हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
४४ | हम्मीररासो
चौपाई छंद
हजरति हरषि तोर तिहिं¹ दिन्नौ ।
चूहौ² प्राण-हीन तब किन्नौ ॥
तबहीं साहि हरषि मुसकाए ।
तिय कौ ऐसे बचन सुनाए ॥२४७॥
कायर जाति तिया³ हम जानी ।
तातैं यह हम प्रथमहिं ठानी ॥
यह करनी अद्भुत तुम देखी ।
निज कर करी सु तुम अवरेखी ॥२४८॥
हँसी हुरम सुनि हजरति बानी ।
पुरुषन की तो अकथ⁴ कहानी ॥
मारैं सिंह तो न मुख भाखैं ।
जाचे नाहिं प्राण वै राखैं ॥२४६॥
मैं जग मैं ऐसा सुनि पाऊँ ।
कहैं साहि मैं बहुत बघाऊँ ॥
बकसो गुनह तो अबै बताऊँ ।
तुरत साहि कै पाइ लगाऊँ ॥
सोरठा छंद
ऐसा मोहिं बताय, सिंह मारि सिफत न करै ।
बकसो औगुन आय, जो उन तात ज मारियौ ॥ २५१ ॥
हुरम तबै कर जोरि, बार बार सिर नाय कै ।
सुनहु गुनह⁵ अब मोर, हजरति बीतयौ आपनो ॥ २५२ ॥
१ तहँ । २ चूही प्राणहीन तिहिं चीनौ । ३ तीय । ४ अकह ।
५ गुनाह जुमोर ।
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हम्मीररासो ४५
छप्पय छंद
मृगया महँ जिहिं समय, सकल भुल्लिय १ बन माहीं ।
महा घोर तम भयौ, तहाँ २ वरनी नहिं जाही ॥
तदिन सेख संयोग, आनि हमसैं तब मिल्लिव ।
नहिंन सेख तकसीर, देखि मन मोरहिं चिल्लिव ॥
संयोग भोग बिछुरन मिलन, लिख्यौ बिधाता ज दिन जहँ ।
नहिं टरै लाख कोऊ करो सुतौ होय वह ३ त दिन तहँ ॥२५३॥
दोहरा छंद
मैं सेखहिं जाँनत नहीं, सेख न जाँनत मोहिं ।
होनहार संजोग जो,४ मिटै न उतनी होहि ॥ २५४ ॥
सुरति करत सिंह जु उठ्यौ, लख्यौ सेख सति भाय ।
लै कमाँन मारचौ तुरत, तज्यौ न आसन आय ॥ २५५ ॥
सुनू स्वभाव ज सेख के, लच्छिन कहे जु आप ।
मैं सभीति भइ सिंह तैं, कहे मोहिं बिन पाप ॥ २५६ ॥
त्रोटक छंद
सुनिये पन सेख करे निज ये ।
घर बैठत बाँ जल सों रजए ॥
नहिं भोजन सोहि गरम्म करै ।
उकरू नहिं बैठत भुंमि भरै ॥२५७॥
सरणागत आवत नाहिं तजै ।
पर बाम लखे मन माहिं लजै ॥
जहँ जाचत प्राण न राखत है।
नहिं झूठ अकारन ५ भाखत है ॥२५८॥
१ भूले । २ तहाँ कछु बर्नि न जाही । ३ वहाँ । ४ तैं ।
५ अकारथ ।
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४६ हम्मीररासो
रण मैं नहिं पिट्ठि दई कबहुँ ।
लखि आरतिवंतन सौं अबहूँ ॥
तहँ मेटत आरति वार तिहीं ।
बिन आसन बैठत है कबहीं ॥२५६॥
मुख सैं उचरै न टरै कबहीं ।
सब तैं मधुरे मुख बैन सही ॥
दृग लाज भरे रिझवार घनैं ।
रहनी करनी कविराज भनैं ॥२६०॥
महिमा महिमा नहिं जात कही ।
जस चाहक गाहक गाहक ही ॥
बरबीर महाररणधीर अरै ।
खँग खेत गहै अरि खंड करै ॥२६१॥
सुनि साहि मनै अचिरज्ज भयौ ।
ततकाल जु सेख बुलाय लयौ ॥
छिरकाय धरा जल सौं जु भरे ।
बहु भोजन आनि गरम्म घरे ॥२६२॥
तर गेरि पटंबर अंबरयं ।
करि पालथि छोरिय कंमरयं ॥
बहु भाँति सिराहि सुभाय मनं ।
करिये तब भोजन आय¹ अनं ॥२६३॥
मिलिए सब जो कछु बाल कहे ।
महिमा तिय जानि सनेह लहे² ॥
प्रजुरे पतिसाहि सु कोप कियं ।
मनु³ ज्वाल बिसाल सुघृत्त दियं ॥२६४॥
दृग लाल बिसाल सुबंक भुवं ।
१ आप । २ लग । ३ जनु ।
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हम्मीररासो ४७
रद दाबत १ ओठ सु ओठ दुवं ॥
करि क्रोध तवै पतिसाहि कहै ।
उर मै अति क्रोध २प्रचंड दहै ॥२६५॥
सुनि जाँमहिं जो तकसीर परै ।
तिहिं कौ न कहो अब दंड धरै ॥
कर जोरि उठ्यौ महिमा तबहीं ।
हम तो तकसीर भरे सबहीं ॥२६६॥
तुव गर्दन वेग कबूल करो ।
है तकसीर जु सेख भरो ॥
तब सेख कहै कर जोरि तवै ।
करिये मन भावतु है जु अचै ॥२६७॥
तब बोलि हुरम्म कहै मुख तैं ।
पहलैं तकसीर परी हम तैं ॥
गरदन्न कबूल करी अबहीं ।
पहलैँ हम तैं तकसीर भई ॥२६८॥
समझे पतिसाह तबै मन मैं ।
अबला हठ नाहिं मिटै मन ३ मैं ॥
इनकौ सब बेगम लोग कहैं ।
मन चाहत सो हठता जु गहैं ॥२६९॥
दोहरा छंद
हुरम बचन सुनि साह तब, मन बिचार तहँ कीन ४।
बेगम जाति जु तीय की, इन मरवै मन दीन ५ ॥२७०॥
जाहु सेख इत ६ मति रहो, जहाँ लगि मेरो राज ।
जो राखै ७ ताकौ हनूँ, प्रगट सुसाज़ समाज ॥२७१॥
१ दब्बत । २ कोप । ३ तन । ४ किन्न । ५ दिन्न । ६ इह । ७ रक्खै ।
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४८ हम्मीररासो
कट्टन गरदन जोग तू, कीनौ १ कुविध २ खरान ।
को रक्खै ३ या भूमि पर, रक्खि ४ करै को जवान ॥२७२॥
छप्पय छंद
यह महि मँडल जितो, आँन मेरी सब मांनैं।
खूनी रक्खै कौन, कोउ ऐसा तू जानै ॥
हम तैं बली बताय, ओट जाकी तू तकै।
बचै न काहू ठौर, एक बिन गए न मक्कै ॥
कर जोरि सेख इम उच्चरै, बली एक साहिब गिनूँ।
निर्वीज धरा ५ कबहुँ न है, ६ मैं हमीर स्रवनन सुनूँ ७ ॥२७३॥
तब सुसेख सिर नाय, रजा हजरति जो पाऊँ ।
जौ न गिनै पतिसाह, सर्न मैं ताकी ८ जाऊँ ॥
तुमहिं न नाऊँ सोस, नहिंन फिरि दिल्लिय आऊँ ।
जुद्ध जुरे नहिं टरौं, हत्थ तुम कौ जु दिखाऊँ ॥
यह कहत सेख सल्लम किय, तबहिं चला चलचित्त भुब ।
निज धाम आय अप अनुज सों, बिबर बिबर बातें जु हुब ॥२७४॥
छंद पद्धरी
आए जु सेख घर तब सरोष ।
जिय जान्यौ अपनो सकल दोष ॥
मिलिय ९ जु मीर गबरू सुधाय ।
चलचित्त देखि तिहिं पूछि १० जाय ॥२७५॥
किहिँ हेतु आज चिंतत सुभाय ।
किहिँ कियव वैर सो मुहिँ ११ बताय ॥
तिहिँ मारि करूँ ततकाल टूक १२ ।
१ किन्नौ । २ कुबदि । ३ राखै । ४ राखि । ५ भुंमि । ६ हैं ।
७ गिन्यौ, सुन्यौ अंत्यानुप्रास । ८ जाकी । ६ मिल्ली । १० पुच्छि ।
११ मो । १२ दुक्क ।
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हम्मीररासो ४९
हिय क्रोध अगिन साँ^१ उठत ऊक^२ ॥२७६॥
को^३ करै बैर बिन कर्म्मबीर ।
मिट^४ गये अन्न जल को सु सोर ॥
तिहिं^५ कौन रहै रक्खै सु कौन ।
यह जानि मर्म तुम रहो मौन ॥२७७॥
यह सुनत मीर गबरू सुभाय ।
सो^६ पर्यौ धर्नि मुच्छा सु खाय ॥
तदि कर्यौ बोध यहु बिधि सुताहिं ।
नहिँ करो सोच रहो^७ निकट साहि ॥२७८॥
तब कहूँ मीर गबरू सु ताहिं ।
सब तजो देश मक्के सु जाहि ॥
कै रहो राव हम्मीर पास ।
तन रहै खुसी नासै जु त्रास ॥२७६॥
तब चलिव सेख तजि साहि देस ।
सब^८ सुभट संग लिन्हे^९ सुबेस ॥
सत पंच सैन गजराज पंच ।
रथ सत्थ लिये निज नारि संच ॥२८०॥
सब रखत साज निज संग लीन ।
दासी^१० जु दास सुंदर नवीन ॥
सजि साज बाज डेरे अनूप ।
लदि ऊँट किते सँग चलिय^११ जूप ॥२८१॥
चढ़ि^१२ सैन सज्योँ निज संग बाँम ।
१ यौं । २ हूक हुक्क । ३ महिमा साहोवाच । ४ मिटि अन्न जहाँ
जाके सनीर । ५ तव । ६ सुइ परचो धरनि मुर्छा सुखाइ । ७ रहु ।
८ निज । ६ लीन्हे । १० सब दासि दास । ११ चले । १२ सजि
सेख चढ्यौ ।
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५० हम्मीररासो
बज्जिव निसाँन गज्जिव सु ताँम ॥
मग चलत करत मृगया अनेक ।
मिलि चलिय१ सकल बर बीर एक२ ॥२८२॥
जिहिं मिलै राव राजा सु जाय ।
पतिसाहू बैर सुनि रहै चाय ॥
चहुँ चक्क फिरयौ महिमा सुधीर ।
नहिं३ कह्यौ रहन काहू सुबीर ॥२८३॥
द्वै४ दीन सेख देखे सुझारि ।
बिन राव दसौँ दिसि फिरिव हारि ॥
तब तक्कि५ सेख हम्मीर राव ।
सोइ आइ सरन परसे जु पाव ॥२८४॥
दोहरा छंद
गढ़ बंका६ वंको सुधर, बंका६ राव हमीर ।
लखि प्रतीति मन महँ७ भइय, हर्षे महिमा मीर ॥२८५॥
देखि जलासय बिटप बहु, उतरि सुडेरा कीन८ ।
हय गय बंधे तरुन तर, खाँन पाँन बिधि लीन९ ॥२८६॥
डेरा ड्यौढ़ी करि खरे, करी बिछायती बेस ।
करि१० मसलति कौँ सलि जुरी, सब भर सरस सुदेस ॥२८७॥
मंत्री मंत्र सुपूच्छि११ तब, इक चर लीन सु बोलि ।
जाहु राव के पास तुम, कहो बात सब खोलि१२ ॥२८८॥
प्रथम सलाँम कहो जु तुम, बिरत१३ कहो सु बिसेष ।
हुकम होय जो मिलन कौं, तो हजूर है सेख ॥२८६॥
इतने मैं जानी परै, पन भ्रम प्रीति प्रतीति ।
१ चलै । २ केक । ३ नन कह्यौ । ४ द्वै, दोउ दोन, दोय । ५ तके ।
६ बंको । ७ जिय मैं । ८ किन्न । ६ लिन्न । १० करी कचहरी आप तत्र ।
११ पुच्छि । १२ बुल्लि, खुल्लि । १३ वृत्त, वृत्तांत ।
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हर्ष सोक यहिँ गति लख्यौ, तुम जानत सब रीति ॥२६०॥
तब सु दूत गय राव पहँ, करी खबरि दरबाँन ।
बोलि हजूरि सुदूत कौ, पूछत कुसल सुजाँन ॥२९१॥
सकल बात सुनि दूत मुख, हर्ष राव बहु कीन१ ।
तबहिं उलटि पठयौ सु वह, सेख बुलाय सुलीन२ ॥२९२॥
नाराच छंद
चल्यौ जु सेख राव पहँ बनाय साज कीनयं३ ।
तुरंग पंच नाग एक साज साजि लीनयं४ ॥
कमाँन दोय टंकनो सु देस मुल्लताँन की ।
कृपाँन एक५ बेस देस पालकी सुजाँन की ॥२६३॥
लिये सु दोय बज्र लाल एक५ मुक्त मालयं ।
कही जु एक५ दोय बाज स्वाँन दोय पालयं ॥
सवार एक आपही सबै 'पयाद चल्लियं ।
रहे तनक्क पौरि जाय फेरि अग्ग हल्लियं ॥२६४॥
सुबेतहार अग्ग६ जाय राव कौ सुनाइयं ।
हमीर राव बेगि आय७ रावतं खँदाइयं ॥
चले लिवाय सेख कौ जहाँ जु राव बट्टियं ।
सभा समेत राव देखि सेख कौ सु उठ्ठियं ॥२९५॥
मिले उभै समाज सौं कुसल्ल छेम पुच्छियं ।
परस्सि पानि पाव सेख हाथ८ जोरि सुच्छियं ॥
करी जुअग्ग सेख भेंट बुल्लियौ सु बाचयं ।
सरन्नि राव राखि९ राखि मैं सरन्नि साचयं ॥२६६॥
फिरचौ सु मैं सु दीन दोय खाँन जाँति सब्वयं ।
जितेक राज रावताय छत्र जाति सब्वयं ॥
१ किन्न । २ लिन्न । ३ किन्नयं । ४ तुरंग पंच नाग इक्क साज सज्जि
लिन्नयं । ५ इक्क । ६ अग्र । ७ आप । ८ हत्थ । ६ रक्खि रक्खि ।
५२ हम्मीररासो
दिसा दसौँ जितेक भूप और बीर बंक जे ।
रहो कह्यौ सु कौन हू रहूँ तहाँ सुधीर जे १ ॥२९७॥
हँसे हमीर राव बात सेख की सुनंतही ।
कहा अलावदीन, पातसाह, सोभनंतही ॥
रहो यहाँ अभै सदा हमीर राव यों कहै ।
तजूँ ज तोहिं प्राण साथि और बात यों २ कहै ॥२९८॥
चौपाई छंद
राव हमीर नजरि सब रक्खिय ।
बचन सेख कौ यहि बिधि भक्खिय ॥
तन धन गढ़ घर ए सब जावैँ ।
पै महिमा पतिसाह न पावैँ ॥२९९॥
कहै सेख प्रण समुझि सु किज्जिय ३ ।
मेरी प्रथम अर्ज सुनि लिज्जिय ४ ॥
दसों दिसा मैं मैं फिरि आयव ।
जिते खाँन सुलतान सु गायव ॥३००॥
गजा राँन. राव जितने जग ।
दीन होय देखे ५ सु अगम मग ॥
बाँध तेग साहस करि कोई ६ ।
तजै लोभ जीवन को सोई ७ ॥३०१॥
यह जिय जानि बास मुहिं दीजे ८ ।
सेख राखि ९ सरनै जस लीजे १० ॥
इतनी धरा सेष सिर होई ।
कहै साहि रक्खै नहिँ कोई ॥३०२॥
१ सुतंक जे । २ त्यों । ३ कीजे । ४ लीजे । ५ दिक्खे । ६ कोइय ।
७ सोइय । ८ दिजिय । ९ रक्खि । १० लिजिय ।
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हम्मीररासो ५३
छप्पय छंद
बार बार क्यों कहै सेख उत्कर्ष बढ़ावै।
एक¹ बार जो कही बहुरि कछु और कहावै² ॥
प्रथम बंस चहुवाँन टेक गहि कबहुँ न छंदै।
बहुरि राव हम्मीर हठ न छुटै तन खंडै ॥
थिर रहहु³ राव इम उच्चरै न डरि न डरि अब सेख तुव ॥
उगै न सूर जो तजहुँ⁴ तोहिं चलहिं५ मेरु अरु भुम्मि ध्रुव ॥२०३॥
बकसि सेख कौ बाजि⁶ साज कंचन के साजे।
मुक्त माल सिरपेंच जटित हीरा⁷ छबि छाजे ॥
सकल सथ्थ सिरपाव साल दिन्नव अति⁸ भारिय।
पंच लक्ख को पटौ दियौ आदर भुवकारिय९ ॥
दिन्नी सुठौर¹⁰ सुंदर इकै¹¹ तिहिं देखत¹² हिय हर्षियउ।
उछाह सहित उठि सेख तब आनँद मंगल बर्षियउ ॥३०४॥
दोहरा छंद
महिमा साह जु तुरतही¹³ गए हवेली आप।
देखत ही सब भाँति सुख मिटी सकल तन ताप ॥
महिमानो पठई नृपति, सबै सथ्थ के हेत।
खाँन पाँन लायक जिते, मधु आमिष¹⁴ सु समेत ॥३०५॥
ज दिन सेख दिल्ली तजी, दूत सथ्थ दिय ताहिं।
को रक्खै कित¹⁵ जात यह, लखो जु तुम हूँ वाहि ॥३०६॥
राख्यो¹⁶ राव हमीर तब, महिमा साहु जु पास।
कहै राव सों दूत तब, मत रक्खो तुम¹⁷ पास ॥३०७॥
१ इक्क। २ कढावै। ३ होहु। ४ तजों। ५ चलैं। ६ वाच।
७ हीरन। ८ असि। ९ बहुधारिय। १० जु। ११ यकै।
१२ पिक्खत। १३ तुरत तब। १४ अमिपहा। १५ कत जाइ यह।
१६ रक्खिउ। १७ निज बास।
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५४ हम्मीररासो
अलादीन सू¹ औलिया, फिरत चहूँ दिसि आनि ।
निबल सबल के बाद सों, किन सुख पायौ जानि ॥३०८॥
·मुक्तादाम² छंद
कहै तब दूत सुनो नृप बात ।
बड़ो तुव बंस प्रताप सुहात³ ॥
तजो⁴ रतनागर को सर हेत ।
रत्न अमूल्य⁵ तजो रज हेत ॥३०९॥
कहो गुन कौन रखे इहि⁶ सेख ।
जरत्त जु बाल गहो⁷ सुबिसेष ॥
अजाँन असी जु करै नहिं राव ।
सुनो⁸ तुम नीति जु राज स्वभाव ॥३१०॥
तजो अब इक्क⁹ कुटुंब बचाय ।
तजो गृह इक्क सुग्राम सहाय ॥
तजो पुर इक सुदेस बचाय ।
तजो सब आतम हेत सुभाय ॥३११॥
महा यह नीच अधम्मिय¹⁰ सेख ।
टरचौ नहिं स्वामि तिया गुन देख ॥
बढ़ै पतिसाह¹¹ दिलीपति¹² बैर ।
लख्यौ नहिं आँनन प्रात सुफेर ॥३१२॥
प्रलै जिहिं रोष तजै धर देह ।
हमीर सु राव सुनो रस¹³ भेव ॥
बढ़ै निति नेह तुमै पतिसाह ।
अमीरस मैं बिष घौरत काह ॥३१३॥
१ से । २ मोतीदाम । ३ सुतात । ४ तजो सरनागत । ५ अमोल ।
६ इह । ७ गही । ८ सुनी । ९ एक । १० अधर्मिय । ११ पुनि साह ।
१२ दिलीसहिं । १३ इह ।
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३. तृतीय भाग: अलाउद्दीन खिलजी की चढ़ाई, नुसरत खान वध व रणथम्भौर घेरा
हम्मीररासो ५५
परो १ फिर आप नहीं दुख आय ।
तजो यह जानि प्रथम्म सुभाय ॥
जथा वह रावन जित्ति २ त्रिलोक ३ ।
सुरन्नर नाग रहैं तिहिं ओक ४ ॥३१४॥
करचौ तिन बैर जबै रघुनाथ ।
मिट्यौ गढ़ लंक सुबंकम पाथ ५ ॥
कहो सर ६ कोन करैं पतिसाह ।
करै तब जंग बचो नहिं ताहि ७ ॥३१५॥
छप्पय छंद
कह हमीर सुनि दूत बचन निज असत भाखौं ।
मो बिन ८ और न कोय सेख को सरनै राखौं ॥
गहूँ खाग ९ सनमुक्ख दुहुँ अति गर्व सुद्ध द्रढ़ ।
लहै मुक्ति मग सत्य किधौं रणथंभ महा गढ़ ॥
कहियो निसंक पतिसाह सों सेख सरनि हम्मीर किय ।
सामाँन युद्ध जेते कछू सो अनंत दुग्गह जु लिय ॥३१६॥
दातार छंद
सुनि हमीर के बचन, दूत दिक्खिय दिस आयव ।
करि सलाँम कर जोरि, साह कौं १० सीस नमायव ॥
पूरब दच्छिन देस और पच्छिम दिसि आयव ।
सवै सेख फिरि थकि, कहूँ काहू न रखायव ॥
तब सेख आय रणथंभ गढ़, दीन बचन इम भक्खियौ ११ ।
सुनि हमीर करुणा सहित, सेख बचन दै राक्खयौ १२ ॥३१७ ॥
महरम खाँ वजीरोवाच
समद पार गय सेख, बार हजरत वह नहीं ।
१ परै । २ जीति । ३ तिलोक । ४ वोक । ५ माथ । ६ सरि ।
७ आहि । ८ मुझ बिन । ६ तेग । १० सौं । ११ भाखियौ । १२ राखियौ ।
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५६ हम्मीररासो
राव शेख क्यों रखै, रहत हजरत घर माहीं ॥
फिर न कहो यह वचन, बृथा¹ कबहूँ² अनजानै ।
दूत साह के बचन, सुने सत्कार सुमानै ॥
महरम्म खाँन इम उच्चरै, खबरदार नहिं बेखबरि ।
कहिये जु बात निज द्रगन लखि, असी बात नहिं कहो फिरि ॥३१८॥
दोहरा छंद
महरम खाँ उजीर सों, कहैं बैन पतिसाहि ।
इक फरमाँन हमीर कौं, लिखि भेजहु अब ताहि ॥३१६॥
छप्पय छंद
लिखि हजरति फरमाँन उलटि एलची पठाए ।
हठ मति करो हमीर चौर मति रखो पराए ॥
हम दिल्लो के ईस राव तुमहूँ जु कहावो ।
बढ़े अलसि जिय माहिं³ बैर मैं कहा जु पावो ॥
माल मुलक चाहो जितौ, कहै साहि बहु लिज्जिये⁴ ।
फरमाँन वाँचि⁵ जिय राव तुम, चोर हमारौ दिज्जिये⁶ ॥३२०॥
दोहरा छंद
वाँचि³ राव फुरमाँन तब, दियउ सेस तब अंग ।
वचन दिये मैं सेख कौं, करों शाह सों जंग ॥३२१॥
दियउ⁷ उलटि फरमाँन तब, राव साहि कौ ज्वाब ।
रख्यौ महिमा साहि मैं, तजूँ न तिहिं मैं अब ॥३२२॥
यह फरमाँन जु बाँचि³ कै, करिव साह तब क्रोध ।
खिज्यौ देखि पतिसाह कौ, कियौ उजीर सुवोध ॥३२३॥
छप्पय छंद
कित्तौ गढ़ रणथंभ राव जिस पहँ गर्बाए ।
दसूँ देस बसि किये जीति करि पाँव लगाए ॥
१ व्यर्थ । २ कबहूँन । ३ माँझ । ४ लीजिए । ५ वंचि । ६ दीजिए । ७ दियौ ।
हम्मीररासो ५७
ईस कहौ अब्र कोन जुद्ध जो हम सौं मंडै ।
देत दुनी तैं कढ्ढि गर्व नातैं क्यों मंडै १ ॥
साहिब्ब बचन इम उच्चरै अली औलिया पोर गनि ।
महिमा साह जु रक्खि तुव अजहूँ समुझि हमीर मनि२ ॥३२४॥
दोहरा छंद
दूजा हजरति का लिख्या, बाँचि राव फरमाँन ।
बार बार क्यों लिखत है, तजूँ न हठ की बाँन ॥३२५॥
पच्छिम सूरज उग्गवै, उलटि गंग बह नीर ।
कहो दूत पतिसाह सौं, तौ हठ न तजै हमीर ॥३२६॥
छप्पय छंद
दियौ पद्म ऋषिराज करौं जब लग मैं सोइय ।
जो गढ़ आयौ निमत साह रक्खै नहिं कोइय ॥
अनहोनी नहिं होय होय होनी हैं सोइय ।
रजिक३ मोति हरि हथ्थ डर सु मानव क्यों कोइय ॥
नहिं तजूँ सेख को प्रण करिव सरन धरम छत्रिय तनौं ।
नन है बिचित्र महिमा तनो सत्य बचन मुख तैं भनों ॥३२७॥
चले दूत सुरझाय, दिलिय दिसि कियौ पयानो ।
गढ़ रणथँभ हम्मीर साह कैसै कम जानो ॥
हयद़ल पयद़ल सेन सूर बर बीर सवायौ ।
हठी राव चहुवाँन बंस यहि हठ चलि आयौ ॥
यहि बिधि सु तुमहूँ धर लखै४ हरे५ सकत्त तुम बीर बर ।
अब पतिसाह जु एक भुव६ कै तुम कै जु हमीर बर ॥३२८॥
सुनत दूत कै बचन साहि जब मन मुसकाए ।
कितो राज हम्मीर करै हठ मोहिं बुलाए ॥
१ तंडै । २ तुव । ३ रिजक । ४ लिखै । ५ हरयौ । ६ भव ।
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५८ हम्मीररासो
कितेक गढ़ इक्क ठौर किते उमराव महाबल।
किते बाजि गजराज किते भट बंक महाबल १ ॥
तुम कहो सकल समझाय मुहिं किहिं हेतु इतै २ गर्वहिं बढ़ै।
हम्मीर राव चहुवाँन कै कितौ ३ नृपनि ४ दल सँग चढ़ै ॥३२६॥
हजरति राव हमीर बार बहुतैं समझायव।
सुनि महिमा को नाँम रोष करि गव रिसायव ॥
करौं जुद्ध तिर सुद्ध साह दल खंडि बिहंडौं।
धरौं सीस हर कंठ सुजस तिहिं लोकहिं मंडौं ॥
हम्मीर राव इम उच्चरै गही टेक ५ छाँड़ौं नहीं।
तन जाहु रहै जिय सोच ६ नहिं लाज धरम खंडौं नहीं ॥३३०॥
चौपाई छंद
कहे साहि सुनु दूत सु बैनं।
कहो ७ राव को पन ध्रम एनं ॥
कितौक दल बल सूर समाजं।
कितेक गढ़ सामाँ घर राजं ॥ ३३१ ॥
रहनी करनी प्रजा प्रतापं।
बानी ८ बिरद् ९ दाँन द्रब आपं ॥
नीति अनीति ग्राम गढ़ कैसा।
सहर १० सरोबर बाट जु जैसा ॥ ३३२ ॥
सत्तरि सहस तुरंगम जानो।
दोय लक्ख पयदल भरमानो ॥
सप्तपंच गजराज अमानो ११ ।
होहि कीच मद बहुत सुदानो १२ ॥ ३३३ ॥
१ बड़ा दल । २ येत । ३ कितका । ४ दसम । ५ तेग । ६ लोभ ।
७ कहै । ८ बाना । ६ बिर्द । १० सहस रोष बाग जु जैसा । ११ मानै ।
१२ दानै ।
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हम्मीररासो ५९
रनथंभौर ग्वालियर बंका।
नरवल¹ औ चित्तौड़ सु तंका ॥
रहै जखीरा गढ़ कै जेता।
अनगिन² वस्तु न जानत तेता ॥ ३३४ ॥
तुरी सहस इकतीस सु सज्जै।
अरु गजराज असी मद गज्जै ॥
सूर वीर दस सहस अमानो।
इते राव रणधीर के जानो ॥ ३३५ ॥
दोहरा छंद
मेटि मसोत (द) जु सकल तहँ,³ कीके⁴ मंदिर देस।
बाँँग निबाज. न होय जहँ, स्रवन कथा हरि बेस ॥३३६॥
नहिं कुराँन कलमा नहीं, मुसलमाँन नहिं पीर।
च्यारि बरण आश्रम सुखी, देस हमीर सु धीर ॥३३७॥
अपनै⁵ अपनै धर्म्म मैं, रहैं सबै नर नारि।
राजनीति पन तेजजुत, फरै राव⁶ सुखकारि ॥३३८॥
कर काहू कै होय नहि, दुखी न कोऊ दीन।
आश्रम किते नबीन⁷ है, ऊँवे मंदिर बीन⁸ ॥३३९॥
पद्धरी छंद
रणथंभ दुग्ग बहु बिकट⁹ जानि।
तिहिं दरा च्यारि मग सुगम मानि ॥
घाटी सु च्यारि अस्सी सु और।
है गै न चलैं अति कठिन ठौर ॥३४०॥
१ नरवल मनु (मन) चीतोड़ सुतंका । २ अगणत । ३ तिहँ ।
४ किन्नै । ५ अप्पन । ६ राज । ७ अनूप । ८ दीस, ईस, अंत्यानुप्रास ।
९ दुर्ग बहु विधि सु ।
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६० \t हम्मीररासो
सरवर सु पंच जल अगम सोय ।
बहु रंग कमल फुल्ले सु जोय ॥
चहुँ ओर नीर को नहिंन छेह ।
परबत अनूप जल भरै एह ॥३४१॥
सो इहै अगम पहुँचे न खग्ग ।
गढ़ चढ़ै कवन जहँ इक्क१ मग्ग ॥
अरु भरे दोय भंडार अन्न ।
दस लक्ख कोरि दस सहस मन्न ॥३४२॥
दस लक्ख सूत सन्न घरे संचि ।
द्विप२ दोय लक्ख धरि धातु खंचि ॥
घृत सहस बीस मन भरे हौद ।
दोय लक्ख पैद चहुँ गढ़न कौद+ ॥३४३॥
बिन तोल नोन३ पर्वत सु तच्छ ।
दस सहस अमल आफू* सुलच्छ ॥
मृगमद कपूर केसरि सुगंध ।
भरि रहे भौन सौंधे सुबंध ॥३४४॥
नहिँ तोल तेल लोहा प्रमाँन ।
बारुद्व सुद्ध नव लच्छ जाँन ॥
अरु पतो जानि सीसो सु सुद्ध ।
नव लक्ख धरचौ संचय सुमुद्ध ॥३४५॥
अरु इतौ राव कै नित्त दाँन ।
पँच तोलि पंच मुहरैं सुमानि ॥
दस दोय धेनु तरुणी सु वच्छ ।
१ एक । २ द्वप । ३ लवण ।
- कौद (कोद)—ओर । * आफू=अफीम ।
हम्मीररासो ६१
सोबरन १ स्रिंग स्रिंगार सुच्छ ॥३४६॥
यह अधिक जानि दीजे२ सु बिप्र ।
उगंत सूर दिज्जे३ सु छिप्र ॥
जीमंत बिप्र सब राजद्वार ।
लंगर सु अनगिनित बटत सार ॥३४७॥
बहु अंध पंगु अरु बधिर कोय ।
सो करैं४ भोज नृप कै सजोय ॥
दस दोय अन्न मन परै और ।
खग सकल चुगैं तहँ ठौर ठौर ॥३४८॥
गणनाथ आदि सब लसैं देव ।
नृप आप५ करत करि नमत सेव ॥
सिव बसैं नंदि भैरव समेत ।
भव भवा सबै परिकर समेत६ ॥३४९॥
द्रढ़ महा वंक गन्नेस गढ्ढ ।
बिन मग्ग सकै पंछी न चढ्ढ ॥
बड़ तोप सतरि गढ़ पै अचल्ल ।
तब छुटत सोर पर्वत७ सुहल्ल ॥३५०॥
छुटंत गर्भ सुकंत नीर८ ।
मन वज्रपात सुकत समीर ॥
आसा सु नाँम राणी सु एक ।
पतिब्रत्त धर्म्म देबी सु टेक ॥३५१॥
रणथंभ नाथ सुत इक्क९ पूर ।
चंड तेज मनूँ ऊगंत सूर१० ॥
१ सुवरन्न। २ दिज्जे । ३ दीजे । ४ सुइ करि भोजन । ५ अप्प ।
६ सहेत । ७ पब्बय । ८ सूकंत नीर । ६ एक । १० चढ़ि तेज मनहुँ
उग्गंत सूर ।
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६२ हम्मीररासो
रतनेस नाँम जम है बिख्यात ।
चित्तोड़ दुग्ग पालै सु तात ॥३५२॥
सँग रहै सुभट थट विक्ट संग¹ ।
को करै तिनहिं तैं रणहिं रंग ॥
तप तेज राव बृषभाँन जेम ।
पर दुख कट्टन बिक्रम सु तेम ॥३५३॥
देखंत² रूप मनु काँमदेव ।
सुइ काछ बाछ निकलंक भेव ॥
अरु खेत जुरे नहिं देत पिट्ठि ।
अरि लखत देखि नहिं परत³ दिट्ठि ॥३५४॥
बहु बाग चहूँ दिसि सघन हेरि ।
गंभीर गहर उपषन सु भेरि ॥
बहु अंब⁴ बृक्ष फल झुकत भार ।
दाड़िम समूह निंबू अपार ॥३५५॥
वहु सेवराज जामुन समूह ।
नारंग रंग महुवा समूह ॥
खिरनी सकेलि नारेल⁵ बृंद ।
खीरा कि चिरुँजी मधुर कंद⁶ ॥३५६॥
कटहल कदंब बड़हल अनेक ।
महुवा अनंत कद्दलि बिसेक(ष)⁷ ॥
तहँ मोलसिरी सोहैं गंभीर ।
माघी सकेत सोहंत धीर⁸ ॥३५७॥
फुलवारि गुंज अति अमर होत⁹ ।
१ बिकट थट्ट रह सुभट संग । २ पिक्खंत । ३ परम । ४ आम्र ।
५ नरियल । ६ कंज । ७ ऊभरि अनंत घोटा सु एक । ८ मधि किते
सरणँ (सहं) सोहंत कीर । ६ फुलवारि भौर गुंजार होत ।
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प्रफुल्लिन¹ गुलाब चंपा उदोत ॥
कहूँ² रहे केतिक्की वृंद फुल्लि ।
अहि भ्रमर गंध सहि रहे भुल्लि ॥३५८॥
कहूँ रहे केवरा जुही जाय ।
संदुप्य³ ओर संभो सु आय⁴ ॥
आचीन नरगिस औ असोक⁵ ।
पाटल⁶ सचमोलिय बोलि कोक⁷ ॥३५९॥
एला लवंग अंगूर वेलि ।
माधुज्ज लता माधुरी मेलि ॥
तरु ताल तमाल रु ताल और ।
ता मध्य कमल अरु कुमुद भौर ॥३६०॥
चहुँ ओर सघन पर्वत सुगंध ।
जलजंत्र छुटै ऊचे सवंध ॥
पिक मोर हंस चकवा बिहंग ।
सुक चाय(त)क कोकिल रमत संग ॥३६१॥
चहुँ ओर बाग बारी अनूप ।
तिहि मध्य दुर्ग रणथंभ भूप⁸ ॥३६२॥
यह दूत के बचन सुनि दरबार कियौ ।⁹
छप्पय छंद
क्या हमीर मगरूर पलक मैं पाय लगाऊँ ।
खूनी महिमा साह उसे गहि दिल्लिय लाऊँ ॥
१ फुल्लित । २ बहु । ३ संदूप । ४ सब्बो सु आम । ५ आचीन नग-
रसा (नरगसा) औ असोक । ६ पाडल । ७ सतवर्ग और श्रीखंड
कुंद, किंसुक सुमालती सेवतिहिं मंद । मधुबन बसंत सिंगार हार, मोतिया
मदनसर फुल्ले-२ । ८ मध्य दुग्ग दुग्गं सुभूप । ६ दूत के बचन सुने तब
पातसाह ने दरबार कर्यौ ।