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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 258 में से

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पृष्ठ 88

२ हम्मीररासो
छंद पद्धरी
जय विन्नराज गणईसदेव ।
जय जगदंय जननी सएव१ * ॥
गुरु - पाद - पद्म वंदन सुकीन ।
सब सज्जन पद मन२ लीन कीन ॥ ४ ॥
प्रथिराज राज जग भौ प्रसिद्ध ।
भृगु वंस मध्य प्रगटे सुसिद्ध ॥
नृप चंद्रभाँन तिहिं बंस मध्य ।
किरवाँन+ दाँन दोऊ प्रसिद्ध ॥ ५ ॥
पिच निंवराण जग गाँम नाँम ।
जुत बर्णाश्रम निज धर्म्म धाँम ॥
जय कीरति भुवमंडल उदार ।
अरु तेज प्रतापी बल अपार ॥ ६ ॥
सब कहैं राठ कौ पातस्याह ।
जस श्रवन सुनन को सदा चाह ॥
द्विजराज गौड़कुल जग - प्रसिद्ध ।
बिद्या - बिनीत हरि - धर्म्म - वृद्ध ॥ ७ ॥
सब दया दाँन उद्दार बीर ।
गुण - सागर नागर परम धीर ॥
कुल पंच बृत्त कै मूल जाँन ।
द्विज आदि गौड़३ जानत जहाँन४ ॥ ८ ॥
सौ चौदह सै चालीस च्यार ।
जन - सासन-सागर अति उद्दार ॥
अब सब को किंकर मोहिं जानि ।
१ सहेव । २ हुलसन । ३ सोइ आदि गोर । ४ जानि ।

  • सएव ( सहेव ) = स्वामिनी । * किरवाँन ( किरपान ) = कृपाण ।