हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ६१
सोबरन १ स्रिंग स्रिंगार सुच्छ ॥३४६॥
यह अधिक जानि दीजे२ सु बिप्र ।
उगंत सूर दिज्जे३ सु छिप्र ॥
जीमंत बिप्र सब राजद्वार ।
लंगर सु अनगिनित बटत सार ॥३४७॥
बहु अंध पंगु अरु बधिर कोय ।
सो करैं४ भोज नृप कै सजोय ॥
दस दोय अन्न मन परै और ।
खग सकल चुगैं तहँ ठौर ठौर ॥३४८॥
गणनाथ आदि सब लसैं देव ।
नृप आप५ करत करि नमत सेव ॥
सिव बसैं नंदि भैरव समेत ।
भव भवा सबै परिकर समेत६ ॥३४९॥
द्रढ़ महा वंक गन्नेस गढ्ढ ।
बिन मग्ग सकै पंछी न चढ्ढ ॥
बड़ तोप सतरि गढ़ पै अचल्ल ।
तब छुटत सोर पर्वत७ सुहल्ल ॥३५०॥
छुटंत गर्भ सुकंत नीर८ ।
मन वज्रपात सुकत समीर ॥
आसा सु नाँम राणी सु एक ।
पतिब्रत्त धर्म्म देबी सु टेक ॥३५१॥
रणथंभ नाथ सुत इक्क९ पूर ।
चंड तेज मनूँ ऊगंत सूर१० ॥
१ सुवरन्न। २ दिज्जे । ३ दीजे । ४ सुइ करि भोजन । ५ अप्प ।
६ सहेत । ७ पब्बय । ८ सूकंत नीर । ६ एक । १० चढ़ि तेज मनहुँ
उग्गंत सूर ।
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