हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रफुल्लिन¹ गुलाब चंपा उदोत ॥
कहूँ² रहे केतिक्की वृंद फुल्लि ।
अहि भ्रमर गंध सहि रहे भुल्लि ॥३५८॥
कहूँ रहे केवरा जुही जाय ।
संदुप्य³ ओर संभो सु आय⁴ ॥
आचीन नरगिस औ असोक⁵ ।
पाटल⁶ सचमोलिय बोलि कोक⁷ ॥३५९॥
एला लवंग अंगूर वेलि ।
माधुज्ज लता माधुरी मेलि ॥
तरु ताल तमाल रु ताल और ।
ता मध्य कमल अरु कुमुद भौर ॥३६०॥
चहुँ ओर सघन पर्वत सुगंध ।
जलजंत्र छुटै ऊचे सवंध ॥
पिक मोर हंस चकवा बिहंग ।
सुक चाय(त)क कोकिल रमत संग ॥३६१॥
चहुँ ओर बाग बारी अनूप ।
तिहि मध्य दुर्ग रणथंभ भूप⁸ ॥३६२॥
यह दूत के बचन सुनि दरबार कियौ ।⁹
छप्पय छंद
क्या हमीर मगरूर पलक मैं पाय लगाऊँ ।
खूनी महिमा साह उसे गहि दिल्लिय लाऊँ ॥
१ फुल्लित । २ बहु । ३ संदूप । ४ सब्बो सु आम । ५ आचीन नग-
रसा (नरगसा) औ असोक । ६ पाडल । ७ सतवर्ग और श्रीखंड
कुंद, किंसुक सुमालती सेवतिहिं मंद । मधुबन बसंत सिंगार हार, मोतिया
मदनसर फुल्ले-२ । ८ मध्य दुग्ग दुग्गं सुभूप । ६ दूत के बचन सुने तब
पातसाह ने दरबार कर्यौ ।