ।
१ उदार । २ बास । ३ इक । ४ कह्यौ । ५ प्रश्न । ६ बत्त । ७ जुक्त ।
=कंक=ससिश्रु ।