हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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का सदैव सुख भोगेंगे ।” इस प्रकार वे एक स्वर होकर बोले कि
मानो एक साथ मेघ की गर्जना हुई । हम्मीरसिंह ने इन वीर राजपूतों
के ऊपर पुष्पों की वृष्टि करके कहा “धन्य हो मेरे प्यारे ! धन्य हो !
धन्य हो क्षत्रिय-पुत्रो ! धन्य हो ! ऐसे ही उत्तर की मैं आशा रखता
था और सोही अंत को मिला । तुम लोगों की शुभचिंतकता से मैं
अपनी भूमाता को छुड़ा सकूँगा । तुम्हारी राजभक्ति और तुम्हारी
एकता देख, तुम्हारा साहस और पराक्रम देख हमारे कुलदेवता
हमारे सहायक होंगे । और मुझे निश्चय है कि हमारा मनोरथ सिद्ध
होगा; इसलिये प्यारे वीर पुरुषो, तैयार हो जाओ । अपने बाल-बच्चों
को इस पहाड़ की सुरक्षित गुफा में छोड़ आओ और उनकी सब
प्रकार रक्षा होती रहे इसके लिये पाँच सहस्र वीर भीलों को नियत
कर चलो ।” हम्मीरसिंह के इन वाक्यों को सुनकर सर्वत्र जय
जयकार होने लगी । उक्त प्रकार के प्रबंध करके वे सब चित्तौर के
लिये पहाड़ों से उतर पड़े ।
“इस समय हम्मीरसिंह के पास पाँच हजार से कुछ अधिक
मनुष्य थे तथापि, ‘एक मराऊ सौ को मारे’ इस कहावत के अनुसार
वे पाँच लाख के समान थे । उन्होंने चित्तौर के चारों ओर का देश
लूट लिया, ग्राम जला दिए, मुसलमानों को पकड़ लिया। चारों ओर
अशांति रहने से व्यापारी व्यापार से और किसान खेती करने से
रुक गए । मुसलमान लोग अपनी प्रजा का रक्षण न कर सके । इससे
प्रजा का समूह हम्मीरसिंह के अधीन हो बसने लगा । इस समय
हम्मीरसिंह की रहन सहन अर्वली पर्वत की चोटियों पर केलवाड़े
में थी । वहाँ जाने का मार्ग बड़ा बेड़ा था । शत्रुओं के अधिकार
कर लेने योग्य कदापि न था । अर्वली पर्वत के भीतरी गुप्त स्थलों
को वहाँ से भाग जाने का मार्ग पृथक् था । ये गुप्त स्थल पहाड़ों की
घनी झाड़ियों में होने से बड़े विकट थे । वहाँ इतने फलादि खाने
योग्य पदार्थ उत्पन्न होते थे कि वर्षों तक सहस्रों मनुष्यों का निर्वाह
हो सकता था । केलवाड़े से पश्चिम ओर का मार्ग खुला था जहाँ